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Saturday, November 5, 2016

आस्था और तरक्की--लघुकथा

आज जिलाधिकारी गरिमा बहुत प्रसन्न थीं,जो काम लोगों को समझा बुझा के और प्रशासन से सख्ती करवाकर वो नहीं करवा पायी थीं, उसको इस आस्था ने बड़ी ही आसानी से करवा दिया| और उससे भी बड़ी बात ये थी कि उन्होंने रजत को भी गलत साबित किया था|
दोनों ही एक ही बैच के आई ए इस थे और इस समय अलग अलग जिलों के जिलाधिकारी| जिस समय गरिमा की पोस्टिंग इस जिले में हुई थी, जिला पानी की समस्या से बुरी तरह जूझ रहा था| अंधाधुंध जल दोहन के चलते जलस्तर काफी नीचे चला गया था और गांवों में तालाब लगभगग मृतप्राय थे| कहने को तो एक महकमा था भूमि संरक्षण का लेकिन गांव वालों के असहयोग और भ्रष्टाचार के चलते योजनाएं लागू नहीं हो पा रही थीं| ऐसे में उनको लगा कि अगर जल संरक्षण को किसी त्यौहार या आस्था से जोड़ दिया जाये तो बात बन सकती है| फिर उन्होंने खुद गांव गांव घूमकर लोगों को समझाया और शुरू हुआ सिलसिला तालाब खुदाई का| साथ में उन्होंने ये बात भी हर गांव में कही थी कि जिस गांव के पोखर में सबसे ज्यादा पानी होगा, उसमें वह खुद गांववालों के साथ पूजा करेंगी| और जब यह बात उसने रजत से कही तो उसने इस बात का मखौल उड़ाया कि लोगों को इस तरीके से भी समझाया जा सकता है| रजत को तो बस एक ही तरीका समझ में आता था और वो था डंडे से समझाना और इस बात पर दोनों में घोर असहमति थी|  
पिछले दो सालों की मेहनत उसको आज फलीभूत होती दिख रही थी इस तालाब के पास आकर| गांव के लोगों के साथ उन्होंने भी पानी में एक बार डुबकी लगायी और एक अंजुल पानी सूर्य को अर्पित कर दिया| तालाब से बाहर निकलकर उसने वहां उपस्थित जन समुदाय के साथ एक सेल्फी ली और उसे एक स्माइली के साथ रजत को भेज दिया| आज पूरे जिले के हर गांव में आज ये पूजा पानी से लबालब भरे तालाबों में हो रही थी और उसके मन में भी सावन घुमड़ रहा था|  

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