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Thursday, June 30, 2016

आक्रोश- लघुकथा

आज रात फिर पी कर आया था जमुना, रुक्मी के तन बदन में आग लग गयी| कितना भी वो मना करे, मानता ही नहीं है, और कहीं ज्यादा बोल दिया तो पीट के रख देता है| घर में उन दोनों के अलावा सिर्फ जमुना की माँ ही थी जो हमेशा खामोश ही रहती थी| हां उसकी ऑंखें बहुत कुछ कहती थीं रुक्मी से, और अक्सर उनमे पछतावा ही दिखता था रुक्मी को|
"कुछ खाने को देगी या सब अपने यार को खिला दिया", कहते हुए जमुना झोलंगी खटिया पर ढह गया| इतनी पी रखी थी उसने कि खड़ा भी नहीं हो पा रहा था और पूरी झोपडी शराब की बदबू से भर गयी थीं| रुक्मी के लिए बर्दास्त करना बहुत मुश्किल था, उसने जल्दी से थाली में कुछ खाने के लिए निकाला और जाकर खटिया पर रख दिया| फिर वो माँ को भी खाने के लिए बुलाने चली गयी|
जब दोनों वापस आईं तो बदबू कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी थी| किसी तरह से नाक पर हाथ रखकर वो खटिया के नजदीक गयी तो देखा कि जमुना ने उलटी कर दी थी और पानी पानी बड़बड़ा रहा था|
"रुको पानी लाती हूँ", कहकर रुक्मी पलटी और बाहर जाकर लोटे में पानी भरने लगी| जैसे ही वो पानी लेकर मुड़ी, माँ ने उसका हाथ पकड़ कर लोटा छीन लिया|
"क्या कर रही हो माँ, उसको पानी दे दें, नहीं तो उसी गंध में पड़ा रहेगा", रुक्मी ने हैरानी से कहा|
"जिस गंध में उसने हम दोनों को डाल रखा है, उससे तो कम ही है ये गंध", कहते हुए माँ ने पानी फेंक दिया और
रुक्मी को बाहर निकाल कर दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया| थोड़ी देर में ही दोनों बैठ कर खाना खा रही थीं और रुक्मी को माँ की आँखों में पहली बार थोड़ी संतुष्टि नज़र आ रही थी| 

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