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Saturday, April 19, 2014

ग्लानि

"क्या सोच के मुस्कुरा रहे हो ", पत्नी ने कहा तो ध्यान आया कि रात काफी हो गयी | वो किचेन के सारे काम निपटा कर सोने आ गयी लेकिन मैं जगा था | मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि कल के डिनर के बारे में सोच रहा था | 
महीनो हो गए थे , माँ के साथ समय बिताये | पापा की मृत्यु के बाद भी वो हमारे साथ रहने को तैयार नहीं हुई और अपने पुराने घर में ही रहती थी | कभी कभी मौका निकाल कर मिल आता था और कभी फोन पर तबियत के बारे में पूछ लेता था | लेकिन आज जैसे ही मैंने फोन किया , माँ ने कहा कि बेटा कल मेरे साथ खाना खाओ | सुनते ही एक ग्लानि सी हुई मुझे कि शायद कुछ ज्यादा ही खुदगर्ज हो गया हूँ | बचपन में भी माँ कही से भी ढूंढ़ कर लाती थी खाना खिलाने के लिए , और आज भी उसे ढूढ़ना पड़ रहा है मुझे | और मैंने भरे गले से कहा " आ रहा हूँ माँ तुम्हारे हाथ का खाना खाने |

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