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Monday, October 24, 2016

नयी रोशनी--लघुकथा

"क्या हुआ, इतना उदास क्यों हो आज", कमरे के एक कोने में पत्नी को चुपचाप बैठे देखकर उन्होंने पूछा|
"बेटी की बहुत याद आ रही है, दिवाली नज़दीक है ना| कितनी रौनक रहती थी घर में उसके रहने से, अब तो समय ही नहीं कटता है", पत्नी ने उनकी तरफ देखते हुए उदासी से कहा|
"हाँ, वो तो है, बेटियों से ही रौनक होती है", उन्होंने कुछ और कहना चाहा लेकिन चुप रह गए|
"वैसे उसने कल ही फोन किया था, कह रही थी कि बहुत खुश है वहाँ, उसे तो लगता ही नहीं कि वह उस घर की बहू है", पत्नी के चेहरे पर चमक आ गयी|
"फ़र्क़ तो है ही, बहू, बहू होती है और बेटी, बेटी", उनके मुंह से निकल गया|
"काश हमारी बहू भी ऐसी होती", पत्नी ने एक आह भरी|
"हमेशा कहती रहती हो कि बेटियाँ हमेशा माँ बाप का ध्यान रखती हैं| बहू को भी बेटी बनाकर देखो, शायद कभी दिक्कत नहीं आये", कहकर वह बाहर निकल गए|
पत्नी को सब समझ में आ गया लेकिन उनके सामने कुछ कह नहीं पायी|
थोड़ी देर बाद ही पत्नी बहू को फोन पर कह रही थी "इस दिवाली पर हमारी बेटी बनकर घर आ जाओ बहू"|

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