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Tuesday, October 11, 2016

दक्षिण अफ्रीका- एक अलग सा देश

1. भारतीय उपमहाद्वीप के किसी व्यक्ति को, जो कभी विदेश नहीं गया हो ( नेपाल को छोड़कर, वैसे भी नेपाल यात्रा को भारतीय कहाँ विदेश यात्रा कहते हैं), के लिए सात समंदर पर जाना, वो भी घूमने के लिए नहीं बल्कि नौकरी करने के लिए, काफी रोमांचक होता है| और वो देश अगर दक्षिण अफ्रीका हो, जिसका नाम सुनते ही जेहन में अश्वेत अफ्रिकी लोग और  गरीबी इत्यादि ही पहले आता है, तो क्या कहना| और उसमें भी अगर जोहानसबर्ग जाना हो और गलती से आपने नेट में सर्च किया तो हालत और ख़राब हो जाती है (यह शहर नेट में दुनियां के सबसे अपराधग्रस्त शहरों में से एक दिखता है)| किसी भी आदमी से बात कीजिये, वो आपको बहुत डरायेगा, और ऐसे में आपकी मानसिक स्थिति बहुत सुखद नहीं रह जाती|
कई बार जोहानसबर्ग में काम कर रहे सहकर्मियों से बात हुई, हर बार बस एक ही जवाब होता था "ये जगह बहुत सुरक्षित नहीं है, आवागमन के साधन नहीं हैं और आप को अपनी कार में ही हर जगह जाना होता है| कार का शीशा हमेशा बंद रखना है और हर चौराहे पर बेहद सतर्क रहना पड़ता है"| कई बार मन में आता था कि कहीं गलत जगह तो नहीं जा रहा हूँ (हालाकि बाद में ये विचार गलत ही साबित हुआ)|  
इन्हीं तमाम विचारों के झंझावात को झेलते हुए जब जोहानसबर्ग हवाई अड्डे पर उतरा तो मन में काफी चिंता थी| मुम्बई से जहाज रात के दो बजे निकला और सुबह सात बजे  जोहानसबर्ग पहुँच गया| साढ़े तीन घंटे के समय के फ़र्क़ को जोड़कर यात्रा लगभग नौ घंटे की थी और शायद ही पूरी यात्रा में कभी नींद आयी हो| बनारस के अगस्त के काफी गर्म मौसम से निकलकर जोहानसबर्ग के ठंढे मौसम में आते ही एकदम से अच्छा लगा और महसूस हुआ कि शायद वो गर्मी यहाँ नहीं मिलेगी अगले कई सालों तक| हवाई अड्डा, जो काफी साफ़ सुथरा  था, जो कि हिंदुस्तान में भी है,  को चारो तरफ से निहारते हुए हम लोग आगे बढे| सिक्योरिटी चेक को पार करने के बाद सामान लेकर बाहर आने पर पहला झटका लगा| ड्राइवर, जो कि ६ फ़ीट से ज्यादा लंबा और विशालकाय अश्वेत था, ने सामान को हाथ तक नहीं लगाया| हां, इंतज़ार कर  रहे बाकी सहकर्मियों ने ही मदद की और हम कार में सवार होकर होटल की तरफ चल पड़े| ये बाद में पता चला कि यहाँ अपने मुल्क़ की तरह स्थिति नहीं है जहाँ आपका ड्राइवर आपका कुली भी होता है|   

2. होटल के रास्ते में सड़कें भी बिलकुल चमकती हुई और ट्रैफिक भी एकदम संयत, बहुत अच्छा लग रहा था देखकर| लेकिन एक आश्चर्य और भी हुआ, इतनी गाड़ियां थीं, कभी कभी रास्ता जाम भी था, लेकिन किसी ने न तो ओवरटेक करने की कोशिश की और न ही किसी ने हॉर्न ही बजाया| ऐसा लग रहा था जैसे किसी को कोई भी जल्दी नहीं है| आने वाले दिनों में ये बात पता चली कि यहाँ के लोग ट्रैफिक नियमों का पागलपन की हद तक पालन करते हैं और हॉर्न बजाना तो बहुत बड़ी असभ्यता मानी जाती है| लेकिन अगर किसी ने हॉर्न बजाया है तो इसका मतलब यहाँ पर दो ही होता है, या तो सामने वाला कोई गलती कर रहा है, जैसे कि वो बिना अपनी बारी के निकल रहा है, और या तो आगे सिग्नल हरा हो गया है लेकिन वो शायद अपने फोन में व्यस्त है और आगे नहीं बढ़ रहा है|
ट्रैफिक नियमों के पालन का आलम तो ये है यहाँ पर कि लाल बत्ती तो शायद ही कोई पार करता हो, यहाँ तक कि रात में भी (हालाँकि रात में ये सलाह भी दी जाती है कि अगर बहुत सुनसान क्षेत्र हो तो लाल बत्ती की परवाह मत करिये, क्योंकि अपनी सुरक्षा सबसे जरुरी है)| और अगर खुदा न ख़ास्ता ट्रैफिक की बत्ती ख़राब है तो हर चौराहे पर लोग बेहद अनुसाशित तरीके से एक के बाद एक निकलते हैं (चौराहे पर चारो तरफ से एक एक कार जाएगी बारी बारी से और एक चक्र पूरा होने पर फिर से वही चक्र चलेगा)| इसमें तभी गड़बड़ होती है जब कोई एशियाई मूल का व्यक्ति अपनी बारी के बिना ही निकलने का प्रयास करेगा और उस स्थिति में दूसरा व्यक्ति हॉर्न बजाकर उसको उसकी गलती का एहसास कराएगा| लोग सड़क पर एक दूसरे की भावनाओं का खूब आदर करते हैं और कोई भी व्यक्ति अगर अपनी लेन बदलने के लिए इंडिकेटर दे रहा है तो पीछे वाला अमूमन रुक कर उसे आगे जाने का मौका दे देता है| मुझे कई महीने लगे इन सब आदतों को सिखने में लेकिन अब लगता है कि बिना चिल्ल पों के सड़क पर चलना कितना सुकूनदायी है| पिछले तीन वर्षों में मैंने भी सड़क पर शायद ४ या ५ बार ही हॉर्न बजाया होगा|  
खैर कुछ देर बाद होटल पहुंचे जहाँ पर भी सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम थे| बाहरी दीवारों पर ऊपर बिजली के तारों की लड़ी थी और गेट भी बंद था जिसे इंटरकॉम पर फोन करने पर खोला गया| अंदर रिसेप्शन पर एक और आश्चर्य मेरा इंतज़ार कर रहा था जिसके बारे में भी मैंने कभी सोचा नहीं था|

3. दरअसल होटल का मेन गेट बंद था और कोई भी वहां नहीं था| इण्टरकॉम पर जब हमारे ड्राइवर ने फोन किया तो उसने सबसे पहले पूछा "आप कैसे हैं(How are you), उधर से कुछ पूछा गया तो ड्राइवर ने कहा "मैं ठीक हूँ (I am fine)| फिर ड्राइवर ने रूम बुकिंग के बारे में बताया तो गेट खुला और हम लोग अंदर गए|
अंदर रिसेप्शन पर बैठी महिला ने भी पहले पूछा "आप कैसे हैं, ड्राइवर ने कहा "मैं ठीक हूँ| फिर ड्राइवर ने पूछा "आप कैसे हैं, तो रिसेप्शन वाली महिला ने कहा "मैं ठीक हूँ| इसके बाद कमरे की औपचारिकता पूरी हुई और हम लोग अपने कमरे की तरफ बढे| कमरे के पास एक और सज्जन थे जिन्होंने देखते ही पूछा "आप कैसे हैं, और ड्राइवर ने जवाब देकर वही प्रश्न उससे पूछा और फिर कमरा खुला और हम लोग अंदर गए| कमरे में बैठने के बाद मुझे यही लगा की अपना ड्राइवर यहाँ हमेशा आता होगा इसलिए इसे सभी पहचानते हैं और हाल चाल पूछ रहे हैं| 
दोपहर का भोजन अपने एक सहकर्मी के घर था और वहां से हिंदुस्तानी खाना खाकर हम लोग बगल के एक शॉपिंग माल में आये| वहां पर हमारे सहकर्मी ने कुछ ख़रीदा और जब बिल के भुगतान के लिए गया तो एक बार फिर वही सिलसिला शुरू हुआ| पहले सहकर्मी ने पूछा "आप कैसे हैं, उसने जवाब दिया, फिर उसने पूछा और सहकर्मी ने जवाब दिया| इसके बाद ही बिल का भुगतान हुआ और हम लोग वापस निकले| 
अगले कुछ दिनों में ये चीज स्पष्ट हुई कि इस देश का यह सामान्य शिष्टाचार है कि जब भी आप किसी से मिलते हैं, चाहे वो व्यक्ति जो भी हो, (वो आपका ड्राइवर हो सकता है, स्वीपर हो सकता है, दूकान वाला हो सकता है या आपका कोई परिचित), आपको सबसे पहले उसकी कुशल क्षेम पूछनी है, फिर वो आपका पूछेगा और इसके बाद ही कोई और बात होगी| इस बात को भी सीखने में मुझे महीनों लग गए क्योंकि अपने हिंदुस्तान में तो आप परिचितों से हाल चाल मुश्किल से पूछते हैं, बाकियों के लिए क्या कहें|
यहाँ तक कि आप अगर फोन करते हैं, चाहे किसी को भी, या किसी का भी फोन आता है तो आपको पहले उसकी कुशल क्षेम पूछनी है, फिर अपनी बतानी है और उसके बाद ही आप काम की बात कर सकते हैं| अगर आपने सीधे काम की बात कर दी तो आप घोर असभ्य माने जाएंगे और लोग इसका बहुत बुरा मान जाते हैं| अगर किसी भी व्यक्ति से आपकी नज़रें मिली तो आपको सामान्यतया मुस्कुराना चाहिए, नहीं तो ये भी असभ्यता मानी जाती है यहाँ पर| अगर गलती से आपने किसी का हाल चाल नहीं पूछा तो लोग आपको टोक भी सकते हैं कि आपने उनकी कुशल क्षेम नहीं पूछी| यहाँ तक कि अगर आपको किसी से कोई रास्ता या कुछ और भी पूछना है तो पहले आप कुशल क्षेम पूछेंगे, फिर अपना बताएँगे और उसके बाद ही आप रास्ता या कुछ और पूछ सकते हैं| सबसे मजेदार तो तब होता है जब आपको रास्ते में ट्रैफिक पुलिस वाला रोकता है आपके लाइसेंस को चेक करने के लिए और तब भी पहले आप उसकी कुशल क्षेम पूछते हैं, फिर वो पूछता है और फिर आपका लाइसेंस मांगता है|  
अब आप खुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कहाँ के लोग ज्यादा सभ्य होते हैं|   

4. होटल से निकालकर बाहर जाने पर एक चीज तो कॉमन थी कि ट्रैफिक सिग्नल लाल होने पर रुक जाना लेकिन शुरुवात में काफी दिक्कत हुई सिग्नल के नाम को लेकर| पहले या दूसरे दिन ही ड्राइवर ने कहा कि अगले रोबोट से दाएँ मुड़कर जाना है तो मैं चौंका कि शायद यहाँ हर चौराहे पर रोबोट लगे हुए हैं| फिर मैंने कई दिन ध्यान दिया, मुझे किसी भी सिग्नल पर रोबोट नहीं दिखा| आखिरकार कुछ दिन बाद मैंने अपनी झिझक तोड़ते हुए मैंने उससे पूछ ही लिया कि मुझे तो रोबोट कहीं नहीं दिखता तो वह मुस्कुराया| फिर मुझे पता चला कि यहाँ ट्रैफिक सिग्नल को ही रोबोट बोलते हैं|
अगली उलझन एक और बात को लेकर हुई, चूँकि यहाँ आपको अपनी कार रखनी ही है तो मैंने भी तुरंत एक कार खरीदी और फिर पेट्रोल पम्प कहाँ कहाँ हैं ये पता लगाना चाहा| इस शहर में लगभग हर आधे किमी पर कोई न कोई पम्प मिल ही जायेगा, बशर्ते आपको ये पता हो कि उसे यहाँ गैराज कहा जाता है| (अपने देश में और यहाँ में नाम में क्या क्या फ़र्क़ है, धीरे धीरे पता चला| जैसे यहाँ दवा की दूकान को मेडिकल स्टोर न कह कर फार्मेसी कहते हैं|)
सबसे बड़ी शुरूआती दिक्कत हुई जगह के बारे में पता लगाने में| फ़र्ज़ कीजिये कि आपको बनारस में कहीं जाना है तो आपको सिर्फ ये पता होना चाहिए कि आपको किस एरिया में जाना है, उसके बाद तो आप पानवाले से, किसी भी दूकान वाले से या सड़क पर जाते किसी भी व्यक्ति से आप पता पूछकर जा सकते हैं| लेकिन यहाँ तो आपको सिर्फ और सिर्फ एक ही जगह से रास्ता पता चल सकता है और वो है गैराज (मतलब पेट्रोल पम्प)| बाकी कहीं न तो आप पूछ सकते हैं और न कोई आपको बताएगा| और अगर गलती से किसी ने बताया भी तो ये तंय है कि आपको समझ में नहीं आएगा (मुझे तो आज तक नहीं समझ आता)|
यहाँ अगर आपको कार चलानी है तो आपको सिर्फ और सिर्फ जी पी एस का ही सहारा होता है, उसी के जरिये आप पूरे देश में घूम सकते हैं| अब मैंने तो हिंदुस्तान में कभी भी इसका इस्तेमाल नहीं किया था तो खासी दिक्कत हुई लेकिन जब से फोन का गूगल मैप प्रयोग करने लगा, तब से बहुत राहत है| 
एक और बात यहाँ पर दिखी कि अगर आपको किसी ने आगे जाने दिया तो आपको उसको धन्यवाद जरूर कहना है| और उसके दो तरीके हैं, या तो आप अपनी कार में से ही अपना हाथ उठाकर उसे धन्यवाद दें, या फिर अपनी पार्किंग लाइट को जला बुझा कर| अगर आपने ऐसा नहीं किया तो फिर आप घोर असभ्य समझे जायेंगे (शुरू में तो लोगों ने पक्का मुझे असभ्य ही समझा होगा)|

5. शुरूआती दौर में जब भी कार किसी सिग्नल पर रूकती, कुछ स्थानीय लोग, जिन्हें आप भिखारी भी कह सकते हैं, अपने हाथ में काली वाली बड़ी पॉलीथिन लेकर खड़े दिख जाते| मुझे ठीक से समझ नहीं आता था कि आखिर इस तरह से क्यूँ खड़े रहते हैं ये लोग| धीरे धीरे समझ आया कि यहाँ पर लोग गाड़ी चलाते समय भी नाश्ता करते रहते हैं, जूस इत्यादि भी पीते है और जब चौराहों पर रुकते हैं तो इन लोगों की बड़ी पॉलिथीन में कचरा डाल देते हैं| साथ ही साथ इन लोगों को कुछ खाने के लिए या कुछ पैसे भी दे देते हैं| अब इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि सड़क पर कचरा नहीं फैलता (आप कल्पना कीजिये बनारस में कोई अगर कार में कुछ खाता है तो क्या करता है, मौका मिलते ही कचरा बड़े आराम से सड़क पर फेंक देता है)|
कुछ समय बीतने पर ये पता चला कि यहाँ सड़कों पर भीख मांगने वालों के तीन प्रकार हैं| इनमे अधिकतर तो ये काली पॉलिथीन लिए युवक होते हैं जो रुकी हुई हर कार के पास जाते हैं और बिना ज्यादा हुज्जत के आगे बढ़ जाते हैं| दूसरा प्रकार उनका है जो कोई तख्ती हाथ में लेकर भीख मांगते हैं और वो भी ज्यादा तंग नहीं करते| चुपचाप खड़े रहकर अपनी तख्तियां दिखाते हुए हर कार के पास जाते हैं और जो मिल जाये उसमें संतुष्ट| अब इनकी तख्तियां कभी कभी इतनी दिलचस्प होती हैं कि पढ़ कर हँसते हँसते हालत खराब हो जाती है (एक तख्ती पर लिखा था कि मेरी बिल्ली ने पडोसी का मुर्गा खा लिया और अरेस्ट हो गयी, उसके बेल के लिए पैसे चाहिए| एक तख्ती पर लिखा था कि मेरी बीबी का अपहरण निंजा ने कार लिया है और मुझे कुंगफू सीखने के लिए पैसे चाहिए)| अक्सर उन तख्तियों पर एक ही बात लिखी दिखती है, हमें इस क्षेत्र को अपराध मुक्त बनाना है (इस शहर को ऐसे ही सबसे ज्यादा अपराधग्रस्त क्षेत्रों में नहीं गिना जाता, यहाँ वास्तव में अपराध बहुत होते हैं)| एक तीसरा प्रकार उनका है जो विकलांग होते हैं और या तो अकेले या किसी के साथ भीख मांगते हैं| इनके अलावा कुछ बदमाश भी होते हैं जो आपको तंग भी करते हैं और इतना गिड़गिड़ाते हैं कि आप का दिल पसीज जाए| कुछ महिलाएं भी हैं जो अपने बच्चे को लेकर भीख मांगती हैं, लेकिन बच्चे उनके ही होते हैं ये पता चल जाता है हम लोगों को|
इधर हाल के समय में एक नयी जमात पैदा हुई है यहाँ, जो भिखारी तो नहीं हैं, बस आपकी कार का विंडस्क्रीन साफ़ करते हैं और बदले में जो मिल जाए उसे ले लेते हैं| सबसे अच्छी बात यहाँ ये है कि आप किसी को भी कुछ भी खाने के लिए दीजिये, चाहे वो भिखारी हो, या आपका गेट कीपर या आपके घर काम करने वाली बाई, ये लोग बेहद खुश होते हैं और ताली बजाकर आपका शुक्रिया करते हैं| सच में दिल खुश हो जाता है इनको कुछ खाने के लिए देकर, थोड़े से खाने के बदले इतनी दुआएं जो मिल जाती हैं| 
लेकिन एक चीज पूरे देश में कामन है, सभी मांगने वाले अश्वेत ही होते हैं, शायद ही कोई श्वेत व्यक्ति भीख मांगते दिखा हो| वजह भी पूरी तरह से आर्थिक है, अश्वेत तबका ही यहाँ आर्थिक रूप से कमजोर है|  

6. एक हफ्ता तो हम लोगों ने होटल में ही बिताया और उसके बाद अपने घर में गए| उस दौरान रोज होटल से ही अपने कार्यालय जाना हुआ| पहले दिन जब मैं अपने कार्यालय पहुँचा तो चकित रह गया, वैसे पता तो था कि अपना बैंक शहर के सबसे बड़े और भव्य शॉपिंग माल में है| सैंडटन के शॉपिंग माल में स्थित अपने कार्यालय को देखकर लगा जैसे किस दुनिया में आ गए| कहाँ हिंदुस्तान में स्थित अपनी शाखाएं, जहाँ भीड़ भाड़, शोरगुल, गन्दगी और दिन भर आते लोगों का सामना करना पड़ता था, वहीँ यहाँ पर आदमी का पता नहीं| एकदम चमचमाता हुआ ऑफिस, कुल पांच कर्मचारी और निहायत ही शांत माहौल| शायद पूरे हफ्ते में एक या दो आदमी आते हैं और हफ्ता भी सिर्फ साढ़े चार दिन का| 
दरअसल यहाँ पर हफ्ते में कार्य करने के सिर्फ ५ दिन हैं और शुक्रवार को दोपहर दो बजे के बाद आदमी वीकेंड के मूड में आ जाता है| यहाँ पर आदमी अपनी जिंदगी को भरपूर जीता है, अपने हिंदुस्तान की तुलना में कई गुना ज्यादा| शुक्रवार शाम को अधिकांश लोग किसी न किसी जगह निकल जाते हैं और फिर रविवार शाम को ही लौटते हैं| पूरे दो दिन जम के पार्टी, शराब और घूमना, फिर वापस सोमवार से काम| लोग समय के बेहद पाबंद होते हैं खासकर श्वेत आबादी, बाकी मूल अफ़्रीकी लोग तो थोड़ा बहुत देर सबेर भी कर लेते हैं| 
पहले हफ्ते में ही एक और बेहद दिलचस्प बात पता चली, एक डिनर का न्यौता आया| जब मैंने समय देखा तो उसमें शाम के साढ़े छह बजे लिखा हुआ था| मुझे लगा कि गलती से लिख दिया होगा, शाम को सात बजे तो हम लोग चाय पीते हैं हिंदुस्तान में और डिनर तो रात नौ के बाद ही होता है| लेकिन जब मैंने पूछा तो लोगों ने बताया कि यहाँ डिनर का समय साढ़े छह बजे से शुरू हो जाता है और लगभग आठ बजे तक समाप्त| डेढ़ घण्टा भी इसलिए, क्योंकि लोग पहले ड्रिंक करते हैं और फिर खाना खाते हैं| अब पहली डिनर पार्टी में तो ऐसा लगा जैसे हम लंच देर से करने जा रहे हैं| लोग यहाँ जल्दी सो जाते हैं और सुबह बहुत जल्दी, लगभग चार बजे उठ जाते हैं| सुबह उठकर सबसे जरुरी काम होता है जिम जाना और अगर सुबह नहीं जा सकते तो शाम को तो जरूर जाते हैं| शारीरिक फिटनेस पर बहुत ध्यान देते हैं यहाँ के निवासी और इसी वजह से ज्यादा उम्र तक जिन्दा रहते हैं| यहाँ आप अस्सी साल से भी ज्यादा के लोगों को आप आराम से कर चलाते और काम करते देख सकते हैं|  
अब कहाँ हम लोग रात को एक बजे तक सोने वाले और सुबह सात बजे उठने वाले, और कहाँ ये देश| कई महीने लग गए इनके समय के साथ समय मिलाने में|   

7. एक सप्ताह बाद हम लोग अपने फ्लैट में रहने आ गए, एक बड़ी सोसाइटी में स्थित ये फ्लैट काफी बड़ा और सम्पूर्ण सुविधा युक्त था| यहाँ पर किराये के मकान दो तरह से मिलते है, या तो पूरी तरह से सुविधायुक्त (बिस्तर, सोफे से लेकर घर की हर चीज मकान मालिक द्वारा दी जाती है) या सिर्फ फ्लैट जिसमें आप अपना सामान खरीदकर रखें| मेरी इच्छा थी कि फ्लैट ऐसी जगह हो जहाँ हिंदुस्तानी लोग कम मिलें और स्थानीय लोग ही ज्यादा मिलें, जिससे यहाँ के लोगों के रहन सहन और जीवन शैली के बारे में पता चल सके| और फ्लैट बिलकुल ऐसी ही जगह था जहाँ हमारे अलावा एक भी हिंदुस्तानी परिवार नहीं था| दो तीन कई पीढ़ी पुराने भारतीय परिवार थे लेकिन अब वो भी यहां के हो गए थे| इस वजह से मुझे इन लोगों को नज़दीक से जानने का मौका मिला|
चूँकि सुरक्षा के काफी कड़े इंतज़ाम होते है यहाँ तो हमारी बिल्डिंग भी ऑटोमैटिक गेट से युक्त है, जहाँ तीन चार गार्ड हमेशा मौजूद रहते है| कोई भी व्यक्ति बिना इज़ाज़त अंदर नहीं जा सकता और हमारे पास रिमोट दिया गया जिससे हम गेट खोल सकें| शुरुआत में तो वैसे भी सब कुछ अजीब ही लगा लेकिन कुछ दिनों बाद मैंने एक ख़ास चीज महसूस किया कि हमारी बिल्डिंग बेहद शांत है, कोई आवाज़ नहीं, हालांकि लगभग 75 फ्लैट होंगे| और अब तो तीन साल से ज्यादा हो गए रहते हुए लेकिन किसी भी शोर शराबे के लिए कान तरस जाते है| आपको अपनी पार्किंग में भी कार ठीक से लगानी है, कहीं आपने पडोसी के पार्किंग में अतिक्रमण कर दिया तो आपके पास नोटिस आ जाएगी और कई बार ऐसा हुआ तो शायद जुर्माना भी|  
यहाँ की आबादी में दो बिलकुल अलग वर्ग है, एक श्वेत वर्ग जो बेहद शांत रहता है और किसी भी तरह का शोरगुल घर में पसंद नहीं करता है| इस बात का अंदाज तो था लेकिन बहुत जल्द ही पता भी लग गया| दरअसल हमारे एक मित्र अपने बच्चों के साथ मेरे घर आये और बच्चे तो उछल कूद करते ही है| लगभग दो घंटे बाद मेरे फ्लैट की घंटी बजी, मैं बाहर निकला तो देखा कि सामने एक बुजुर्ग खड़े है, जो मेरे नीचे वाले फ्लैट में रहते है| उन्होंने पहले तो आने के लिए माफ़ी मांगी और फिर कहा कि क्या ये शोर बंद हो सकता है, ये मुझे मार डाल रहा है| मैंने भी उनसे छमा मांगी और बच्चों को किसी तरह समझाया कि ज्यादा उछलें मत| आगे भी दो तीन बार ऐसा हुआ तो मैं काफी सतर्क हो गया और बच्चों के आने पर उनको समझाता ही रहता हूँ|
और दूसरा यहाँ की अश्वेत आबादी, जो कुछ ज्यादा ही शोरगुल पसंद है| शुरू शुरू में हम लोग जब भी किसी मॉल में जाते थे तो अक्सर दुकानों में काम करने वाले अश्वेत लोग संगीत पर थिरकते दिख जाते| बस इनको बहाना चाहिए नाचने और चिल्लाने का, कोई भी संगीत बज जाए फिर ये रुक नहीं सकते| आप इनकी बस्ती में चले जाईये, आपको लगेगा ही नहीं कि आप किसी बेहद शांत देश में रहते है| 
लेकिन अगर दोनों तरह के लोग एक ही जगह रह रहे हों, जैसे हमारी बिल्डिंग में ही, तो एकदम शांत रहते है| धीरे धीरे इस विरोधाभास में हम लोगों ने भी जीना सीख लिया और यहाँ की आबो हवा में ढल गए| 

8. इस देश में बहुत से विरोधाभास देखने को मिलते हैं और धीरे धीरे मुझे पता चलता गया| अब अगर आपको हिंदुस्तान में मोबाइल का सिमकार्ड लेना हो तो आजकल काफी मशक्कत करनी पड़ती है, लेकिन यहाँ पर तो ऐसे मिलते हैं जैसे आप दूकान से आलू, प्याज़ ले रहे हों (आलू प्याज़ से याद आया, यहाँ ये दोनों सब्जियां भी बहुत अच्छे से पैक करके पांच या सात किलो के पैकेट में मिलती हैं)| इस देश में आने के बाद मैंने सोचा फोन करने के लिए सिम लेना पड़ेगा और उसके लिए फोटो, एड्रेस प्रूफ और आई डी प्रूफ लगेगा| लेकिन मुझे मेरे सहकर्मी ने यूँ ही एक सिम पकड़ा दिया| मुझे लगा उसने अपने नाम से लिया होगा मेरे लिए, तो उसने बताया कि आपको जितने प्रीपेड सिम चाहिये, मिल जायेंगे| हाँ पोस्टपेड के लिए जरूर आपको कागजात देने पड़ते हैं| ये भी उस देश में जहाँ ऑनलाइन फ्राड बहुत होते हैं और मेल हैक होना तो कॉमन है|
दूसरा आश्चर्य तब हुआ जब अपने पूर्ववर्ती को एयरपोर्ट छोड़ने जाना था| इस देश में जहाँ इतना ज्यादा क्राइम है, वहाँ क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आप अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर किसी को पहुंचाने सिक्योरिटी चेक तक जा सकते हैं| एक हिंदुस्तान के हवाई अड्डे हैं जहाँ अगर आपको किसी शहर के लिए भी फ्लाइट पकड़ना हो तो लगता है कि किसी युद्ध स्थल में आ गए हैं| 
खैर जब मैंने अपनी कार अपने पूर्ववर्ती से खरीदी तो उसका ट्रांसफर कराना था| अब मुझे लगा कि ये भी कोई बहुत बड़ा काम होगा यहाँ, लेकिन दो तीन घंटे में ही कुछ भुगतान करके गाड़ी मेरे नाम ट्रांसफर हो गयी| वो भी तब, जब गाड़ी बेचने वाला देश छोड़ के जा चुका था| लेकिन उसी दिन मुझे यहाँ पर भ्रष्टाचार से पहली बार साबका पड़ा| गाड़ी ट्रांसफर होने के बाद एक फिटनेस चाहिये होता है जिससे कि ये सिद्ध हो कि आप इस गाड़ी को यहाँ चला सकते हैं| उस टेस्ट में अधिकारियों ने फेल कर दिया, जबकि कार एकदम फिट और नयी थी| तब मेरे वाहन चालक ने बताया कि मैं करवा देता हूँ और कुछ पैसे देकर कार फिट हो गयी| 
यहाँ पर पुलिस में दो तरह के अधिकारी होते हैं, श्वेत और अश्वेत| लोगों ने शुरू में ही बता दिया था कि अगर कभी भी रास्ते में पुलिस ने कार रोकी और आपने अपना लाइसेंस या पासपोर्ट नहीं रखा है तो दो रास्ते हैं| अगर पुलिस वाला अश्वेत है तो आप उसे मामूली सी रकम देकर भी छूट सकते हैं, लेकिन अगर पुलिस अफसर श्वेत है तो किसी भी हाल में उसे रिश्वत देने की चेष्टा मत कीजिये, वर्ना वो आपको गिरफ्तार भी कर सकता है| 
अगर आप किसी नियम का उल्लंघन करते है तो आपके पते पर टिकेट (यहाँ फाइन को टिकेट कहते हैं, मुझे कुछ महीने लगे समझने में) आ जायेगा| सड़को पर कैमरे लगे हैं जो आपको निर्धारित गति से तेज जाने या लाल बत्ती पर रोबोट (ट्रैफिक सिग्नल) पार करने पर आपके पते पर टिकेट भेज देते हैं| मुझे भी तेज गति से कार चलाने के लिए एक बार टिकेट का भुगतान करना पड़ा है|   

9. हिंदुस्तान से आये हुए किसी शख्स के लिए ये विश्वास करना कि किसी देश में वीकेंड (शुक्रवार शाम से रविवार देर रात तक) किसी को फोन करना या किसी से कार्य सम्बंधित बात करना न सिर्फ अभद्रता मानी जाती है, बल्कि सामने वाला व्यक्ति आपसे खफा भी हो सकता है| इस देश में वीकेंड मतलब सिर्फ मौज मस्ती, घूमना फिरना, फोन दूसरों के लिए बंद और रिलैक्स करना| यहाँ तक कि कोई प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाला डॉक्टर भी नहीं मिलेगा वीकेंड में, सिर्फ हस्पताल में कुछ इमरजेंसी सेवाएं चालू रहती हैं| और एक अपना देश है जहाँ काम के घंटे रात को ११ बजे भी ख़त्म नहीं होते और शनिवार और रविवार से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता|
अपनी खुद की कार होना तो हिंदुस्तान में भी गर्व की बात होती है और स्टेटस सिंबल होता है, तो यहाँ पर भी कार लेकर बहुत अच्छा महसूस हुआ| लेकिन कुछ दिन बाद देखा कि यहाँ तो हर व्यक्ति के पास कार है लेकिन मोटरसाइकिल बहुत कम लोगों के पास ही है| यहाँ वीकेंड्स में तो बाइकर्स की गैंग निकलती है और उनकी बाइक्स ऐसी कि देख कर ऑंखें खुली की खुली रह जाएँ| या तो हर्ले डेविडसन या बी एम् डब्ल्यू की बाइक और वो भी इतनी भव्य कि क्या कहा जाए| खैर बाद में पता चला कि यहाँ बाइक रखना स्टेटस सिंबल होता है क्योंकि एक बाइक की कीमत में आप यहाँ कई कारें खरीद सकते हैं| हाँ अपने देश वाली बाइक्स भी दिखती है, लेकिन सिर्फ पिज़्ज़ा डिलीवरी वालों के पास| यहाँ तक कि एक वेस्पा स्कूटर की कीमत यहाँ एक अच्छी कार की कीमत के बराबर है| 
साइकिल सवार भी यहाँ इस तरह से चलते हैं कि लगे जैसे कोई बाइक से जा रहा हो| हेलमेट लगाकर और कुछ ऐसी ड्रेस पहनकर जो दूर से ही दिख जाए और अगर रात में साइकिल सवार जा रहा हैं तो उसके हेलमेट में लाइट भी होगी| साइकिलिंग भी यहाँ एक व्यायाम का हिस्सा हैं और अक्सर वीकेंड्स में लोग लंबी लंबी दूरी तक साइकिल से जाते हैं| यहाँ तक कि रात में कुछ लोग दौड़ने भी निकलते हैं तो लाइट लगी हुई हेलमेट लगाकर| मतलब हर चीज को एक सलीके से और स्टाइल में, लेकिन अगर आप बाहर के एरिया में निकल जायेंगे तो आपको गरीबी भी दिख जाती हैं| 
हाईवे पर सड़क के किनारे बाएं तरफ एक हिस्सा रहता हैं जो कि इमरजेंसी लेन कहलाता हैं| ये मुख्य रूप से एम्बुलेन्स, पुलिस या किसी और इमरजेंसी के लिए ही होता हैं और सामान्य तौर से कोई अन्य व्यक्ति इसका इस्तेमाल नहीं करता हैं| हाँ अगर किसी की फ्लाइट छूट रही हो तो वो भी इसका इस्तेमाल कार सकता हैं, बशर्ते वह जुर्माना भुगतने के लिए तैयार हो|
कुल मिलाकर लोग यहाँ जीवन को बहुत व्यवस्थित तरीके से और पूरी जिंदादिली से जीते हैं और यहाँ से वापस जाने पर सालों लग जाते हैं इन चीजों को भुलाने में|

10. फर्ज कीजिये कि आप कहीं खाने के लिए गए हैं, जैसे किसी रेस्तरां इत्यादि में, तो आप तो ये उम्मीद तो करेंगे ही कि खाने के मेज पर पानी भी मिले| लेकिन इस देश में ये एक बड़ा फ़र्क़ नज़र आया, यहाँ खाने के साथ आपको सॉफ्ट ड्रिंक जैसे कोक, मिरिंडा इत्यादि तो मिलेगा, यहाँ तक कि आपको हार्ड ड्रिंक भी जैसे बियर, व्हिस्की इत्यादि भी मिलेगा लेकिन अगर आपने पानी माँगा तो बेयरा आपको थोड़े आश्चर्य से देखेगा| और अगर आपने पानी माँगा तो आपको बताना पड़ेगा कि आपको मिनरल वाटर चाहिए या टैप वाटर (नल का पानी)|
अब आप सोचिये कि आपको हिंदुस्तान में कहीं खाने के लिए बुलाया जाए और पानी नल से निकाल कर दे दिया जाए तो आप कैसा महसूस करेंगे| शायद आप पीने से ही मना कर दें (वास्तव में हिंदुस्तान में नल का पानी पीना कल्पना से बाहर है), लेकिन इस देश में जब हम लोग आये तो घर में देखा कि न तो फ़िल्टर लगा है और न ही मिनरल वाटर की कोई बोतल रखी है| अब पीने का पानी कहाँ है पूछा तो मेरे पूर्ववर्ती ने बताया कि यहाँ पर पीने के लिए नल का ही पानी इस्तेमाल करते हैं| दरअसल इस देश का पानी विश्व के सबसे शुद्ध पानी वाले देशों में शुमार किया जाता है और इसीलिए जो पानी बाथरूम में इस्तेमाल होता है वही किचन में भी और वही पीने के लिए भी| हमें कई महीने लग गए आपने आप को मानसिक रूप से तैयार करने में कि नल का पानी भी इतना शुद्ध और साफ़ हो सकता है|
यहाँ पर लोग बाहर पानी पीने के बदले कोक पीना ज्यादा पसंद करते हैं, खासकर अश्वेत आबादी| और इसीलिए यहाँ की अश्वेत आबादी मोटापे से जूझ रही है| दरअसल कोक और पेप्सी कंपनियों ने यहाँ के लोगों को अपने पेय का गुलाम बना दिया है| आप यहाँ मजदुर तबके को देखिये, उनके हाथ में पानी की बोतल के बदले कोक की बड़ी वाली बोतल दिखेगी| तकलीफ तो तब होती है जब दो से तीन साल के बच्चों को भी कोक पीते देखता हूँ, कितना नुक्सान करता होगा ये उनको| खाने का भी यहाँ अलग ही सिस्टम है, घर पर खाना शायद ही बनता है, लोग नाश्ता से लेकर भोजन तक अधिकतर बाहर ही करते हैं| हमारे यहाँ जितने भी लोग काम करते हैं, उनको हमने आजतक कभी टिफ़िन लेकर आते नहीं देखा, ये अलग बात है कि हम लोग तो रोज ही लेकर जाते हैं| अधिकतर लोग बर्गर, पिज़्ज़ा और इसीतरह की चीजें खाकर दिन बिताते हैं और रोटी या चावल तो सिर्फ किसी हिंदुस्तानी आदमी के साथ ही खाते हैं| 
अधिकतर लोग यहाँ पर मुख्य तौर पर मांसाहारी हैं और शाकाहारियों की संख्या बहुत कम है| हाँ यहाँ के फल बहुत अच्छे होते हैं और सब्जियां भी कमोबेश सभी मिल जाती हैं|

11. बच्चों की पढ़ाई लिखाई के लिए यहाँ बेहद सुकूनदायी माहौल है, पढ़ाई पर कम जोर लेकिन व्यक्तित्व विकास पर ज्यादा| अपने देश के बच्चों को देखिये, उनके वजन से ज्यादा उनके बस्ते का वजन होता है लेकिन यहाँ पर स्थिति काफी अलग और बेहतर है| यहाँ पर शैक्षणिक वर्ष यानी कक्षाएं जनवरी से प्रारम्भ होती हैं और नवम्बर में आखिरी परीक्षा ख़त्म| यानी पूरा दिसंबर बच्चों की छुट्टी, इसके अलावा भी साल में कई बार लंबी लंबी छुट्टियां होती रहती हैं और बच्चों पर पढ़ाई का तनाव अमूमन नहीं दिखता है| शायद इसीलिए यहाँ शिक्षित लोगों का प्रतिशत भी काफी ज्यादा है, लगभग ९२ प्रतिशत|
अमेरिकन इंटरनेशनल स्कूल नाम का एक स्कूल यहाँ ऐसा है जिसका शैक्षणिक वर्ष भारत के हिसाब से है, लेकिन वहां पर एडमिसन के लिए लंबी लाइन होती है| और अगर इसके फीस को आप सुनेंगे तो होश फाख्ता हो जायेंगे, बहुत ही ज्यादा है| एक साल की फीस लगभग ३० लाख रूपये होती है और उसके अलावा तमाम खर्चे और, मतलब अगर आप वहां पढ़ाने का सोच रहे हैं तो फिर हिंदुस्तान की प्रॉपर्टी को बेचना पड़ेगा| वैसे सामान्य प्राइवेट स्कूल की फीस भी लगभग ४ से पांच लाख रूपये सालाना होती है|
स्कूलों में पढ़ाई का माध्यम तो इंग्लिश ही ही है लेकिन उसके अलावा आप यहाँ की स्थानीय भाषा, जैसे अफ्रीकान, जुलू इत्यादि भी सीख सकते हैं| सरकारी स्कूल भी हैं जहाँ पर फीस बहुत कम है लेकिन प्राइवेट स्कूल तो भयानक फीस लेते हैं| हिंदी की पढ़ाई भी कुछ स्कूलों में होती है और इससे यहाँ के अप्रवासी भारतीयों को बहुत राहत मिलती है| बच्चों को कैलकुलेटर शुरू में ही पकड़ा दिया जाता है और प्राइवेट स्कूलों में तो आई पैड में ही पढ़ाई होती है| मतलब लिखने, जोड़ने, घटाने इत्यादि का झंझट ख़त्म|
वैसे एक खास बात है कि यहाँ के स्कूलों में हिंदुस्तान से आये बच्चे बड़े अच्छे नज़रों से देखे जाते हैं| और प्रिंसिपल तथा शिक्षक भी उनसे बहुत प्रभावित रहते हैं, वजह है अनुशासन और संस्कार| भारतीय बच्चे माँ बाप की बात मानते हैं तो शिक्षकों की बात भी मानते हैं, जबकि यहाँ के बच्चे तो स्कूल में अनुशासन का नाम भी शायद ही जानते हों| मैं भी जब भी अपने बेटे के स्कूल जाता था, प्रिंसिपल बहुत तारीफ़ करता था कि भारतीय बच्चे अगर हों तो कोई दिक्कत ही न हो| स्कूलों में धूम्रपान बहुत सामान्य सी बात है और किसी शिक्षक को ये अधिकार नहीं है कि वो किसी बच्चे को दंड दे सके| अगर किसी बच्चे को धूम्रपान करते या
किसी अन्य गलत काम में पकड़ा गया तो उसे कम्युनिटी सर्विस की सजा दी जाती है, जैसे स्कूल में झाड़ू लगाना या सफाई करना आदि| बच्चे किसी भी शिक्षक या प्रिंसिपल को भी उसके नाम से ही बुलाते हैं, बस नाम के पहले मिस्टर का मिस लगा देते हैं| 
खेलकूद भी यहाँ शिक्षा का अभिन्न अंग है और बच्चे खूब खेलते भी हैं| कुल मिलाकर पढ़ाई यहाँ हिंदुस्तान की तरह नहीं है जहाँ बच्चों को बचपन में ही गधो की तरह बस्ते ढोने से लेकर रट्टू तोता तक बना दिया जाता है|

12. यहाँ की पढ़ाई के बारे में कुछ दिलचस्प चीजें और भी हैं| आप फर्ज कीजिये कि आप हिंदुस्तान में किसी को कहते हैं कि आप के बच्चे ने मेट्रिक या हाई स्कूल पास कर लिया है तो वो क्या सोचेगा| उसे तो यही समझ में आएगा कि बच्चे ने दसवीं पास कर ली है और अब वह ११ वीं में पढ़ेगा| लेकिन इस देश में, कई अन्य यूरोपीय देशों की तरह (दरअसल यह देश सिर्फ कहने के लिए अफ्रीका है, अधिकतर मामलों में यह देश यूरोप का ही हिस्सा लगता है), बच्चों का मेट्रिक या हाई स्कूल पास करना एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है| अब वो किस लिए तो बताते हैं- यहाँ पर मेट्रिक या हाई स्कूल मतलब हिंदुस्तान का १२ वीं होता है| और उसे पास करने के उपलक्ष्य में बच्चे बहुत बड़ी बड़ी पार्टी करते हैं जिसे ग्रेजुएसन पार्टी कहते हैं (हिंदुस्तान में ग्रेजुएसन पार्टी का मतलब आप जानते ही हैं, ग्रैजुएट होना)|
बच्चों के साथ साथ उनके माता पिता के लिए भी ग्राजुएसन पार्टी बहुत महत्वपूर्ण होती है| एक आम हिंदुस्तानी के लिए बच्चों की इस पार्टी की कल्पना भी करना बहुत मुश्किल है, इसमें लड़के लड़कियां देर रात तक शराब पीते हैं और नृत्य इत्यादि भी करते हैं| इसके लिए पूरे साल तैयारी की जाती है और अलग से ड्रेस भी सिलाया जाता है| इसके बाद यहाँ पर बहुत से बच्चे किसी नौकरी में लग जाते हैं, बशर्ते उनकी उम्र हो और कुछ बच्चे ही आगे पढ़ाई करने की सोचते हैं|
मेट्रिक के बाद की पढ़ाई यूनिवर्सिटी की पढ़ाई कहलाती है और बच्चे इंजीनिरिंग, मेडिकल या किसी और विषय में दाखिला लेते हैं| जोहानसबर्ग, प्रिटोरिया और केप टाउन में कुछ अच्छी यूनिवर्सिटीज हैं जिनका स्तर काफी अच्छा माना जाता है|
जो लोग भारत में बेरोजगारी से त्रस्त हैं उन्हें यहाँ के आंकड़े भी चौका देंगे| सरकारी तौर पर इस देश में लगभग 27 प्रतिशत बेरोजगारी है लेकिन अगर गैर सरकारी आंकड़ों पर गौर किया जाये तो लगभग ४० प्रतिशत लोग यहाँ बेरोजगार हैं और सरकार उनके लिए भत्ता देने का फैसला कर चुकी है|
पिछले तीन महीने से यहाँ पर छात्रों फीस बढ़ाने के खिलाफ द्वारा हिंसक हड़ताल की जा रही है और कई यूनिवर्सिटीज महीनों से बंद हैं| छात्रों की मांग है कि शिक्षा को फ्री किया जाए और बढ़ी हुई फीस तुरंत वापस ली जाए| पिछले वर्ष भी इसी तरह उन्होंने हड़ताल करके फीस को बढ़ने नहीं दिया था और उनका सोचना है कि आगे भी इसी तरह का प्रोटेस्ट किया जाएगा|
खैर अब शिक्षा फ्री होगी या नहीं, ये तो नहीं पता, लेकिन अब राजनीति इसमें भी घुस चुकी है और शायद इस तरह की हड़तालें आगे भी देखने को मिलती रहेंगी यहाँ पर|

13. लोगों ने तो शुरू में ही बता दिया था कि यहाँ पर यातायात के साधन सीमित हैं| और यही वजह है कि यहाँ हर व्यक्ति के पास कार दिखती है| लेकिन अगर किसी को दक्षिण अफ्रीका का इतिहास और महात्मा गांधीजी के बारे में पता हो तो उसके लिए थोड़े आश्चर्य की बात होगी| अब अगर यहाँ ट्रेन नहीं चल रही होती, तो शायद पीटर मेरिट्सबर्ग की घटना नहीं होती जिसमें गांधीजी को ट्रेन के फर्स्ट क्लास डब्बे से धक्के देकर बाहर फेंक दिया गया था| और इसी घटना ने मोहनलाल को महात्मा बनाने में शायद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा की
और सम्पूर्ण विश्व को एक ऐसा व्यक्ति दिया जिसके बारे में आगे की पीढियां शायद विश्वास भी नहीं कर पाएंगी|
खैर, यहाँ ट्रेन तो चलती है लेकिन उनके तीन विभिन्न प्रकार हैं| पहली ट्रेन, मेट्रो रेल, जो देश के विभिन्न भागों में तो चलती है लेकिन इस ट्रेन में सिर्फ अश्वेत और गरीब आबादी ही सफर करती है| यह बिलकुल हमारे देश की पैसेंजर ट्रेन जैसी है लेकिन हमने न तो खुद आजतक इसमें सफर किया है और न हीं कभी किसी और पर्यटक या स्वेत व्यक्ति को करते देखा है| दूसरी ट्रेन है हाउ ट्रेन जो अपने देश की मेट्रो ट्रेन जैसी है, पूरी तरह वातानुकूलित और बहुत तेज गति से चलने वाली| यह ट्रेन बहुत कम जगहों पर उपलब्ध है और एयरपोर्ट को शहर के कई हिस्सों से जोड़ती है| इसका किराया काफी ज्यादा होता है और आमजन इसमें सफर नहीं करते हैं| तीसरी ट्रेन है ब्लू ट्रेन, यह दुनियां के दस सबसे महंगे ट्रेन में से एक है और यह मुख्य रूप से पर्यटन के लिए है| इसका किराया बेहद महंगा है और इसमें सफर करने की हिम्मत हम जैसों में नहीं है| अब आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि आप को जोबर्ग से केपटाऊन जाना हो तो हवाई जहाज में आप लगभग १००० ज़ार(५००० रूपये) में जा सकते हैं, लेकिन अगर आप को ब्लू ट्रेन से जाना है तो लगभग इसका १० से पंद्रह गुना ज्यादा खर्च करना होगा|
एक और खूबी है यहाँ, आप को टैक्सी के तौर पर मर्सिडीज और बी एम् डब्ल्यू हर तरफ दिख जाएँगी और आप इनमे सफर करके अपने आप को महाराजा जैसी फीलिंग दे सकते हैं| दरअसल इस देश में ये कारें बनती हैं और इनपर छूट भी होती है जिसके चलते हर कोई इसे ले सकता है (अपने देश में तो बी एम् डब्ल्यू का मर्सिडीज वाला करोड़पति ही माना जाता है)|
यहाँ आम जनता के लिए टैक्सी चलती है जिसमें हम लोगों के लिए बैठना नामुमकिन है| देखने में इतनी ख़राब नहीं होती लेकिन सुरक्षा कि दृष्टि से लोग मना करते हैं| लेकिन रोड पर आप इनको चलता देखेंगे तो आपको हिंदुस्तान के टेम्पो वाले याद आ जायेंगे| टैक्सी वाले किसी भी ट्रैफिक नियम का पालन नहीं करते हैं और उनसे अपने कार का या अपने आप का बचाव करना आपकी अपनी जिम्मेदारी होती है| जोबर्ग में तो सामान्य टैक्सी ही दिखती है लेकिन अगर आप डरबन चले जाईये तो आपको इक से बढ़कर एक रंगबिरंगी टैक्सी दिखाई पड़ेगी| वहां पर अधिकतर टैक्सियां अफ़्रीकी भारतीय लोग ही चलाते हैं और आप को लगेगा
कि आप दक्षिण भारत के किसी हिस्से में आ गए हैं| बसें भी यहाँ चलती हैं जो कि यहाँ के आमजन के लिए ही हैं, हमारे जैसे आप्रवासियों के लिए नहीं| हाँ टूरिस्ट बसों में आप आराम से सफर कर सकते हैं|

14. यहाँ पर गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन का नियम भी कुछ अलग है, मतलब गाड़ी का नंबर कुछ भी हो सकता है| शुरू में तो नहीं पता था लेकिन अलग ढंग से लिखे नंबर जिज्ञासा जरूर उत्पन्न करते थे| इसी बीच कुछ ऐसे नंबर दिखे जिसमें किसी का नाम लिखा था तो किसी के धर्म के बारे में लिखा था तो लगा कि यहाँ आप कुछ भी नंबर लिखवा सकते हैं| दरअसल यहाँ पर तो नंबर सामान्यतयः हिन्दुस्तान के उलट ही लिखे जाते हैं, जैसे वहां पर पहले राज्य को लिखा जाता है (UP651234), लेकिन यहाँ पर राज्य को अंत में लिखा जाता है (WSR481GP)(GP मतलब हाउटेन्ग प्रोविंस)| कहीं कहीं इसके अपवाद भी हैं|
लेकिन यहाँ सबसे बड़ी सुविधा यह है कि आप कुछ अलग भुगतान करके अपना नंबर कुछ भी लिखवा सकते हैं| उदहारण के तौर पर अगर आप बजरंग बली के तगड़े भक्त हैं तो अपना नंबर कुछ ऐसा लिखवा सकते हैं (HANUMAN GP)| अब मैंने तो यहाँ पर एक से एक नंबर प्लेट देखी है, जैसे श्रीराम, अली जैसे धार्मिक नंबर प्लेट, या किसी का नाम जैसे शीला, बद्री आदि भी| लोग अपने बिज़नस के हिसाब से भी नंबर लिखवा लेते हैं और मुझे तो खैर बहुत अच्छा लगता है इनको देखकर| काश हिंदुस्तान में भी ये सुविधा चालू हो जाए तो मजा आ जाए| 
एक चीज और है, यहाँ गाड़ियों का बीमा काफी महंगा है और अधिकतर यह मासिक भुगतान पर होता है| मतलब हर महीने आपके खाते से बीमा की रकम कट जायेगी| शुरुआत में तो बहुत तगड़ा झटका लगा जब देखा कि जो रकम हम हिंदुस्तान में पूरे साल में देते हैं, वह यहाँ दो महीने में ही देना पड़ रहा है| और बीमा के लिए बस फोन पर बात कीजिये और अपना ईमेल दीजिये, आपकी गाड़ी का बीमा हो जायेगा| ये अलग बात है कि हमारे जैसे शुद्ध बनारसी आदमी के लिए फोन पर यहाँ की अंग्रेजी समझना कितना कठिन था, बता नहीं सकते|
यहाँ एक और दिक्कत से हमारा साबका पड़ा, हिन्दुतान में तो हम लोग शून्य को जीरो या शून्य ही कहते हैं (अंग्रेजी या हिंदी में), लेकिन यहाँ पर जीरो को ओ कहते हैं (O)| अब आप ही बताईये, कोई आपको अपना नंबर बता रहा है और उसमें पड़ने वाले जीरो को ओ कह रहा है तो आपको दिक्कत होगी या नहीं (खैर हम तो अब भी ओ नहीं कह पाते हैं, जीरो ही कहते हैं)| और यहाँ पर मोबाइल के नंबर ९ डिजिट के होते हैं, बस आपको पहले एक ओ मतलब जीरो लगाना पड़ता है|
यहाँ पर फोन आपको महीने के किश्त पर, यानि कॉन्ट्रेक्ट पर मिल जाता है (अब तो भारत में भी मिल रहा है)| आप किसी भी नेटवर्क कंपनी के पास जाईये, वो आपको महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर, जो कि अमूमन दो साल के लिए होता है, फोन दे देगा| इसीलिए शुरू में मुझे हर व्यक्ति के हाथ में आई फोन देखकर झटका लगा था, बाद में समझ आया कि जो मर्जी वो फोन आप ले सकते हैं यहाँ| 
वैसे तो यह देश पूरी तरह से किश्तों पर जीने वाला देश है लेकिन लोग यहाँ जिंदगी को भरपूर जीते हैं|

15. कुछ और अजीब चीजें भी यहाँ देखने को मिलती रहती हैं, बशर्ते आप आँखें खोल के निकलें| लोग यहाँ धूम्रपान बहुत करते हैं लेकिन बिलकुल अनुशासन में| हर माल या फैक्ट्री, कार्यालय में धूम्रपान की जगह नियत है और लोग उसी जगह पर जाकर सिगरेट पीते हैं| खासकर पार्किंग में तो अक्सर लोग सिगरेट पीते नजर आ जाते हैं और कार चलाते हुए भी खूब सिगरेट पीते हैं| किसी भी रोबोट (ट्रैफिक सिग्नल) पर आप रुकते हैं तो अपने चारो तरफ देख लीजिये, बहुत से लोग धूम्रपान करते दिख जायेंगे| लेकिन एक अजीब बात जो मुझे देखने को मिली वो ये थी कि पुरुषों के तुलना में यहाँ महिलाएं ज्यादा धूम्रपान करती दिखती हैं| हुक्का भी खूब फैशन में है और जगह जगह हुक्का बार हैं जिनमें कहीं कहीं तो पूरी रात युवक युवतियां आपको हुक्का पीते नज़र आ जायेंगे|
सबसे ज्यादा मजा तो तब आता है जब आपको किसी ट्रैफिक सिग्नल पर कोई महिला कार चालक अपनी भौहें बनाती दिख जाती है| कार में मेकअप करना तो सामान्य बात है यहाँ और कभी कभी तो भीड़ में धीरे धीरे कार चलाते हुए महिलाएं पूरा मेकअप कर डालती हैं| खैर मेरी नजर में तो बहुत साधना की जरुरत होती होगी इसके लिए|
शुक्रवार को दोपहर बाद अगर आप माल या किसी शॉपिंग सेंटर में जाएंगे तो आपको बहुत चहल पहल नजर आएगी| लोग वीकेंड के लिए खाने पीने का सामान और बाकी जरुरत की चीजें खरीद लेते हैं और फिर अगले दो दिन तक मस्ती करते हैं| लोगों से अगर आप शुक्रवार शाम को बात कीजिये तो कमोबेश एक ही बात सुनने को मिलती है "बहुत थक गए हैं, बहुत लंबा हफ्ता था"| अब इनको कौन समझाए कि एक बार हिंदुस्तान जाकर काम करिये तो समझ आये कि थकान और काम क्या होता है|
महीने में अमूमन २५ या २६ तारीख को यहाँ पे डे (तनख्वाह का दिन) होता है और उस हफ्ते तो चहल पहल देखने लायक होती है| अधिकतर लोगों की तनख्वाह अगले १० दिन में ख़त्म हो जाती है और फिर लोग अगली तनख्वाह का इंतज़ार करते हैं| जिंदगी को सिर्फ आज में जीने वालों की यहाँ बहुतायत है और बचत क्या होती है, इनको पता भी नहीं होता| अब चूँकि हर चीज ही यहाँ किश्तों में मिल जाती है तो लोग बहुत चिंता करते भी नहीं हैं| यहाँ पर हर बड़े स्टोर का अपना एक कार्ड होता है (क्रेडिट कार्ड जैसा) और उससे लोग सामान को किश्तों में खरीद लेते हैं| यहाँ तक कि एक चप्पल भी आपको किश्त में खरीदने की सुविधा मिलती है और जब तक उसका भुगतान पूरा हुआ तब तक वह टूट भी जाती है|
और एक हम लोग हैं कि तनख्वाह मिलने के बाद सबसे पहले बचत के बारे में ही सोचते हैं|

16. यहाँ पर सबसे ज्यादा जो चीज हम हिंदुस्तानियों को खलती है, वह है सड़क के किनारे चाय पकोड़े की दुकान का नहीं होना| डरबन और केपटाऊन, जो इस देश के अन्य महत्वपूर्ण शहर हैं, वहां तो फिर भी सड़क के किनारे दुकानें मिल जाती हैं, लेकिन जोहानसबर्ग में तो आपको कुछ भी खरीदना है तो आपको शॉपिंग माल में ही जाना होगा| सुरक्षा की वजह से यहाँ सड़क पर आपको दुकानें नहीं मिलती हैं, इक्का दुक्का कहीं कहीं दिखती भी हैं तो वह सिर्फ स्थानीय अश्वेत लोगों के लिए ही होती हैं| 
लेकिन इसी शहर का एक हिस्सा है फोर्ड्सबर्ग, जो कि एक तरह से मिनी एशिया है| इस जगह हर तरह की भारतीय चीज जैसे सरसो का तेल, पोहा, जलेबी इत्यादि मिल जाती है| आपको बेहतरीन इडली डोसा खाने को मिल जाएगा और तमाम तरह के भारतीय पकवान भी मिलेंगे| इस एरिया में हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी दुकानदार हैं और उनका अपना ग्राहक बेस है| अधिकतर बाल काटने की दुकानें पाकिस्तानियों की हैं तो मीट और मछली की दुकान बांग्लादेशियों की| और इस इलाके में आने के बाद आप खुद को हिंदुस्तान के ही किसी हिस्से में महसूस करते हैं| दरअसल यहाँ गन्दगी का साम्राज्य है और ट्रैफिक नियम का भी उतनी कड़ाई से पालन नहीं होता है| आपको पूजा पाठ की सारी सामग्री भी यहाँ मिल जाएगी और होली में रंग तथा दीवाली में पटाखे और दिए भी यहाँ पर मिल जाते हैं| कुछ चाय और पान की दुकान भी यहाँ हैं और बांग्लादेश से इम्पोर्टेड रोहू और कतला मछली भी यहाँ मिल जाती है जो बेहतरीन क्वालिटी की होती है| उतनी बढ़िया क्वालिटी की रोहू तो मैंने शायद ही कभी हिंदुस्तान में खायी होगी| एक खास दुकान है यहाँ पर, एक मीट की दुकान है जिसमें सभी सेल्स काउंटर पर सिर्फ मुस्लिम महिलाएं काम करती हैं| एक और खासियत है यहाँ की, यहाँ मटन का मतलब लैम्ब (भेड़) होता है| दरअसल यहाँ पर लोग लैम्ब ही खाते हैं, बकरे का मीट बहुत कम खाया जाता है| लेकिन फोर्ड्सबर्ग में आपको बकरे का मीट भी मिल जाता है| दिक्कत सिर्फ होटल्स में होती है जहाँ आपको बकरे का गोश्त नहीं मिलता है|   
शुरुआत में एक बार दिलचस्प वाकया हुआ| फोर्ड्सबर्ग में एक सब्जी की दुकान, जो अमूमन फुटपाथ पर लगती है, से सब्जी खरीदकर चलते समय हमने थैंक्यू कहा तो उसने जवाब में शुक्रिया बोला| इस देश का स्थानीय सब्जी बेचने वाला हिंदी बोल रहा था, ये मेरे लिए बेहद अजीब बात थी| फिर तो उससे खूब बात हुई हिंदी में और उसने बताया कि हिंदुस्तानी ग्राहकों से ही उसने हिंदी सीखी है| अब तो बस उसकी की दुकान से सब्जी लेता हूँ, उससे बात करके काफी अच्छा लगता है| कुछ और दुकानदार भी हिंदी के कुछ शब्द जानते हैं और हम लोगों को देखकर अक्सर बोलते भी हैं|   
इस शहर के कुछ और हिस्से भी ऐसे हैं जहाँ हिंदुस्तान के लोग बहुतायत में रहते हैं और वहां पर खूब सारे मंदिर और मस्जिद भी हैं, उसके बारे में अगली चिट्ठी में| 

17. कुछ और बहुत दिलचस्प चीजें यहाँ देखने को मिलती हैं| दर असल इस देश में औपचारिकता की पराकाष्ठा दिखती है| लोग तो यहाँ पर इस तरह से क्षमा मांगते हैं जैसे हम लोग साँस लेते हैं| अब उदाहरण के तौर पर फर्ज कीजिये कि आप किसी शॉपिंग माल या कहीं भी पैदल जा रहे हैं और आपके सामने कोई व्यक्ति आ जाता है| अब ऐसे में हम हिंदुस्तानी अमूमन थोड़ा सा हट के या रगड़ते हुए निकल जायेंगे, लेकिन यहाँ पर ऐसा नहीं होता है| ऐसी स्थिति में 100 में से 95 लोग रुक जायेंगे और आपसे तुरंत सॉरी बोलेंगे, तब रास्ता बदलेंगे| और अगर दोनों तरफ यहाँ के लोग हैं तो स्थिति और दिलचस्प होती है, उनमें अधिक विनम्र होने की जैसे होड़ लग जाती है|
सबसे हास्यास्पद स्थिति तो तब होती है जब आप टॉयलेट में हों, अपना काम निपटा रहे हों और आपके बगल वाली स्थान पर आकर कोई स्थानीय व्यक्ति खड़ा हो जाए| अब ऐसे में अगर आपकी निगाह उस व्यक्ति से टकरा गयी तो मान के चलिए कि उस अवस्था में भी आपको अपना हालचाल बताना पड़ सकता है| हमारे ऑफिस के सामने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट का ऑफिस था और उसका मालिक एक बेहद बुजुर्ग व्यक्ति था| अब आमने सामने ऑफिस होने कि वजह से लिफ्ट में भी मुलाक़ात हो जाती थी और हम एक दूसरे को पहचान गए थे| खैर जब ऑफिस के सामने, लिफ्ट में या शॉपिंग माल में (हम लोगों का ऑफिस एक शॉपिंग माल में ही है) मुलाक़ात होती थी तब तो ठीक था एक दूसरे की कुशल क्षेम पूछना| लेकिन सबसे खतरनाक तो तब लगा जब एक दिन टॉयलेट में हम लोग अगल बगल खड़े थे और जैसे ही उनसे नजर मिली, शुरू हो गए “आप कैसे हैं”| अब शर्मा शर्मी में हमने भी कह दिया ठीक हूँ, लेकिन अब अगर उनका हाल चाल नहीं पूछता तो असभ्य हो जाता| इसलिए बहुत हिचकते हुए उनका हाल चाल भी पूछना ही पड़ गया| अब आप कल्पना कर सकते हैं कि अपनी क्या हालत थी लेकिन उनके लिए तो ये सामान्य शिष्टाचार था| इसके बाद दो तीन बार और ऐसा ही संयोग हुआ तो टॉयलेट जाने में भी हिचक होने लगी कि कहीं फिर न टकरा जाएँ| (अब वो ऑफिस शिफ्ट हो गया है तो काफी राहत है)
टॉयलेट से याद आया, यहाँ पर सफाई का काम अश्वेत महिलाएं ही करती हैं और टॉयलेट चाहे महिलाओं का हो या पुरुषों का, उसे महिलाएं ही साफ़ करती हैं| सफाई करने के समय संकेत के तौर पर वो टॉयलेट के बाहर एक पानी का बर्तन जैसा रख देती हैं ताकि उसे देखकर कोई अंदर न आये| अब शुरू शुरू में तो यह पता नहीं था इसलिए सीधे घुस जाया करते थे | धड़धड़ाते हुए टॉयलेट में घुसे और सामने महिला कर्मचारी खड़ी थी| अब काटो तो खून नहीं, न आगे बढ़ते बनता था और न वापस भागने कि हिम्मत| खैर अब तो आदत भी पड़ गयी है और संकेत का भी पता चल गया है तो शर्मिंदगी से बच जाते हैं|
एक और बेहद अजीब बात है इस देश में कि यहाँ अधिकतम खुदरा मूल्य का कोई कांसेप्ट ही नहीं है| मतलब एक ही चीज आपको एक दूकान में एक मूल्य में और उसी के बगल वाली दूकान में उससे कई गुना ज्यादा दाम में मिलेगी| दर असल अधिकतर चीजें यहाँ आयात की जाती हैं और जिस दुकान की जो मर्जी, वह कीमत लेता है| एक बार एक साधारण सा रजिस्टर हम लोगों ने ख़रीदा जो काफी महंगा लगा (लगभग 650 रुपये का था)| कुछ ही दिन बाद वही रजिस्टर उसी के ठीक बगल वाली स्टोर में मिला जिसकी कीमत लगभग 60  रुपये थी, मतलब दस गुने का फ़र्क़| अब आप की मर्जी है कि आप ये सब पता लगाते रहें, वर्ना तो लुटना तंय है|
एक और बहुत अजीब बात देखने को मिली यहाँ पर, यहाँ पर जुड़वाँ बच्चे बहुत देखने को मिलते हैं| मैंने अपने जीवन में जितने नहीं देखे थे, यहाँ शायद एक साल में ही देख लिए| जुड़वाँ बच्चों की गाड़ी भी खूब देखने को मिलती है यहाँ और कभी कभी तो तीन बच्चे भी दिख जाते हैं| एक और फ़र्क़ है यहाँ, हिंदुस्तान में तो महिलाएं बच्चों को कमर पर टाँग के घूम लेती हैं लेकिन यहाँ पर दो अलग अलग वर्ग दो अलग अलग तरीके से बच्चों को ढोते हैं| जो अमीर (मुख्यतयाः श्वेत आबादी) हैं वह महिलायें या तो बच्चों को बच्चा गाड़ी में घुमाती हैं या अपने पीछे एक आरामदायक बैग जैसे सामान में टाँग कर घूमती हैं| लेकिन तो गरीब आबादी है उसे ये बच्चा गाड़ी लेना महंगा पड़ता है तो ये महिलायें बच्चों को अपनी पीठ पर तौलिये के सहारे बांध लेती हैं और घूमती हैं| बच्चे भी बड़े आराम से बिना कोई शोर किये तौलिये से बंधे हुए घूमते रहते हैं|
वैसे एक बात तो है कि यहाँ के बच्चे अमूमन बहुत खामोश रहते हैं, बच्चों का रोना चिल्लाना बहुत दुर्लभ दृश्य है यहाँ|

18. अगर आपको कोई अंतरराष्ट्रीय किकेट मैच हिंदुस्तान में देखना हो तो ऐसा लगता है जैसे आप किसी जेल में जा रहे हों और कुल मिलाकर अनुभव कुछ बहुत अच्छा नहीं होता| कई घंटे तक लाइन लगाकर आप स्टेडियम में पहुँचते हैं और आपको बहुत कम चीजें अंदर ले जाने की इजाजत होती है| फिर वापस निकलने में पुनः घंटों लगते हैं और फिर पार्किंग में से अपनी गाड़ी लेकर निकालते समय तक आप एक तरह से तौबा कर लेते हैं|
लेकिन यहाँ पर किसी अंतरराष्ट्रीय मैच को देखना इतना सुखद अनुभव होता है कि आप चाहेंगे कि बार बार ऐसे मैच हों और आपको इन्हें देखने का मौका मिले| अब चूँकि मेरा घर यहाँ के सबसे मशहूर और महत्वपूर्ण स्टेडियम वांडरर्स के ठीक सामने है तो मैं तो सभी मैचों का आनंद लेता रहता हूँ| यहाँ मैच देखने का मतलब सिर्फ मैच देखना नहीं होता है, बल्कि परिवार के साथ या दोस्तों के साथ भरपूर पिकनिक मनाना होता है| आप यहाँ अपने साथ ड्रिंक, खाने पीने का सामान, छोटा टेंट जिसके नीचे आप आराम से चद्दर बिछाकर सोते हुए मैच देख सकते हैं|
एक मैच तो मैदान के अंदर चल रहा होता है लेकिन इस यहाँ पर घांस के एरिया में बच्चे बहुत से क्रिकेट और फुटबॉल मैच साथ साथ खेल रहे होते हैं| यहाँ के स्टेडियम में कई तरह के स्टैंड हैं और उनमें सबसे प्यारा स्टैंड होता है घांस वाला एरिया| यह पूरी तरह से पिकनिक के लिए होता है और बच्चे खूब मस्ती करते है| पूरे स्टेडियम में कम से कम एक बैंड तो होता ही है जो लगातार बजता रहता है और लोग बियर पीते हुए नृत्य करते रहते हैं| लोगों की वेशभूषा भी देखने लायक होती है और कुल मिलाकर माहौल गजब का होता है|
मैंने कभी पढ़ा था कि विदेशों में मैच के दरम्यान कुछ स्ट्रीकर्स (निर्वस्त्र लोग) घुस जाते हैं और खूब शोर शराबा होता है| लेकिन जब मैं पहला ही अंतरराष्ट्रीय मैच जो दक्षिण अफ्रीका और पकिस्तान के बीच हुआ था, देखने गया तो इसका प्रत्यक्ष अनुभव हुआ| टी २० मैच था और पहली पारी ख़त्म होने के बाद बारिश शुरू हो गयी| अब मैच तो बंद था और लोग छाते लगाकर बारिश ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे थे| मैं भी छाता लगाए बैठा था तभी अचानक से शोर हुआ और नजर मैदान में गयी जहाँ एक व्यक्ति दौड़ रहा था और उसके पीछे पीछे सुरक्षा कर्मी दौड़ रहे थे| गौर से देखने पर पता चला कि वह एक स्ट्रीकर था और पूरा स्टेडियम खूब शोर कर रहा था| खैर तीन चार बार गिरने पड़ने के बाद सुरक्षा कर्मी उसे किसी तरह पकड़कर बाहर ले गए और शोर थमा| लेकिन दस मिनट बाद ही फिर से एक स्ट्रीकर घुसा और फिर वही शोर शराबा और उसे पकड़ने के लिए सुरक्षा कर्मियों की दौड़ भाग| खैर जब तक बारिश नहीं बंद हुई, ये मनोरंजन चलता रहा और फिर मैच शुरू हुआ|
मैच के समय पार्किंग के लिए भी यहाँ गजब की व्यवस्था होती है| बहुत सारे स्थानीय लोग लोगों की गाड़ी पार्किंग कराने के लिए लगे रहते हैं| सड़क के दोनों ओर और कभी कभी सड़क के बीच में भी गाड़ियां खड़ा कराई जाती हैं| काफी दूर से ही पार्किंग कराने वाले आपको क्रिकेट के शॉट का इशारा करके पूछते हैं कि क्या आप मैच देखना चाहते हैं| अगर आपकी गाड़ी धीरे हुई तो वो समझ जाते हैं और फिर आपकी गाड़ी के साथ कभी कभी तो आधे किलोमीटर तक की दौड़ लगाते हैं, जब तक कि आप की गाड़ी पार्क न करा दें|
एक और बात है यहाँ कि अगर मैच वन डे या टेस्ट मैच है तो लंच ब्रेक या टी ब्रेक में मैदान को दर्शकों के लिए खोल दिया जाता है| अब आधे घंटे तक दर्शक मैदान पर क्रिकेट खेलते रहते हैं, या फोटो लेते रहते हैं| उसके बाद सब लोग बाहर निकल जाते हैं और वापस मैच स्टार्ट| 
कुल मिलाकर अगर मैच देखने का स्वर्गिक आनंद लेना है तो यहाँ आकर लीजिये और साथ साथ पिकनिक फ्री मनाईये|  

19. आजकल हिंदुस्तान में चल रहे नोट बंदी (५०० और १००० के नोट बंद होने की घटना) के साथ साथ यहाँ की करेंसी और बैंकिंग के बारे में भी जानना दिलचस्प रहेगा| इस देश में अनेक वर्ग की मुद्रा उपलब्ध है जिसमें सिक्कों से लेकर नोट तक हैं| हमको सबसे पहली दिक्कत तो यह हुई कि यहाँ आने से पहले तक हमें पता था कि यहाँ की मुद्रा ज़ार है| लेकिन यहाँ आने पर पता चला कि इसे रैंड भी कहते हैं और लिखते समय R100, R 200 लिखते हैं|
यहाँ पर सबसे छोटा सिक्का  सेण्ट का है फिर १० सेण्ट का है और उसके बाद २० सेण्ट और ५० सेण्ट का| फिर १ ज़ार, २० ज़ार और ५ ज़ार के सिक्के भी हैं| ये सारे सिक्के आज भी बखूबी चलते हैं और हर दूकान में आपको फुटकर के तौर पर मिल जाते हैं|
सबसे छोटा नोट यहाँ १० ज़ार का है और उसके बाद २० ज़ार, ५० ज़ार, १०० ज़ार और २०० ज़ार का है| २०० ज़ार से बड़ी कोई मुद्रा यहाँ नहीं है और इससे काम चल जाता है| एक अपना हिंदुस्तान है जहाँ २००० रुपये का नोट भी लोगों को छोटा लग रहा है|
अपने देश की तरह लाख और करोड़ यहाँ नहीं चलता है, इस देश में लाख को सौ हजार (HUNDRED THOUSAND) और उसके बाद मिलियन और बिलियन होता है (मिलियन मतलब १० लाख)|
आप अगर हिंदुस्तान में किसी भी बैंक में खाता खोलते हैं तो आपको अपने बचत खाते में रखे हुए धन पर ब्याज भी मिलता है जो अलग अलग बैंक अलग अलग दर पर देते हैं| लेकिन यहाँ पर आप ने अपना खाता खोला तो ब्याज मिलना तो दूर, हर महीने एक निश्चित रकम देने के लिए तैयार हो जाईये| उसके बाद अगर आपने एक निश्चित संख्या से ज्यादा बार अगर रकम निकाली तो भी आपको कुछ शुल्क का भुगतान करना पड़ेगा| और नगद तो आप जब भी जमा करेंगे, आपको शुल्क लगेगा ही| हां अगर आपने फिक्स्ड डिपाजिट में पैसा रखा है तो आपको जरूर ब्याज मिलता है, लेकिन उसमें भी एक शर्त है कि समय से पहले आप पैसा निकाल नहीं सकते| अगर आपने समय पूर्व पैसा निकाला तो आपको ब्याज तो कुछ भी नहीं मिलेगा और कुछ पेनाल्टी अलग से लगेगी (मतलब अगर आपने १००० ज़ार फिक्स्ड डिपाजिट में जमा किये हैं और आप उसे समय पूर्व निकाल रहे हैं तो आपको शायद ९५० ज़ार ही मिलेंगे)|
एक और महत्वपूर्ण बात, यहाँ का रिज़र्व बैंक सरकारी नहीं है, बल्कि प्राइवेट है| पूरी दुनिया में कुल ७ देश ही हैं जहाँ रिज़र्व बैंक प्राइवेट है और यह देश उनमें से एक है (अमेरिका और स्विट्ज़रलैंड भी है इस लिस्ट में)| यहाँ पर बैंकिंग इंडस्ट्री में एकाधिकार का ये हाल है कि ५ बड़े बैंक हैं यहाँ पर जो पूरे दक्षिण अफ्रीका के बैंकिंग का ९५ प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखे हुए हैं| बाक़ी बचे ५ प्रतिशत के लिए तमाम बैंक काम करते हैं|  
महंगाई की दर भी पिछले तीन सालों में काफी बढ़ी है और बढ़ती बेरोजगारी के चलते यहाँ के आर्थिक आर्थिक हालात काफी ख़राब हो चुके हैं| लोग वर्तमान सरकार से भी काफी खफा हैं और अगले चुनाव में सत्तारूढ़ अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस को बदलने की बात भी जोरो शोरों से उठ रही है|    
20. पुलिस एक ऐसा शब्द है जिससे वैसे तो व्यक्ति को सुरक्षा का आभास होना चाहिए लेकिन होता संभवतः इसका उल्टा ही है| हिंदुस्तान में शायद ही कोई शरीफ इंसान ऐसा होगा जिसे अगर ये कहा जाए कि किसी काम के लिए पुलिस के पास चले जाओ तो वह जाना चाहेगा (हाँ, सत्तारूढ़ दाल के नेता, अपराघी और दलाल जरूर बेधड़क पुलिस के पास चले जाते हैं)| लेकिन इस देश में स्थिति काफी उलट है और लोगों को पुलिस के पास जाने में कम से कम भय तो नहीं ही लगता है|
यहाँ की पुलिस फोर्स दक्षिण अफ्रीकन पुलिस सर्विस (SAPS) है| और इसके अलावा यहाँ पर कुछ म्युनिसिपल क्षेत्रों में म्युनिसिपल पुलिस यूनिट भी है (जोहानसबर्ग, डरबन और केप टाउन में), जिनके पास कम पावर होते हैं| मुख्य रूप से इनका कार्य ट्रैफिक व्यवस्था को चलाना और म्युनिसिपल क्षेत्रों में उनके कानून का पालन कराना होता है|
यहाँ पर पुलिस के अधिकारियों के रैंक हिंदुस्तान के सेना की तरह होते हैं| सबसे बड़ा अधिकारी जनरल होता है और उसके बाद लेफ्टिनेंट जनरल, मेजर जनरल, ब्रिगेडियर, कर्नल इत्यादि होते हैं| हाँ सबसे निचले स्तर के कर्मचारी को कांस्टेबल जरूर कहते हैं| कुल पुलिस बल की संख्या लगभग २ लाख के आस पास है जो दुनिया के बाकी देशों की तुलना में बहुत कम है (हिंदुस्तान में तो लगभग २० लाख पुलिस कर्मी होंगे जो विश्व में सर्वाधिक है, चीन से भी ज्यादा)|
लेकिन यहाँ पर आपको हर चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस या हर मोड़ पर सामान्य पुलिस नहीं दिखती है| अक्सर वीकेंड के पहले शाम को वाहनों की सघन तलाशी होती है और लोग पूरी शांति से इसमें सहयोग करते हैं| सबसे आश्चर्यजनक दृश्य तो तब देखने को मिलता है जब किसी चौराहे की लाइट खराब हो जाती है और वहां पर पुलिस के जवान ट्रैफिक कण्ट्रोल करने आते हैं| न तो इनके पास कोई सीटी होती है जिसे जोर से बजा सकें और न ही कोई शोर शराबा होता है| इसमें बहुत सी महिला पुलिस की सदस्य होती हैं और अगर वो स्थानीय अश्वेत महिला है तो कभी कभी आपको ट्रैफिक नियंत्रण करते करते नृत्य करते भी दिख जाती है| लगता ही नहीं है कि ट्रैफिक नियंत्रण में इनको कोई तनाव होता है| दरअसल यहाँ भीड़ भाड़ नहीं है तो इसके चलते शायद तनाव भी नहीं होता है पुलिस को|
अगर आपकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया है तो आपको नजदीकी पुलिस स्टेशन जाकर एक रिपोर्ट लिखानी होती है जिससे बीमा कंपनी आपको क्लेम का भुगतान कर सके| अब अगर यह रिपोर्ट आपको हिंदुस्तान में लिखवानी हो तो आपके माथे पर पसीना आ जायेगा, लेकिन यहाँ तो पता ही नहीं चलता| मैं खुद गया था रिपोर्ट लिखाने, पहले तो एक काउंटर पर बैठे पुलिस कर्मी से कुशल क्षेम हुआ और फिर उसने बताया कि फलां पुलिस अधिकारी के पास चले जाईये, काम हो जायेगा| अगले १० मिनट में रिपोर्ट लिख कर मिल भी गयी| ये अलग बात है कि यह शहर दुनिया के सबसे ज्यादा अपराधग्रस्त शहरों में से एक है|
यहाँ पर पुलिस के सामानांतर एक और व्यवस्था चलती है जो प्राइवेट सुरक्षा एजेंसीज के द्वारा चलायी जाती है| इस देश में तमाम निजी एजेंसियां हैं जो अलग अलग क्षेत्रों में काम करती हैं| हर बिल्डिंग और हर घर कहीं न कहीं इनके द्वारा सुरक्षित रहता है और उनकी गाड़ियां दिन रात भाग दौड़ करती रहती हैं| दर असल ये एजेंसियां बड़े बड़े नेताओं द्वारा संचालित होती हैं और शायद इसी वजह से यह उद्योग फल फूल रहा है| अब अगर देश में अपराध घट गए तो इनका धंधा ही बंद हो जायेगा, यहाँ पर अपराधों के नहीं घटने की शायद ये भी एक वजह हो सकती है|
एक और बात जो बहुत सुकूनदायीं लगती है कि यहाँ शायद ही कभी सड़क पर नेताओं के चलते सड़क जाम लगता है| न तो कोई पुलिस के हूटर्स और न ही कोई लाल, नीली बत्तियां जलाती हुई गाड़ियां दिखती हैं| सिर्फ कभी कभी जब देश के राष्ट्रपति निकलते हैं तो थोड़ी दूर तक ट्रैफिक रोक दिया जाता है|    
पुलिस का सामान्य व्यवहार भी बहुत दोस्ताना होता है, आप किसी भी पुलिस वाले से बिना किसी भय के कुछ भी पूछ सकते हैं| पुलिस में भ्रष्टाचार तो यहाँ भी खूब है लेकिन शायद ही कभी सामना करना पड़ा है, हाँ एक बार जरूर २० ज़ार कोक के नाम पर देना पड़ा था (एक पुलिस वाले ने मांग ही लिया था कि कम से कम कोक तो पिलाइये)|

21. किसी भी देश को जानने के क्रम में सबसे पहली चीज जो आप अमूमन जानना चाहते हैं, वह होती है कि उसकी राजधानी क्या है | अब जब इस देश के बारे में आपको पता चलेगा कि यहाँ कोई एक राजधानी नहीं है तो आपको बेहद आश्चर्य होगा| दरअसल इस देश की तीन राजधानियां हैं और वह अलग अलग वजहों से हैं|
1. यहाँ पर प्रीटोरिया में कार्यपालिका की राजधानी है क्योंकि देश के राष्ट्रपति यहीं रहते हैं (सीट ऑफ़ प्रेसिडेंट)|
2. केपटाउन में विधायी राजधानी है (सीट ऑफ़ पार्लियामेंट)|
3. ब्लोमफोंटेन में न्यायिक राजधानी है (सीट ऑफ़ सुप्रीमकोर्ट)|
इस देश में कुछ और चीजें हैंजो काफी अलग हैं| यहाँ पर  अफ्रीका महाद्वीप में सबसे ज्यादा श्वेत आबादी है और हिंदुस्तान के बाहर सब से ज्यादा हिंदुस्तानी भी यहीं रहते हैं| इस देश में कुल 9 प्रोविंस हैं जिसमें सबसे ज्यादा आबादी वाला प्रोविंस हॉटेंग है जिसकी राजधानी जोहानसबर्ग है| लेकिन सबसे ज्यादा भारतीय डरबन में रहते हैं जो क्वाज़ुलूनटाल प्रोविंस में आता है|
सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा यहाँ ज़ुलू है और उसके अलावा भी यहाँ 10 और ऑफिसियल भाषाएँ हैं, जिनमे अंग्रेजी और अफ्रीकान्स मुख्य हैं|
अब कहाँ उत्तरप्रदेश जैसा हिंदुस्तान का एक प्रदेश जिसकी आबादी लगभग 22 करोड़ होगी और कहाँ यह पूरा देश जिसकी आबादी लगभग 5.5 करोड़ होगी| मतलब एक उत्तरप्रदेश में 4 दक्षिणअफ्रीका आ जायेगा, इसीलिए यहाँ पर भीड़ भाड़ नहीं देखने को मिलती है| अगर आप जोहानसबर्ग से केपटाउन सड़क के द्वारा जाते है (लगभग 1600किमी दूर), तो आपको कभीकभी 200 किमी तक कुछ भी नहीं दिखेगा, सिर्फ आपकी गाड़ी, हरा भरा वातावरण और शानदार सड़क| (ये 1600 किमी की दूरी भी लोग औसतन 12 घंटे में तंय कर लेते हैं, आप इसी से यहाँ की सड़क का अंदाज लगा सकते हैं)|
यहाँ के तीन सबसे महत्वपूर्ण शहर हैं-
1 . जोहानसबर्ग -जो हमारे मुम्बई की तरह आर्थिक गतिविधियों की राजधानी कहा जा सकता है|
2. डरबन -जो कि महात्मा गाँधी की वजह से बहुत मशहूर है और जहाँ हिंदुस्तान  के बाहर सबसे ज्यादा हिंदुस्तानी रहते हैं|
3. केपटाउन-जो कि विश्व में घूमने फिरने के लिए दूसरा सबसे खूबसूरत और सुकूनदायक शहर है (पहले नंबर पर तो फ़्रांस का एक शहर आता है)|
इसके अलावा पोर्टएलिज़ाबेथ और पोलोकवाने भी काफी मशहूर हैं और काफी लोग यहाँ भी घूमने फिरने आते हैं| लेकिन एक बेहद आश्चर्यजनक बात यह भी है कि एक तरफ जोहानसबर्ग है जो अपराध के मामले में बहुत कुख्यात है तो दूसरी तरफ केपटाउन है जो बेहद सुरक्षित शहर है| डरबन में भी ज्यादा दिक्कतें नहीं हैं, कुल मिलकर जातीय विविधताओं, भाषायी भिन्नताओं और हर रंग और नस्ल के लोगों का एक बेहतरीन देश है दक्षिणअफ्रीका|

22. हमारे हिंदुस्तान में बालों को लेकर कई चीजें प्रचलित हैं, जैसे बालों को लेकर कई गाने बने हैं "ये रेशमी जुल्फें", या "न झटको जुल्फ से पानी", आदि| पता नहीं कितनी कवितायेँ भी लिखी गयी हैं प्रेयसी के बालों के बारे में कल्पना करते हुए| कितने ही तरह के तेल, साबुन औऱ शैम्पू भी सिर्फ घने काले लंबे बालों के लिए मिलते हैं अपने देश में| अगर किसी के बाल झड़ने लगे तो वह न जाने कौन कौन से उपाय करता है, जैसे अंडे लगाना, रेड़ी का तेल लगाना आदि आदि| साथ ही साथ एक औऱ चीज प्रचलित है अपने देश में कि पैसा उन्ही के पास होता है जिनके सर पर बाल कम होते हैं, मतलब गंजापन औऱ अमीरी साथ साथ आती है (अब हमारे सर से बाल आज तक कम नहीं हुए औऱ इसीलिए जेब खाली ही रहती है)|
लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि कोई ऐसा देश भी है जहाँ के अश्वेत निवासियों के सर पर अमूमन या तो बाल होते ही नहीं हैं, औऱ अगर होते भी हैं तो बेहद कम औऱ छोटे घुंघराले बाल| वैसे क्रिकेट में दिलचस्पी होने के चलते अक्सर वेस्ट इंडीज के खिलाडियों के सर के विचित्र तरह के बालों को देखकर बहुत उत्सुकता होती थी कि इतने अजब गजब बाल क्यों होते हैं इनके| लेकिन जब यहाँ पर आया तो इस रहस्य का खुलासा हुआ औऱ मैं एकदम से आश्चर्यचकित रह गया|
दर असल शुरू शुरू में बहुत से स्थानीय अश्वेत लोगों से मुलाकात हुई तो पुरुष तो अक्सर टकले ही मिलते थे| लेकिन स्त्रियों के बाल अजीब तरीके के थे, हर स्त्री का अलग हेयर स्टाइल| धीरे धीरे पता चला कि यहाँ की सारी स्त्रियां नकली बाल (विग) लगाती हैं, उनके सर पर बाल तो होते ही नहीं| कभी कभी तो यहाँ औरतें भी एकदम सफाचट सर लिए घूमते नजर आ जाती हैं औऱ उनको देखकर आप को झटका लग सकता है| औऱ सिर्फ इसी देश में नहीं, बल्कि पूरे अफ्रीका में अमूमन लोगों के सर पर बाल नहीं होते हैं|
हमारे एक परिचित ने एक दिलचस्प वाकया सुनाया| यहाँ पर घरों में काम करने के लिए महिलाएं आसानी से मिल जाती है औऱ लोग हफ्ते में एक दिन से लेकर हफ्ते में पांच दिन तक उनसे काम करवाते हैं (शनिवार औऱ रविवार को तो वह भी काम नहीं करती)| उनके यहाँ काम करने वाली सुबह आयी, काम किया औऱ चली गयी| शाम को फिर वह काम करने के लिए आयी औऱ जब उसने घंटी बजायी तो मेरे परिचित चौंक गए कि ये कौन आ गया| उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया तो फिर से घंटी बजी औऱ उस महिला ने उनसे कहा कि वही उनके यहाँ काम करती है| दर असल हुआ यह था कि सुबह जब वो आयी थी तो उसके बाल एकदम छोटे थे, लेकिन शाम को उसने बहुत बड़े बालों का विग लगा लिया था जिसके चलते वह उसको पहचान नहीं पाए|
खैर यहाँ महिलाएं अपनी आमदनी का एक हिस्सा विग पर भी खर्च करती हैं औऱ ये विग या तो उनके सर पर गोंद से चिपका दिए जाते हैं, या सर पर सिल दिए जाते हैं| अब सिलने में दर्द भी तो होता है लेकिन इनके पास कोई औऱ रास्ता भी नहीं होता उसे बर्दास्त करने के सिवा| यहाँ बाल खूब बिकते हैं औऱ सभी सलून अपने यहाँ से कटे हुए बालों को बेच देते हैं| लेकिन इसका सकारात्मक पहलू ये भी मान सकते हैं कि हर महीने आपके बाल अलग अलग स्टाइल के होंगे औऱ अगर आपने सर टकला ही रखा तो आपको उधार देने वाले भी शायद ही आपको पहचान पाएं|
लेकिन एक बात औऱ है यहाँ कि इसी वजह से बहुत से श्वेत पुरुष भी अपना सर टकला ही रखते हैं| पता नहीं अश्वेत लोगों के समर्थन में या एक फैशन सा बन गया है यहाँ टकला रहना|
शायद एक नारी के लिए इससे बड़ी दुर्भाग्य की औऱ कोई बात नहीं हो सकती कि उसके सर पर बाल नहीं हो, लेकिन प्रकृति ने न जाने क्यों ये सजा दे रखी है यहाँ के अश्वेत निवासियों को|

23. आज हिंदुस्तान में बहुत सारी समस्याएं सिर्फ वहां की जनसँख्या की वजह से हैं| लगभग १३० करोड़ की जनसँख्या को सँभालते सँभालते संसाधनों का अकाल पड़ जाता है, सरकार भो पस्त रहती है कि कैसे सबको रोटी, कपडा और मकान मिले| शादियां भी एकाध धर्मों को छोड़कर सिर्फ एक ही होती हैं और सरकार और विभिन्न समाजसेवी संसथान दिन रात लगे हुए हैं कि कैसे जनसँख्या नियंत्रण किया जाए| कुछ साल पहले तक तो बच्चे दो ही अच्छे का नारा था लेकिन अब तो "एक ही बच्चा, सबसे अच्छा" माना जा रहा है|
लेकिन इस देश में मैंने कभी भी किसी को भी, चाहे वह सरकार हो या समाजसेवी संस्थान हों, जनसँख्या नियंत्रण के बारे में कोई बात करते नहीं देखा| यहाँ तो लोग आराम से कम से कम तीन, और अगर कहीं जुड़वाँ बच्चे हो गए तो चार या पांच बच्चे भी पैदा करते हैं| दरअसल इस देश की कुल जनसँख्या भी हमारे एक छोटे से प्रदेश जितनी ही है और न तो जगह की कमी है और न ही संसाधनों की|
एक और खास बात नज़र आयी यहाँ कि यहाँ के दंपत्ति शादी के बाद तुरंत ही बच्चे पैदा कर लेते हैं (वैसे शादी करने से पहले कई साल ये लोग ऐसे ही साथ रह चुके होते हैं, और कभी कभी तो शादी में इनके बच्चे भी सरीक होते हैं)| और एक बच्चे के तुरंत बाद दूसरा और तीसरा बच्चा भी पैदा कर लेते हैं| फिर उसके बाद पूरी जिंदगी चैन से रहते हैं, बच्चों के बीच हमारे देश की तरह अंतर यहाँ देखने को नहीं मिलता है|
शादियों के मामले में भी यहाँ पूरी आज़ादी है, अक्सर यहाँ सिंगल पेरेंट्स मिल जाते हैं| शादी के दो चार साल बाद ही बहुत से लोग अलग भी हो जाते हैं और फिर किसी और से शादी कर लेते हैं| मतलब ऐसे पति पत्नी, जिन्होंने साथ साथ जिंदगी गुजारी हो, बहुत कम ही मिलते हैं| यहाँ के कुछ जातियों में कई शादियां करने की भी इजाजत है और लोग चार चार शादियां भी करते हैं| सबसे दुखद पहलू ये होता है कि महिला को पता होता है कि उसका पति कुछ साल बाद ही दूसरी या तीसरी शादी भी कर लेगा, लेकिन वह कुछ नहीं कर पाती है|  
शादी भी यहाँ काफी सादगी से संपन्न हो जाती है| किसी पार्क या पब्लिक प्लेस पर लोग इकठ्ठा होते हैं और एक पादरी की देख रेख में एकाध घंटे में ही शादी संपन्न हो जाती है| लड़के के सभी भाई एक ड्रेस में और लड़की की बहनें एक अलग ड्रेस में आपको दिख जाते हैं और शादी में नाच गाना होता रहता है (बस बैंड बाजा नहीं दिखा हमको)| फिर एक लंच और शादी संपन्न, बहुत कम भीड़ भाड़ और चहल पहल| हाँ, कुछ शादियां चर्च में भी होती हैं और बहुत से जातियों में इसे सबसे जरुरी भी समझ जाता है
तलाक बहुत सामान्य सी चीज है यहाँ पर और तलाक के बाद बच्चे किसी एक के पास रहते हैं और दूसरा भी उनसे मिलने आराम से आता रहता है| मेरी बिल्डिंग में ही एक पति पत्नी में शादी के बहुत साल बाद तलाक हुआ और उसके बाद पति के साथ उसकी नयी गर्ल्फ़्रेंड रहने लगी| बीच बीच में बच्चों की माँ भी आती रहती है और बच्चे भी बीच बीच में अपनी माँ के घर जाकर रहते हैं| कहीं कोई कडुवाहट नहीं, न ही कोई झगड़ा झंझट|
अब चूँकि महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं तो ज्यादा बंधन में रहना पसंद नहीं करती हैं, लेकिन कहीं न कहीं परिवार जैसी संस्था तो प्रभावित होती ही है|

24.  अगर किसी हिंदुस्तानी को कहा जाये कि आप को नौकरी में हर हफ्ते दो छुट्टियां मिलेंगी और त्यौहारों पर अलग से छुट्टी मिलेगी, तो शायद ख़ुशी के मारे उसका दम ही निकल जाए| हफ्ते क्या महीने में भी त्यौहारों के अलावा अगर दो छुट्टी मिल जाए कर्मचारियों को (खासकर बैंक वालों को) तो वह काफी प्रसन्न हो जायेंगे| लेकिन अगर उनको ये कह दिया जाए कि साल के ११ महीने हर हफ्ते दो छुट्टियां, त्यौहारों पर अलग से छुट्टी, कोई त्यौहार अगर शनिवार को पड़ गया तो उसके लिए सोमवार को भी अलग से छुट्टी तो मिलेगी ही, साथ ही साथ साल में पूरे एक महीने की छुट्टी अलग से मिलेगी तो शायद आदमी पागल ही हो जायेगा|
अब यहाँ आने से पहले तो हम लोग महीने में अगर दो दिन भी छुट्टी मिल जाती थी तो खुश हो लेते थे, लेकिन जब इस देश में आये तो पता चला कि यहाँ काम कम और छुट्टियां ज्यादा हैं| हर हफ्ते दो छुट्टियां, त्यौहारों पर अलग से छुट्टी और फिर जब दिसम्बर आया तो पता चला कि यहाँ दिसम्बर महीने में कोई काम ही नहीं होता| वजह ये कि यहाँ हर कंपनी में लगभग एक महीने की छुट्टी रहती है जो दिसम्बर के दूसरे हफ्ते से लेकर जनवरी के पहले हफ्ते तक चलती है| उसके बाद भी लोगों को आने में कुछ और दिन लग ही जाते हैं| सबसे मजे की बात ये है कि नवम्बर एन्ड से ही लोग अगले महीने की छुट्टी की तयारी में लग जाते हैं और फिर काम भी सुस्त पड़ जाता है| 
इस देश में सबसे बड़ा त्यौहार क्रिसमस का होता है और लोग पूरे साल इसके लिए दिन गिनते रहते हैं| 
क्रिसमस की खरीददारी ब्लैक फ्राइडे से ही शुरू हो जाती है जो नवम्बर के आखिरी हफ्ते में पड़ता है| जैसे हिंदुस्तान में दिवाली पर बोनस या बख्शीश दिया जाता है, वैसे ही यहाँ पर दिसम्बर में कर्मचारियों को बोनस मिलता है और काम करने वालों को बख्शीश इस महीने में देना जरुरी होता है| लगभग हर कंपनी में क्रिसमस पार्टी होती है और लोग उसके बाद छुट्टियों की तैयारी में लग जाते हैं| हर शॉपिंग मॉल के बाहर और अंदर बड़े
बड़े क्रिसमस ट्री दीखते हैं और बच्चों को उपहार देते हुए जगह जगह संता भी नजर आते हैं|
एक और चीज यहाँ अजीब है, आप कल्पना कीजिये हिंदुस्तान में किसी भी त्यौहार में (होली को छोड़कर) बाज़ारों की क्या हालात रहती है| दुकाने और रेस्टुरेंट इत्यादि देर रात तक खुले रहते हैं और सड़कों पर खूब चहल पहल रहती है| अब चूँकि यहाँ दशहरा या दीवाली तो पब्लिकली मनाई नहीं जाती है (हिंदुस्तानी लोग ही आपस में मना लेते हैं), तो बाजार में कोई भीड़ भाड़ दिखने की उम्मीद भी नहीं थी| लेकिन क्रिसमस के अवसर पर मुझे लगा कि बाजार में खूब भीड़ भाड़ होगी और रेस्टुरेंट भी देर तक खुले रहेंगे| अब क्रिसमस वाले दिन
हम लोग शाम को मॉल में गए कि कुछ खरीदी भी कर लेंगे और रात को खाना भी खाकर आएंगे, लेकिन माल पहुंचे तो पता चला कि अधिकांश दुकानें बंद हैं और रेस्टुरेंट भी बंद है| लोग भी छुट्टी या सामान्य दिन के लिहाज से भी बहुत कम नज़र आ रहे थे| उस समय पता चला कि यहाँ पर त्यौहार में दुकानें देर तक खुलना तो दूर, अधिकतर बंद ही रहती हैं (फिर घर आकर ही खाना, खाना पड़ा)|
जोहानसबर्ग शहर दिसम्बर में लगभग बंद सा रहता है, सड़कों पर एक चौथाई गाड़ियां ही नजर आती हैं और अधिकतर लोग छुट्टियां मनाने या तो केप टाउन, या डरबन निकल जाते हैं| इस महीने की छुट्टी मनाने के लिए काफी पहले से ही बुकिंग्स कर ली जाती हैं| दिसम्बर के महीने में इस शहर में अपराध काफी बढ़ जाते हैं क्योंकि सबको क्रिसमस मनाना होता है और उसके लिए पैसे चाहिए| और इस महीने में घरों में चोरियां भी खूब होती हैं, क्योंकि सारे लोग तो बाहर गए होते हैं|

25. हिंदुस्तान में तो हम लोगों ने कई तरह की इन्सुरेन्स पालिसी के बारे में सुना था और कई तरह के पार्लर भी देखे, सुने थे| लेकिन इस देश में आने के बाद एक ऐसे पार्लर के बारे में पता चला कि अपने तो होश ही उड़ गए| सबसे पहले तो यहाँ आकर ये पता चला कि आपको मेडिकल इन्सुरेन्स रखना ही है| आप किसी भी क्लिनिक में चले जाओ या कहीं पर भी हस्पताल में जाईये, सबसे पहले आपसे यही पूछा जायेगा कि किस कंपनी का मेडिकल इन्सुरेन्स है आपके पास| अगर आपके पास नहीं है तो फिर आपको पहले पैसा जमा करना होगा, तभी वो आपको भर्ती करेंगे| दूसरा खटका तब लगा जब देखा कि इन्सुरेन्स कंपनी वाले एक और पालिसी भी बेचते हैं यहाँ पर जिसको "फ्यूनरल पालिसी" कहते हैं| मतलब आपके किरिया करम के लिए ये पालिसी होती है| अब हिंदुस्तान जैसा माहौल तो है नहीं यहाँ कि घंटे भर में सैकड़ो लोग इकठ्ठा हो जाते हैं किसी के मरनी में| यहाँ तो एकल परिवार और बचत लोग करते नहीं तो अंतिम संस्कार का खर्च कहाँ से आये, इसके लिए ये पालिसी भी खूब चलती है यहाँ पर (हमको भी हर हफ्ते एक मैसेज आ जाता है इस पालिसी का)|
दूसरा यह कि आप को अगर कहा जाए कि आप पार्लर जाना पसंद करेंगे तो आपका जवाब अमूमन हाँ ही होगा| क्योंकि आप तो यही सोचेंगे कि पार्लर मतलब खूबसूरत बनने की जगह| लेकिन अगर आपको बताया जाये कि आपको फ्यूनरल पार्लर जाना है तो आपकी हालात क्या होगी| डर असल यहाँ पर फ्यूनरल पार्लर भी खूब हैं जहाँ मृत व्यक्ति को रखा भी जाता है और वहां पर अंतिम संस्कार से सम्बंधित सारी सामग्री, जैसे कफ़न, गाड़ियां, दफ़नाने के उपकरण इत्यादि भी मिलते हैं| 
एक और अजीब बात है यहाँ पर, खासकर निम्न आय वर्ग के लोगों में, कि मृत्यु के बाद मृत शरीर को कई दिनों तक (कई बार तो महीनों तक) रखा जाता है| इसकी दो वजहें हैं, एक तो ये कि सारे रिश्तेदार इकट्ठे हो जाते हैं और दूसरी वजह आर्थिक है| अगर मृत व्यक्ति की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो वह घूम घूम कर लोगों से पैसे इकठ्ठा करता है और जब जरुरत भर के पैसे इकठ्ठा हो जाते हैं, तब अंतिम संस्कार किया जाता है| 
खैर इस देश में जीवन के साथ साथ अंतिम संस्कार का भी अलग ही हिसाब है|  

26. इस देश में अनेक विरोधाभास देखने को मिलते हैं| जहाँ एक तरफ हर व्यक्ति से, चाहे आप उसे जानते हों या न जानते हों, आपको सामने पड़ने पर हाल चाल पूछना ही है| वहीँ दूसरी तरफ लोग अपने अपने घरों में सिमटे भी रहते हैं और पड़ोसियों से भी शायद ही कोई ताल्लुक रखते हैं| इसमें फ़र्क़ थोड़ा दिखता है श्वेत और अश्वेत लोगों में, श्वेत लोग एकदम अपने आप में सीमित रहते हैं तो अश्वेत लोग मौज मस्ती वाले होते हैं और थोड़े ज्यादा खुले होते हैं| 
अब जिस सोसाइटी में हम रहते हैं, वहाँ पर अनुभव थोड़ा अलग है| मेरे ठीक पड़ोस में रहने वाली महिला लगभग ७० साल की हैं और अकेले रहती हैं| आज भी उनके सजने सँवरने में कोई कमी नहीं है और दूर से देखकर तो आप अंदाज भी नहीं लगा सकते उनकी उम्र का| खूब बातचीत करने वाली और आज भी अकेले अपनी कार लेकर पूरे शहर में घूमती रहती हैं| अपने कई पुरुष मित्रों के बारे में बेहिचक बात करती है और अपने पति को भी उसी तरफ याद करती हैं| दो बच्चे हैं, बेटी इंग्लैंड में है तो बेटा इज़राईल में| साल में एक बार बेटा यहाँ आता है और एक बार वह बेटी के पास इंग्लैंड जाती हैं|  
एक परिवार और है जिसके दोनों बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते हैं, जिसमें मेरा बेटा| अब चूँकि यहाँ अधिकतर स्कूलों में ट्रांसपोर्ट की सुविधा नहीं होती तो मेरे लिए बहुत कठिन था रोज सुबह स्कूल बेटे को छोड़ना और फिर शाम को लेना| लेकिन पहले ही दिन उन्होंने बेटे को खुद ही स्कूल छोड़ा और ले आये| मुझे थोड़ी राहत मिली, फिर मैंने उनसे कहा कि एक दिन आप ले जाईये, एक दिन मैं ले जाऊंगा, तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया| कहने लगे कि मैं तो वैसे भी रोज स्कूल जाता ही हूँ तो आपके बेटे को भी ले जाऊंगा| खैर जब मैंने कई बार कहा तो उन्होंने मुझे दो दिन स्कूल ले जाने की इज़ाज़त दी| लेकिन उन दो दिनों में से भी एक दिन वही ले जाते थे, यहाँ तक कि अगर उनके बच्चों को नहीं भी जाना है तो भी मुझसे नहीं कहते थे| किसी अनजान देश में कोई ऐसा आदमी मिलना बहुत बड़े भाग्य की ही बात है|
मेरे मकान मालिक एक डॉक्टर हैं और बेहद सज्जन पुरुष| हमसे बस एक ही बात हमेशा कहते हैं "मैं चाहता हूँ कि आपको कोई दिक्कत नहीं हो"| शुरू में ही जब मैं उनके घर में रहने गया तो उन्होंने कहा कि पूरे घर का कालीन, सिर्फ इत्यादि नया लगवा देता हूँ| अब चूँकि सारा सामान लगभग नया ही था तो मैंने मना कर दिया| फिर मैंने कुछ सामान के लिए कहा, तो होता ये थे कि अगर मैंने दो चीज के लिए कहा तो वह छह चीज ले आते थे| अगर कोई भी चीज थोड़ी भी गड़बड़ हुई तो तुरंत नया लगवा देते| धीरे धीरे ये स्थिति हो गयी है कि अब मैं किसी भी चीज के लिए कहता ही नहीं हूँ| एक और ख़ास बात है कि घर में अगर कुछ भी गड़बड़ हुई और मैंने उनको बताया, तो खुद ही लग जाते हैं उसे ठीक करने के लिए| कोई संकोच नहीं और कोई फ़र्क़ भी नहीं कि टॉयलेट में कुछ ख़राब है और उसे ठीक करना है|  
कुल मिलाकर यह एक अजब गजब देश है और यहाँ पर जिंदादिली खूब दिखती है|    

27. हर देश की अपनी कुछ खास चीजें होती हैं, जैसे वहां का क्लाइमेट, वहां का खाने पीने का ढंग इत्यादि| दक्षिण अफ्रीका वैसे तो मूलतः मांसाहारी देश है लेकिन यहाँ पर शाकाहार के लिए भी चीजें खूब पायी जाती है, मिसाल के लिए फल| खैर जब शुरुवात में मैं यहाँ आया था तो मैंने कई लोगों से सुना कि इस वीकेंड पर ब्राई पार्टी रखते हैं, तो मुझे लगा कि कुछ तो खास होगा इसमें| फिर जब पहली बार एक ब्राई पार्टी में गया तो लगा कि वास्तव में यह कुछ खास है| 
इस देश में ब्राई खूब होती है और साल में एक दिन यहाँ नेशनल ब्राई डे के रूप में २४ सितम्बर को मनाया जाता है (इसी दिन नेशनल हेरिटेज डे भी मनाया जाता है)| अब ब्राई के बारे में तो ये भी कहते हैं कि अगर आपको ब्राई के बारे में नहीं पता तो आपको अफ्रीका में रहने का हक़ ही नहीं है| दर असल ब्राई का मतलब होता है भुना हुआ गोस्त, और यहाँ पर ब्राई के लिए अलग से स्टैंड, कोयला, लकड़ी और उसके लिए अलग से कटा हुआ मीट भी मिलता है| शाकाहारी लोग इसमें भुट्टा और स्वीट पोटैटो भी भून लेते हैं और उनका भी ब्राई हो जाता है|
यहाँ पर अक्सर वीकेंड्स में, और खास तौर पर सर्दियों में तो जरूर ब्राई पार्टी होती है| ब्राई स्टैंड में कोयला और लकड़ी रखकर आग लगाते हैं और थोड़ी देर में जब आग तैयार हो जाती है तो उसपर मसाले में लिपटे हुए मीट को भूना जाता है| इसके लिए भी जानकारी होनी चाहिए, वर्ना मीट जल भी सकता है| खैर ब्राई स्टैंड के चारो तरह लोग शराब लेकर बैठ जाते हैं और धीरे धीरे मीट खाते रहते हैं| यह अमूमन सिर्फ मीट की ही पार्टी होती है और इसमें और कुछ भी (जैसे रोटी, चावल) नहीं खाते हैं| 
सबसे मजे की बात यह है कि यहाँ पर आपको हर बड़े स्टोर में ब्राई के लिए बढ़िया से पैकेट में गोल गोल कोयला, लकड़ी और अलग से इसके लिए पैक किया हुआ मीट मिलता है| साथ में मसाला भी मिलता है, बस आप मीट को मसाले में लपेटिये और ब्राई करके चाव से खाइये| आप किसी भी पार्क में चले जाईये, आपको वीकेंड्स में तमाम ब्राई पार्टियां चलती मिल जाएँगी|
दर असल ब्राई पार्टी यहाँ सामाजिक त्यौहार जैसा होता है जिसमें ढेरों लोग इकठ्ठा होते हैं और खूब खाते पीते हैं| किसी भी बड़े फंक्सन में या जन्मदिन इत्यादि की पार्टी में यह होता ही है| बस यह समझ लीजिये कि अपने हिंदुस्तान में जैसे बट्टी, दाल और चोखा की पार्टी होती है, वैसे ही यहाँ ब्राई की पार्टी होती है|

28. जब बात खाने की हो, तो दक्षिण अफीका आपका बहुत पसंदीदा स्थल हो सकता है| न सिर्फ मांसाहार, बल्कि शाकाहार के भी बहुत से विकल्प यहाँ मौजूद हैं| मीट, पोल्ट्री प्रोडक्ट्स, सी फ़ूड तो यहाँ खूब मिलते ही हैं, साथ ही साथ फल, अनाज और सब्जियां भी यहाँ एकदम फ्रेश और पौस्टिक होती हैं| 
अगर अनाज की बात करें तो यहाँ का सबसे ज्यादा पैदा होने वाला अनाज गेंहू ही है लेकिन सबसे बड़ी मात्रा में मक्का पैदा होता है| मक्के का आटा यहाँ खूब बिकता है और लोगों के मुख्य आहार का एक अहम् हिस्सा होता है| रोटियां तो लोग यहाँ बहुत कम ही खाते हैं लेकिन ब्रेड के लिए गेहूं का प्रयोग होता है| चावल भी यहाँ उगाया जाता है और लोग खाते भी हैं लेकिन उतना नहीं, जितना हमारे हिंदुस्तान में|
अब अगर गन्ने का जिक्र न हो तो हिंदुस्तान और अफ्रीका का सम्बन्ध अधूरा रह जायेगा| यहाँ गन्ने की पैदावार भी खूब होती है और इसी गन्ने के खेतों में काम करने के लिए हिंदुस्तान से लोगों को लाया गया था| उस समय तो उनको यहाँ पर कुली कहते थे, लेकिन आज ये लोग सम्मान की जिंदगी गुजार रहे हैं| 
यहाँ पर एक ख़ास चीज मिलती है "बिलटोंग" और जिसको बनाने की जगह जगह पर फैक्ट्री भी है| इसे लोग नास्ते में या किसी भी समय खाने में इस्तेमाल कर लेते हैं| दर असल यह मीट को सुखाकर और उसमें मसाले लपेटकर बनाया जाता है (जैसे हिंदुस्तान में अचार बनाया जाता है)| पुरे दक्षिण अफ्रीका में कहीं भी चले जाईये, आपको बिलटोंग हर जगह मिल जाता है और खूब चाव से खाया जाता है| मीट किसी भी चीज का हो सकता है, जैसे बीफ, लैम्ब, पोर्क, हिरन, ऑस्ट्रिच इत्यादि| 
मीट में सबसे ज्यादा यहाँ बीफ ही मिलता है और उसके बाद लैम्ब, पोर्क, हिरन, ऑस्ट्रिच इत्यादि भी खूब मिलता है| हिंदुस्तान से आने वालों के लिए एक चीज यहाँ गौर करने वाली है, अगर आपने कहीं पर चीज़ बर्गर आर्डर किया है तो ध्यान रखिये, यहाँ पर चीज़ मतलब बीफ भी होता है| हमारे एक परिचित जिस दिन यहाँ आये, दोपहर में खाने के लिए मैक डोनाल्ड में चले गए और चीज़ बर्गर आर्डर कर दिया ये सोच कर कि पता नहीं यहाँ नॉन वेग बर्गर में क्या हो| लेकिन जैसे ही उन्होंने उसे खाना शुरू किया, उनका ध्यान पैकेट पर गया और उनको वहां बीफ लिखा हुआ दिख गया| अब उनको दिन भर उल्टियां आती रहीं, आगे से उन्होंने कान पकड़ा कि चीज़ यहाँ पर कभी नहीं खाएंगे| 
फलों में सेब, केला, स्ट्रॉबेरी, अंगूर इत्यादि खूब मिलते हैं और अंगूरों की तो बहार है यहाँ| इस देश में वाइन फैक्ट्रीज और वाइन यार्ड्स भी खूब हैं और यह शराब के बड़े निर्माताओं में से एक है| 

29. खाने पीने की चीजों में एक और बेहद मशहूर चीज है यहाँ पर जो हिंदुस्तानियों से सीधे जुडी हुई है| "बनी चाउ" नाम की एक ऐसी डिश है जिसके ओरिजिन में हिंदुस्तानियों का नाम आता है| यह मुख्य रूप से ब्रेड के बड़े लोफ के ऊपरी हिस्से को निकाल कर और उसमें तरह तरह की सब्जियों या मीट को भर कर बनायीं जाती है, और बाद में ब्रेड के निकाले हुए हिस्से से उसे ढँक दिया जाता है| मतलब एक तरह से सब्जियों और मीट से भरा हुआ ब्रेड, जिसे आप हाथ में पकड़कर खा सकते हैं और आपको किसी भी प्लेट या चम्मच वगैरह की जरुरत नहीं है|
अब इस मशहूर डिश की उत्पत्ति के लिए भी कई कहानियां प्रचलित हैं| सबसे पहले हिंदुस्तानी लोगों को नटाल (डरबन) के इलाके के गन्ने के खेतों में काम करने के लिए ले आया गया था| अब हिंदुस्तानी लोग तो रोटी सब्जी खाने वाले लोग हुआ करते थे लेकिन यहाँ पर तो रोटी मिलती नहीं थी| अब रोटी का विकल्प हो गया ब्रेड का बड़ा टुकड़ा लेकिन सब्जी कहाँ रखें, क्योंकि इन लोगों को टिफ़िन ले जाने की इजाजत नहीं होती थी| अब जुगाड़ में तो हिंदुस्तानियों का सांई पूरे विश्व में नहीं होता तो यहाँ भी उन्होंने इसका जुगाड़ धुंध निकाला| और ऐसे में यही विकल्प समझ में आया लोगों को और उन्होंने ब्रेड के बीच में सब्जी भरकर ले जाना शुरू किया| 
अब इसका नाम बनी चाउ क्यों पड़ा, इसके पीछे भी कई किस्से हैं| इसमें सबसे प्रचलित किस्सा यह है कि गुजरात के किसी बनिए ने इसे अपने भोजनालय में सबसे पहले बनाया तो इसका नाम बनी चाउ पड़ गया| पहले तो इसमें सिर्फ सब्जियां ही होती थीं लेकिन बाद में मीट भी भरा जाने लगा| आज से सैकड़ों साल पहले डरबन से शुरू हुआ यह फ़ास्ट फ़ूड आज न सिर्फ डरबन में, बल्कि पूरे दक्षिण अफ्रीका में बड़े चाव से खाया जाता है|
डरबन में तो हर साल सितंबर महीने में बनी चाउ बैरोमीटर नाम से एक प्रतियोगिता भी होती है जिसमें भाग लेने और जिसका आनंद उठाने दूर दूर से लोग आते हैं और इसके विजेता को पुरस्कृत भी किया जाता है| 
अगर आप कभी भी दक्षिण अफ्रीका आएं, तो बनी चाउ को चाव से खाना मत भूलियेगा| 

30. दक्षिण अफ्रीका खाने पीने में तो बेहतरीन जगह है ही, यहाँ पर शिष्टाचार भी बहुत अलग है| हर किसी से हाल चाल पूछना तो यहाँ पर सामान्य है ही, लेकिन हम हिंदुस्तानियों के लिए सबसे अजीब चीज है यहाँ के लोगों का बिंदास व्यवहार| अब आप कल्पना कीजिये कि हिंदुस्तान में कोई लड़की किसी पुरुष को देखे और मुस्कुरा दे तो क्या होगा| शायद वह पुरुष उससे शादी तक की कल्पना कर डालेगा| और अगर कोई लड़की किसी पुरुष को कहीं भी रोक कर कहे कि आप के बाल बड़े प्यारे हैं, तो फिर उस पुरुष की मानसिक स्थिति की आप कल्पना कर सकते हैं| उसको तो शायद यही लगे कि अब तो अपना रास्ता एकदम साफ़ है|
यूरोपीय देशों की तरह यह देश भी बहुत बिंदास है, किसी भी जगह पर एक दूसरे को हग करना, किस करना या दुनिया से बेखबर एक दूसरे में डूबे रहना यहाँ आम बात है (हम लोगों के लिए थोड़ा मुश्किल होता है इसे हजम करना)| किसी को किसी भी संबोधन से पुकारना यहाँ आम बात है, आप किसी भी स्टोर में चले जाईये, रेस्टुरेंट में चले जाईये, आप को कुछ ऐसे संबोधन सुनने को मिल जायेंगे, जिसकी हम हिंदुस्तानी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं|
अब कोई हिंदुस्तानी पुरुष किसी स्टोर में जाए और वहां की कोई महिला कर्मचारी उससे कहे "हाउ आर यू माय लव" या "हाउ आर यू माय डार्लिंग", तो उसकी क्या हालत होगी आप सोच सकते हैं| लेकिन यहाँ तो ये सब सामान्य बोलचाल में शुमार है, और किसी को इस बोलचाल में कुछ अजीब भी नहीं लगता| आप अमूमन किसी भी महिला को कह सकते हैं कि आप बहुत सुंदर हैं और किसी के साथ भी फोटो लेने के लिए कह सकते हैं, खासकर अश्वेत आबादी के साथ तो यह बिलकुल सामान्य है| सामान्यतया कोई इन सब से इनकार भी नहीं करता| 
एक और खास बात है यहाँ (जो अब हिंदुस्तानी महानगरों में भी आम हो चला है) कि लोग एक दूसरे से मिलने पर हाथ तो मिलाते ही हैं, लेकिन एक दूसरे से गले लगना ज्यादा पसंद करते हैं| और बहुत बार तो एक दूसरे को गले लगाकर एक दूसरे के गाल पर चुम्बन भी करते हैं| अब आप सोचिये कि ये सब आम हिंदुस्तानी सोचे भी तो मुश्किल आएगी|
और यहाँ की अश्वेत आबादी हाथ भी थोड़ा अलग तरीके से मिलाती है, हम लोग तो सिर्फ एक दूसरे का हाथ पकड़कर हिलाते हैं लेकिन ये लोग आपका हाथ दो तरह से पकड़ते हैं, पहले अपने पंजे से आपके पंजे को और फिर अपने हाथ के अंगूठे से आप के हाथ के अंगूठे को और फिर वापस पंजे को पकड़ते हैं| यह इनके आपसे आत्मीय होने का प्रतीक होता है| 
खैर हर जगह के अलग अलग तरीके हैं और लोग जितना जल्दी इससे अभ्यस्त हो जाएँ, उतना बेहतर होता है|

31.कुछ और चीजें जो यहाँ आप को आश्चर्य में डाल देती हैं, उनमे से एक है यहाँ पर टिसू पेपर का उपयोग| यहाँ पर लोग हिंदुस्तानियों की तरह रुमाल नहीं इस्तेमाल करते, बस टिसू पेपर ही इस्तेमाल करते हैं| चाहे खाने के समय हो या खाने के बाद हो, हर जगह सिर्फ टिसू पेपर| वैसे तो यह लोग साफ़ सफाई के लिए बहुत सजग रहते हैं लेकिन अगर आप इनसे साथ खाने बैठ गए तो शुरू शुरू में तो आपको बहुत दिक्कत होगी| अगर खाना जरा भी तीखा है तो इनकी नाक बहनी शुरू हो जाती है और खाने के मेज पर बैठे बैठे ही ये लोग टिसू से नाक साफ़ करते हैं और फिर उस टिसू को जेब में रखकर पुनः खाना शुरूं कर देते हैं| अब आप सोचिये कि आपके ठीक सामने बैठा हुआ व्यक्ति खूब जोर से नाक साफ़ करता है और फिर टिसू जेब में रखकर वापस आप के साथ खाना शुरू कर देता है तो ऐसे में आपको खाना हजम होगा| और अगर खुदा न खास्ता उसको जुकाम हुआ है तो पूरे भोजन के दौरान वह बार बार नाक साफ़ करेगा और खाता रहेगा, भले आपका खाना खराब हो जाये| और खाने के बाद खूब सारा टिसू लेकर हाथ साफ़ करेगा और चल देगा, रुमाल का झंझट ही नहीं| बाकि टॉयलेट में तो यह लोग सिर्फ टिसू पेपर ही इस्तेमाल करते हैं, यह तो सबको पता है|
एक और चीज जो हमें आज ही पता चली वह यह है कि यहाँ का नियम है कि जो व्यक्ति किसी भी जगह जाता है, उसे पहले हाल चाल पूछना है| आप फर्ज कीजिये कि आप हिंदुस्तान में किसी ऑफिस में जाते हैं या किसी और जगह भी जाते हैं तो रिसेप्सन पर बैठा आदमी आपको पहले ग्रीट करेगा, फिर भले आप उसे नमस्कार कीजिये और काम की बात कीजिये| लेकिन यहाँ अगर आप कहीं भी जाते हैं तो रिसेप्सन पर बैठे आदमी को पहले आपको पूछना है कि आप कैसे हैं, फिर वह आपसे पूछेगा और आपकी मदद करेगा| हमारे परिचित के साथ एक मजेदार वाक़या हुआ था एक बार, उनको किसी ऑफिस में पहुँचने में देर हो रही थी तो उन्होंने गेट पर खड़े गार्ड से कहा कि मुझे देर हो रही है, क्या आप गेट खोल सकते हैं| लेकिन वह गार्ड खड़ा रहा उसने गेट नहीं खोला तो उनको गुस्सा आया और उन्होंने पूछा कि तुम गेट क्यों नहीं खोल रहे तो उसने बताया "आपने मुझसे हाल चाल नहीं पूछा, तो कैसे खोल दूँ"| फिर उन्होंने क्षमा मांगी और उससे पूछा कि आप कैसे हैं, तब जाकर गार्ड ने गेट खोला| मतलब यहाँ आप कैसे हैं नहीं पूछना उनका अपमान करना माना जाता है|
यहाँ के भारतीय, जो कई पुश्तों से यहीं रह रहे हैं, उन्होंने अपने आप को यहाँ के हिसाब से ढाल लिया है| उनमे से अधिकांस को तो यह भी नहीं पता कि उनके दादा परदादा कहाँ से आये थे और बहुत से तो अपने आप को अब दक्षिण अफ्रीकन ही मानते हैं| उनके नाम और सरनेम तो अभी भी काफी मिलते जुलते हैं लेकिन नाम की स्पेलिंग में काफी फ़र्क़ आ गया है| मिसाल के तौर पर एक परिचित हैं जिनका नाम वी गरीब है लेकिन गरीब की स्पेलिंग (Garrib) है| इसी तरह एक और हैं जिनका सरनेम शिवनाथ है लेकिन स्पेलिंग (Sewnath) है| ऊषा की स्पेलिंग (Oosha) होती है, चित्रा की स्पेलिंग (Citra) होती है और विद्या की स्पेलिंग (Vidhiya), ऐसे ही तमाम नाम हैं जिनकी स्पेलिंग पढ़कर आप चौंक जायेंगे लेकिन यह फ़र्क़ यहाँ के हिसाब से हो गया है|
ऐसे ही और कई अजब गजब चीजें हैं यहाँ पर, जिनका जिक्र आगे चलकर होता रहेगा|

32. यहाँ के लोगों के शौक भी अजीब अजीब हैं, मसलन बर्ड वाचिंग, फिशिंग, साइकिल चलाना या बोटिंग करना| अब हिंदुस्तान में तो मैंने शायद ही कहीं देखा हो कि लोग सैकड़ो किलोमीटर दूर सिर्फ इसलिए जाते हैं कि वहां पर चिड़िया देखने की कोई जगह है| लेकिन इस देश में आप को बहुत से ऐसे स्पॉट मिलेंगे जहाँ बर्ड वाचिंग करने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं| एकदम ख़ामोशी से बैठ कर घंटों लोग चिड़िया देखते हैं और अपना दिन बिताते हैं| ऐसे ही साइकिल चलाने के लिए घर से कई सौ किलोमीटर दूर अपनी बड़ी सी कार में साइकिल बांध कर लोग वीकेंड में निकल जाते हैं और वहां पर साइकिल चलाते हैं| और एक अपना हिंदुस्तान है जहाँ हर जगह लोग साइकिलिंग करते मिल जायेंगे|
मछली पकड़ना यहाँ के सबसे पसंदीदा टाइम पास में से एक है| पूरा पूरा दिन लोग तालाब, डैम या नदी के किनारे बैठे रहते हैं, कुछ तो प्लास्टिक के पाजामे पहन कर आधा पानी में खड़े रहकर घंटों मछली पकड़ने के लिए खड़े रहते हैं| सबसे आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब एक डैम के किनारे मैंने कुछ लोगों को मछली पकड़ते देखा| कुछ देर बाद उनमे से एक के कांटें में एक बड़ी सी मछली आयी तो मुझे लगा कि चलो उसका भोजन का प्रबंध हो गया| लेकिन तभी मैंने देखा कि उसका एक दोस्त एक वजन करने वाली मशीन लेकर उसके पास गया और दोनों ने मछली का वजन किया| उसके बाद मछली के मुंह में कुछ डालकर उन्होंने वापस पानी में फेंक दिया| मैंने पास जाकर आश्चर्य से पूछा कि आपने मछली को वापस पानी में क्यों डाल दिया, कुछ गड़बड़ थी क्या मछली में तो उन्होंने जवाब दिया कि अरे हम लोग तो सिर्फ मछली पकड़कर देखते हैं कि उसका वजन कितना है और किसने सबसे बड़ी मछली पकड़ी, उसको खाने के लिए थोड़े न पकड़ते हैं| खैर मैंने हिम्मत करके एक बात और पूछ ली कि आप को क्या मिलता है इससे तो उन्होंने बताया कि बहुत अच्छा टाइम पास होता है इसमें| जब मैंने यह पूछा कि आप के कांटे से मछली को घाव भी तो हो जाता है तो उन्होंने बताया कि हम लोग उसके मुंह में कुछ दवा जैसा डाल देते हैं जिससे उसे नुकसान नहीं होता| अब आप ही सोचिये कि पूरा दिन सिर्फ मछली पकड़कर यह देखना कि किसने सबसे बड़ी पकड़ी अपने देश में सनकीपन ही तो कहा जायेगा|
जानवरो के प्रति भी यहाँ बहुत प्रेम है लोगों के मन में (ये अलग बात है कि यहाँ पर हर जानवर को लोग खा भी जाते हैं)| लेकिन साथ ही साथ हर सोसाइटी में यह भी लिखा होता है कि आप यहाँ पर जानवर रख सकते हैं या नहीं| कुत्ते तो खैर हर जगह खुशनसीब होते हैं तो यहाँ भी हैं, उनके घूमने के लिए अलग से पार्क बने हैं जहाँ पर आपको सैकड़ो नस्ल के कुत्ते टहलते हुए दिख जायेंगे| लेकिन कुत्तों को आप हर पार्क या पब्लिक प्लेस में नहीं ले जा सकते| यहाँ बिल्लियां बहुत भाग्यशाली समझी जाती हैं और बहुत से दुकानों में आपको बिल्लियां मिल जाएँगी| लोग कुत्तों के साथ इनको भी पालते हैं और इनकी जिंदगी शायद इंसानों से भी ज्यादा बेहतर होती है|
शिकार के शौक़ीन भी यहाँ खूब हैं और उसके लिए भी लोग छुट्टियों में निकल जाते हैं|  

33. 


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