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Monday, November 14, 2016

अपने हिस्से की क़ुर्बानी--लघुकथा

"अरे अम्मा, पगला गयी हो क्या, अपना काम कैसे चलेगा, पता नहीं कितना दिन ये चलेगा", छोटका ने माँ को एक बार फिर से चिल्लाकर कहा|
"अपना काम तो चल ही जायेगा, लेकिन पड़ोस के तय्यब मियां का क्या होगा| तीन दिन से दिहाड़ी नहीं किया है उन्होंने, उनके बच्चों की भूख अब नहीं देखी जाती", अम्मा ने चिंतित स्वर में कहा|
"अपने घर में ही कहाँ बहुत है और पैसे भी तो ज्यादा नहीं हैं| मैं तुमको नहीं ले जाने दूँगा", छोटका अम्मा के सामने आकर खड़ा हो गया|
"अरे बेशर्म, एक टाइम का खाना अगर छोड़ दिया भी तो मर नहीं जायेंगे हम लोग| लेकिन मेरे रहते किसी के घर में फांके पड़े, मुझसे देखा नहीं जायेगा", अम्मा ने उसका हाथ झिड़क दिया|
"आखिर एक फौजी का खून है मुझमें, और आहुति सिर्फ सीमा पर खड़े लोग ही नहीं देते| थोड़ी बहुत क़ुर्बानी तो हमको भी देनी पड़ेगी अपने मुल्क और अपने लोगों के लिए", कहते हुए अम्मा निकल गयीं|
छोटका ने एक बार घर में अपनी बीबी की तरफ देखा और उसकी नजर में भी हिकारत के भाव देखकर बाहर निकल गया|
थोड़ी देर बाद वह एक बैंक के सामने लाइन में खड़े लोगों को पानी पिला रहा था|

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