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Tuesday, April 21, 2015

बोझ--

आज फिर आँख खुल गयी उसकी | बगल में गहरी नींद में सोये , बेहद प्यार करने वाले उसके पति को क्या ये नहीं जानना चाहिए | जो हुआ वो तो एक हादसा ही था , सबने तो यही समझाया था | माँ ने तो शादी के समय उसे अकेले में कई बार समझाया था , इस हादसे का जिक्र वो भूल कर भी नहीं करे किसी से , खासकर पति से तो कदापि नहीं |
बहुत छोटी थी वो , अगल बगल के घरों में बेरोकटोक खेलने जाती रहती थी | एक दिन खेल खेल में ही पता नहीं क्या हुआ , कुछ घंटों बाद उसे होश आया तो वो बिस्तर पर पड़ी थी | कोई कुछ बताने को तैयार नहीं था , एक दो दिन बाद उसने देखा कि बगल का घर खाली हो गया था | धीरे धीरे समय के साथ उसे भी पता चल गया | 
अगर उसका कोई दोष नहीं था तो फिर ? कल ये सब वो उसे बता देगी , शायद दिल का बोझ हल्का हो जाए |

खुदगर्ज़--

श्मशान घाट से लौटते समय उसके कदम उठ ही नहीं रहे थे । काश उसने बेटी की बात मान ली होती तो शायद ये दिन नहीं आता । कौन सा उसने कोई अलग आसमां माँग लिया था , बस इतना ही तो कहा था कि वो किसी और से शादी करना चाहती है ।
लेकिन जब माँ ने उससे पिता की इज़्ज़त का हवाला दिया तो वो चुपचाप तैयार हो गयी । शायद वो कहीं बहुत ज्यादा प्यार करती थी ।
दहेज़ लोभियों ने उसे मौत के घाट उतार दिया और उसने कभी कुछ नहीं बताया । बेटी की अर्थी का बोझ तो उठा लिया उसने लेकिन अब अपने दिल का बोझ ?

Monday, April 20, 2015

सपनों का जहाँ--

" मम्मी , आप भी आओ ना , हमारे साथ देखो अन्तरिक्ष को , कितने प्यारे प्यारे सितारे हैं वहां ", बेटी की पुकार पर उसने बाहर देखा । 
बेटी को अपने पिता के साथ अन्तरिक्ष निहारते देख उसकी आँखें भर आयीं । 
काश उसे भी ये मौका मिला होता तो शायद वो भी अपने सपनों का जहाँ बसा सकती थी । उसने दृढ निस्चय कर लिया कि बेटी को उसके सपनों का जहाँ दिला के ही रहेगी , किसी भी हाल में ।

Wednesday, April 15, 2015

पाप --

आज फिर से बादल , मौसम को ई का हो गया है , रामदीन सोच में डूब गया | आधे से ज्यादी फसल तो पहले ही चौपट हो गयी है , ऊपर से अगर घाम न हुआ तो पकेगी कैसे बची खुची फसल | कुछ समझ नहीं आ रहा था उसको | थोड़ी देर बाद वो उठा और कुम्हार टोला की ओर निकल गया | वहां रघू भी अपने सर पर हाँथ रख कर बैठा था , उसे देखते ही बोला " अरे ई मौसम को का हो गवा है , एकदम समझ नहीं आवत है एकर मिज़ाज़ | बर्तन तो तैयार ही नहीं हो पावत हैं , कइसे दो जून की रोटी का इंतज़ाम होई "|
कोई जवाब नहीं था उसके पास , चुपचाप उठा और वापस खेत की ओर निकल पड़ा | पगडण्डी गीली थी और उससे ज्यादा गीला था उसका मन | कइसे होगा इस बार सबके लिए भोजन का इंतज़ाम , अगली फसल के लिए भी तो खाद , बीज लेना है | इन्ही विचारों से जूझता हुआ वो अपने खेत पहुंचा तो सन्न रह गया | एक बछिया उसके खेत में घुस के बची खुची फसल चबा रही थी | मन एकदम से क्रोध से भर गया उसका और पास पड़ी ईंट उठाकर उसने पूरी ताक़त से बछिया को मारा | ईंट सीधी उसके सर पर लगी और वो दो चार कदम दौड़ कर उसके खेत में ही गिर पड़ी | उसके गिरते ही रामदीन की चेतना जागी , वो भाग कर बछिया के पास पहुंचा , पर वो तो मुंह से खून उगलती मृतप्राय हो गयी थी |
अब क्या हो , गौ हत्या का पाप लग जायेगा उसके ऊपर | सर पकड़ कर वो बछिया के पास बैठ गया । अचानक बछिया ने आखिरी हिचकी ली और रामदीन उसको देखते हुए फफक कर रो पड़ा |  

Tuesday, April 14, 2015

फ़र्ज़--

" काश , बस एक बार मौका मिल जाता , एक गोली दुश्मन के सीने के पार , फिर चाहे खुद शहीद हो जाऊँ " । 
ये कई बार सुन चुका था साथी जवान , उसने बड़े प्यार से पूछा " अच्छा ये बता , तूँ यहाँ क्यूँ खड़ा है । इसीलिए ना कि तुम्हारे देश पर कोई आँच न आये , कि दूर कहीं हमारे बीबी बच्चे चैन की नींद सो सकें "। 
" इसीलिए तो कह रहा हूँ कि काश " 
बीच में ही बात काटते हुए साथी जवान ने फिर कहा " सामने जो सैनिक खड़ा है , वो भी तो इसीलिए खड़ा है कि उसका देश सुरक्षित रहे , उसके देशवासी चैन की नींद सोएं । अब ये बता कि देश की सुरक्षा के लिए क्या जरुरी है कि हम ख़ून ही बहाएं "।
" देश की सुरक्षा इसमें है की हम यहाँ मुस्तैदी से अपना फ़र्ज़ निभाएं । हमारी जिंदगी देश के लिए ज्यादा जरुरी है "।
रात ढलने लगी थी , जवान अब पूरी मुस्तैदी से अपना कर्तव्य निभा रहा था , दूर कहीं उसके अपने परिवार के लोग चैन की नींद सो रहे थे ।

इरादा--

" मैं चलती हूँ माँ , स्कूल खुलना जरुरी है "। 
" पर बेटी , अगर उन्होंने फिर से हमला कर दिया तो ? मैं बेटे को तो खो चुकी हूँ , अब तुम्हें नहीं खोना चाहती "। 
" अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो , ये तो उनकी जीत होगी माँ "।
और उसके कदम स्कूल की ओर बढ़ गए ।

उत्थान--

अम्बेडकर जयंती की तैयारी जोर शोर से चल रही थी ।
" इस बार मुख्य अतिथि अपने खेलावन चाचा रहेंगे "।
" लेकिन क्यों बेटा , सरपंच जी ने मना कर दिया क्या ?
" चाचा , सिर्फ जयंती मनाने से कुछ नहीं होगा , पहले हम खुद तो इस मानसिकता से बाहर निकलें "।







Friday, April 3, 2015

अप्रैल फूल--

" कहाँ चले आप इतना सज धज के , आज तो छुट्टी है न ऑफिस की ", जैसे ही उस्मानी साहब घर से निकलने को हुए , बेगम ने टोक दिया | एक बार तो बहुत जोर का गुस्सा आया उनको , कितनी बार मना किया है कि निकलते समय मत टोका करो , लेकिन आज बात न बढ़े इस वज़ह से टाल गए | बस आधे घंटे बचे थे पार्क पहुँचने के लिए | उनकी नयी सोशल फ्रेंड ने समय जो दिया था मिलने के लिए |
" कुछ नहीं बेगम , ज़रा यूँ ही टहलने जा रहा था | थोड़ी देर में आ जाऊंगा , कुछ लाना है तो बता दीजिये "|
" ठीक है , लेकिन जल्दी आइएगा ", बेगम ने अपनी मुस्कराहट दबाते हुए कहा |
इधर उस्मानी साहब घर से निकले , उधर बेगम और बेटी हँसते हँसते लोट पोट होने लगीं | उनके बिछाए जाल में फंस कर उनको आज की तारीख भी याद नहीं रही |

सीढ़ी--

अब वो सफलता की बुलंदियों पर था , उसकी पहली ही फिल्म जबरदस्त हिट हो गयी थी | सामने खुला आसमान था जिसमे उसकी मंज़िल उसे दिख रही थी | सभी बधाईयां दे रहे थे उसको , फोटोग्राफर्स अपने फ़्लैश चमका रहे थे | कल तक जो लोग उसको मिलने का समय भी नहीं देते थे , वो आज साइनिंग अमाउंट लेकर घेरे हुए थे |
वहीँ किनारे खड़ी वो सोच रही थी कि जब तक इसे मेरी जरुरत थी तो मुझे सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया | उसने बड़ी मुश्किल से अपने पिता को तैयार किया था इसको मौका देने के लिए | और आज उसकी अहमियत घाँस की तरह हो गयी थी |