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Saturday, April 26, 2014

होर रह

होर रह -- 
अचानक मोड़ पर कार के सामने एक मोटरसाइकिल वाला आ गया और मैंने तेजी से ब्रेक लगाया | साथ ही साथ मेरे मुह से निकल गया "होर रह "|
जिंदगी में बहुत सारी घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें हम याद रखना चाहते हैं , बहुत सारी ऐसी भी होती है जिन्हे हम कतई याद नहीं रखना चाहते , लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं जिनको हम याद तो नहीं रखते लेकिन वो हमारे अवचेतन मन में इस तरह समा जाती हैं की हम चाह कर भी उन्हें अपने से अलग नहीं कर सकते |
ये उस समय की बात है जब हम स्कूल में पढ़ते थे | घर से स्कूल लगभग ८ किमी दूर था और हम रोज साइकिल से स्कूल जाते थे | गांव से स्कूल का रास्ता कच्चा-पक्का था और बीच में खेत खलिहान भी पड़ते थे | हमारे एक मित्र जो की दूसरे गांव में रहते थे , वो भी अक्सर आते समय तो साथ आते थे , कभी कभी जाते समय भी मिल जाते थे | अपना रास्ता मस्ती में साइकिल चलाते , ठहाके लगाते और दुनिया जहान की बातें करते बीत जाता था | फिर हम लोग अपने अपने घर को निकल जाते थे | हमारे वो मित्र भी एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे और साल में लगभग 9 महीने स्कूल आने के पहले और स्कूल से जाने के बाद खेतों में काम करते थे | उस समय खेती में यंत्रीकरण की शुरुआत हो चुकी थी और हर गांव में दो या तीन ट्रेक्टर आ चुके थे | लेकिन अभी भी बहुत सारे किसानों के पास खेतों की जुताई करने के लिए बैल होते थे | हमारे मित्र के घर भी ट्रेक्टर नहीं था और उनके यहाँ भी जुताई बैलों से ही होती थी |
गांव में हल जोतते समय बैलों को चलने और रोकने के लिए अलग अलग शब्द इस्तेमाल होते थे और बैल इन शब्दों को सुनकर ही रुकते या चलते थे | इन्हीं में से एक शब्द थे "होर रह" जो बैलों को रुकने के लिए प्रयुक्त होता था | चूँकि हमारे मित्र लगातार जुताई करते रहते थे इसलिए ये शब्द उनकी जबान पर चढ़ा हुआ था | वो इसी शब्द का इस्तेमाल अपनी साइकिल को रोकने के लिए भी करते थे , साइकिल में ब्रेक लगाने के बाद | लगातार सुनते सुनते वो शब्द मेरे अवचेतन मन में भी छप गया और मैंने भी साइकिल रोकने के लिए यही शब्द इस्तेमाल करना शुरू कर दिया | फिर साइकिल से स्कूटर , मोटरसाइकिल और अब कार भी , लेकिन अब भी ब्रेक लगाने के समय गाहे बगाहे जबान पे आ ही जाता है "होर रह "|
अफ़सोस सिर्फ इसका है कि उस मित्र से स्कूल के बाद आज तक मुलाकात नहीं हुई | लेकिन शायद जब भी होगी , मैं जरूर पूछूंगा कि उनको याद है कि नहीं "होर रह "|

Saturday, April 19, 2014

सपने--

किसी का असमय चले जाना बहुत पीड़ादायक होता है | कितने खुश थे वो अपनी जिंदगी में | वो दोनों और उनका एकलौता बेटा | ग्रेजुएशन के आखिरी साल में था वो , पढ़ने में भी काफी जहीन था | बेहद खुशदिल ,हमेशा कहता था , कभी आप लोगों से दूर नहीं जाउंगा | लेकिन उस रात अचानक सीने में दर्द उठा और कुछ भी नहीं कर पाये दोनों | चला गया इतनी दूर जहाँ से कोई भी वापस नहीं आता |
पत्नी तो जैसे पागल ही हो गयी थी ,लेकिन उसने अपने आप को सम्भाला | जिंदगी तो नहीं रुक जाती किसी के जाने से , पर अब उसे जीने का मकसद ही नहीं दिख रहा था | फिर उसे याद आयी अपने गांव की जहा पर कोई ढंग का अस्पताल नहीं था | 
और आज अपने गांव में अस्पताल की नींव डालते समय उसे महसूस हुआ कि जैसे उसे जीने का मकसद मिल गया है | शायद अब किसी और सपने को असमय टूट जाने से बचा पाये | 

आगबबूला

एक ही स्कूल में कक्षा ८ में दोनों पढ़ते थे | सूरज अमीरघराने से ताल्लुकात रखता था, वहीं नीरज गरीब था ,फिर भी दोनों के आपसी सम्बन्ध काफी अच्छे थे | उन दोनों का हर कामसाथ-साथ होता था | एक दिन सूरज को गणित का कुछ सवाल नही आ रहा था ,तो नीरज ने कहा कि मेरे घर पर आ जाओ ,वही मिलकर पढाई कर लेते है| वे एक कमरे में पढाई करने लगे तभी अचानक नीरज कि माँ कमरे में आ गई ओर बोली "बचवा तू लोगन के जब भूख पियास लगी तब मांग के खा लीहा , गर्मी क दिन हौ ,पढ़े के समय भूख खूब लागेला | एके आपने घर समझिआ ""
इतना सुनते ही नीरज आगबबूला हो गया और माँ का हाथ पकड़कर कमरे से बाहर कर दिया और कहने लगा कि जब आपको खड़ी हिंदी में बोलने नही आता है तो आप मेरे दोस्तों से बात करने क्यों जाती है |

ग्लानि

"क्या सोच के मुस्कुरा रहे हो ", पत्नी ने कहा तो ध्यान आया कि रात काफी हो गयी | वो किचेन के सारे काम निपटा कर सोने आ गयी लेकिन मैं जगा था | मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि कल के डिनर के बारे में सोच रहा था | 
महीनो हो गए थे , माँ के साथ समय बिताये | पापा की मृत्यु के बाद भी वो हमारे साथ रहने को तैयार नहीं हुई और अपने पुराने घर में ही रहती थी | कभी कभी मौका निकाल कर मिल आता था और कभी फोन पर तबियत के बारे में पूछ लेता था | लेकिन आज जैसे ही मैंने फोन किया , माँ ने कहा कि बेटा कल मेरे साथ खाना खाओ | सुनते ही एक ग्लानि सी हुई मुझे कि शायद कुछ ज्यादा ही खुदगर्ज हो गया हूँ | बचपन में भी माँ कही से भी ढूंढ़ कर लाती थी खाना खिलाने के लिए , और आज भी उसे ढूढ़ना पड़ रहा है मुझे | और मैंने भरे गले से कहा " आ रहा हूँ माँ तुम्हारे हाथ का खाना खाने |

अपनापन

कहाँ के रहने वाले हो भाई , टैक्सी में बैठने के बाद साकेत ने ड्राईवर से पूछा | पूछने के दो मकसद थे , एक तो अपने एरिया का निकला तो शायद सही रास्ते ले जाये और जल्दी पहुँचा दे और दूसरा किराया भी कम ले | नए और अनजान शहर में वैसे ही तमाम तनाव होते हैं कि ठगे न जाएँ , सही समय पे पहुँच जाएँ और अगर किसी साक्षात्कार के लिए आये हैं तो फिर तो तनाव ही तनाव | टैक्सी वाले ने बताया कि यू.पी. के हैं तो अगला सवाल कि कौन से जिला के हो | उसके जवाब को सुनते ही साकेत बड़े ही अपनेपन से बोला "अरे हम भी वहीं के हैं " और फिर इत्मीनान से बैठ गया | टैक्सी वाले ने भी कहा कि चिंता मत करो भैया , हम आपको एकदम शॉर्टकट ले चलते हैं | गंतव्य पर पहुँच कर साकेत ने किराया पूछा और बताये किराये से 50 रूपया कम देते हुए बोला "भैया हम से तो ज्यादा मत लो "| पैसे गिनते हुए टैक्सी वाला सोच रहा था कि ये अपनापन उसे कब तक नुकसान पहुँचाएगा |

मुखौटे

आज के कार्यक्रम में आपको जाना है , याद है न | हाँ भाई , याद है , ये राजनैतिक मज़बूरी जो न करवाये | बड़े उखड़े लहजे में उन्होंने कहा और नाश्ते में लग गए | खैर शाम को सभास्थल पर पहुचे और मंच पे विराजमान हो गए | सामने मेज पर एक लड़के ने पानी और कुछ नाश्ते के लिए रख दिया | उस लड़के को देख कर उनकी पानी पीने की इच्छा भी जाती रही | अपना जातिगत संस्कार तो उन्हें रोक रहा था लेकिन दिखाने के लिए उन्होंने पानी को उठाकर मुह से लगाया | पी नहीं पाये तो उसे वापस मेज पर रख दिया | 
कुछ वक्ताओं के बोलने के बाद जैसे ही उनके व्याख्यान का नंबर आया , उन्होंने बड़े ही ओजस्वी भाषा में जाति व्यवस्था और धर्म के खिलाफ भाषण देना शुरू कर दिया | भाषण खत्म हुआ और लोगों के तमाम रोकने के बावजूद वहाँ से निकल लिए कि कहीं उनके साथ कुछ खाना , पीना न पड़ जाये |

इंतज़ार

चाचा , कब से खड़े हो यहाँ पे , किसका इंतज़ार कर रहे हो | हाँ बेटा , किसी का इंतज़ार ही तो कर रहा हूँ , चाचा ने लम्बी सांस लेते हुए कहा | थोड़ा अजीब लगा उनका व्यवहार , इसलिए उत्सुकता हुई जानने की | मैंने थोड़ा सहानुभूति दिखाते हुए कहा "आजकल कोई किसी का इंतज़ार नहीं करता चाचा "| 
सचमुच बहुत तेज जमाना आ गया है और लोग तो एक दूसरे के ऊपर से होते हुए आगे निकल जाते हैं , इंतज़ार की कौन कहे , चाचा ने भी ऊपर देखते हुए कहा | अब तो उत्सुकता कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी थी | मैंने आखिरी कोशिश की जानने की और उनकी तरफ सवालिया निगाह से देखने लगा |
तुम सही कह रहे हो , जब बच्चे छोटे थे तब उनके बड़े होने का इंतज़ार , फिर बड़े होने पे उनके व्यवस्थित होने का इंतज़ार | लेकिन उन्होंने तो जरा भी नहीं सोचा और इतनी दूर निकल गए कि अब तो उनके फ़ोन का ही इंतज़ार रह गया है |
इतने में एक बुजुर्ग महिला सामने से आती दिखीं और चाचा ने उनकी तरफ इशारा करते हुए कहा "इसी का इंतज़ार कर रहा था | ये रोज इसी पार्क में आती है और मुझे कहती है कि तुम बाहर मेरा इंतज़ार करो क्योकि कभी इसी पार्क में वो मेरा इंतज़ार करती थी |