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Wednesday, September 23, 2015

नया क़दम--

" तुम्हारी लिखी सारी चिट्ठियाँ ले आया हूँ , बहुत चाह के भी उन्हें जला नहीं पाया । सोचा डाकिये का वेश ही बना के चलूँ , पुराने दिन याद आ जायेंगे ", और वो मुड़ कर वापस चलने लगा । 
" रुको , मुझे भी कुछ लौटाना है तुम्हे । अब तो अकेली जिन्दगी में यही सहारा था लेकिन जब तुम सब लौटा रहे हो तो मुझे भी इन्हें रखने का हक़ नहीं है ", और वो भी अंदर से एक पैकेट ले आई । 
पैकेट ले कर वो वापस मुड़ा , लेकिन क़दमों ने साथ नहीं दिया । 
" क्या अब हम साथ जिंदगी जी सकते हैं ", और सहमति में सर हिलते ही उसने नयी ज़िन्दगी की तरफ क़दम बढ़ा दिया ।

पहचान--

पहचान का द्वन्द--
" बधाई हो, समाजसेवा के इन राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए| आप जैसे विरले लोग ही हैं जो तवायफ़ों के बेसहारा बच्चों की देखभाल में अपना जीवन लगाये हुए हैं "|
"जी, शुक्रिया, हम लोग तो बस इस बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के कार्य में लगे हुए हैं "|
शायद अब उनके अतीत का जिक्र लोग छोड़ दे, यही सोचते हुए वो लोगों से बधाई स्वीकार कर रहे थे कि एक आवाज़ उनके कान में पड़ी " अरे अगर तवायफ़ का बेटा ही ऐसे बच्चों का ख्याल नहीं रखेगा तो और कौन रखेगा "|
एकबारगी तो उनके मन में एक टीस सी उठी, लेकिन फिर उन्हें अपनी पहचान का द्वन्द ख़त्म होता दिखने लगा|

अन्जाना भय--

रोज की ही तरह आज भी ऑफिस से निकलने में उसे देर हो गयी थी । तीन साधन बदलकर वो अपने कॉलोनी के बाहर उतर कर जल्दी जल्दी घर की तरफ चल दी । काफी अँधेरा हो गया था और अचानक बिजली भी गुल हो गयी । 
न जाने क्यूँ उसे सुबह का अखबार याद आ गया । पहले पन्नें पर खबर थी कि एक छोटी बच्ची की अस्मत कुछ दरिन्दों ने लूटी । अब कॉलोनी के रास्ते के दोनों ओर खड़े पेंड़ उसे एकदम से डरावने लगने लगे । अचानक किसी के पैरों की आहट से वो बुरी तरह घबरा गयी और उसके मुँह से चीख़ निकल गयी । 
" क्या हुआ , इतनी घबराई हुई क्यूँ हो , कुछ हुआ क्या ?, आवाज़ उसके पति की थी । 
वो एकदम से उससे लिपट गयी , पति को कुछ समझ नहीं आया । अभी तो उसका डर निकल गया लेकिन कल फिर रात होगी , अँधेरा होगा और वो अन्जाना भय फिर घेर लेगा ।

हौसला--

अचानक हुई बरसात ने सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया , टपकती हुई छत और बुझता हुआ चूल्हा , सब जैसे उसकी स्थिति का मज़ाक उड़ा रहे थे । महीने का आखिरी हफ्ता , ख़ाली जेब और बच्चों की बक़ाया फ़ीस , क्या करे । 
हर स्थिति में खुश रहना कहीं पढ़ा था उसने और अचानक बाहर नज़र पड़ी तो उसे यक़ीन भी हो गया । उस बरसात के पानी में नाव चलाते उसके बच्चे उसे हर स्थिति से लड़ने का हौसला दे रहे थे ।

शहीद के सपने --

" साहब, तीन महीने हो गए, अभी तक़ कुछ पता नहीं चला, अब तो फाँकों की नौबत आ गयी है "।
" समय तो लगता ही है, पेपर बड़े साहब के पास गया है "।
" पिछली बार बड़े साहब ने कहा था कि आपको आने की जरुरत नहीं है, आपके पति देश के लिए शहीद हुए थे "।
" तो आपको सरकार पेंशन तो देगी ही न, लेकिन थोड़ा हम लोगों का भी ध्यान ?"
" ध्यान तो रखना ही है ", उसने जलती नज़र से बाबू को देखा और वापस चल दी। बाबू की हँसी उसका बहुत देर तक पीछा करती रही।
हाँ, घर आते समय उसने बेटे के लिए सेना की नौकरी का फार्म ले लिया था।

बोझ-

" अाप को क्या लगा कि मैं अाप को छोड़ दूँगा । अाप के गुनाहों का हिसाब अब अदालत में होगा, गिरफ्तार करो इनको "।
सुनते ही चेहरे पर हवाईयाँ छाने लगीं, अब तो बचना मुश्किल है | 
आखिर में बचने के लिए आखिरी हथियार भी इस्तेमाल कर दिया " तुम भूल रहे हो कि हम दोनों हम मज़हब हैं और ये काम हम ख़ुदा के लिए ही कर रहे हैं | क्या जवाब दोगे ख़ुदा को "।
" अाप जैसे लोगों की वजह से ही हमें दोहरी कीमत चुकानी पड़ रही है समाज में , पूरी कौम ही शक के घेरे में रहती है "।
गाड़ी स्टार्ट हुई अौर वो बढ़ गया अपने अाफिस की तरफ । एक सुकून था उसके चेहरे पर , मन का कुछ बोझ हल्का हो गया था ।

सीकड़--

" का रे खदेरुआ , जलसा बीत गयल | अब अपने में रह अउर गाय गोरु सब के चारा पानी दे ", दद्दा की कर्कश आवाज़ सुन कर वो वर्तमान में आ गया | ज़मीन पर पड़े चरी के गट्ठर को उठाकर कांटा मारने वाली मशीन पर रखा ओर कांटा मारने लगा |
कल का दृश्य रह रह कर उसके दिमाग में चल रहा था | इस बार सीट रिज़र्व घोषित हो गयी थी ओर पुराने सरपंच दद्दा ने उसको खड़ा कर दिया था | विजयी घोषित होने पर यही दद्दा ओर बाक़ी सब उसको माला पहना कर चुनाव कार्यालय से गाँव तक लाये थे |
मवेशियों को चारा देने के बाद उसने झउवा उठाया ओर गोबर इकठ्ठा करने लगा | उसकी मेहरारू गोबर पाथने के लिए बैठी हुई थी | तभी एक गाय ने सीकड़ छुड़ा लिया ओर बाहर दौड़ी | उसने दौड़ कर उसको पकड़ा ओर वापस खूंटे से बाँधने लगा |
गाय को बांधकर जैसे ही वो खड़ा हुआ , उसका हाँथ अपने गर्दन पर चला गया | इस सीकड़ को छुड़ाने की कोशिश भी कर पायेगा कभी , सोचते हुए उसने गोबर उठाया ओर आगे बढ़ गया |