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Monday, October 15, 2018

फिर चाँद ने निकलना छोड़ दिया-कहानी

पूरा देश स्तब्ध था और बेतरह परेशान भी, वजह ही कुछ ऐसी थी। कभी ऐसा हुआ ही नहीं था और न ही किसी ने कहीं क़िस्से कहानियों में ऐसा पढ़ा था। शायद विदेशों में भी लोग परेशान होंगे लेकिन फ़िलहाल बात अपने देश की ही कर रहा हूँ। अपने देश में भी बात धीरे-धीरे सबकी निगाह में आ गई, शुरूआत तो दरअसल अपने शहर से ही हुई थी।
यह लगातार छठवां दिन था और आसमान में चाँद के दर्शन नहीं हुए थे। वैसे तो इस मौसम में चाँद और उसकी चाँदनी अपने पूरे शबाब पर होती है। और जैसे-जैसे रात जवान होती है, वैसे वैसे निहायत ख़ूबसूरती और नज़ाकत से चाँदनी का उजाला धरती पर सनै सनै फैलने लगता है। मगर अब ऊपर आसमान में सितारे भी परेशान थे कि वह कैसे चमकेंगे, आख़िर वे भी तो अपनी चमक चाँद से ही उधार लिया करते थे।
शहरों में तो शायद बच्चों को बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था, उनको वैसे भी आसमान का चाँद दिखाई कब पड़ता है। छोटे-छोटे दड़बेनुमा घरों में रहने वाले बच्चों को तो खुला आसमान भी नसीब नहीं होता, चाँद तो सिर्फ़ किताबों और टी।वी पर ही देखा होता है उन्होंने। न ही उनको हरियाली दिखती है और न ही पक्षियों का कलरव सुनाई पड़ता है। बचपन का असली आनंद न ले पाने के लिए अभिशप्त ये शहरी बच्चे दरअसल अपने पूर्वजों के लालच की क़ीमत अनजाने में चुका रहे होते हैं। लेकिन क़स्बों और गाँवों में बच्चे भी बड़ों के साथ-साथ बेहद हैरान परेशान थे। उनको तो खुले आसमान में अक्सर चाँद को देखने की आदत थी, और इसी वजह से कितने ही बच्चे अपनी माँ को तंग करने लगे कि आख़िर उनका चंदा मामा क्यों नहीं दिखाई देता आजकल। एक-दो दिन तो उन्होंने बच्चों को समझाया कि चंदामामा कहीं घूमने गए हैं लेकिन तीसरे दिन उनको अपनी बात पर ही यक़ीन नहीं हो रहा था। हर माँ दूसरों से यही सवाल पूछ रही थी, बेचैनी उनको भी हो रही थी लेकिन जवाब किसी के भी पास नहीं था। क़स्बों और गाँव के युवक और युवतियाँ भी परेशान थीं, चाँद में दिखाई देने वाला उनका महबूब भी नदारद था।
उधर शहर से काफ़ी दूर एक गाँव में, जहाँ आज भी बिजली नहीं आई थी, वहाँ रात को लगभग ८ बजे सभी बड़े और बुज़ुर्ग इकट्ठा हुए। चाँद का दिखाई नहीं देना उनके लिए भी एक बड़ा और मुश्किल सवाल बन गया था। उन सबके ज़हन में बस एक ही बात थी कि न तो अमावस्या है और न ही बदली छाई हुई है, फिर आख़िर ये चाँद क्यों नहीं दिखाई दे रहा।
"मेरी ज़िन्दगी तो अब लगभग समाप्ति की तरफ़ बढ़ रही है लेकिन मैंने आज तक ऐसा नहीं देखा। यहाँ तक कि मैंने अपने पिता या दादा से भी कभी ऐसी बात नहीं सुनी कि इस समय में चाँद नहीं दिखाई दे", गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति ने आसमान की तरफ़ हैरानी से देखते हुए कहा।
वहाँ उपस्थित बाक़ी लोगों के दिमाग़ में भी कमोबेश यही बात आ रही थी। उन्होंने भी आज तक ऐसा न तो देखा था और न सुना था। उनमें से एक और बुज़ुर्ग, जो अपने समय में कुछ कक्षा तक पढ़े थे, ने अपनी बात रखी "हाँ मैंने तो कुछ किताबें भी पढ़ रखी है लेकिन उनमें भी कभी ऐसा प्रसंग पढ़ने को नहीं मिला कि चाँद ऐसे ग़ायब हो गया हो। मुझे तो किसी बड़ी अनहोनी की आशंका नज़र आ रही है"।
ये बात भले किसी ने अभी तक नहीं कही हो लेकिन सबके दिमाग़ में यही बात घूम रही थी। अंदर ही अंदर सबको इसी बात का भय सता रहा था कि हो न हो, ज़रूर कोई अनहोनी घटने वाली है। कुछ देर तक एक ख़ामोशी छाई रही और हर आदमी कभी आसमान तो कभी सामने बैठे लोगों को देख रहा था। लेकिन आज की सभा में मौजूद पंडित रामदयाल के हिसाब से बात कुछ और ही थी। इस मसले पर आज से पहले जब भी उन्होंने अपनी बात रखने की कोशिश की थी, लोगों ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था। वैसे भी उनके चरित्र के बारे में उनको छोड़कर पूरे गाँव को पता था और सिवा मज़बूरी अब कोई भी उनको अपने दरवाज़े पर बुलाना नहीं चाहता था। लेकिन आज उनको लगा कि इस मौक़े को वह अपने पक्ष में भुना सकते हैं तो उन्होंने गला खँखारकर बोलना शुरू किया "देखिए इस बात के पीछे कई वजहें हैं जिनको अब आप लोगों को मानना ही पड़ेगा, आख़िर जब धर्म का इतना नाश होगा तो भगवान कितने दिन चुपचाप देखेगा। जिसे देखो वही आजकल धर्म विरुद्ध बातें कर रहा है और अगर मैं कुछ कहता हूँ तो आप लोग मेरे ही ख़िलाफ़ हो जाते हैं", इतना कहकर पंडित थोड़ा रुके और सरसरी निगाह से सबके चेहरे का जायज़ा लेने लगे।
कोई और समय होता तो लोग उनको अनसुना कर देते लेकिन इस समस्या की वजह किसी को पता नहीं थी तो हर व्यक्ति संशय में था। और जब वजह पता नहीं चले तो आदमी भगवान के सामने समर्पण कर ही देता है। एक बुज़ुर्ग ने पंडित से पूछा "चलिए पंडीजी, आप ही बताइए कि ऐसा क्यों हो रहा है और उसका समाधान क्या है?"
रामदयाल को समझ में आ गया कि आज जो मौक़ा मिला है उसे जाया नहीं करना है और जहाँ तक हो सके इसका फ़ायदा उठाना है। उन्होंने अपनी बोली में गंभीरता घोलते हुए कहना शुरू किया "अच्छा बाबा आप ही बताइए, आप तो गाँव में सबसे बुज़ुर्ग हैं और आपने पहले का समय भी देखा है। क्या पहले भी इसी तरह लोग पूजा-पाठ से अलग रहते थे?
बाबा कुछ बोलें उसके पहले ही पंडित रामदयाल ने अपनी बात आगे बढ़ाई "जहाँ तक मुझे पता है, पूरे गाँव में साल भर कहीं-न-कहीं रामायण और सत्यनारायण का पाठ चलता रहता था। और हर त्योहार पर मंदिर के साथ-साथ आप लोगों के घर भी देवता वास करते थे। और आज क्या हो रहा है, यह आप सबको पता है, न तो कहीं रामायण और न कही कोई और पूजा-पाठ"।
गाँव के सभी लोग न चाहते हुए भी इस बात को मानने के लिए तैयार हो गए, अंदर ही अंदर उनको भी इसमें ईश्वरीय कोप नज़र आ रहा था। सारे लोग पंडित की तरफ़ देख रहे थे और इंतज़ार कर रहे थे कि वह अपनी बात ख़तम करें और कुछ उपाय बताएँ।
पंडित अब आराम से पालथी मारकर बैठ गए और अपनी बात आगे बढ़ाई "गाँव के पोखरे के पास वाले मंदिर की देखभाल हमेशा से हमारे बाप-दादा ही करते आ रहे थे लेकिन आप लोगों ने मुझे वहाँ से हटा दिया। अब भगवान की देखभाल नहीं होगी तो वह कुपित तो होंगे ही"।
पंडित की इस बात से वहाँ बैठे लोगों को क्रोध तो आया लेकिन समय की नज़ाकत को पहचानकर लोग चुप ही रहे। सबको पता था कि पंडित की नज़र मंदिर के चारो तरफ़ की ग्राम समाज की ज़मीन पर थी जहाँ वह बसना चाह रहा था। लेकिन ग्राम सभा ने पंडित को वहाँ सिर्फ़ सुबह एक बार पूजा कराने की ही इजाज़त दी थी।
"पुराने समय में निचली जातियों को आख़िर क्यों गाँव से बाहर बसाया गया था और उनका काम सिर्फ़ हमारे यहाँ मेहनत मज़दूरी करना था? हर चीज़ के पीछे भगवान की मर्ज़ी थी और इतने सालों से सब कुछ ठीक से ही तो चल रहा था। लेकिन आजकल तो न जातिभेद है और न कोई छुआछूत, तो यह सब तो होना ही है", पंडित ने अपनी बात समाप्त की और बैठ गया।
गाँव में थोड़ा-बहुत फ़र्क़ तो आया ही था, शिक्षा के प्रसार और लोगों में बढ़ती जागरूकता के चलते अब पहले जैसी ग़ुलामी नहीं थी कि निचली जात वालों को बिना पैसे दिए कोई मज़दूरी करा ले। और ऊपर से चुनाव के समय कुछ बातें शहर से यहाँ भी आ जातीं और चुनाव के परिणाम आने के कुछ समय बाद तक चलतीं। फिर वापस यहाँ का जीवन अपने ढर्रे पर आ जाता और लोग किसी तरह दाल रोटी के सहारे अपना जीवन खींचने में अगला पाँच साल ख़र्च कर देते।
"तो क्या उपाय है इसका पंडितजी, आप ही बताइए", कई लोगों ने एक साथ कहा तो पंडित का चेहरा खिल गया।
"पूजा-पाठ करना होगा और भगवान को प्रसन्न करना होगा, तभी इस गंभीर समस्या से बच पाएँगे हम लोग। मैं कल बताता हूँ कि क्या करना होगा", पंडित ने कहा और उठ गया। वहाँ बैठे बाक़ी लोग भी उठ गए और पंडित की बात मानने के सिवा उनके पास उस समय कोई चारा नहीं बचा।
उधर तारे भी परेशान होकर भगवान के पास गए और उनको अपना दर्द बताया "प्रभु, आजकल चन्द्रमा पता नहीं कहाँ गुम हो गए हैं, पिछले छह रात से आ ही नहीं रहे हैं। अब न तो आसमान में चाँदनी दिखाई देती है और न हम सब, नीचे धरती पर भी बच्चे और उनकी माताएं हैरान परेशान हैं। हमें तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है भगवन्, आप ही कुछ करें और चन्द्रमा को वापस बुलाएँ"।
भगवान ख़ामोश थे, उनके चेहरे पर भी परेशानी पढ़ी जा सकती थी। जब वह कुछ देर तक सोचते रहे और उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया तो तारे फिर बोल पड़े "आप तो सर्वज्ञाता हैं प्रभु, आपको तो पता ही है कि आख़िर चन्द्रमा क्यों नहीं दिखाई दे रहे। अब आप ही कुछ कीजिए वरना हम सब भी ख़त्म हो जाएँगे"।
प्रभु ने अब अपना सर उठाया और तारों की तरफ़ देखकर उन्होंने बोलना शुरू किया "हाँ मैं सर्वज्ञाता हूँ और मुझे यह भी पता है कि चन्द्रमा कहाँ चले गए हैं। लेकिन कारण इतना जटिल और दर्दभरा है कि अब तो मैं भी विवश हूँ, मैं चाहकर भी चन्द्रमा को नहीं कह पा रहा हूँ कि वह वापस आएँ और पूरे ब्रह्मांड में चाँदनी और उजाला फैलाएं"।
तारे अब और हैरान थे कि आख़िर क्या वजह थी जिसके चलते प्रभु भी चन्द्रमा को नहीं बोल पा रहे हैं। तारों की परेशानी भगवान से छुपी नहीं थी और उन्होंने उनको बताना शुरू किया "आप लोगों को तो पता ही है कि धरती के सभी जीव जंतुओं, पेड़ पौधों और इनसान को मैंने ही बनाया है। और सबके लिए जीने का समान अवसर भी दिया है"।
"हाँ, यह तो हम सबको पता है", तारे एक स्वर में बोल पड़े।
"लेकिन धीरे-धीरे इनसानों ने इस पूरे सिस्टम को अपने फ़ायदे के हिसाब से बदलना शुरू किया और हमारी बनाईं बहुत सी चीज़ें ख़तरे में पड़ गईं"। इतना कहकर भगवान थोड़ा रुके, उनके चेहरे पर दर्द नज़र आ रहा था।
"ख़ैर यह भी इतना बुरा नहीं था जितना बुरा उसने आगे चलकर किया, आख़िर विकास तो करना ही चाहिए। लेकिन इनसानों ने अपने फ़ायदे के चक्कर में अपने आपका ही नुक़सान करना शुरू कर दिया। आप लोग भी तो गवाह हो कि आए दिन भूकंप, बाढ़, सूखा, मौसमों का अजीब तरह से बदलाव, प्रदूषण इत्यादि कितना बढ़ गया है धरती पर और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं", भगवान ने एक गहरी साँस ली।
ये सब बातें तो तारों को भी पता थीं लेकिन इससे वह चाँद के ग़ायब होने का कोई संबंध नहीं जोड़ पा रहे थे। तारे कुछ कहते, इसके पहले ही भगवान ने आगे कहना शुरू किया "लेकिन मैं आप सब को चाँद के छुप जाने की असली वजह बताता हूँ। इसके पहले भी कई बार मुझसे चन्द्रमा ने इस बात की शिकायत की कि मैं इनसान को इनसानों के ऊपर ही ज़ुल्म करने से क्यों नहीं रोकता हूँ। और मैंने उसको समझाया कि इनसान को दिमाग़ इसीलिए दिया है कि वह अपना और समाज का अच्छा बुरा सोच सके। लेकिन अगर इसके बाद भी वह अपने ही समाज का दुश्मन बन जाता है तो मैं क्या कर सकता हूँ। चन्द्रमा मेरे समझाने पर समझ गया और उदास ही सही लेकिन वापस चला गया था"।
भगवान एक बार फिर रुके और साँस लेकर उन्होंने आगे बताना शुरू किया "लगभग दस दिन पहले चन्द्रमा फिर मेरे पास आया और वह बहुत क्रोधित था। मेरे पूछने से पहले ही उसने बताना शुरू किया कि मुझे अब ऐसे संसार में उजाला नहीं फैलाना जहाँ मेरी आँखों के सामने मेरे ही रोशनी में ऐसा अत्याचार किया जाए। पता तो मुझे भी था कि रात में धरती पर चाँद के उजाले में एक लड़की से बलात्कार और फिर उसकी नृशंस हत्या हुई थी। लेकिन मैंने उसे समझाया कि उसका काम उजाला फैलाना है, इनसान की ग़लती पर उसे शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है। वह चला तो गया लेकिन मुझे कहता गया कि अगर ऐसा ही होता रहा तो शायद वह इस ब्रह्मांड से चला जाएगा।
"और छह दिन पहले जो हुआ वह तो आप सब को भी पता है, उसी चाँदनी रात में एक तीन साल की लड़की से दरिंदों ने सामूहिक बलात्कार किया और फिर उसको मौत के घाट उतार दिया। उधर धरती पर यह घटना हुई और चाँद आधी रात को ही ब्रह्माण्ड छोड़कर चला गया, अब वह मेरे कहने पर भी वापस नहीं आएगा", भगवान की आवाज़ में थकान थी।
तारे स्तब्ध थे, सारा आकाश ख़ामोश और हवाएँ भी जैसे चलना भूल गई थीं। अचानक ज़ोर से बारिश होनी शुरू हुई और धरती कई घंटे तारों के आँसुओं से भीगती रही। इनसान को लगा जैसे मानसून समय से पहले ही आ गया, लेकिन इसके बावजूद भी चाँद का कहीं पता नहीं था।
लेकिन इस संसार को तो चलाना ही था इसलिए भगवान ने एक तारे को चाँद जैसा बना दिया। लेकिन अब बात वह नहीं रह गई थी जो पहले हुआ करती थी, चाँदनी की शीतलता, सफ़ेदी और ख़ूबसूरती जैसे ग़ायब हो गई है। अब असली चाँद होता तो असली चाँदनी भी होती, बहरहाल अब आकाश पर चाँद तो निकलता है, चाँदनी भी होती है, लेकिन वह धूमिल होती है। अब आप ही बताइए, क्या आपने आसमान पर वही पुराना चाँद देखा है जो आप कुछ महीनों पहले देखा करते थे। आप सच सच बताईयेगा, अब वह नहीं दिखता है न।

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