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Friday, June 17, 2016

आग--लघुकथा

"अरे फिर से छाने लगे सब अपना छप्पर, देखते हैं कितनी बार करेंगे| एकाध बार और जलवाना पड़ेगा, फिर तो आएंगे ही अपने पास गिड़गिड़ाते हुए", प्रधानजी अपने सामने बैठे चेलों को समझा रहे थे| पुलिस उनके साथ थी लेकिन अंदर ही अंदर उनको चिंता भी होने लगी थी, ऐसा पहली बार हुआ था|
कुछ ही दिनों में पंचायत चुनाव था और उनको उम्मीद थी कि कोई उनके सामने खड़ा नहीं होगा| देशी दारु और मटन का इंतज़ाम करवा दिया था उन्होंने लेकिन इस बार उस बस्ती के लोगों ने अपना उम्मीदवार खड़ा कर दिया था| दो बार उनके छप्पर वो जलवा चुके थे, लेकिन वो लोग फिर से छप्पर छाने लगते|
"आज फिर से आग लगा देना छप्परों में और इस बार एकाध जानवर भी जल जाए तो ही समझेंगे सब", सामने रखा मदिरा का ग्लास उठाकर गटकते हुए प्रधानजी ने कहा| चेले सर हिलाकर उठकर बाहर निकल गए, प्रधानजी ने एक बार और ग्लास भरा|
उधर उस बस्ती में लोग उतने ही उत्साह से छप्पर छा रहे थे| इतने सालों से भूख की आग झेल रहे वो लोग अब किसी भी आग का सामना करने के लिए कमर कस चुके थे| 

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