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Friday, June 24, 2016

नफरत-लघुकथा

"दवा पी लिया है, अब आराम से सो जाओ, कल तक बेहतर हो जाओगी", उसने अंगूरी बाई को बिस्तर पर आहिस्ता से लिटाते हुए कहा| कई दिनों से अंगूरी बाई की तबियत ख़राब चल रही थी, उम्र भी काफी हो गयी है उसकी और ध्यान रखने वाला भी उसके सिवा कोई नहीं रहा|
"तुम आज भी बाई का इतना ख्याल रखती हो, हमें तो नफरत होती है इससे", पास ही खड़ी एक दूसरी बाई कटुता भरे शब्दों में बोली|
"क्या करूँ, मन नहीं मानता मेरा", वो उसके सर को सहलाते हुए बोली|
"इस औरत से कैसी हमदर्दी, आखिर इसने ही तो हमें इस गंदे धंधे में डाला था| मेरा चलता तो इसे छोड़ देती मरने के लिए", दूसरी बाई का स्वर अभी भी उतना ही कड़वा था|
"नफरत मुझे भी है, लेकिन ये तो उस नफरत के लायक भी नहीं है, इसपर तो दया आती है बस| हाँ, आज भी उतनी ही नफरत होती है अपने अपनों से, जिन्होंने जानबूझ कर मुझे इस धंधे में डाल दिया| जब अपने ही ऐसे हों, तो इन बेगानों से कैसी नफरत, ये तो सिर्फ अपना धंधा चला रही थी", कहते हुए उसकी आँखों से अंगारे बरसने लगे|
दूसरी बाई उसे एकटक देख रही थी, और उसने उसका हाथ धीरे से पकड़ लिया| उसकी नफरत भी अब मायने बदल रही थी| 

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