24. अगर किसी हिंदुस्तानी को कहा जाये कि आप को नौकरी में हर हफ्ते दो छुट्टियां मिलेंगी और त्यौहारों पर अलग से छुट्टी मिलेगी, तो शायद ख़ुशी के मारे उसका दम ही निकल जाए| हफ्ते क्या महीने में भी त्यौहारों के अलावा अगर दो छुट्टी मिल जाए कर्मचारियों को (खासकर बैंक वालों को) तो वह काफी प्रसन्न हो जायेंगे| लेकिन अगर उनको ये कह दिया जाए कि साल के ११ महीने हर हफ्ते दो छुट्टियां, त्यौहारों पर अलग से छुट्टी, कोई त्यौहार अगर शनिवार को पड़ गया तो उसके लिए सोमवार को भी अलग से छुट्टी तो मिलेगी ही, साथ ही साथ साल में पूरे एक महीने की छुट्टी अलग से मिलेगी तो शायद आदमी पागल ही हो जायेगा|
अब यहाँ आने से पहले तो हम लोग महीने में अगर दो दिन भी छुट्टी मिल जाती थी तो खुश हो लेते थे, लेकिन जब इस देश में आये तो पता चला कि यहाँ काम कम और छुट्टियां ज्यादा हैं| हर हफ्ते दो छुट्टियां, त्यौहारों पर अलग से छुट्टी और फिर जब दिसम्बर आया तो पता चला कि यहाँ दिसम्बर महीने में कोई काम ही नहीं होता| वजह ये कि यहाँ हर कंपनी में लगभग एक महीने की छुट्टी रहती है जो दिसम्बर के दूसरे हफ्ते से लेकर जनवरी के पहले हफ्ते तक चलती है| उसके बाद भी लोगों को आने में कुछ और दिन लग ही जाते हैं| सबसे मजे की बात ये है कि नवम्बर एन्ड से ही लोग अगले महीने की छुट्टी की तयारी में लग जाते हैं और फिर काम भी सुस्त पड़ जाता है|
इस देश में सबसे बड़ा त्यौहार क्रिसमस का होता है और लोग पूरे साल इसके लिए दिन गिनते रहते हैं|
क्रिसमस की खरीददारी ब्लैक फ्राइडे से ही शुरू हो जाती है जो नवम्बर के आखिरी हफ्ते में पड़ता है| जैसे हिंदुस्तान में दिवाली पर बोनस या बख्शीश दिया जाता है, वैसे ही यहाँ पर दिसम्बर में कर्मचारियों को बोनस मिलता है और काम करने वालों को बख्शीश इस महीने में देना जरुरी होता है| लगभग हर कंपनी में क्रिसमस पार्टी होती है और लोग उसके बाद छुट्टियों की तैयारी में लग जाते हैं| हर शॉपिंग मॉल के बाहर और अंदर बड़े
बड़े क्रिसमस ट्री दीखते हैं और बच्चों को उपहार देते हुए जगह जगह संता भी नजर आते हैं|
एक और चीज यहाँ अजीब है, आप कल्पना कीजिये हिंदुस्तान में किसी भी त्यौहार में (होली को छोड़कर) बाज़ारों की क्या हालात रहती है| दुकाने और रेस्टुरेंट इत्यादि देर रात तक खुले रहते हैं और सड़कों पर खूब चहल पहल रहती है| अब चूँकि यहाँ दशहरा या दीवाली तो पब्लिकली मनाई नहीं जाती है (हिंदुस्तानी लोग ही आपस में मना लेते हैं), तो बाजार में कोई भीड़ भाड़ दिखने की उम्मीद भी नहीं थी| लेकिन क्रिसमस के अवसर पर मुझे लगा कि बाजार में खूब भीड़ भाड़ होगी और रेस्टुरेंट भी देर तक खुले रहेंगे| अब क्रिसमस वाले दिन
हम लोग शाम को मॉल में गए कि कुछ खरीदी भी कर लेंगे और रात को खाना भी खाकर आएंगे, लेकिन माल पहुंचे तो पता चला कि अधिकांश दुकानें बंद हैं और रेस्टुरेंट भी बंद है| लोग भी छुट्टी या सामान्य दिन के लिहाज से भी बहुत कम नज़र आ रहे थे| उस समय पता चला कि यहाँ पर त्यौहार में दुकानें देर तक खुलना तो दूर, अधिकतर बंद ही रहती हैं (फिर घर आकर ही खाना, खाना पड़ा)|
जोहानसबर्ग शहर दिसम्बर में लगभग बंद सा रहता है, सड़कों पर एक चौथाई गाड़ियां ही नजर आती हैं और अधिकतर लोग छुट्टियां मनाने या तो केप टाउन, या डरबन निकल जाते हैं| इस महीने की छुट्टी मनाने के लिए काफी पहले से ही बुकिंग्स कर ली जाती हैं| दिसम्बर के महीने में इस शहर में अपराध काफी बढ़ जाते हैं क्योंकि सबको क्रिसमस मनाना होता है और उसके लिए पैसे चाहिए| और इस महीने में घरों में चोरियां भी खूब होती हैं, क्योंकि सारे लोग तो बाहर गए होते हैं|
25. हिंदुस्तान में तो हम लोगों ने कई तरह की इन्सुरेन्स पालिसी के बारे में सुना था और कई तरह के पार्लर भी देखे, सुने थे| लेकिन इस देश में आने के बाद एक ऐसे पार्लर के बारे में पता चला कि अपने तो होश ही उड़ गए| सबसे पहले तो यहाँ आकर ये पता चला कि आपको मेडिकल इन्सुरेन्स रखना ही है| आप किसी भी क्लिनिक में चले जाओ या कहीं पर भी हस्पताल में जाईये, सबसे पहले आपसे यही पूछा जायेगा कि किस कंपनी का मेडिकल इन्सुरेन्स है आपके पास| अगर आपके पास नहीं है तो फिर आपको पहले पैसा जमा करना होगा, तभी वो आपको भर्ती करेंगे| दूसरा खटका तब लगा जब देखा कि इन्सुरेन्स कंपनी वाले एक और पालिसी भी बेचते हैं यहाँ पर जिसको "फ्यूनरल पालिसी" कहते हैं| मतलब आपके किरिया करम के लिए ये पालिसी होती है| अब हिंदुस्तान जैसा माहौल तो है नहीं यहाँ कि घंटे भर में सैकड़ो लोग इकठ्ठा हो जाते हैं किसी के मरनी में| यहाँ तो एकल परिवार और बचत लोग करते नहीं तो अंतिम संस्कार का खर्च कहाँ से आये, इसके लिए ये पालिसी भी खूब चलती है यहाँ पर (हमको भी हर हफ्ते एक मैसेज आ जाता है इस पालिसी का)|
दूसरा यह कि आप को अगर कहा जाए कि आप पार्लर जाना पसंद करेंगे तो आपका जवाब अमूमन हाँ ही होगा| क्योंकि आप तो यही सोचेंगे कि पार्लर मतलब खूबसूरत बनने की जगह| लेकिन अगर आपको बताया जाये कि आपको फ्यूनरल पार्लर जाना है तो आपकी हालात क्या होगी| डर असल यहाँ पर फ्यूनरल पार्लर भी खूब हैं जहाँ मृत व्यक्ति को रखा भी जाता है और वहां पर अंतिम संस्कार से सम्बंधित सारी सामग्री, जैसे कफ़न, गाड़ियां, दफ़नाने के उपकरण इत्यादि भी मिलते हैं|
एक और अजीब बात है यहाँ पर, खासकर निम्न आय वर्ग के लोगों में, कि मृत्यु के बाद मृत शरीर को कई दिनों तक (कई बार तो महीनों तक) रखा जाता है| इसकी दो वजहें हैं, एक तो ये कि सारे रिश्तेदार इकट्ठे हो जाते हैं और दूसरी वजह आर्थिक है| अगर मृत व्यक्ति की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो वह घूम घूम कर लोगों से पैसे इकठ्ठा करता है और जब जरुरत भर के पैसे इकठ्ठा हो जाते हैं, तब अंतिम संस्कार किया जाता है|
खैर इस देश में जीवन के साथ साथ अंतिम संस्कार का भी अलग ही हिसाब है|
26. इस देश में अनेक विरोधाभास देखने को मिलते हैं| जहाँ एक तरफ हर व्यक्ति से, चाहे आप उसे जानते हों या न जानते हों, आपको सामने पड़ने पर हाल चाल पूछना ही है| वहीँ दूसरी तरफ लोग अपने अपने घरों में सिमटे भी रहते हैं और पड़ोसियों से भी शायद ही कोई ताल्लुक रखते हैं| इसमें फ़र्क़ थोड़ा दिखता है श्वेत और अश्वेत लोगों में, श्वेत लोग एकदम अपने आप में सीमित रहते हैं तो अश्वेत लोग मौज मस्ती वाले होते हैं और थोड़े ज्यादा खुले होते हैं|
अब जिस सोसाइटी में हम रहते हैं, वहाँ पर अनुभव थोड़ा अलग है| मेरे ठीक पड़ोस में रहने वाली महिला लगभग ७० साल की हैं और अकेले रहती हैं| आज भी उनके सजने सँवरने में कोई कमी नहीं है और दूर से देखकर तो आप अंदाज भी नहीं लगा सकते उनकी उम्र का| खूब बातचीत करने वाली और आज भी अकेले अपनी कार लेकर पूरे शहर में घूमती रहती हैं| अपने कई पुरुष मित्रों के बारे में बेहिचक बात करती है और अपने पति को भी उसी तरफ याद करती हैं| दो बच्चे हैं, बेटी इंग्लैंड में है तो बेटा इज़राईल में| साल में एक बार बेटा यहाँ आता है और एक बार वह बेटी के पास इंग्लैंड जाती हैं|
एक परिवार और है जिसके दोनों बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते हैं, जिसमें मेरा बेटा| अब चूँकि यहाँ अधिकतर स्कूलों में ट्रांसपोर्ट की सुविधा नहीं होती तो मेरे लिए बहुत कठिन था रोज सुबह स्कूल बेटे को छोड़ना और फिर शाम को लेना| लेकिन पहले ही दिन उन्होंने बेटे को खुद ही स्कूल छोड़ा और ले आये| मुझे थोड़ी राहत मिली, फिर मैंने उनसे कहा कि एक दिन आप ले जाईये, एक दिन मैं ले जाऊंगा, तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया| कहने लगे कि मैं तो वैसे भी रोज स्कूल जाता ही हूँ तो आपके बेटे को भी ले जाऊंगा| खैर जब मैंने कई बार कहा तो उन्होंने मुझे दो दिन स्कूल ले जाने की इज़ाज़त दी| लेकिन उन दो दिनों में से भी एक दिन वही ले जाते थे, यहाँ तक कि अगर उनके बच्चों को नहीं भी जाना है तो भी मुझसे नहीं कहते थे| किसी अनजान देश में कोई ऐसा आदमी मिलना बहुत बड़े भाग्य की ही बात है|
मेरे मकान मालिक एक डॉक्टर हैं और बेहद सज्जन पुरुष| हमसे बस एक ही बात हमेशा कहते हैं "मैं चाहता हूँ कि आपको कोई दिक्कत नहीं हो"| शुरू में ही जब मैं उनके घर में रहने गया तो उन्होंने कहा कि पूरे घर का कालीन, सिर्फ इत्यादि नया लगवा देता हूँ| अब चूँकि सारा सामान लगभग नया ही था तो मैंने मना कर दिया| फिर मैंने कुछ सामान के लिए कहा, तो होता ये थे कि अगर मैंने दो चीज के लिए कहा तो वह छह चीज ले आते थे| अगर कोई भी चीज थोड़ी भी गड़बड़ हुई तो तुरंत नया लगवा देते| धीरे धीरे ये स्थिति हो गयी है कि अब मैं किसी भी चीज के लिए कहता ही नहीं हूँ| एक और ख़ास बात है कि घर में अगर कुछ भी गड़बड़ हुई और मैंने उनको बताया, तो खुद ही लग जाते हैं उसे ठीक करने के लिए| कोई संकोच नहीं और कोई फ़र्क़ भी नहीं कि टॉयलेट में कुछ ख़राब है और उसे ठीक करना है|
कुल मिलाकर यह एक अजब गजब देश है और यहाँ पर जिंदादिली खूब दिखती है|
27. हर देश की अपनी कुछ खास चीजें होती हैं, जैसे वहां का क्लाइमेट, वहां का खाने पीने का ढंग इत्यादि| दक्षिण अफ्रीका वैसे तो मूलतः मांसाहारी देश है लेकिन यहाँ पर शाकाहार के लिए भी चीजें खूब पायी जाती है, मिसाल के लिए फल| खैर जब शुरुवात में मैं यहाँ आया था तो मैंने कई लोगों से सुना कि इस वीकेंड पर ब्राई पार्टी रखते हैं, तो मुझे लगा कि कुछ तो खास होगा इसमें| फिर जब पहली बार एक ब्राई पार्टी में गया तो लगा कि वास्तव में यह कुछ खास है|
इस देश में ब्राई खूब होती है और साल में एक दिन यहाँ नेशनल ब्राई डे के रूप में २४ सितम्बर को मनाया जाता है (इसी दिन नेशनल हेरिटेज डे भी मनाया जाता है)| अब ब्राई के बारे में तो ये भी कहते हैं कि अगर आपको ब्राई के बारे में नहीं पता तो आपको अफ्रीका में रहने का हक़ ही नहीं है| दर असल ब्राई का मतलब होता है भुना हुआ गोस्त, और यहाँ पर ब्राई के लिए अलग से स्टैंड, कोयला, लकड़ी और उसके लिए अलग से कटा हुआ मीट भी मिलता है| शाकाहारी लोग इसमें भुट्टा और स्वीट पोटैटो भी भून लेते हैं और उनका भी ब्राई हो जाता है|
यहाँ पर अक्सर वीकेंड्स में, और खास तौर पर सर्दियों में तो जरूर ब्राई पार्टी होती है| ब्राई स्टैंड में कोयला और लकड़ी रखकर आग लगाते हैं और थोड़ी देर में जब आग तैयार हो जाती है तो उसपर मसाले में लिपटे हुए मीट को भूना जाता है| इसके लिए भी जानकारी होनी चाहिए, वर्ना मीट जल भी सकता है| खैर ब्राई स्टैंड के चारो तरह लोग शराब लेकर बैठ जाते हैं और धीरे धीरे मीट खाते रहते हैं| यह अमूमन सिर्फ मीट की ही पार्टी होती है और इसमें और कुछ भी (जैसे रोटी, चावल) नहीं खाते हैं|
सबसे मजे की बात यह है कि यहाँ पर आपको हर बड़े स्टोर में ब्राई के लिए बढ़िया से पैकेट में गोल गोल कोयला, लकड़ी और अलग से इसके लिए पैक किया हुआ मीट मिलता है| साथ में मसाला भी मिलता है, बस आप मीट को मसाले में लपेटिये और ब्राई करके चाव से खाइये| आप किसी भी पार्क में चले जाईये, आपको वीकेंड्स में तमाम ब्राई पार्टियां चलती मिल जाएँगी|
दर असल ब्राई पार्टी यहाँ सामाजिक त्यौहार जैसा होता है जिसमें ढेरों लोग इकठ्ठा होते हैं और खूब खाते पीते हैं| किसी भी बड़े फंक्सन में या जन्मदिन इत्यादि की पार्टी में यह होता ही है| बस यह समझ लीजिये कि अपने हिंदुस्तान में जैसे बट्टी, दाल और चोखा की पार्टी होती है, वैसे ही यहाँ ब्राई की पार्टी होती है|
28. जब बात खाने की हो, तो दक्षिण अफीका आपका बहुत पसंदीदा स्थल हो सकता है| न सिर्फ मांसाहार, बल्कि शाकाहार के भी बहुत से विकल्प यहाँ मौजूद हैं| मीट, पोल्ट्री प्रोडक्ट्स, सी फ़ूड तो यहाँ खूब मिलते ही हैं, साथ ही साथ फल, अनाज और सब्जियां भी यहाँ एकदम फ्रेश और पौस्टिक होती हैं|
अगर अनाज की बात करें तो यहाँ का सबसे ज्यादा पैदा होने वाला अनाज गेंहू ही है लेकिन सबसे बड़ी मात्रा में मक्का पैदा होता है| मक्के का आटा यहाँ खूब बिकता है और लोगों के मुख्य आहार का एक अहम् हिस्सा होता है| रोटियां तो लोग यहाँ बहुत कम ही खाते हैं लेकिन ब्रेड के लिए गेहूं का प्रयोग होता है| चावल भी यहाँ उगाया जाता है और लोग खाते भी हैं लेकिन उतना नहीं, जितना हमारे हिंदुस्तान में|
अब अगर गन्ने का जिक्र न हो तो हिंदुस्तान और अफ्रीका का सम्बन्ध अधूरा रह जायेगा| यहाँ गन्ने की पैदावार भी खूब होती है और इसी गन्ने के खेतों में काम करने के लिए हिंदुस्तान से लोगों को लाया गया था| उस समय तो उनको यहाँ पर कुली कहते थे, लेकिन आज ये लोग सम्मान की जिंदगी गुजार रहे हैं|
यहाँ पर एक ख़ास चीज मिलती है "बिलटोंग" और जिसको बनाने की जगह जगह पर फैक्ट्री भी है| इसे लोग नास्ते में या किसी भी समय खाने में इस्तेमाल कर लेते हैं| दर असल यह मीट को सुखाकर और उसमें मसाले लपेटकर बनाया जाता है (जैसे हिंदुस्तान में अचार बनाया जाता है)| पुरे दक्षिण अफ्रीका में कहीं भी चले जाईये, आपको बिलटोंग हर जगह मिल जाता है और खूब चाव से खाया जाता है| मीट किसी भी चीज का हो सकता है, जैसे बीफ, लैम्ब, पोर्क, हिरन, ऑस्ट्रिच इत्यादि|
मीट में सबसे ज्यादा यहाँ बीफ ही मिलता है और उसके बाद लैम्ब, पोर्क, हिरन, ऑस्ट्रिच इत्यादि भी खूब मिलता है| हिंदुस्तान से आने वालों के लिए एक चीज यहाँ गौर करने वाली है, अगर आपने कहीं पर चीज़ बर्गर आर्डर किया है तो ध्यान रखिये, यहाँ पर चीज़ मतलब बीफ भी होता है| हमारे एक परिचित जिस दिन यहाँ आये, दोपहर में खाने के लिए मैक डोनाल्ड में चले गए और चीज़ बर्गर आर्डर कर दिया ये सोच कर कि पता नहीं यहाँ नॉन वेग बर्गर में क्या हो| लेकिन जैसे ही उन्होंने उसे खाना शुरू किया, उनका ध्यान पैकेट पर गया और उनको वहां बीफ लिखा हुआ दिख गया| अब उनको दिन भर उल्टियां आती रहीं, आगे से उन्होंने कान पकड़ा कि चीज़ यहाँ पर कभी नहीं खाएंगे|
फलों में सेब, केला, स्ट्रॉबेरी, अंगूर इत्यादि खूब मिलते हैं और अंगूरों की तो बहार है यहाँ| इस देश में वाइन फैक्ट्रीज और वाइन यार्ड्स भी खूब हैं और यह शराब के बड़े निर्माताओं में से एक है|
29. खाने पीने की चीजों में एक और बेहद मशहूर चीज है यहाँ पर जो हिंदुस्तानियों से सीधे जुडी हुई है| "बनी चाउ" नाम की एक ऐसी डिश है जिसके ओरिजिन में हिंदुस्तानियों का नाम आता है| यह मुख्य रूप से ब्रेड के बड़े लोफ के ऊपरी हिस्से को निकाल कर और उसमें तरह तरह की सब्जियों या मीट को भर कर बनायीं जाती है, और बाद में ब्रेड के निकाले हुए हिस्से से उसे ढँक दिया जाता है| मतलब एक तरह से सब्जियों और मीट से भरा हुआ ब्रेड, जिसे आप हाथ में पकड़कर खा सकते हैं और आपको किसी भी प्लेट या चम्मच वगैरह की जरुरत नहीं है|
अब इस मशहूर डिश की उत्पत्ति के लिए भी कई कहानियां प्रचलित हैं| सबसे पहले हिंदुस्तानी लोगों को नटाल (डरबन) के इलाके के गन्ने के खेतों में काम करने के लिए ले आया गया था| अब हिंदुस्तानी लोग तो रोटी सब्जी खाने वाले लोग हुआ करते थे लेकिन यहाँ पर तो रोटी मिलती नहीं थी| अब रोटी का विकल्प हो गया ब्रेड का बड़ा टुकड़ा लेकिन सब्जी कहाँ रखें, क्योंकि इन लोगों को टिफ़िन ले जाने की इजाजत नहीं होती थी| अब जुगाड़ में तो हिंदुस्तानियों का सांई पूरे विश्व में नहीं होता तो यहाँ भी उन्होंने इसका जुगाड़ धुंध निकाला| और ऐसे में यही विकल्प समझ में आया लोगों को और उन्होंने ब्रेड के बीच में सब्जी भरकर ले जाना शुरू किया|
अब इसका नाम बनी चाउ क्यों पड़ा, इसके पीछे भी कई किस्से हैं| इसमें सबसे प्रचलित किस्सा यह है कि गुजरात के किसी बनिए ने इसे अपने भोजनालय में सबसे पहले बनाया तो इसका नाम बनी चाउ पड़ गया| पहले तो इसमें सिर्फ सब्जियां ही होती थीं लेकिन बाद में मीट भी भरा जाने लगा| आज से सैकड़ों साल पहले डरबन से शुरू हुआ यह फ़ास्ट फ़ूड आज न सिर्फ डरबन में, बल्कि पूरे दक्षिण अफ्रीका में बड़े चाव से खाया जाता है|
डरबन में तो हर साल सितंबर महीने में बनी चाउ बैरोमीटर नाम से एक प्रतियोगिता भी होती है जिसमें भाग लेने और जिसका आनंद उठाने दूर दूर से लोग आते हैं और इसके विजेता को पुरस्कृत भी किया जाता है|
अगर आप कभी भी दक्षिण अफ्रीका आएं, तो बनी चाउ को चाव से खाना मत भूलियेगा|
30. दक्षिण अफ्रीका खाने पीने में तो बेहतरीन जगह है ही, यहाँ पर शिष्टाचार भी बहुत अलग है| हर किसी से हाल चाल पूछना तो यहाँ पर सामान्य है ही, लेकिन हम हिंदुस्तानियों के लिए सबसे अजीब चीज है यहाँ के लोगों का बिंदास व्यवहार| अब आप कल्पना कीजिये कि हिंदुस्तान में कोई लड़की किसी पुरुष को देखे और मुस्कुरा दे तो क्या होगा| शायद वह पुरुष उससे शादी तक की कल्पना कर डालेगा| और अगर कोई लड़की किसी पुरुष को कहीं भी रोक कर कहे कि आप के बाल बड़े प्यारे हैं, तो फिर उस पुरुष की मानसिक स्थिति की आप कल्पना कर सकते हैं| उसको तो शायद यही लगे कि अब तो अपना रास्ता एकदम साफ़ है|
यूरोपीय देशों की तरह यह देश भी बहुत बिंदास है, किसी भी जगह पर एक दूसरे को हग करना, किस करना या दुनिया से बेखबर एक दूसरे में डूबे रहना यहाँ आम बात है (हम लोगों के लिए थोड़ा मुश्किल होता है इसे हजम करना)| किसी को किसी भी संबोधन से पुकारना यहाँ आम बात है, आप किसी भी स्टोर में चले जाईये, रेस्टुरेंट में चले जाईये, आप को कुछ ऐसे संबोधन सुनने को मिल जायेंगे, जिसकी हम हिंदुस्तानी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं|
अब कोई हिंदुस्तानी पुरुष किसी स्टोर में जाए और वहां की कोई महिला कर्मचारी उससे कहे "हाउ आर यू माय लव" या "हाउ आर यू माय डार्लिंग", तो उसकी क्या हालत होगी आप सोच सकते हैं| लेकिन यहाँ तो ये सब सामान्य बोलचाल में शुमार है, और किसी को इस बोलचाल में कुछ अजीब भी नहीं लगता| आप अमूमन किसी भी महिला को कह सकते हैं कि आप बहुत सुंदर हैं और किसी के साथ भी फोटो लेने के लिए कह सकते हैं, खासकर अश्वेत आबादी के साथ तो यह बिलकुल सामान्य है| सामान्यतया कोई इन सब से इनकार भी नहीं करता|
एक और खास बात है यहाँ (जो अब हिंदुस्तानी महानगरों में भी आम हो चला है) कि लोग एक दूसरे से मिलने पर हाथ तो मिलाते ही हैं, लेकिन एक दूसरे से गले लगना ज्यादा पसंद करते हैं| और बहुत बार तो एक दूसरे को गले लगाकर एक दूसरे के गाल पर चुम्बन भी करते हैं| अब आप सोचिये कि ये सब आम हिंदुस्तानी सोचे भी तो मुश्किल आएगी|
और यहाँ की अश्वेत आबादी हाथ भी थोड़ा अलग तरीके से मिलाती है, हम लोग तो सिर्फ एक दूसरे का हाथ पकड़कर हिलाते हैं लेकिन ये लोग आपका हाथ दो तरह से पकड़ते हैं, पहले अपने पंजे से आपके पंजे को और फिर अपने हाथ के अंगूठे से आप के हाथ के अंगूठे को और फिर वापस पंजे को पकड़ते हैं| यह इनके आपसे आत्मीय होने का प्रतीक होता है|
खैर हर जगह के अलग अलग तरीके हैं और लोग जितना जल्दी इससे अभ्यस्त हो जाएँ, उतना बेहतर होता है|
31.कुछ और चीजें जो यहाँ आप को आश्चर्य में डाल देती हैं, उनमे से एक है यहाँ पर टिसू पेपर का उपयोग| यहाँ पर लोग हिंदुस्तानियों की तरह रुमाल नहीं इस्तेमाल करते, बस टिसू पेपर ही इस्तेमाल करते हैं| चाहे खाने के समय हो या खाने के बाद हो, हर जगह सिर्फ टिसू पेपर| वैसे तो यह लोग साफ़ सफाई के लिए बहुत सजग रहते हैं लेकिन अगर आप इनसे साथ खाने बैठ गए तो शुरू शुरू में तो आपको बहुत दिक्कत होगी| अगर खाना जरा भी तीखा है तो इनकी नाक बहनी शुरू हो जाती है और खाने के मेज पर बैठे बैठे ही ये लोग टिसू से नाक साफ़ करते हैं और फिर उस टिसू को जेब में रखकर पुनः खाना शुरूं कर देते हैं| अब आप सोचिये कि आपके ठीक सामने बैठा हुआ व्यक्ति खूब जोर से नाक साफ़ करता है और फिर टिसू जेब में रखकर वापस आप के साथ खाना शुरू कर देता है तो ऐसे में आपको खाना हजम होगा| और अगर खुदा न खास्ता उसको जुकाम हुआ है तो पूरे भोजन के दौरान वह बार बार नाक साफ़ करेगा और खाता रहेगा, भले आपका खाना खराब हो जाये| और खाने के बाद खूब सारा टिसू लेकर हाथ साफ़ करेगा और चल देगा, रुमाल का झंझट ही नहीं| बाकि टॉयलेट में तो यह लोग सिर्फ टिसू पेपर ही इस्तेमाल करते हैं, यह तो सबको पता है|
एक और चीज जो हमें आज ही पता चली वह यह है कि यहाँ का नियम है कि जो व्यक्ति किसी भी जगह जाता है, उसे पहले हाल चाल पूछना है| आप फर्ज कीजिये कि आप हिंदुस्तान में किसी ऑफिस में जाते हैं या किसी और जगह भी जाते हैं तो रिसेप्सन पर बैठा आदमी आपको पहले ग्रीट करेगा, फिर भले आप उसे नमस्कार कीजिये और काम की बात कीजिये| लेकिन यहाँ अगर आप कहीं भी जाते हैं तो रिसेप्सन पर बैठे आदमी को पहले आपको पूछना है कि आप कैसे हैं, फिर वह आपसे पूछेगा और आपकी मदद करेगा| हमारे परिचित के साथ एक मजेदार वाक़या हुआ था एक बार, उनको किसी ऑफिस में पहुँचने में देर हो रही थी तो उन्होंने गेट पर खड़े गार्ड से कहा कि मुझे देर हो रही है, क्या आप गेट खोल सकते हैं| लेकिन वह गार्ड खड़ा रहा उसने गेट नहीं खोला तो उनको गुस्सा आया और उन्होंने पूछा कि तुम गेट क्यों नहीं खोल रहे तो उसने बताया "आपने मुझसे हाल चाल नहीं पूछा, तो कैसे खोल दूँ"| फिर उन्होंने क्षमा मांगी और उससे पूछा कि आप कैसे हैं, तब जाकर गार्ड ने गेट खोला| मतलब यहाँ आप कैसे हैं नहीं पूछना उनका अपमान करना माना जाता है|
यहाँ के भारतीय, जो कई पुश्तों से यहीं रह रहे हैं, उन्होंने अपने आप को यहाँ के हिसाब से ढाल लिया है| उनमे से अधिकांस को तो यह भी नहीं पता कि उनके दादा परदादा कहाँ से आये थे और बहुत से तो अपने आप को अब दक्षिण अफ्रीकन ही मानते हैं| उनके नाम और सरनेम तो अभी भी काफी मिलते जुलते हैं लेकिन नाम की स्पेलिंग में काफी फ़र्क़ आ गया है| मिसाल के तौर पर एक परिचित हैं जिनका नाम वी गरीब है लेकिन गरीब की स्पेलिंग (Garrib) है| इसी तरह एक और हैं जिनका सरनेम शिवनाथ है लेकिन स्पेलिंग (Sewnath) है| ऊषा की स्पेलिंग (Oosha) होती है, चित्रा की स्पेलिंग (Citra) होती है और विद्या की स्पेलिंग (Vidhiya), ऐसे ही तमाम नाम हैं जिनकी स्पेलिंग पढ़कर आप चौंक जायेंगे लेकिन यह फ़र्क़ यहाँ के हिसाब से हो गया है|
ऐसे ही और कई अजब गजब चीजें हैं यहाँ पर, जिनका जिक्र आगे चलकर होता रहेगा|
32. यहाँ के लोगों के शौक भी अजीब अजीब हैं, मसलन बर्ड वाचिंग, फिशिंग, साइकिल चलाना या बोटिंग करना| अब हिंदुस्तान में तो मैंने शायद ही कहीं देखा हो कि लोग सैकड़ो किलोमीटर दूर सिर्फ इसलिए जाते हैं कि वहां पर चिड़िया देखने की कोई जगह है| लेकिन इस देश में आप को बहुत से ऐसे स्पॉट मिलेंगे जहाँ बर्ड वाचिंग करने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं| एकदम ख़ामोशी से बैठ कर घंटों लोग चिड़िया देखते हैं और अपना दिन बिताते हैं| ऐसे ही साइकिल चलाने के लिए घर से कई सौ किलोमीटर दूर अपनी बड़ी सी कार में साइकिल बांध कर लोग वीकेंड में निकल जाते हैं और वहां पर साइकिल चलाते हैं| और एक अपना हिंदुस्तान है जहाँ हर जगह लोग साइकिलिंग करते मिल जायेंगे|
मछली पकड़ना यहाँ के सबसे पसंदीदा टाइम पास में से एक है| पूरा पूरा दिन लोग तालाब, डैम या नदी के किनारे बैठे रहते हैं, कुछ तो प्लास्टिक के पाजामे पहन कर आधा पानी में खड़े रहकर घंटों मछली पकड़ने के लिए खड़े रहते हैं| सबसे आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब एक डैम के किनारे मैंने कुछ लोगों को मछली पकड़ते देखा| कुछ देर बाद उनमे से एक के कांटें में एक बड़ी सी मछली आयी तो मुझे लगा कि चलो उसका भोजन का प्रबंध हो गया| लेकिन तभी मैंने देखा कि उसका एक दोस्त एक वजन करने वाली मशीन लेकर उसके पास गया और दोनों ने मछली का वजन किया| उसके बाद मछली के मुंह में कुछ डालकर उन्होंने वापस पानी में फेंक दिया| मैंने पास जाकर आश्चर्य से पूछा कि आपने मछली को वापस पानी में क्यों डाल दिया, कुछ गड़बड़ थी क्या मछली में तो उन्होंने जवाब दिया कि अरे हम लोग तो सिर्फ मछली पकड़कर देखते हैं कि उसका वजन कितना है और किसने सबसे बड़ी मछली पकड़ी, उसको खाने के लिए थोड़े न पकड़ते हैं| खैर मैंने हिम्मत करके एक बात और पूछ ली कि आप को क्या मिलता है इससे तो उन्होंने बताया कि बहुत अच्छा टाइम पास होता है इसमें| जब मैंने यह पूछा कि आप के कांटे से मछली को घाव भी तो हो जाता है तो उन्होंने बताया कि हम लोग उसके मुंह में कुछ दवा जैसा डाल देते हैं जिससे उसे नुकसान नहीं होता| अब आप ही सोचिये कि पूरा दिन सिर्फ मछली पकड़कर यह देखना कि किसने सबसे बड़ी पकड़ी अपने देश में सनकीपन ही तो कहा जायेगा|
जानवरो के प्रति भी यहाँ बहुत प्रेम है लोगों के मन में (ये अलग बात है कि यहाँ पर हर जानवर को लोग खा भी जाते हैं)| लेकिन साथ ही साथ हर सोसाइटी में यह भी लिखा होता है कि आप यहाँ पर जानवर रख सकते हैं या नहीं| कुत्ते तो खैर हर जगह खुशनसीब होते हैं तो यहाँ भी हैं, उनके घूमने के लिए अलग से पार्क बने हैं जहाँ पर आपको सैकड़ो नस्ल के कुत्ते टहलते हुए दिख जायेंगे| लेकिन कुत्तों को आप हर पार्क या पब्लिक प्लेस में नहीं ले जा सकते| यहाँ बिल्लियां बहुत भाग्यशाली समझी जाती हैं और बहुत से दुकानों में आपको बिल्लियां मिल जाएँगी| लोग कुत्तों के साथ इनको भी पालते हैं और इनकी जिंदगी शायद इंसानों से भी ज्यादा बेहतर होती है|
शिकार के शौक़ीन भी यहाँ खूब हैं और उसके लिए भी लोग छुट्टियों में निकल जाते हैं|
33.