Translate

Saturday, October 29, 2016

अपने लोग--लघुकथा

  सुरसत्ती देवी बहुत परेशान थी, रहा भी नहीं जा रहा था और कुछ करने की हिम्मत भी नहीं पड़ रही थी| वैसे तो अब धीरे धीरे पिछले कुछ महीनों में उन्होंने अपने आप को कुछ कुछ यहाँ के माहौल के हिसाब से ढाल लिया था, लेकिन फिर भी इस कूड़े को देखकर उनको बहुत खराब लग रहा था|
जब से बेटा इस नए मोहल्ले में उनको लेकर आया है, हमेशा समझाता रहा है कि पुरानी बातें भूल जाओ| शुरू में तो अपने ही घर के सोफे पर बैठने में उनको हिचक लगती थी, और अगर कोई घर पर आ गया तो समझ में ही नहीं आता था कि क्या करें| आखिर जिस तरह से जिंदगी के शुरूआती साल गुजारे थे, उससे उबरने में समय तो लगता ही है| पति की मौत के बाद सफाई कर्मचारी की नौकरी करते हुए किस तरह से उन्होंने बेटे को पढ़ाया था, ये उनको ही पता था| जब बेटे को बड़ी नौकरी मिली तो उसने साफ़ कह दिया कि अब ये नौकरी बंद और मेरे साथ शहर चलकर रहो| कहाँ छोटे से झोपड़े में रहने वाली और कहाँ ये शहर का घर, बार बार उनको लगता कि वापस अपने पुरानी जगह चली जाएँ|
कल की दिवाली में खूब जम के धूम धड़ाका हुआ था और सुबह जब उनकी आंख खुली तो बाहर सड़क पर चारो तरफ बस कूड़ा ही कूड़ा दिख रहा था| शायद आज सफाई वाली, जिसके लिए बहुत कुछ बेटे से छुपा कर उन्होंने रखा हुआ था, नहीं आयी थी| आज के दिन उनको अपना पुराना समय याद आ गया, पूरे इलाके को कायदे से साफ़ करती थीं और खूब बख्शीश भी मिलती थी| लेकिन आज यहाँ इतनी गन्दगी, उनसे देखा नहीं जा रहा था, लेकिन अगर साफ़ करते बेटे ने देख लिया तो बहुत नाराज होगा, इसका भी डर था|
तभी उनको दूर से सफाई वाली आती दिखी और उन्होंने तीन चाल बड़े पॉलिथीन में जो कुछ रखा हुआ था, उसे उठाया और जल्दी जल्दी बाहर निकल गयीं| उसे सब सामान देकर एक बार अपने घर की ओर देखा| बेटा अभी भी सो रहा है जानकर उन्होंने सफाई वाली को कस कर गले लगाया और उसे आश्चर्यचकित छोड़ कर वापस मुड़ गयीं| 

No comments:

Post a Comment