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Tuesday, June 28, 2016

सरकारी पैसा--लघुकथा

"साहब, बहुत गरीब किसान हूँ, फसल भी नहीं हुई इस बार, कहाँ से चुका पाऊँगा| तहसील में केस मत भेजिये, नहीं तो ज़मीन भी कुर्क हो जाएगी", सामने खड़ा व्यक्ति एकदम फटेहाल था और उसका चेहरा बंजर ज़मीन की तरह स्याह था|
एक बार उसने सर उठा कर देखा और फिर वसूली नोटिस साइन करने में व्यस्त हो गया| मार्च का महीना, रिकवरी का बड़ा टारगेट और उच्चाधिकारियों का लगातार दबाव, उसे कुछ और सोचने का मौका ही नहीं दे रहा था|
"पैसा तो देना ही पड़ेगा, आखिर सरकारी पैसा है", थोड़ा गुर्राते हुए उसने कहा|
"इस बार की मोहलत दे दीजिये साहब, अगले फसल में जरूर चुकता कर दूंगा| बिटिया का गौना भी देना है", कहते हुए उसने अपने गमछे से माथे पर चू आये पसीने को पोंछा|
तभी फोन की घंटी बजी, फोन पर बस यही कह पाया "यस सर, हो जायेगा, अभी भेजता हूँ समझौता प्रस्ताव"| फोन रखकर उठा तो सामने खड़े उस किसान को देखकर उखड गया "मुझे कुछ नहीं पता, या तो इसी महीने पैसे जमा करो, या फिर तहसील में केस भेज दूँगा", कहते हुए वो एक फाइल ले आया|
थोड़ी ही देर में उसने दो हस्ताक्षर किये, एक उस समझौता प्रस्ताव के लिए जिसमे ब्याज मिलाकर कुल २५ लाख की राशि के लिए बैंक ५ लाख में समझौता कर रहा था और दूसरा उस किसान के ६० हजार के लिए केस को तहसील में भेजने के लिए| उसका वसूली का टारगेट पूरा होने की सम्भावना काफी बढ़ गयी थी|
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सरकारी पैसा--
"आइए अमीन साहब, कुछ कीजिये आप, बहुत कमजोर है वसूली इस बार", सामने अमीन को देखकर वो कुर्सी से खड़ा हो गया| मार्च का महीना चल रहा था और वसूली के लिए भयानक दबाव था उच्चाधिकारियों की तरफ से|
"अरे क्या कहा जाए, दो महीने बाद चुनाव है और नेता लोग घूम घूम के किसानों को समझा रहे हैं कि कर्ज़ा माफ़ हो जायेगा| अगर किसी को धमकाओ तो सीधा किसी नेता के पास पहुँच जाता है और फिर ऊपर से फोन आ जाता है तंग नहीं करने के लिए", अमीन साहब ने अपनी मज़बूरी बताते हुए बैग टेबल पर रख और बैठ गए|
"कुछ तो कीजिये, नहीं तो वसूली का टारगेट पूरा नहीं हो पाएगा| रोज क्लास लग रही है हमारी" अपने आप को जितना बेचारा बना सकता था उतना बनाया उसने|
"ठीक है, तो एक काम करता हूँ| आप कुछ ऐसे किसानों का केस दीजिये, जिनका खेत बहुत कम हो| ऐसे लोग डरकर पैसा भर ही देते हैं, नहीं तो उनके खेत भी नीलाम कर देंगे", अमीन साहब ने सुझाव दिया|
थोड़ी ही देर में उसने कई हस्ताक्षर किये, एक उस समझौता प्रस्ताव के लिए जिसमे ब्याज मिलाकर कुल २५ लाख की राशि के लिए बैंक ५ लाख में समझौता कर रहा था और बाकी कई उन किसानों के केस को तहसील में भेजने के लिए, जिनके पास खेत कम थे|  

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