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Thursday, June 16, 2016

संतुलन--लघुकथा

पूरा दिन बेहद थकाऊ था आज और उसने सोचा कि घर जाकर चुपचाप लेट जाएगा। नयी जिम्मेदारी ने उसे जितनी सन्तुष्टि दी, उतना ही तनाव भी बढ़ा दिया था। घर में घुसते ही उसे लग गया कि आज फिर कुछ हुआ है, पत्नी का चढ़ा चेहरा और माँ का उतरा चेहरा सब कुछ बता रहा था। अब उसकी अपनी थकान गायब हो गयी, कैसे समझाए इन दोनों को। कारण पूछने पर अक्सर दोनों में कौन गलत है, उसे समझ नहीं आता।
" एक ग्लास पानी मिलेगा क्या, बहुत थक गया हूँ", उसने थोड़ी ऊँची आवाज़ में कहा।
थोड़ी देर में पत्नी ने पानी उसके सामने रखा, लेकिन रखने के ढंग ने सब बता दिया।
"एक नया माल खुला है मेरे ऑफिस के सामने, इस सन्डे चलते हैं", उसने फिर थोड़ी ऊँची आवाज़ में कहा। पत्नी ने कुछ कहा तो नहीं लेकिन चेहरे पर फ़र्क़ नज़र आ गया। वो बाहर निकला और माँ के सामने जाकर बैठ गया।
"आज मटर का निमोना खाने का मन था लेकिन पता नहीं मटर है कि नहीं", उसने एक बार फिर ऊँची आवाज़ में कहा।
"मटर है ना, अभी बनाती हूँ", कहते हुए माँ उठी और फ्रिज से मटर निकालने लगी।
अब वो आराम से सोफे पर लेटकर टी वी देख रहा था, किचेन में माँ निमोना बनाने में व्यस्त थी और पत्नी भी कुछ गुनगुनाते हुए चाय बना रही थी।

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