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Monday, June 27, 2016

संतुष्टि--लघुकथा

डॉक्टर बहुत उलझन में पड़ गए थे, सामने बैठे मरीज की वेशभूषा उसके आर्थिक स्थिति को स्पष्ट बता रही थी| लगभग ५५ वर्ष की महिला जो, अपनी उम्र से कहीं बहुत ज्यादा बुजुर्ग लग रही थी, गरीबी और वक़्त के थपेड़ों ने दरअसल अपना काम बखूबी किया था| उसने आते ही लगभग उनके पैर ही पकड़ लिए थे और उसकी आँखों ने वो सब भी बता दिया था जो वो जबान से नहीं बोल पायी थी| एक बार फिर उन्होंने सामने पड़े रिपोर्ट्स पर नज़र डाली जो उसका पति लेकर आया था| सामान्य सी बीमारी थी, लेकिन तमाम महंगे टेस्ट करवा लिए थे उस डॉक्टर ने, जिसकी न तो जरुरत थी और न उसे करा सकने की उस व्यक्ति की हैसियत लगती थी|
मन में तमाम भाव आ जा रहे थे, क्या उसे बता दें कि पिछले एक महीने से उसने बेवजह पैसे बर्बाद किये थे| उस डॉक्टर के बारे में उनको भी पता चल गया था कि कैसे वो लोगों को चूसता है, लेकिन था तो हमपेशा ही| फिर उन्होंने इण्टरकॉम पर अपने असिस्टेंट को बुलाया और उसे मरीज के लिए १५ दिन की दवा देने के लिए और फीस वापस करने के लिए कह दिया|
"आप निश्चिन्त होकर जाइए, अगर जरुरत पड़ी तो १५ दिन बाद फिर आ जाईयेगा| वैसे अब ये एकदम ठीक हो जाएँगी, थोड़ा खाने पीने का ध्यान रखिये इनका| और हाँ, कुछ भी हो, मुझे ही दिखाइएगा आगे से" कहते हुए डॉक्टर उठ खड़े हुए| उस महिला और उसके पति ने बेहद कृतञता से हाथ जोड़े और बाहर निकल गए| डॉक्टर के चेहरे पर एक संतुष्टि का भाव आ गया, अपने हमपेशा के करतूत की कुछ तो भरपाई कर दी थी उन्होंने|
लेकिन उनको अपने पेशे में लोगों का विश्वास जिन्दा रख पाने की संतुष्टि सबसे ज्यादा थी|       

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