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Wednesday, September 23, 2015

सीकड़--

" का रे खदेरुआ , जलसा बीत गयल | अब अपने में रह अउर गाय गोरु सब के चारा पानी दे ", दद्दा की कर्कश आवाज़ सुन कर वो वर्तमान में आ गया | ज़मीन पर पड़े चरी के गट्ठर को उठाकर कांटा मारने वाली मशीन पर रखा ओर कांटा मारने लगा |
कल का दृश्य रह रह कर उसके दिमाग में चल रहा था | इस बार सीट रिज़र्व घोषित हो गयी थी ओर पुराने सरपंच दद्दा ने उसको खड़ा कर दिया था | विजयी घोषित होने पर यही दद्दा ओर बाक़ी सब उसको माला पहना कर चुनाव कार्यालय से गाँव तक लाये थे |
मवेशियों को चारा देने के बाद उसने झउवा उठाया ओर गोबर इकठ्ठा करने लगा | उसकी मेहरारू गोबर पाथने के लिए बैठी हुई थी | तभी एक गाय ने सीकड़ छुड़ा लिया ओर बाहर दौड़ी | उसने दौड़ कर उसको पकड़ा ओर वापस खूंटे से बाँधने लगा |
गाय को बांधकर जैसे ही वो खड़ा हुआ , उसका हाँथ अपने गर्दन पर चला गया | इस सीकड़ को छुड़ाने की कोशिश भी कर पायेगा कभी , सोचते हुए उसने गोबर उठाया ओर आगे बढ़ गया |

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