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Thursday, June 12, 2014

सुकून

"सरकती जाये है रुख से नक़ाब , आहिस्ता आहिस्ता" | जगजीत सिंह की ये ग़ज़ल कमरे में बज रही थी और मैं पुरसुकून अपनी अलग दुनिया में खोया हुआ था | रात के ११ बज रहे थे और कमरे में अँधेरा , बजती हुई ग़ज़ल से सामंजस्य बैठाने में कामयाब हो गया था |
अचानक दरवाजे पर आहट हुई और रूम पार्टनर कमरे में घुसा | क्या यार , जब देखो तब सिर्फ ग़ज़लों को सुनते हो , कहते हुए उसने बल्ब जला दिया | बल्ब की रौशनी ने एकदम से वापस हक़ीक़त की दुनिया में पहुँचा दिया मुझे |
कब तुम अपनी कल्पना की आभासी दुनिया से बाहर निकलोगे भाई , पार्टनर मुझे समझाने की कोशिश कर रहा था | जिंदगी की कठोर सच्चाईयों का सामना करो और जिंदगी को भरपूर जियो | सुनना ही है तो रॉक सुनो , पॉप म्यूजिक सुनो , ये क्या की हर समय अँधेरे में ग़ज़लों को सुनते रहते हो |
अब मैं पूरी तरह से जमीनी दुनिया में था | फिर मैंने उससे पूछा कि तुम ये पॉप और रॉक म्यूजिक क्यों सुनते हो | उसने तुरंत जवाब दिया " यार , जिंदगी में मस्ती बहुत जरुरी है और इन्हे सुनकर मजा आ जाता है | गाने सुनो , झूमो और इस लाइफ को पूरी तरह से एन्जॉय करो "| मैंने फिर पूछा " सुकून भी मिलता है तुमको इस संगीत को सुनकर " , उसके पास कोई जवाब नहीं था |
मुझे सुकून मिलता है ग़ज़लों को सुनकर , और मेरे लिए जिंदगी में सुकून के बहुत मायने हैं | इन्हे सुनने का मतलब ये नहीं है कि मैं जिंदगी की तल्ख़ हक़ीक़त से भागने की कोशिश कर रहा हूँ , बल्कि ये मुझे जिंदगी को और संजीदगी से जीने को प्रेरित करती हैं | और मैंने बल्ब बुझाकर फिर से ग़ज़ल सुनना शुरू कर दिया |

पछतावा--

बहुत पछतावा हो रहा था उन्हें अपनी सोच और व्यवहार पर| समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे उतरेगा ये बोझ उनके सीने से| जिस बच्चे को उन्होंने नालायक और निकम्मा समझा था और जिसे घर से भी बेरुखी से दूर कर दिया था, आज इतनी बड़ी मुसीबत में वही काम आया| माताजी की आँख से अश्रुधारा अविरल बह रही थी और पिताजी भी खामोश खड़े थे, पश्चात्ताप उनके चेहरे से भी साफ़ झलक रहा था|
ग्लानि से उन्होंने अपने हाथ बेटे की ओर जोड़ दिए|
" माता पिता के हाथ जब भी उठें, आशीर्वाद देने के लिए उठें, हाथ जोड़ने के लिए नहीं, कहते हुए उसने पिता के जोड़े हुए हाथों को अपने सर पे रख लिया|
उनकी सारी ग्लानि आंसुओं में बह गयी और उन्होंने उसे सीने से लगा लिया|

माँ--

" क्या बात है रितु, आज इतना उदास क्यों हो"|
" कुछ नहीं, बस यूँ हीं, कुछ खास नहीं"|
लेकिन उसे पता चल गया था कि वो क्यों उदास है| दरअसल कल मातृ दिवस है और हॉस्टल में सभी बच्चे इसी के बारे में बात कर रहे थे आज| हर कमरे में बस एक ही बात कि कल अपनी माँ के लिए क्या गिफ्ट लेना है या कौन सा कार्ड भेजना है| लेकिन रितु की माँ नहीं है इसीलिए वो उदास दिख रही है|
उसे अपनी माँ याद आ गयी, शायद ही कोई दिन हो जिस दिन उनका फोन नहीं आता हो| और फोन क्या , वो तो पूरा नसीहतों का पिटारा होता है| ये खाना, वो मत खाना, देर रात तक मत जागना, पढ़ाई लिखाई में ध्यान लगाना, और भी न जाने कितनी नसीहतें | आखिर वो कह देती थी कि बस करो माँ, अब मैं बच्ची नहीं हूँ, हास्टल में रह रही हूँ और अपना ख्याल रख सकती हूँ| इसपर उनका जवाब होता कि हाँ अब तो तू बड़ी हो गयी है, अब तो मेरी बातें तुम्हे अजीब लगती होंगी और फिर वो फोन रख देती| लेकिन कुछ ही घंटों में फिर उनका फोन आ जाता और फिर से सारी नसीहतें दी जातीं|
लेकिन आज रितु को देखकर उसे एहसास हो रहा था कि माँ की कमी कितनी महसूस होती है, खासकर तब, जब घर से दूर रहना पड़ता है| कोई नहीं होता जो बिना कहे ही सारी जरूरतों को समझ सके, और उनको पूरा कर सके| जो उनकी ख़ुशी में खुश हो और उनके दुःख में दुखी| और जिसकी माँ ही नहीं हो तो उसकी कमी तो कोई पूरा कर ही नहीं सकता|
फिर उसने माँ को फोन लगाया और बोला " माँ, कल तुम रितु को फोन करना और उसे बताना की उसकी माँ नहीं तो क्या हुआ मैं तो हूँ, माँ नहीं तो माँ जैसी तो हूँ"|

विडम्बना

अरे भाई , क्या बात है , बड़ी भीड़ लगी है कनिया के घर के सामने , मैंने सामने से आ रहे जोखन से पूछा | " आप को नहीं पता , बेचारा आज अल्लाह को प्यारा हो गया " | मैं एकदम से हतप्रभ रह गया | कब हो गया ये और मुझे खबर तक नहीं |
कनिया हमारे गांव का नाई था , पिछले २५ सालों से मैं उसे देखता आ रहा था | उसकी एक आँख गड़बड़ थी जिससे लोग उसे कनिया ही पुकारते थे | किसी को भी , यहाँ तक की उसे खुद अपना सही नाम याद नहीं था | हर जाति और धर्म के लोगों के घर जा कर लोगों के बाल काटना , दाढ़ी बनाना ही उसका पेशा था | उसके पिता भी इसी पेशे में थे और शायद उसकी पिछली कई पुश्तें यही करती आ रही थीं | बड़ा ही खुशमिजाज , सारे गांव की खबर उसके पास होती थी | बाल कटवाते कटवाते पूरे एरिया की खबर मिल जाती थी | इधर उसका काम थोड़ा कम हो गया था क्योंकि नई पीढ़ी के नौजवान अब उसके बदले नए सैलून में जाना पसंद करते थे | लेकिन अभी भी पुरानी पीढ़ी का वही नाई था और कैची और उस्तरा ही उसके औजार थे जिसे वो चमड़े पर घिस घिस कर तेज करता रहता था |
जल्दी से मैं उसके घर के सामने पहुंचा और पूछने लगा कि कैसे हुआ | तभी उसके पड़ोसी ने बताया कि वो टिटनेस से मर गया | दरअसल वो उस्तरे से अपनी दाढ़ी बना रहा था और कट जाने के कारण उसे टिटनेस हो गया | वक़्त की विडम्बना कि वह अपने ही उस्तरे की वजह से ही काल का ग्रास बन गया |

ट्रैक्टर--

अपने पिता का अंतिम संस्कार करके लौटा था संजय और दरवाजे पर बैठा सोच रहा था कि काश उसने जिद नहीं की होती | अगर उसने बापू की बात मान ली होती तो शायद ये दिन देखने को नहीं मिलता | इन्हीं सब ख्यालों में डूबे हुए उसे पिछली बातें याद आने लगीं |
उसी ने जिद की थी कि अपने घर भी ट्रैक्टर होना चाहिए | गांव में बहुत से घरों में ट्रैक्टर आ गया था और अब उसके मन में भी इसकी इच्छा हिलोरें मार रहीं थीं | बापू ने बहुत समझाया कि क्या जरुरत है इसकी , तमाम घरों में तो है ही और उनके पास खेत भी इतना नहीं है लेकिन संजय ने एक नहीं सुनी |
जैसे ही उस एरिया के ट्रैक्टर डीलर को भनक लगी कि संजय भी ट्रैक्टर लेना चाहता है , उसने एक एजैंट को उसके पीछे लगा दिया | अब रोज एजेंट का फोन आता और हर दूसरे दिन वो संजय के घर आ धमकता | उसके बापू ने आशंका जाहिर की थी , कि इतने कम खेत पर ट्रैक्टर ऋण नहीं मिलेगा लेकिन एजैंट ने आश्वस्त किया कि ऋण मिल जायेगा | हार कर उसके बापू ने ज़मीन के कागजात संजय को दे दिए और एजेंट ने आनन फानन में ऋण दिला दिया |
अब ट्रैक्टर आ गया , गांव में मिठाईयां बटीं और संजय भी उत्साह से लग गया जुताई करने में | शुरू में तो बहुत से किसानों ने जुताई के लिए कहा , लेकिन पैसे देने के समय एक ही जवाब "फसल पर दे देंगे , भागे थोड़े ही जा रहे हैं"| धीरे धीरे लोगों ने जुताई करवाना कम कर दिया , पैसे का तगादा चलता रहा लेकिन इतना आसान नहीं था पैसा मिलना | अपनी खेती इतनी थी नहीं कि उससे बैंक की किश्त समय से जमा हो सके |
फिर बैंक से नोटिस आना शुरू हुआ और एक दिन कुर्की का नोटिस भी आ गया | बैंक ने ट्रैक्टर भी जब्त कर लिया और खेतों को भी नीलाम कर के अपना पैसा वसूल लिया | इसी सदमे में बापू चल बसे | इस नासमझी से ट्रैक्टर उसके लिए विकास नहीं बल्कि विनाश का कारण बन गया |

संतुष्टि

आपने तो हमें जिन्दा कर दिया साहब , उस औरत के आंसू रुक ही नहीं रहे थे | उसका पति चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी था , शराब और जुए के लत ने बर्बाद कर दिया था | जब साथी कर्मचारियों ने उधार देना बंद कर दिया तो एक ही रास्ता बचा था , सूदखोर के पास जाने का | अब तो महीने में कब तनख्वाह मिली , ये भी उस बेचारी को पता नहीं चलता था | कैसे घर चलाये और बच्चों को स्कूल भेजे , जिंदगी के संघर्षों ने बिलकुल हताश कर दिया था |
एक दिन वो बैंक मैनेजर के केबिन में आकर रोने लगी | पूछने पर बोली " अगर दो बच्चे नहीं होते तो कबका जीवन त्याग चुकी होती और उसने सारा हाल बता डाला " | खैर उसको दिलासा देकर खाता चेक किया तो पता चला कि तनख्वाह जमा तो होती है लेकिन उसी दिन निकल भी जाती है | अगली तनख्वाह पर पता चला कि पासबुक तो सूदखोर के पास है और वो ही निकाल लेता है | उसके ब्याज में ही कमोबेश सारी तनख्वाह चली जाती है और पास में कुछ भी नहीं बचता |
फिर मैनेजर ने उन दोनों को बैंक बुलाया और समझाया कि हम तुम्हे कर्ज देंगे लेकिन तुम्हे साहूकार का सारा पैसा एकसाथ लौटाना होगा | उसकी पत्नी को तो मानो सब कुछ मिल गया |कुछ दिन बाद साहूकार को बुलाकर बैंक ऋण से उसके सारे पैसे चुकता कराये और जैसे ही पासबुक उसकी पत्नी को सौंपा , वो फफक फफक कर रोने लगी और उसका पति हाथ जोड़े खड़ा था | एक परिवार आज उजड़ने से बच गया था और इसकी संतुष्टि सभी के चेहरे पर नजर आ रही थी |

पीड़ा

खा लो बेटा , थोड़ा तो खा लो , रमा अपने छोटे बेटे के पीछे पीछे खाना ले कर घूम रही थी , लेकिन बेटा किसी भी सूरत में खाने को तैयार नहीं था | बड़ी मशक्कत के बाद उसने थोड़ा सा खाया और बाक़ी खाना प्लेट में छोड़ दिया | रमा बहुत दुःखी थी उसके इस आदत से |
अगले दिन जब स्कूल से बेटे को लेकर आते समय रास्ते में सड़क के किनारे एक बच्चे को पेपर के टुकड़े में कुछ खाते देखकर रमा भौचक्क रह गयी | गरीबी और भूख क्या नहीं करा देती , उसका मन पीड़ा से भर गया | फिर कुछ सोचकर उसने बेटे को उस तरफ दिखाया और बोली "बेटा देख , जिन्हे खाना नहीं मिलता है वो कहीं भी , कुछ भी खाने को तैयार हो जाते हैं और तुम खाना बर्बाद कर देते हो "|
पता नहीं क्या लगा बेटे को , लेकिन उसने खाना बर्बाद करना बंद कर दिया | शायद उस भूखे बच्चे की पीड़ा उसके बाल मन को भी छू गयी थी |