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Monday, October 29, 2018

बेचैनी-लघुकथा

संध्या को समझ में नहीं आ रहा था कि मनीष की बेचैनी कैसे दूर करे, दुःख तो उसे भी बहुत हुआ था जब वह हादसा हुआ था. कितने ही लोग, जिनमें बच्चे और महिलाएं भी थीं, मारे गए थे और उसका सदमा बहुत गहरा पड़ा था मनीष के ऊपर. लेकिन उसको भी पता था और मनीष को भी कि गलती मनीष की नहीं थी और वह चाह कर भी उस हादसे को टाल नहीं सकता था.
आज मनीष की छुट्टी का सातवां दिन था, हादसे के बाद ही उसे विभाग ने कुछ दिन की छुट्टी पर भेज दिया था. सबको उम्मीद थी कि कुछ दिन बाद सब कुछ यथावत हो जायेगा और मनीष वापस अपने काम में लग जायेगा. लेकिन मनीष की बेचैनी और उदासी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी और यही बात संध्या को भी बेतरह परेशान किये हुए थी.
"अब उसे भूलने की कोशिश करो नहीं तो कैसे चलेगा. तुम्हारी तो कोई गलती नहीं थी उस हादसे में, लोग ही अपनी जान को खतरे में डालते रहते हैं तो कोई क्या करे", संध्या ने मनीष को समझाने की एक और कोशिश की.
मनीष उसे सुन कर भी जैसे अनसुना कर रहा था, उसने अपना सर हिलाया और उदास स्वर में बोला "मैं कुछ नहीं कर पाया संध्या और इतने लोगों की मौत की वजह बन गया. भले मेरा विभाग मुझे इसका जिम्मेदार नहीं मानता लेकिन मैं इस आत्मग्लानि से निकल नहीं पा रहा हूँ".
संध्या ने एक गहरी सांस ली, उसके जेहन में कुछ समय पहले का एक हादसा आ गया जिसमें ड्राइवर का धर्म अलग होने के चलते उसपर एक दूसरे तरीके का आरोप लग गया था.
"वो तो अच्छा हुआ कि वो लोग भी अपने ही धर्म के थे वर्ना लोग तो इसे एक अलग ही रंग दे देते. आजकल तो बस कोई बहाना चाहिए लोगों को", संध्या ने जैसे राहत की सांस ली.
मनीष ने उसकी तरफ देखा और कुछ सोचकर बुदबुदाया "काश इसी बहाने से ही लोग मुझे कोसते, गुनाहगार ठहराते तो शायद मेरे दिल का बोझ कुछ कम होता!

Thursday, October 25, 2018

फिर भी - लघुकथा

"आज फिर नींद नहीं आ रही है आपको, भूलने की कोशिश कीजिये उसे", रश्मि ने बेचैनी से करवट बदलते हुए राजन से कहा और उठकर बैठ गयी. कुछ देर तक तो वह अँधेरे में ही राजन का सर सहलाते रही, फिर उसने कमरे की बत्ती जला दी.
"लाइट बंद कर दो रश्मि, अँधेरे में फिर भी थोड़ा ठीक लगता है. उजाला तो अब बर्दास्त नहीं होता, काश उस दिन मैं नहीं रहा होता", राजन ने रश्मि की गोद में सर छुपा लिया.
धीरे धीरे रश्मि ने अब अपने आप को संभाल लिया था लेकिन अभी भी जब वह बाहर निकलती, उसे लगता जैसे लोगों की निगाहें उससे लगातार सवाल कर रही हैं. और उसे राजन की मनःस्थिति का भी भरपूर अंदाजा था.
"मेरी कोई गलती नहीं थी रश्मि, मोड़ पर अँधेरे के चलते मुझे दिखाई नहीं पड़ा और जबतक मुझे दिखा, लोग सामने थे", राजन ने एक बार फिर वही दुहराया जो वह पिछले एक हफ्ते से कहता आ रहा था.
"किसने कहा कि तुम्हारी गलती थी, सबने तो तुम्हें बेकसूर बता दिया है. अख़बारों में भी तुम्हारे बारे में कुछ गलत नहीं छपता अब तो", रश्मि ने उसे फिर से दिलासा देने की कोशिश की.
राजन ने करवट बदली और उसने रश्मि की तरफ देखते हुए गहरी सांस ली "लेकिन अपने आप को कैसे समझाऊँ रश्मि, उसमें कुछ बच्चे भी थे हमारे बच्चों के उम्र के". 

Wednesday, October 24, 2018

धरती का बोझ-लघुकथा

शोक सभा चालू थी, हर आदमी आता और मरे हुए लोगों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी बात शुरू करता और फिर प्रशासन को कोसते हुए अपनी बात ख़त्म करता. बीच बीच में लोग उस एक व्यक्ति की भी तारीफ़ जरूर करते जिसने कई लोगों को बचाया था लेकिन अपनी जान से भी हाथ धो बैठा था.
उधर कही आसमान में रूहें एक जगह बैठी हुई जमीन पर चलने वाले इस कार्यक्रम को देख रही थीं. उनमें अधिकांश तो उस एक रूह से बहुत खुश थीं जिसने उनके कुछ अपनों को बचा दिया था लेकिन एक रूह बहुत बेचैन थी. उसे यह बात जरा भी हजम नहीं हो रही थी कि मंच पर आने वाले उसका तो जिक्र ही नहीं कर रहे हैं.
तभी श्रोताओं में से कुछ लोग बोलने लगे "खैर बहुत बुरा हुआ लेकिन कम से कम वह नेता भी इसमें मर गया, धरती का बोझ कम हो गया". 
ऊपर सभी रूहों ने उस एक रूह की तरफ देखा, अब वह सबसे नजरें चुरा रही थी. 

मिलन-लघुकथा

चारो तरफ मची भगदड़ अब धीरे धीरे कम हो चली थी, बस घायल लोगों की चीखें ही चारो तरफ गूंज रही थीं. इस भयानक हादसे में सैकड़ों लोग मरे थे और उससे ज्यादा ही घायल थे. राहत में पहुंचे लोग मृत शरीरों को एक तरफ इकट्ठा कर रहे थे और घायलों को हस्पताल भेजने की तैयारी में भी जुटे थे.
पटरी के एक तरफ पड़े एक युवा के मृत शरीर को लोगों ने उठाकर एक तरफ कर दिया. कुछ ही देर बाद कुछ और लोग एक लड़की के मृत शरीर को भी वहीँ डाल गए. कुछ घंटे बीतते बीतते तमाम लाशें एक दूसरे से गड्डमड्ड पड़ीं थीं और लड़के का हाथ लड़की के हाथ में था.
ऊपर कहीं आसमान के किसी कोने में दोनों की आत्माएं बेहद सुकून महसूस कर रही थीं. लड़के की आत्मा ने मुस्कुराते हुए लड़की की आत्मा से कहा "ऊपरवाले ने तुम्हारी बात कितनी जल्दी सुन ली, कल ही तुम कह रही थी कि समाज अगर साथ जीने नहीं देता तो कम से कम साथ साथ मरने तो देगा. और देखो आज मरने के बाद तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में है".
लड़की की आत्मा भी मुस्कुरायी और उसने लड़के की आत्मा का हाथ अपने हाथ में ले लिया. नीचे लाशों के अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं, लड़के और लड़की के घर वाले हादसे के स्थल पर एक दूसरे से अलग बैठकर उनके मौत पर विलाप कर रहे थे.

Wednesday, October 17, 2018

परछाईयों का भय - लघुकथा

पिछले कुछ घंटों से उदास दिख रहे अपने दोस्त को देखकर उससे रहा नहीं गया. "क्या हो गया राजमन, बहुत उदास लग रहे हो".
राजमन ने एक नजर उसकी तरफ डाली और सोच में पड़ गया कि तेजू को बात बताएं कि नहीं. लेकिन तेजू तो उसकी हर बात, हर राज से वाकिफ़ था इसलिए उसे बताने में कोई हर्ज भी नहीं था.
"यार, तुम तो देख ही रहे हो ये आजकल का ट्रेंड, जिसे देखो वही इस #मी टू# के बहाने लोगों के नाम उछाल रहा है. रिटायरमेंट के बाद अब कहीं कोई मेरे खिलाफ भी यह चैप्टर न खोल दे, यही सोचकर घबरा रहा हूँ".
तेजू ने गहरी सांस ली "अच्छा तो यह वजह है, वैसे तुम्हारा कोई अफेयर मुझसे तो छिपा नहीं है. लेकिन शोषण तो तुमने किया ही था कई महिलाओं का".
"अब तुम भी यही कहोगे, मैंने शोषण किया है. अरे सबके अपने अपने स्वार्थ थे और सारे समझौते उसी के लिए तो हुए थे", राजमन ने अपनी दलील दी.
तेजू के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी "अब इतना तो तुम भी जानते हो कि उस समय तुम ऐसे पद पर थे कि लोगों की मदद कर सकते थे. लेकिन क्या उस समय तुम्हारी नैतिक जिम्मेदारी कुछ नहीं थी? 

Tuesday, October 16, 2018

आत्मनिर्भरता- कहानी

उसने ग़ौर से पिताजी को देखाबहुत उदास दिख रहे थे और शायद निराश भी थे। सेवानिवृत्ति के 5 वर्ष बाद लगभग 65 साल की उम्र पार कर चुके पिताजी को उसने शायद ही कभी इस तरह से निराश देखा हो। दरअसल सेवानिवृत्ति के पहले भी कभी वह हम लोगों पर निर्भर नहीं रहे और अब पिछले कुछ सालों से हम दोनों के साथ बारी-बारी से रह रहे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी जब तक माँ थीतब तक उन्होने अपना जीवन अपने तरीक़े से ही जिया। पेंशन के पैसों को कहाँ और कैसे ख़र्च करना हैइसका निर्णय उन्होने माँ से पूछकर ही किया लेकिन माँ के नहीं रहने पर उन्होने जैसे सब कुछ छोड़ दिया। अब जिसके घर जाते हैंअपने बैंक खाते की चेकबुक उसे ही पकड़ा देते हैं और फिर जीवन को एक अलग ढर्रे पर चलने के लिए छोड़ देते हैं। शायद जीवन को अब वह एक अलग ही नज़रिए से देखने लगे थे जहाँ उनकी अपनी इच्छाएँ बहुत मायने नहीं रखती थीं।

पिछले क़रीब तीन महीने से पिताजी बड़े भाई के यहाँ रह रहे थे और उसकी भी इच्छा थी कि पिताजी से मिल लिया जाए। वह पिताजी से ज़्यादा क़रीब था लेकिन सिर्फ़ अपने घर उनको रखना भी उसके लिए संभव नहीं था। एक तो बड़े भाई ख़ुद भी कहते थे कि कुछ महीने पिताजी उनके घर रहेंगे। और दूसरे उसने जब घर में पिताजी को हमेशा अपने साथ ही रखने की बात की तो पत्नी ऊषा का रुख़ उसे बहुत सकारात्मक नहीं लगा। हालाँकि उसने खुले शब्दों में कुछ नहीं कहा लेकिन कई और तरीक़ों से उसने ज़ाहिर कर दिया कि पिताजी को हमेशा रखना मुमकिन नहीं है।

अब बड़े भैया भी तो चाहते हैं कि पिताजी उनके साथ रहें और पिताजी का भी तो मन होगा ही कि वह बड़े बेटे के घर कुछ दिन रहें। उनसे पूछने पर तो शायद खुल के नहीं बोल पाएँ लेकिन हमें तो सोचना ही चाहिएऊषा का तर्क था।

उसे भी लगा कि ठीक ही हैपिताजी का मन भी लगा रहेगा और ऊषा को भी बहुत दिक़्क़त नहीं होगी। वह भी इसी समाज का हिस्सा था और अपने कुछ दोस्तों के घर पर उनके माँ पिताजी की हालत देख चुका था।

यह भी ठीक रहेगापिताजी भी सब जगह घूम फिर लेंगें और सबका मन लगा रहेगाउसने कहा तो ऊषा ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करने में कोई कोताही नहीं की।

माँ के गुज़रने के बाद उसने शुरू में पिताजी को अपने घर ही रखा। ठीक-ठाक पेंशन मिल रही थी लेकिन पिताजी ने जैसे पैसे निकालने या ख़र्च करने से तौबा कर ली। उसने कई बार समझाया कि अपनी पासबुक और चेकबुक आप अपने पास ही रखिए लेकिन पिताजी ने उसे पकड़ा दिया।

अब मुझे क्या ज़रूरत हैहर चीज़ तो तुम ला ही देते हो। कभी ज़रूरत पड़ेगी तो तुमसे माँग लूँगाकुछ चेक मैंने साइन कर दिए हैंजब ज़रूरत हो निकाल लिया करनापिताजी ने इन सब चीज़ों से अपने आपको एकदम परे कर लिया।

उसने भी नियम बना लिया थाहफ़्ते में एक दिन पिताजी को सैलून लेजाकर उनकी हजामत बनवानापूरे महीने की दवा एक साथ शुरू में ही मँगवा लेना और दो हिंदी अख़बार उनके लिए रोज़ मँगवाना। उसे याद था कि कैसे सुबह-सुबह अख़बार पढ़ने के लिए पिताजी हाकर का इंतज़ार करते रहते थे और उसकी साइकल की आवाज़ भी वह दूर से ही पहचान जाते थे। गाहे-बगाहे उसे उलाहना भी देते रहते अरे रामचरणआजकल देर करने लगे हो आने मेंसामने शर्माजी के घर तो आधे घंटे पहले ही अख़बार आ जाता है।और रामचरण उनको अगले दिन से जल्दी आने का वादा करते हुए निकल जाता। एक-दो दिन बाद फिर वही समय हो जाता लेकिन पिताजी ने कभी भी रामचरण को अख़बार बंद करने के लिए नहीं कहा। और उनका अख़बार भी एक ही था दैनिक जागरणजो पिछले कई सालों से चला आ रहा था। शर्माजी के यहाँ हिंदुस्तान आता था और कभी-कभार वह उसे भी पढ़ लेते थे लेकिन संतुष्टि उनको सिर्फ़ दैनिक जागरण से ही होती थी। बड़े भाई को अख़बार में बहुत दिलचस्पी नहीं थी लेकिन वह भी पिताजी के ही ढर्रे पर थाअक्सर पिताजी के साथ ही बीच के पन्ने निकालकर पढ़ता रहता।

शुरू-शुरू में तो उसने हमेशा कुछ रुपये पिताजी के कुर्ते के जेब में रखा। पिताजी ने कई बार कहा भी कि क्या ज़रूरत है इसकी लेकिन उसे लगता था कि एक ऐसे व्यक्ति के पास पैसे हमेशा होने चाहिए जिसने पूरी ज़िंदगी अपने पैसों से ही जीवन काटा होकभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया हो। पिताजी भी रोज़ टहलने जाते और आते समय बच्चों के लिए चॉकलेट या मूँगफली ले आते। एकाध बार ऊषा ने उसे टोका भी कि पिताजी को मना करो लेकिन उसने ऊषा को समझा दिया पिताजी का आत्मसम्मान रखने के लिए कभी मना मत करनावैसे भी उनके पेंशन का हिस्सा ही वह ख़र्च करते हैं।

वो तो ठीक है लेकिन जब ज़रूरत नहीं हो तो पैसे क्यों ख़र्च करते हैंआख़िरकार अंत में काम तो उनके ही आने हैंऊषा ने अपना मत रखा लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया।

समय के साथ मनुष्य चीज़ों को भूलने लगता है या यूँ कहें कि मस्तिष्क को अपनी सहूलियत से भूल जाने देता है। मैं भी जैसे-जैसे अपनी जाती ज़िंदगी में व्यस्त होने लगापिताजी के प्रति थोड़ा लापरवाह होने लगा। अब मैं कभी-कभी उनके जेब में पैसे रखना भूल जातापिताजी भी अमूमन कुछ नहीं कहते। जब दो-चार दिन ऐसा हो जाता तो सीधे तो नहीं लेकिन दूसरे तरीक़े से बता देते कि उनके पास पैसे नहीं हैं आज पार्क के बाहर बहुत बढ़िया मूँगफली मिल रही थीहमने सोचा कि बच्चों के लिए ले लें लेकिन शायद दूसरा कुर्ता पहन लिया था मैंने।मुझे यह अच्छी तरह से मालूम था कि पिताजी के कमरे में उनके सुबह के टहलने के लिए एक ही कुर्ता टँगा रहता और बाक़ी कुर्ते अलमारी में रहते। और यह बात पिताजी भी जानते थे लेकिन एक हिचक सी होने लगी थी उनको पैसे के लिए कहने में। दो-चार बार जब यह घटना हुई तो मुझे अहसास हुआ कि यह ग़लत हो रहा है तो मैंने फिर से नियम से पैसे पिताजी के कुर्ते में रखना शुरू कर दिया।

मैंने यह बात बड़े भाई को भी बता दी थी और उनको ताकीद भी किया था कि वह इसका ख़याल रखें। लेकिन भैया तो शुरू से ही इन सब चीज़ों के प्रति लापरवाह थे और उन्होने कभी-कभार ही इसके लिए ध्यान दिया। आज पिताजी की उदासी को मैं तो भाँप गया लेकिन बड़े भाई ने महसूस ही नहीं किया। जब बड़े भाई ऑफ़िस निकल गए और भाभी भी घर के काम में व्यस्त हो गईं तो मैंने पिताजी से पूछा क्या बात है पिताजीतबीयत थोड़ी गड़बड़ है क्याआप उदास लग रहे हैं?

पिताजी ने मेरी तरफ़ ग़ौर से देखा और सर हिलाते हुए बोले तबीयत तो ठीक ही हैबस ऐसे ही। अब उम्र के साथ थोड़ी-बहुत दिक़्क़त तो लगी ही रहेगी।

मैं समझ गया कि पिताजी खुलकर बात नहीं करेंगे और मैं उनसे काफ़ी देर तक इधर-उधर की बात करता रहा। शाम को बड़े भाई आए तो उनसे भी इस बाबत सीधे बात करना उचित नहीं लगा। मैंने थोड़ा घुमाकर बात शुरू की पिताजी का पेंशन आपने कभी निकाला कि नहींबीच-बीच में खाता देख लिया कीजिए

बड़े भाई समझ नहीं पाए कि मैं यह क्यों पूछ रहा हूँउन्होने मेरी तरफ़ अचरज से देखा। पिछले महीने एक बार कुछ रुपये निकाले तो थेउसके बाद ज़रूरत नहीं महसूस हुई। तुम्हें पैसों की ज़रूरत है तो बोलोमैं दे देता हूँ।

मुझे लग गया कि बड़े भाई ग़लत समझ गए हैंअब मैंने उनसे खुल कर बात की दरअसल बात यह है भैया कि पिताजी के पास भी कुछ पैसे रहने चाहिए लेकिन वह कभी माँगते नहीं। इसीलिए मैं उनके जेब में हमेशा कुछ रुपये डाल देता था जिससे उनको जो भी ठीक लगेख़र्च करें। और उनके पेंशन से ही पैसे निकालता हूँ जिससे उनको यह न लगे कि वह हमारे पैसे पर आश्रित हैं। आप उनके जेब में आजकल रुपये नहीं डालते हैं और शायद उनको यही बात अंदर से साल रही है कि उनके पास बच्चों के लिए ख़र्च करने के लिए भी पैसे नहीं हैं।

बड़े भाई को जैसे झटका लगाउन्होने इस विषय में कभी ध्यान ही नहीं दिया था। मैंने उनको इशारों इशारों में यह बात पहले भी बताई थी लेकिन खुलकर नहीं कह पाया था कि कहीं उनको बुरा न लग जाए

अरे मैंने तो यह बात कभी सोची ही नहींमुझे लगा कि उनकी हर ज़रूरत का सामान तो घर में रहता ही है और बाहर का वह कुछ खाते पीते नहीं। इसलिए उनको पैसे की क्या ज़रूरत होगीबड़े भाई को अपनी भूल का अहसास हुआ और वह बाहर निकल गए। थोड़े देर में जब वह वापस लौटे तो उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव थेउन्होने पिताजी के कुर्ते में कुछ रुपये डाल दिए थे।

अगली सुबह पिताजी टहल कर लौटे तो उनके हाथ में एक दर्जन केले थे जिसे सबने बड़े मज़े में मिलकर खाया। उनके चेहरे पर उदासी अब दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही थी। बड़े भाई ने इसी बीच उनकी चेकबुक भी लाकर रख दीपिताजी बड़ी प्रसन्नता से उसमें कुछ रकम लिख रहे थे।

सोच- कहानी

रविवार का दिन कितने दिनों बाद आता है और ऐसे बीत जाता है जैसे आया ही नहीं था. आज
फिर रविवार की सुबह थी, ठंड अब अपने शबाब पर आ रही थी और ऐसे में रज़ाई में ही लेटे
लेटे चाय पीते हुए अखबार पढ़ने का आनंद ही कुछ और है. आज न तो दफ्तर जाने की हड़बड़ी
है और न ही रोज के हिसाब से नहाने धोने और शेविंग करने की. वैसे भी उसने एक नियम
अपने लिए बना रखा है कि रविवार के दिन जाड़े भर न तो स्नान करेगा और न ही शेविंग,
आखिर इस दिन में और बाकी के दिनों में कुछ तो फर्क होना ही चाहिए.
पत्नी सुबह एक प्याला चाय दे गयी थी और अखबार भी उलट पलट कर पूरा पढ़ा जा चुका था.
ऐसे में एक प्याली चाय और मिल जाये तो कुछ देर तक फोन पर मैसेज इत्यादि भी देख लिए
जाएँ, कुछ यही सोचते हुए उसने पत्नी को आवाज दी “बेगम, अगर आपकी नजरे इनायत हो
जाये तो गरीब को एक प्याली चाय की और नसीब हो जाती”. यह भी उसका आजमाया हुआ
नुस्खा था. बस एक चीज उसे कभी समझ में नहीं आती कि इन महिलाओं को छुट्टी के दिन
ऐसा आलस क्यूँ नहीं होता, आखिर वह भी तो एक दिन आराम चाहती होंगी. उसे किचेन से
कुछ आवाज सुनाई दी जिसपर उसने आदतन ध्यान नहीं दिया और फोन देखता रहा. थोड़ी देर
में उसकी चाय आ गयी और वह फिर से रविवार के आनंद में डूब गया.
कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी बजी, वह उससे बेफिकर आराम से लेटा रहा. शायद बाई होगी या
दूधवाला पैसे लेने आया होगा, अक्सर पैसे लेने वाले रविवार को ही आते थे. लेकिन पत्नी ने
कमरे में आते ही कहा कि उठकर रद्दी वाले को अखबार वगैरह दे दीजिये. उसे खराब तो लगा
कि इसको भी आज ही आना था जब पिताजी गाँव गए हैं, वर्ना यह सब काम तो वही निपटा
देते थे. कुछ मिनट वह वैसे ही पड़ा रहा लेकिन जब पत्नी की दुबारा आवाज आई तो उसे
बिस्तर छोडना ही पड़ा. कमरे से बाहर निकलते समय उसकी नजर घड़ी पर पड़ी, 11 बज गए
थे. रोज तो वह अब तक एक घंटा दफ्तर में बिता चुका होता है लेकिन आज लेटे लेटे ही बीत
गया. बाहर बरामदे में निकलने पर उसे गुनगुनी धूप फैली दिखी तो काफी अच्छा लगा. अब
उसका ध्यान रद्दी वाले की तरफ गया, बरामदे के एक किनारे बैठा एक अधेड़ व्यक्ति जिसकी
खिचड़ी दाढ़ी और उलझे बाल उसकी दशा बताने के लिए काफी थे. उसने एक हाफ स्वेटर पहना
हुआ था जो उतना ही बदरंग था जितनी शायद उसकी अपनी जिंदगी होगी.

बाहर उसकी साइकल खड़ी थी जो शायद 10 साल पुरानी तो रही ही होगी और पीछे कैरियर के
दोनों तरफ झोले लटके हुए थे जिसमें वह रद्दी रखता था. रद्दी वाला बड़ी तल्लीनता से वहाँ
रखे रद्दी में से मैगजीन और कापी किताब अलग कर रहा था और अखबार एक तरफ रख रहा
था. उसने एक बार खाँसा तो रद्दीवाले ने उसकी तरफ देखा और सर हिलाकर उसको नमस्ते
किया. उसने भी बदले में सर हिला दिया और वहीं राखी कुर्सी पर बैठ गया. उसने कई बार
पिताजी को देखा था रद्दी बेचते और उसको याद था कि पहले वह रेट जरूर पुछते और फिर
मोल भाव करते. कई बार तो उन्होने एक रद्दीवाले को वापस करके दूसरे रद्दीवाले को बेचा
जिसने सिर्फ 50 पैसा प्रति किलो ज्यादा दिया था.
वैसे उसकी आदत नहीं थी मोलभाव की, वह सब्जी खरीदते वक़्त भी मोलभाव नहीं करता था.
और इस आदत के लिए पत्नी द्वारा कई बार “आप तो राजा हैं”, या “आपको तो कोई भी लूट
सकता है” जैसी उपाधियों से नवाजा जा चुका था. लेकिन उसे इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता
था और वह मुस्कुरा कर रह जाता. आज पता नहीं कैसे उसके मन में रद्दी का रेट पूछने की
इच्छा आ गयी, शायद पिताजी के हिस्से का काम करने के चलते एक अतिरिक्त दबाव उसके
मन में आ गया था.
“अखबार कैसे खरीदते हो?, उसने पूछा तो रद्दीवाले ने तुरंत जवाब दिया, मानो वह इस सवाल
का इंतजार ही कर रहा था “बाबूजी, वैसे तो हम लोग 6 रुपये किलो खरीदते हैं और किताब
कापी का रेट अखबार से कम होता है लेकिन आपके यहाँ से हमेशा ले जाता हूँ तो साढ़े छ रुपये
किलो दूँगा”.
उसको एक बार तो लगा कि चाहे छ हो या साढ़े छ, क्या फर्क पड़ता है. लेकिन उसने यूँ ही
कहा “रेट थोड़ा और बढ़ाओ, कम दे रहे हो”. अब वह पूरी तरह पिताजी की ज़िम्मेदारी को
निभाने के लिए तैयार हो गया था.
रद्दीवाले ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर वह तैयार हो गया “बाबूजी मंहगाई बहुत बढ़
गयी है और परिवार का खर्चा चलाना काफी मुश्किल हो रहा है आजकल. लेकिन आप के यहाँ
कोई बात नहीं, आप 7 रुपये ले लीजिएगा”. अब तक वह सारी रद्दी को अलग अलग कर चुका
था और एक एक कर उसने उन्हें तौलना शुरू कर दिया.

उसे ध्यान आया, सचमुच तेल की कीमतों में आजकल आग लगी हुई है और मंहगाई इंडेक्स में
भी इजाफा हुआ है. उसके ऑफिस में आजकल बस नए वेतन वृद्धि की ही चर्चा चलती रहती है
और हर आदमी बढ़े हुए वेतन को लेकर क़यास लगाता रहता है. कुछ लोग तो तीन महीने में
बढ्ने वाले डी ए को लेकर ही जोड़ घटाव में लगे रहते कि इस बार तो डी ए काफी बढ़ेगा. इन
चर्चाओं से उसे भी एहसास होने लगता है कि मंहगाई काफी बढ़ रही है और वेतन में अच्छी
ख़ासी बढ़ोत्तरी आवश्यक है.
रद्दीवाला अब अखबार तौलने लगा था और उसे बताता जा रहा था कि कितना वजन हुआ.
उसकी नजर एक बार फिर उसके स्वेटर और शर्ट पर पड़ी और वह पिताजी के सोच से वापस
अपनी सोच में आ गया.
“बाबूजी, कुल 26 किलो रद्दी हुआ और 7 रुपये के हिसाब से 182 रुपये हुआ”, उसने सारा
हिसाब बताया और अपनी जेब से पैसे निकाल कर गिनने लगा. 182 रुपये, इतने में क्या होता
है आजकल, पाँच किलो आटा भी तो नहीं मिलता होगा. फिर उसे पिताजी याद आए, पूरे समय
रद्दीवाले के सामने बैठकर वजन देखते और फिर दाम को अपने से जोड़कर ही लेते. वह इन्हीं
ख़यालों में खोया था तभी रद्दीवाले ने उसके सामने पैसे रखे “बाबूजी, 180 रुपये हैं, अगली बार
2 रुपये जोड़कर दे दूँगा”.
उसने अपने हाथ में 180 रुपये देखे, रद्दीवाला अखबार वगैरह उठाकर अपने साइकल के झोले
में रख रहा था. उसने आगे बढ़कर रद्दीवाले को बुलाया और उसके हाथ में 180 रुपये पकड़ाते
हुआ कहा “मंहगाई सचमुच बहुत बढ़ गयी है, बच्चों के लिए इससे कुछ खरीद लेना”, और फिर
बिना रद्दीवाले की तरफ देखे वह वापस मुड़ गया.

Monday, October 15, 2018

फिर चाँद ने निकलना छोड़ दिया-कहानी

पूरा देश स्तब्ध था और बेतरह परेशान भी, वजह ही कुछ ऐसी थी। कभी ऐसा हुआ ही नहीं था और न ही किसी ने कहीं क़िस्से कहानियों में ऐसा पढ़ा था। शायद विदेशों में भी लोग परेशान होंगे लेकिन फ़िलहाल बात अपने देश की ही कर रहा हूँ। अपने देश में भी बात धीरे-धीरे सबकी निगाह में आ गई, शुरूआत तो दरअसल अपने शहर से ही हुई थी।
यह लगातार छठवां दिन था और आसमान में चाँद के दर्शन नहीं हुए थे। वैसे तो इस मौसम में चाँद और उसकी चाँदनी अपने पूरे शबाब पर होती है। और जैसे-जैसे रात जवान होती है, वैसे वैसे निहायत ख़ूबसूरती और नज़ाकत से चाँदनी का उजाला धरती पर सनै सनै फैलने लगता है। मगर अब ऊपर आसमान में सितारे भी परेशान थे कि वह कैसे चमकेंगे, आख़िर वे भी तो अपनी चमक चाँद से ही उधार लिया करते थे।
शहरों में तो शायद बच्चों को बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था, उनको वैसे भी आसमान का चाँद दिखाई कब पड़ता है। छोटे-छोटे दड़बेनुमा घरों में रहने वाले बच्चों को तो खुला आसमान भी नसीब नहीं होता, चाँद तो सिर्फ़ किताबों और टी।वी पर ही देखा होता है उन्होंने। न ही उनको हरियाली दिखती है और न ही पक्षियों का कलरव सुनाई पड़ता है। बचपन का असली आनंद न ले पाने के लिए अभिशप्त ये शहरी बच्चे दरअसल अपने पूर्वजों के लालच की क़ीमत अनजाने में चुका रहे होते हैं। लेकिन क़स्बों और गाँवों में बच्चे भी बड़ों के साथ-साथ बेहद हैरान परेशान थे। उनको तो खुले आसमान में अक्सर चाँद को देखने की आदत थी, और इसी वजह से कितने ही बच्चे अपनी माँ को तंग करने लगे कि आख़िर उनका चंदा मामा क्यों नहीं दिखाई देता आजकल। एक-दो दिन तो उन्होंने बच्चों को समझाया कि चंदामामा कहीं घूमने गए हैं लेकिन तीसरे दिन उनको अपनी बात पर ही यक़ीन नहीं हो रहा था। हर माँ दूसरों से यही सवाल पूछ रही थी, बेचैनी उनको भी हो रही थी लेकिन जवाब किसी के भी पास नहीं था। क़स्बों और गाँव के युवक और युवतियाँ भी परेशान थीं, चाँद में दिखाई देने वाला उनका महबूब भी नदारद था।
उधर शहर से काफ़ी दूर एक गाँव में, जहाँ आज भी बिजली नहीं आई थी, वहाँ रात को लगभग ८ बजे सभी बड़े और बुज़ुर्ग इकट्ठा हुए। चाँद का दिखाई नहीं देना उनके लिए भी एक बड़ा और मुश्किल सवाल बन गया था। उन सबके ज़हन में बस एक ही बात थी कि न तो अमावस्या है और न ही बदली छाई हुई है, फिर आख़िर ये चाँद क्यों नहीं दिखाई दे रहा।
"मेरी ज़िन्दगी तो अब लगभग समाप्ति की तरफ़ बढ़ रही है लेकिन मैंने आज तक ऐसा नहीं देखा। यहाँ तक कि मैंने अपने पिता या दादा से भी कभी ऐसी बात नहीं सुनी कि इस समय में चाँद नहीं दिखाई दे", गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति ने आसमान की तरफ़ हैरानी से देखते हुए कहा।
वहाँ उपस्थित बाक़ी लोगों के दिमाग़ में भी कमोबेश यही बात आ रही थी। उन्होंने भी आज तक ऐसा न तो देखा था और न सुना था। उनमें से एक और बुज़ुर्ग, जो अपने समय में कुछ कक्षा तक पढ़े थे, ने अपनी बात रखी "हाँ मैंने तो कुछ किताबें भी पढ़ रखी है लेकिन उनमें भी कभी ऐसा प्रसंग पढ़ने को नहीं मिला कि चाँद ऐसे ग़ायब हो गया हो। मुझे तो किसी बड़ी अनहोनी की आशंका नज़र आ रही है"।
ये बात भले किसी ने अभी तक नहीं कही हो लेकिन सबके दिमाग़ में यही बात घूम रही थी। अंदर ही अंदर सबको इसी बात का भय सता रहा था कि हो न हो, ज़रूर कोई अनहोनी घटने वाली है। कुछ देर तक एक ख़ामोशी छाई रही और हर आदमी कभी आसमान तो कभी सामने बैठे लोगों को देख रहा था। लेकिन आज की सभा में मौजूद पंडित रामदयाल के हिसाब से बात कुछ और ही थी। इस मसले पर आज से पहले जब भी उन्होंने अपनी बात रखने की कोशिश की थी, लोगों ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था। वैसे भी उनके चरित्र के बारे में उनको छोड़कर पूरे गाँव को पता था और सिवा मज़बूरी अब कोई भी उनको अपने दरवाज़े पर बुलाना नहीं चाहता था। लेकिन आज उनको लगा कि इस मौक़े को वह अपने पक्ष में भुना सकते हैं तो उन्होंने गला खँखारकर बोलना शुरू किया "देखिए इस बात के पीछे कई वजहें हैं जिनको अब आप लोगों को मानना ही पड़ेगा, आख़िर जब धर्म का इतना नाश होगा तो भगवान कितने दिन चुपचाप देखेगा। जिसे देखो वही आजकल धर्म विरुद्ध बातें कर रहा है और अगर मैं कुछ कहता हूँ तो आप लोग मेरे ही ख़िलाफ़ हो जाते हैं", इतना कहकर पंडित थोड़ा रुके और सरसरी निगाह से सबके चेहरे का जायज़ा लेने लगे।
कोई और समय होता तो लोग उनको अनसुना कर देते लेकिन इस समस्या की वजह किसी को पता नहीं थी तो हर व्यक्ति संशय में था। और जब वजह पता नहीं चले तो आदमी भगवान के सामने समर्पण कर ही देता है। एक बुज़ुर्ग ने पंडित से पूछा "चलिए पंडीजी, आप ही बताइए कि ऐसा क्यों हो रहा है और उसका समाधान क्या है?"
रामदयाल को समझ में आ गया कि आज जो मौक़ा मिला है उसे जाया नहीं करना है और जहाँ तक हो सके इसका फ़ायदा उठाना है। उन्होंने अपनी बोली में गंभीरता घोलते हुए कहना शुरू किया "अच्छा बाबा आप ही बताइए, आप तो गाँव में सबसे बुज़ुर्ग हैं और आपने पहले का समय भी देखा है। क्या पहले भी इसी तरह लोग पूजा-पाठ से अलग रहते थे?
बाबा कुछ बोलें उसके पहले ही पंडित रामदयाल ने अपनी बात आगे बढ़ाई "जहाँ तक मुझे पता है, पूरे गाँव में साल भर कहीं-न-कहीं रामायण और सत्यनारायण का पाठ चलता रहता था। और हर त्योहार पर मंदिर के साथ-साथ आप लोगों के घर भी देवता वास करते थे। और आज क्या हो रहा है, यह आप सबको पता है, न तो कहीं रामायण और न कही कोई और पूजा-पाठ"।
गाँव के सभी लोग न चाहते हुए भी इस बात को मानने के लिए तैयार हो गए, अंदर ही अंदर उनको भी इसमें ईश्वरीय कोप नज़र आ रहा था। सारे लोग पंडित की तरफ़ देख रहे थे और इंतज़ार कर रहे थे कि वह अपनी बात ख़तम करें और कुछ उपाय बताएँ।
पंडित अब आराम से पालथी मारकर बैठ गए और अपनी बात आगे बढ़ाई "गाँव के पोखरे के पास वाले मंदिर की देखभाल हमेशा से हमारे बाप-दादा ही करते आ रहे थे लेकिन आप लोगों ने मुझे वहाँ से हटा दिया। अब भगवान की देखभाल नहीं होगी तो वह कुपित तो होंगे ही"।
पंडित की इस बात से वहाँ बैठे लोगों को क्रोध तो आया लेकिन समय की नज़ाकत को पहचानकर लोग चुप ही रहे। सबको पता था कि पंडित की नज़र मंदिर के चारो तरफ़ की ग्राम समाज की ज़मीन पर थी जहाँ वह बसना चाह रहा था। लेकिन ग्राम सभा ने पंडित को वहाँ सिर्फ़ सुबह एक बार पूजा कराने की ही इजाज़त दी थी।
"पुराने समय में निचली जातियों को आख़िर क्यों गाँव से बाहर बसाया गया था और उनका काम सिर्फ़ हमारे यहाँ मेहनत मज़दूरी करना था? हर चीज़ के पीछे भगवान की मर्ज़ी थी और इतने सालों से सब कुछ ठीक से ही तो चल रहा था। लेकिन आजकल तो न जातिभेद है और न कोई छुआछूत, तो यह सब तो होना ही है", पंडित ने अपनी बात समाप्त की और बैठ गया।
गाँव में थोड़ा-बहुत फ़र्क़ तो आया ही था, शिक्षा के प्रसार और लोगों में बढ़ती जागरूकता के चलते अब पहले जैसी ग़ुलामी नहीं थी कि निचली जात वालों को बिना पैसे दिए कोई मज़दूरी करा ले। और ऊपर से चुनाव के समय कुछ बातें शहर से यहाँ भी आ जातीं और चुनाव के परिणाम आने के कुछ समय बाद तक चलतीं। फिर वापस यहाँ का जीवन अपने ढर्रे पर आ जाता और लोग किसी तरह दाल रोटी के सहारे अपना जीवन खींचने में अगला पाँच साल ख़र्च कर देते।
"तो क्या उपाय है इसका पंडितजी, आप ही बताइए", कई लोगों ने एक साथ कहा तो पंडित का चेहरा खिल गया।
"पूजा-पाठ करना होगा और भगवान को प्रसन्न करना होगा, तभी इस गंभीर समस्या से बच पाएँगे हम लोग। मैं कल बताता हूँ कि क्या करना होगा", पंडित ने कहा और उठ गया। वहाँ बैठे बाक़ी लोग भी उठ गए और पंडित की बात मानने के सिवा उनके पास उस समय कोई चारा नहीं बचा।
उधर तारे भी परेशान होकर भगवान के पास गए और उनको अपना दर्द बताया "प्रभु, आजकल चन्द्रमा पता नहीं कहाँ गुम हो गए हैं, पिछले छह रात से आ ही नहीं रहे हैं। अब न तो आसमान में चाँदनी दिखाई देती है और न हम सब, नीचे धरती पर भी बच्चे और उनकी माताएं हैरान परेशान हैं। हमें तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है भगवन्, आप ही कुछ करें और चन्द्रमा को वापस बुलाएँ"।
भगवान ख़ामोश थे, उनके चेहरे पर भी परेशानी पढ़ी जा सकती थी। जब वह कुछ देर तक सोचते रहे और उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया तो तारे फिर बोल पड़े "आप तो सर्वज्ञाता हैं प्रभु, आपको तो पता ही है कि आख़िर चन्द्रमा क्यों नहीं दिखाई दे रहे। अब आप ही कुछ कीजिए वरना हम सब भी ख़त्म हो जाएँगे"।
प्रभु ने अब अपना सर उठाया और तारों की तरफ़ देखकर उन्होंने बोलना शुरू किया "हाँ मैं सर्वज्ञाता हूँ और मुझे यह भी पता है कि चन्द्रमा कहाँ चले गए हैं। लेकिन कारण इतना जटिल और दर्दभरा है कि अब तो मैं भी विवश हूँ, मैं चाहकर भी चन्द्रमा को नहीं कह पा रहा हूँ कि वह वापस आएँ और पूरे ब्रह्मांड में चाँदनी और उजाला फैलाएं"।
तारे अब और हैरान थे कि आख़िर क्या वजह थी जिसके चलते प्रभु भी चन्द्रमा को नहीं बोल पा रहे हैं। तारों की परेशानी भगवान से छुपी नहीं थी और उन्होंने उनको बताना शुरू किया "आप लोगों को तो पता ही है कि धरती के सभी जीव जंतुओं, पेड़ पौधों और इनसान को मैंने ही बनाया है। और सबके लिए जीने का समान अवसर भी दिया है"।
"हाँ, यह तो हम सबको पता है", तारे एक स्वर में बोल पड़े।
"लेकिन धीरे-धीरे इनसानों ने इस पूरे सिस्टम को अपने फ़ायदे के हिसाब से बदलना शुरू किया और हमारी बनाईं बहुत सी चीज़ें ख़तरे में पड़ गईं"। इतना कहकर भगवान थोड़ा रुके, उनके चेहरे पर दर्द नज़र आ रहा था।
"ख़ैर यह भी इतना बुरा नहीं था जितना बुरा उसने आगे चलकर किया, आख़िर विकास तो करना ही चाहिए। लेकिन इनसानों ने अपने फ़ायदे के चक्कर में अपने आपका ही नुक़सान करना शुरू कर दिया। आप लोग भी तो गवाह हो कि आए दिन भूकंप, बाढ़, सूखा, मौसमों का अजीब तरह से बदलाव, प्रदूषण इत्यादि कितना बढ़ गया है धरती पर और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं", भगवान ने एक गहरी साँस ली।
ये सब बातें तो तारों को भी पता थीं लेकिन इससे वह चाँद के ग़ायब होने का कोई संबंध नहीं जोड़ पा रहे थे। तारे कुछ कहते, इसके पहले ही भगवान ने आगे कहना शुरू किया "लेकिन मैं आप सब को चाँद के छुप जाने की असली वजह बताता हूँ। इसके पहले भी कई बार मुझसे चन्द्रमा ने इस बात की शिकायत की कि मैं इनसान को इनसानों के ऊपर ही ज़ुल्म करने से क्यों नहीं रोकता हूँ। और मैंने उसको समझाया कि इनसान को दिमाग़ इसीलिए दिया है कि वह अपना और समाज का अच्छा बुरा सोच सके। लेकिन अगर इसके बाद भी वह अपने ही समाज का दुश्मन बन जाता है तो मैं क्या कर सकता हूँ। चन्द्रमा मेरे समझाने पर समझ गया और उदास ही सही लेकिन वापस चला गया था"।
भगवान एक बार फिर रुके और साँस लेकर उन्होंने आगे बताना शुरू किया "लगभग दस दिन पहले चन्द्रमा फिर मेरे पास आया और वह बहुत क्रोधित था। मेरे पूछने से पहले ही उसने बताना शुरू किया कि मुझे अब ऐसे संसार में उजाला नहीं फैलाना जहाँ मेरी आँखों के सामने मेरे ही रोशनी में ऐसा अत्याचार किया जाए। पता तो मुझे भी था कि रात में धरती पर चाँद के उजाले में एक लड़की से बलात्कार और फिर उसकी नृशंस हत्या हुई थी। लेकिन मैंने उसे समझाया कि उसका काम उजाला फैलाना है, इनसान की ग़लती पर उसे शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है। वह चला तो गया लेकिन मुझे कहता गया कि अगर ऐसा ही होता रहा तो शायद वह इस ब्रह्मांड से चला जाएगा।
"और छह दिन पहले जो हुआ वह तो आप सब को भी पता है, उसी चाँदनी रात में एक तीन साल की लड़की से दरिंदों ने सामूहिक बलात्कार किया और फिर उसको मौत के घाट उतार दिया। उधर धरती पर यह घटना हुई और चाँद आधी रात को ही ब्रह्माण्ड छोड़कर चला गया, अब वह मेरे कहने पर भी वापस नहीं आएगा", भगवान की आवाज़ में थकान थी।
तारे स्तब्ध थे, सारा आकाश ख़ामोश और हवाएँ भी जैसे चलना भूल गई थीं। अचानक ज़ोर से बारिश होनी शुरू हुई और धरती कई घंटे तारों के आँसुओं से भीगती रही। इनसान को लगा जैसे मानसून समय से पहले ही आ गया, लेकिन इसके बावजूद भी चाँद का कहीं पता नहीं था।
लेकिन इस संसार को तो चलाना ही था इसलिए भगवान ने एक तारे को चाँद जैसा बना दिया। लेकिन अब बात वह नहीं रह गई थी जो पहले हुआ करती थी, चाँदनी की शीतलता, सफ़ेदी और ख़ूबसूरती जैसे ग़ायब हो गई है। अब असली चाँद होता तो असली चाँदनी भी होती, बहरहाल अब आकाश पर चाँद तो निकलता है, चाँदनी भी होती है, लेकिन वह धूमिल होती है। अब आप ही बताइए, क्या आपने आसमान पर वही पुराना चाँद देखा है जो आप कुछ महीनों पहले देखा करते थे। आप सच सच बताईयेगा, अब वह नहीं दिखता है न।

Tuesday, October 9, 2018

मुर्दा परम्पराएँ- कहानी

अब जोखू की आँख के आँसू सूख गए थे, आख़िर कितनी देर बहते। आँगन में पिताजी का शव एक तरफ़ सफ़ेद चादर से ढंककर रखा था और उसके चारो तरफ़ जल रही अगरबत्तियों की तेज़ गंध चारो तरफ़ फैली हुई थी। अभी दो दिन पहले ही तो पड़ोस के गाँव के डॉक्टर देखकर गए थे और उन्होंने कुछ दवाएँ दी थीं। अब डॉक्टर भी थे तो झोलाछाप ही लेकिन उनके दवा से फ़ायदा हो जाता था। ऐसे में शहर जाकर और बहुत ज़्यादा पैसा लगाकर मरीज़ को दिखाने की हिम्मत बहुत कम लोग ही कर पाते थे। जोखू को भी यही लगा कि मौसम बदला है और उसीका असर है, एकाध दिन में ठीक हो जाएगा। वह घर का इकलौता लड़का था, पिताजी के सब भाई अलग-अलग रहते थे और उनको किसी से कुछ ख़ास लेना देना नहीं था। परिवार में एक बुआ थी और एक बहन भी जो अपने-अपने घरों में कमोबेश उसी अवस्था में थीं। छोटी-सी खेती थी जिसे न छोड़ते बनता था और न वह सबका पेट ही भर पाती थी। एक किसान जिस चक्रव्यूह में फँसा अपना पूरा जीवन बिता देता है, वह भी उसी चक्रव्यूह में अटका था। ऐसे में पिता के रहने से वह बहुत सी चिंताओं से मुक्त रहता था लेकिन उनकी अचानक हुई मौत से वह टूट गया। आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही, पहले माँ और अब पिताजी भी, वह एकदम से बड़ा हो गया।
"जोखू, तुम चिंता मत करना, सारा किरिया करम मैं सँभाल लूँगा, तुम हिम्मत रखो", चाचा ने आकर उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसकी रुकी हुई रुलाई फिर से फूट पड़ी। चाचा ने भी उसे थोड़ी देर रो लेने दिया, उनको अनुभव था कि कुछ देर में वह सामान्य हो जाएगा।
धीरे-धीरे पूरे गाँव में ख़बर हो गई थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया। चाचा घर पर अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए। पंडित को बुलाया गया और बाँस की सीढ़ी बनवाने के लिए एक आदमी गाँव के बाहर बँसवारी की तरफ़ निकल गया। चूँकि शाम का समय हो गया तो सबने राय दी कि दाह-संस्कार के लिए कल ले जाना ही ठीक रहेगा, वैसे भी सूर्यास्त के बाद दाह-संस्कार नहीं किया जाता है।
"अब रात होने को आ रही है इसलिए लाश को कल ही घाट पर ले जाएँगे, सुबह तक कुछ रिश्तेदार भी आ जाएँगे। बाक़ी इंतज़ाम मैं देखता हूँ, तुम घर में सबको देखो", चाचा ने उसको समझाया।
उसे भी यही उचित लगा क्योंकि रात में और रिश्तेदार भी आ ही जाएँगे। अब पिताजी की तबीयत ज़्यादा ख़राब रही होती या कुछ दिन से लगातार बीमार रहे होते तो शायद बहुत से रिश्तेदार पहले ही देखने आए होते। लेकिन एकदम से चले गए तो आख़िरी वक़्त में कोई देख भी नहीं पाया।
उसकी रात आँखों-आँखों में ही कटी, ऐसे में नींद भी भला कैसे आती और सुबह के पाँच बजते बजते बुआ और बहन भी आ गईं। उनके आते ही एक बार फिर से रोना पीटना शुरू हो गया। एक अजीब-सी परंपरा है कि गाँव में चाहे शादी ब्याह हो या मरनी करनी, महिलाएँ उस संदर्भ में कुछ गीत गाकर ही अपना सुख या दुख प्रकट करती हैं। यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी अनवरत चालू है और ये गीत कब पिछली पीढ़ी की औरतें नई पीढ़ी को दे देती हैं, पुरुषों को तो पता भी नहीं चलता है। काफ़ी देर तक तमाम ऐसे गीत रोते हुए गाकर बुआ और बहन पिताजी को याद करती रहीं। उसकी पत्नी, अड़ोस-पड़ोस की औरतें भी रोने की आवाज़ सुनकर साथ देने और ढाढस बढ़ाने आ गईं। चाचा भी आ गए और उन्होंने लगभग डाँटते हुए कहा "अब बस भी करो सब लोग, कितना रोना-धोना करोगे। जोखू अब हम लोग चलने की तैयारी करते हैं"।
कुछ देर में ही पूरब से सूरज देवता निकले, आज उस जगह सब थे, बस पिताजी नहीं थे उनको देखने के लिए। उसे याद आया, शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब वह सूर्योदय से पहले नहीं जगा हो। पिताजी इन बातों में नियम क़ानून के बहुत पक्के थे और उनका स्पष्ट मानना था कि जिस घर में लोग सूर्योदय के बाद उठते हैं, लक्ष्मी उस घर से रूठ जाती हैं। ये अलग बात थी कि उसके आज तक रोज़ सुबह उठने के बाद भी लक्ष्मी क्यों रूठी हुई थीं, उसे कभी पता नहीं चला। पिछली बार खेत का एक टुकड़ा माँ के गुज़रने पर बिक गया था और अब पिताजी उसका अफ़सोस लिए ही परलोक सिधार गए।
"जोखू, ज़रा किसी को परधान के दरवाज़े भेजो ट्रैक्टर भेजने के लिए, समय से निकल चलेंगे तो सब जल्दी निपट जाएगा", चाचा ने फिर आवाज़ लगाई तो जोखू ने रग्घू को प्रधान के घर भेज दिया।
अगल-बगल से लोग जुटने शुरू हो गए और शव को जल्दी से घाट ले चलने की आवाज़ हर तरफ़ से आने लगी। गाँव के प्रधान के घर से ट्रैक्टर ट्रॉली के साथ दरवाज़े पर आ गया। शव को ट्रैक्टर पर रखा गया और उसके साथ ही एक बार फिर से रोना-धोना शुरू हो गया। गाँव के कुछ लोग ट्रैक्टर पर उसके साथ बैठ गए। बाक़ी लोग अपनी मोटरसाइकिल और साइकिल से ट्रैक्टर के साथ-साथ चल पड़े। हर गाँव की तरह उसके गाँव के लोगों का अंतिम संस्कार भी एक पूर्व निश्चित घाट पर ही होता था। गंगा नदी के किनारे स्थित वह घाट गाँव से क़रीब २० किमी दूर था।
पहले के ज़माने में तो लोग पैदल ही शव को कंधे पर उठाए घाट पहुँच जाते थे और उसे भी कई शवयात्राएँ याद थीं जिसमें वह भी पैदल ही घाट तक गया था। गाँव के कुछ मज़बूत लोग अधिकांश समय शव को अपने कंधे पर ही लेकर जाते थे। लेकिन अब तो साधन उपलब्ध थे इसलिए घाट पर पहुँचने में आसानी हो जाती थी। गाँव से निकलने के बाद धीरे-धीरे लोग शवयात्रा में जुड़ते गए और कुछ रिश्तेदार तो सीधे घाट पर ही पहुँच गए थे। लगभग ११ बजे ट्रैक्टर और बाक़ी वाहन घाट पर पहुँचे और लोग शव को उतारकर गंगाजी में स्नान के लिए ले जाने लगे। समय के साथ-साथ सरकार ने विद्युत् शवदाहगृह भी बनवा दिया है लेकिन लोगों के दिमाग़ में उसका ख़याल ही नहीं आता था। समाज के दबाव और पंडितों के समझाने के चलते लोग अक्सर विद्युत् शवदाहगृह का उपयोग नहीं करते और दिन में एकाध बार ही वह इस्तेमाल होता था। ऐसी तमाम पुरानी परम्पराएँ भला इतनी आसानी से कहाँ छूटती हैं, चाहे अब उन्होंने बदलते समय के साथ अपना अर्थ ही खो दिया हो। कितनी लकड़ियाँ बच सकती हैं विद्युत शवदाहगृह के इस्तेमाल से लेकिन इस दिशा में सोचने वाले आज भी कम ही हैं। घाट पर एक किनारे एक बोर्ड भी लगा हुआ था कि मृत्यु का पंजीकरण कराना अनिवार्य है लेकिन वह बोर्ड भी अपने अस्तित्त्व के लिए संघर्ष कर रहा था।
उनके घाट पर पहुँचते ही कुछ पंडो ने आख़िरी क्रियाकर्म के लिए घेरा। दरअसल दूरदराज़ से आए लोग अपने साथ पंडित नहीं लाते थे जिसके चलते घाट के पण्डे ही सब काम कराते थे। लेकिन गाँव के बुज़ुर्गों ने उन्हें समझा दिया कि गाँव के पण्डे आए हैं सब करने के लिए। चार लोगों ने शव को गंगाजी में डुबकी लगाकर किनारे रख दिया और इस बीच उसके चाचा लकड़ियों के इंतज़ाम के लिए चल दिए। जैसे ही चाचा लकड़ी की टाल की ओर बढ़े, कई दुकानदारों ने उनको घेर लिया। लकड़ियों के बारे में वे इस तरह से बता रहे थे जैसे वह जलाने के लिए नहीं बल्कि किसी की शादी में बेड बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली हो। ख़ैर एक लकड़ी वाले से बात तंय हुई और उसने शव के वज़न के हिसाब से कितनी लकड़ी लगेगी बताया। गाँव के कुछ बुज़ुर्ग, जिनको इन सब का पुराना अनुभव था, उन्होंने थोड़ा कम करवाया और फिर कुछ लोगों ने लकड़ियों को तौलवाना शुरू किया। अधिकांश लकड़ियाँ या तो गीली थीं या हरी, बड़ी मुश्किल से कुछ सूखी लकड़ियाँ मिलीं। साथ ही साथ चन्दन की लकड़ी के कुछ टुकड़े भी ले लिए गए। एक बोर्ड वहाँ पर भी लगा हुआ था जिसपर लकड़ी का मूल्य अंकित था लेकिन वह भी अपना मूल्य खो चुका था। शवदाह से सम्बंधित बाक़ी सब सामान भी ले-लिया गया और घाट पर मौजूद नाई ने जोखू के सर के बाल मूड़ दिए। शव को जलाने के लिए आग लेने उनको डोमराज के पास ही जाना था और वह चाचा के साथ चल पड़ा। आग देने के लिए भी डोमराज ने बड़ा-सा मुँह खोला, पहले ५००० की माँग की फिर किसी तरह उनको ५०० में तैयार किया गया।
शव को चिता पर लिटाकर उसको लकड़ियों से ढँक दिया गया। चिता की लकड़ियों को इस तरह से जलाना कि शव पूरी तरह से जल जाए, यह भी एक कला है जिसके कुछ जानकार हर गाँव में होते हैं। उसने जैसे ही चिता में आग लगाई, गाँव के दो लोग आगे आए और उन्होंने चिता जलाने की ज़िम्मेदारी बख़ूबी सँभाल ली। लकड़ियों को ऊपर-नीचे करके और बीच-बीच में जलते हुए शव को भी उलट-पलट कर उन लोगों ने अपना काम पूरी तसल्ली से पूरा किया। इस बीच बाक़ी सब लोग जगह-जगह बैठकर आपसी चर्चा में मसगूल थे, उसको छोड़कर शायद ही किसी के चेहरे पर दुख की कोई परछाई नज़र आ रही थी।
अगले तीन घंटे में दाह-संस्कार निपट गया, डोम ने चिता में से बची हुई अस्थियाँ निकालकर दे दीं और उनको उसने गंगाजी में प्रवाहित कर दिया। उसके बाद उसने नदी के पानी में दो-चार बार डुबकी लगाई। फिर घाट पर उपस्थित सभी लोगों ने एक-एक बार नदी के मटमैले पानी में डुबकी लगाई और फिर सब वापस चलने की तैयारी करने लगे।
"चलो सब निपट गया जोखू, अब कुछ नास्ता पानी करा दिया जाए सबको", चाचा ने अपना गमछा कंधे पर डालते हुआ आवाज़ लगाई। जोखू भारी मन से घाट से उठा, पिताजी की अब कोई निशानी वहाँ शेष नहीं थी। अपने आँखों के किनारे आए आँसुओं को उसने पोंछा और गाँव के लोगों की तरफ़ बढ़ गया।
एक परंपरा यह भी सदियों से चली आ रही थी कि शवदाह के बाद जितने लोग घाट पर रहते हैं उनको जलपान कराना पड़ता है। अब कोई बहुत बुज़ुर्ग चल बसा हो तो फिर भी बहुत अटपटा नहीं लगता लेकिन जब किसी के घर कोई जवान या बच्चा गुज़र जाता है तो ऐसे में यह जलपान कई लोगों को बेहद ख़राब लगता था। लेकिन जब भी किसी ने इसका विरोध करने की कोशिश की, लोगों ने उन्हें अपनी परंपरा के नाम पर चुप करा दिया। एक व्यक्ति को तो लोगों ने यह तक कह दिया कि चूँकि उसके घर के एक बुज़ुर्ग बहुत बीमार हैं इसलिए वह ऐसी बातें कर रहा है। इसके चलते अब बहुत कम लोग ही इसका सबके सामने विरोध करते हैं, हाँ जिन्हें जलपान करना नहीं अच्छा लगता वह घाट से चुपचाप चले जाते हैं।
एक किनारे गाँव के बुज़ुर्ग चाचा के साथ बहस में लगे हुए थे कि किस मिठाई की दुकान पर जलपान किया जाएगा। बात बड़ी-बड़ी दुकानों से होते हुए रास्ते में पड़ने वाली एक दुकान पर तंय हुई और सबको बता दिया गया कि वहाँ पहुँच जाएँ। अपनी-अपनी गाड़ियों से थोड़ी देर में सब वहाँ इकट्ठा हुए। कुछ देर तक कौन सी मिठाई होगी और समोसा कितने होंगे इसपर बहस चलती रही। दुकानदार भी स्थिति समझकर अपनी राय दे रहा था और थोड़े समय में नाश्ते का मेनू फ़ाइनल हुआ। फिर तो सबने कुछ इस अंदाज़ में जमकर नाश्ता किया, गोया किसी के तिलक में आए हों। दो के बदले चार मिठाई खाना, समोसा भी दो-तीन खा लेना वह भी ऐसी परिस्थिति में, लोग पता नहीं कैसे कर पाते हैं यह सब। ऊपर से कुछ लोग तो घर के लिए भी यह कहते हुए मिठाई समोसे बंधवा लिए कि आज तो घर में कुछ बनेगा नहीं तो यहीं से ले जाते हैं। शायद अगर वह अपना घुटा सर लेकर वहाँ नहीं होता तो दुकान में मौजूद अन्य लोग अन्दाज़ा भी नहीं लगा पाते कि ये लोग शवदाह करके नाश्ता कर रहे हैं। भर-पेट नाश्ता करके सब लोग अपने-अपने वाहन से निकल पड़े, वह भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा। घर में मौजूद लोगों के लिए भी चाचा ने नाश्ता ले-लिया गया था, क्योंकि फ़िलहाल तो घर पर चूल्हा नहीं जलना था।
घर पहुँचकर कुछ देर में सब लोग अपने-अपने घर की तरफ़ निकल गए और जोखू अपने घुटे सर और शरीर पर लपेटी धोती के साथ एक चौकी पर बैठ गया। जिस व्यक्ति ने आग दी होती है उसे खटिया पर नहीं बैठना होता है, इसीलिए पहले से ही उसकी चौकी बाहर लग गई थी। थोड़ी देर बाद चाचा ने उसको सारे ख़र्च का ब्यौरा दिया तो वह धम्म से सर पकड़कर बैठ गया। सिर्फ़ शवदाह और जलपान में जितने रुपये ख़र्च हुए थे, उतने का इंतज़ाम भी उसके लिए तत्काल संभव नहीं था। अभी तो अगले तेरह दिन तमाम कर्मकांड होने थे और उसके बाद ब्राह्मणभोज जिसमें पूरे गाँव को और रिश्तेदारों को भी खिलाना था। उसे लगने लगा जैसे उसके बचे हुए थोड़े-से खेत भी पिताजी के साथ गुज़र गए हैं और वह बिल्कुल बेआसरा हो गया है।

Saturday, October 6, 2018

रिश्तों की चिता-- लघुकथा

चिता पर चाचाजी का शरीर लकड़ियों से ढंका हुआ पड़ा था और उसको आग लगाने की तैयारी चल रही थी. चाचाजी उम्र पूरा करके गुजरे थे इसलिए घर में बहुत दुःख का माहौल नहीं था लेकिन उनकी सेहत के हिसाब से अभी कुछ और साल वह सामान्य तरीके से जी सकते थे.  अभी भी सारा परिवार एक में था इसलिए पूरा घर वहां मौजूद था. चचेरे भाई ने चिता जलाने के लिए जलती फूस को हाथ में लिया और चिता के चारो तरफ चक्कर लगाने लगा.
कुछ ही पल में चिता ने आग पकड़ ली और वह एक किनारे से एकटक जलती चिता को देखता रहा. चाचाजी से पिछले कई सालों से उसकी बातचीत बंद थी और उनके जिद्दी स्वभाव के चलते आपस में रिश्ता सुधरने की कोई गुन्जाईस भी नहीं थी. घर के लोगों के साथ साथ उसने भी शुरू के सालों में उनके साथ सम्बन्ध सुधारने की कोशिश की लेकिन हर बार बात और खराब होती गयी. सब लोग उसे समझाते कि चाचाजी का स्वभाव ही ऐसा है, उनकी सोच के उलट कुछ भी करने की मत सोचो. लेकिन उसे आत्मसम्मान को लगी ठेस ने उसे उनसे बहुत दूर कर दिया.
आग पूरा जोर पकड़ चुकी थी और अब चाचाजी का जलता शरीर उसे दिखाई दे रहा था. उसके मन में भी चाचाजी को लेकर जो विरोध था, उसपर धीरे धीरे मंथन चल रहा था. अचानक चटाक की आवाज आयी, उसने देखा आग से कोई हड्डी चटक कर टूट गयी. एकदम से उसकी आंख में पानी आ गया, उसके मन में जमी हुई बर्फ भी चटक गयी. धीरे से उसने जलती हुई चिता की तरफ अपने हाथ जोड़े और वापस घरवालों की तरफ चल दिया.

Wednesday, October 3, 2018

अपराधबोध-लघुकथा

ट्रैफिक सिग्नल की बत्ती लाल हो गयी थी तो उसने ब्रेक लगाया और बाहर देखने लगा. जाने और आने वालों की दो दो लेन थी और हर आदमी ने अपनी गाड़ी थोड़े थोड़े फासले पर खड़ा कर रखी थी. जोहानसबर्ग की यह बात उसे बेहद पसंद थी कि अमूमन हर व्यक्ति कानून का पूरी तरह से पालन करता था और शायद ही कभी लाल बत्ती पर सड़क पार करता था. हॉर्न बजाना तो बेहद असभ्यता की बात मानी जाती थी और किसी की गलती को जताने के लिए ही लोग हॉर्न बजाते थे.
रोज की तरह ही वह अफ़्रीकी नवयुवक, जिसे वह शक्ल से पहचानता था, लेकिन कभी उसने उसका नाम भी नहीं पूछा था, आकर चुपचाप उसके बगल में खड़ा हो गया. अक्सर उसकी गाड़ी इस सिग्नल पर रूकती और वह नवयुवक आकर मुस्कुराते हुए उसके बगल में खड़ा हो जाता. कभी भी उसने न तो मांगने के लिए आवाज लगायी और न ही उसके शीशे पर नॉक किया. बस लोगों की देखा देखी वह भी उसको कुछ रैंड दे देता था.
आज पता नहीं उसे कुछ देने का मन नहीं किया, शायद किसी बात पर अपसेट था. ६० सेकेण्ड वाले सिग्नल का काउंट डाउन चल रहा था और वह युवक सिग्नल पर नजर डालते हुए चुपचाप खड़ा था. लगभग १० सेकेण्ड बचे थे तभी उसकी नजर उस नवयुवक से मिली और ऐसा लगा जैसे उसकी ऑंखें शिकायत कर रही हों.
सिग्नल हरा हुआ और वह उस युवक से नजरें बचाते हुए झटके से आगे बढ़ गया. रास्ते भर उसे अजीब सी बेचैनी महसूस होती रही, ऐसा लग रहा था जैसे उसने किसी का हक़ मार दिया हो.

क्षोभ - लघुकथा

वह भीख मांगने वाला बूढ़ा बड़ी देर से उस घर का दरवाजा खटखटा रहा था. कमोबेश रोज उसे उस घर से कुछ न कुछ मिल ही जाता था लेकिन आज अभी तक दरवाजा नहीं खुला था. इतनी देर में बगल वाले घर से एक औरत निकली और उसने बूढ़े को बुलाकर कुछ खाने के लिए दे दिया.
बेचन अपने घर के अहाते से यह सब देख रहा था, पतली सी सड़क के उस पार दोनों घर थे. अब उसे भी अब कहीं आना जाना नहीं होता था तो अहाते में पड़ा पड़ा यह सब देखा करता था. जिस घर से बूढ़े को कभी कभार कुछ मिलता था, आज वहां से मिल गया और बूढ़ा बहुत खुश था. लेकिन जब काफी देर तक दूसरे घर से कोई नहीं निकला तो बूढ़ा बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ गया.
जाते समय उसकी आवाज बेचन के कानों में गूंज रही थी "आज उस घर से भी खाने को मिल गया लेकिन मरे रोज वाले ने तो दरवाजा ही नहीं खोला".

साफ़ सफाई- लघुकथा

गाँववालों की भीड़ इकठ्ठा हो चुकी थी, उनको भी पता था कि जब किसी गाड़ी में लोग आते हैं तो कुछ न कुछ बांटते हैं. गाड़ी में से कुछ पैकेट निकाले जा रहे थे और चारो तरफ खड़े लोगों में से कई निगाहें बड़ी हसरत से उन्हें निहार रही थीं.
कुछ समय बाद छोटा सा मंच सज गया और गाड़ी से आये कुछ लोगों ने गांववालों को समझाना शुरू किया "सफाई बहुत जरूरी है चाहे वह घर की हो या अपने शरीर की. आप लोग आज से यह प्रण कीजिये कि आगे से सफाई का पूरा ध्यान रखेंगे. आज हम लोग स्वछता से सम्बंधित सामग्री वितरित करेंगे".
बीमार और कमजोर रग्घू भी पोते के सहारे चला आया था कि कुछ तो मिल ही जायेगा. जैसे ही पैकेट बाँटने शुरू हुए, एक और व्यक्ति ने ऊँची आवाज़ में कहा "और खाना खाने के पहले भी अपने हाथ साफ़ करना बहुत जरुरी है वर्ना गन्दगी पेट में चली जाती है और बीमार बना देती है".
रग्घू के कानों में अचानक खाना शब्द सुनाई दिया और उसकी आँखों में एक चमक दौड़ गयी. उसने अपने सूखे होठों पर जीभ फेरी और अगले ही पल वह पोते का हाथ पकडे भीड़ में पूरी ताक़त से घुस गया.