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Friday, November 6, 2015

नव जीवन--

आज इतिहास फिर अपने को दुहरा रहा था| जैसे ही बहू ने घबराते हुए बताया कि उसका बेटा नज़मा से शादी करना चाहता है, उनकी आँखों में २५ साल पहले का दृश्य घूम गया|
उस सुबह को भूलना उनके लिए आज भी संभव नहीं था जब उनका बेटा शहर से अपने साथ एक विजातीय लड़की को लेकर आया था| बहुत स्पष्ट शब्दों में उसने कहा था " बाबूजी , मुझे पता है कि ये शादी आप स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए हमने कोर्ट में शादी कर ली है और आपका आशीर्वाद लेने आये हैं "|
अंगारे बरसाती आँखों से उन्होंने उसकी तरफ देखा था और घर छोड़ देने का हुक्म सुना दिया था| दोनों वापस चले गए और इस सदमे से उनकी पत्नी ने बिस्तर पकड़ लिया|
कुछ ही सालों में उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे दोनों को खो दिया और फिर बहू को पोते की वज़ह से अपने गाँव ले आये| समय के साथ अपने अंदर होते बदलाव को वो महसूस तो कर रहे थे लेकिन मन खुल कर मानने को तैयार नहीं था| आज की घटना ने उन्हें एक बार फिर आत्ममंथन पर मज़बूर कर दिया था| बेटे के बाद पोते को भी खोना, आगे नहीं सोच पाये|
" बहू, शादी की तैयारी शुरू कर दो, आखिर अपने घर में बहुत सालों बाद ऐसा अवसर आ रहा है "|
बहू ने उनकी तरफ आश्चर्य से देखा, वो अपना चेहरा दूसरी तरफ कर चुके थे|

आवाजें--

" इस लड़की को आप नहीं रख सकते कॉलेज में , हमारे बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा ", अभिभावकों की भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी कॉलेज के गेट पर और आवाज़ें बढ़ने लगी थीं । पिछले महीने ही कुछ दरिंदों ने उसकी अस्मत लूट ली थी और उस समय पूरा कॉलेज प्रशासन उसको निकालने के पक्ष में था लेकिन प्रिंसिपल अडिग थे अपने फैसले पर । 
" अगर यही हादसा आपके बच्ची के साथ हुआ होता तो भी आपलोग यही कहते । इस हादसे में उसका क्या कसूर था , यही न कि वो अपनी रक्षा खुद करने में असमर्थ थी । आप लोग देखना चाहेंगे कि वो क्या कर रही है यहाँ ", कहकर वो खेल के मैदान की तरफ चल पड़े । 
मैदान का दृश्य देखकर सबकी ऑंखें फटी रह गयी । वही लड़की जो कभी खुद की रक्षा नहीं कर पायी थी , आज बाकी लड़कियों को आत्मरक्षा का पाठ पढ़ा रही थी । एक बार फिर से आवाजें शुरू हो गयी थीं , लोगों की तालियों की ।

मज़बूत रिश्ते--

" आज हमारे घर आपकी दावत है भाईजान, शाम को इन्तज़ार करूँगा आपका ", इतना कहकर उसने फोन रख दिया और पत्नी से शाम की दावत के बारे में बात करके ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा। आज वो पत्नी की उस शंका को गलत साबित करना चाहता था कि भाईजान उसके यहाँ खाना नहीं खाएँगे। धर्म अलग है तो क्या, उसने तो कितनी ही बार खाया है उनके यहाँ।
थोड़ी देर में फोन की घण्टी बजी, उधर से भाईजान थे।
" दर असल आज आपकी भाभी ने पहले से ही कहीं का कार्यक्रम बना रखा था, इसलिए आज तो नहीं आ पाएंगे, किसी और दिन जरूर आएंगे "।
" मैंने कहा था ना कि वो नहीं आएंगे, अब तो भरोसा हो गया मेरी बात का ", पत्नी का चेहरा उसका यक़ीन पुख्ता करता लग रहा था। वो सोच में पड़ गया, अब उसका भी भरोसा डगमगाने लगा था। भारी मन से वो ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा।
एक बार फिर घण्टी बजी, इस बार भाभी थीं " हम लोग जरूर आएंगे शाम को, अभी आपके भाईजान ने मुझे बताया तो मैंने शाम का कार्यक्रम रद्द कर दिया। आप के यहाँ आने से जरुरी कोई भी कार्यक्रम नहीं है"।
उसने एक बार फिर पत्नी की तरफ़ देखा, पत्नी को रिश्तों की मज़बूती पर यक़ीन हो गया था।

जिन्दगी की शतरंज--

जिन्दगी की शतरंज--
सुबह तड़के उठकर वो घर से निकल गया , पत्नी और बच्ची सोये हुए थे। शहर में फैले तनाव की वज़ह से कल उसे कोई काम नहीं मिल पाया था और कल रात में जो बचा खुचा खाने का सामान था वो ख़त्म हो गया था। जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वो आज सबसे पहले पहुँच जाना चाहता था ताकि आज तो काम मिल जाए और रात को परिवार को खाना खिला पाये। चुनावी पोस्टरों से अटी पड़ी सड़कें और गलियाँ उन जैसों के विकास की ही बात कर रही थी।
अब उजाला फ़ैल गया था और वो मज़दूर मंडी में सबसे पहले पहुँच गया था। अब इंतज़ार था तो ठेकेदारों का जो आकर ले जाएँ काम पर। ठेकेदार तो आये लेकिन वो कर्म के नहीं, धर्म के थे और कुछ ही देर में पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाते घूमने लगीं। दंगे फ़ैल गए और कर्फ्यू का आदेश जारी हो गया था। घबराहट में वो भागा और गोलियों से बचते बचाते अपने घर सामने पहुँचा।
सामने जलते हुए अपने घर को देखकर वो गश खाकर गिर पड़ा। जिन्दगी की शतरंज ने शह और मात दोनों दे दी थी।

गिरगिट--

" अरे देखो तो , वो बुढ़िया के बाल बेचने वाला गिरा पड़ा है । चलकर पूछ लेते है कि क्या हुआ है "। 
" बिना बात के पचड़े में क्यूँ फँसना , कहीं मर वर गया होगा तो मुसीबत में फँस जायेंगे ", पत्नी को झिड़कते हुए राजू ने बाइक आगे बढ़ा दी ।। 
अपने ही मोहल्ले का लड़का था वो , जब भी घर की तरफ से निकलता था , बच्चे को यूँ ही पकड़ा देता था एक पैकेट । पैसे मिले या न मिले , हँसते हुए आगे बढ़ जाता । जब भी पैसे नहीं देने होते , अपने ही घर का बना देता था उसे राजू । वो भी उसे बहुत मानती थी और कभी कभी खाने पीने को कुछ दे देती थी । आज उसको यूँ छोड़ के आगे चल देना उसे दिल में कचोट रहा था । 
अचानक राजू ने बाइक रोकी और उसकी निगाह सड़क के किनारे वाले पेड़ पर बैठे गिरगिट पर चली गयी । उसे अपने पति के पीठ का रंग भी बदलता महसूस हो रहा था ।

हल--

सबके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ साफ़ दिख रही थी , चुनाव एकदम सर पर थे और कोई ठोस मुद्दा नहीं मिल रहा था उन लोगों को । कई प्रस्ताव दिए वहाँ मौजूद लोगों ने लेकिन सब सिरे से खारिज़ कर दिया रज्जब मियाँ ने । 
" काश , थोड़ा माहौल बिगाड़ पाते हम लोग तो हमारे पक्ष में लहर होती लेकिन अपने ही मोहल्ले के चचाजान सारा खेल ख़राब कर दे रहे हैं । अब उनको कौन समझाए की आज भाई चारा का समय नहीं रहा ", रज़्ज़ब मियाँ खौल रहे थे । 
" तो फिर क्या किया जाये , उनको समझाना तो नामुमकिन सी बात है । कुछ और सोचना होगा हमें "।
" समझा नहीं सकते तो क्या , खामोश तो कर सकते हैं न । और उनके शरीर को उन लोगों के इलाके में डाल देना , एक तीर से दो शिकार हो जायेंगे "।
अचानक वहाँ मौज़ूद लोगों के चेहरे तनावमुक्त नज़र आने लगे ।

पछतावा--

राज रोज ख़बरें आ रही थीं , फलाँ , फलाँ ने फलाँ पुरस्कार लौटाया और उसके बाद अखबार और टी वी पर उनकी फोटो और गर्मागर्म चर्चा | उनमें से कई लोगों का तो उन्होंने नाम भी नहीं सुना था , अब पता चला उनको कि इनको भी फलाँ पुरस्कार मिला था | चच्चा सोच रहे थे कि काश हमें भी मिला होता तो आज हम भी ! 
अचानक उनको याद आया और जल्दी जल्दी अलमारी खंगालने लगे कि इतने में चाची आ गयीं | 
" क्या ढूँढ रहे हो अलमारी में आज , कुछ हेरा गया है का ?
" अरे तुम नहीं समझोगी , एक ठो सर्टिफिकेट था पहले का , वही ढूँढ रहे थे | पता नहीं कहाँ चला गया "|
" अबहीं कुछ दिन पहिले ही कुछ रद्दी कबाड़ी को बेचा था इसमें से निकाल कर , कहीं उसी में तो नहीं चला गया ?
" रहोगी गँवार की गँवार ही , बिना पूछे काहें बेच दिया कबाड़ी को ", और चच्चा बिगड़ते हुए कबाड़ी के दुकान की ओर भागे |
" अरे सजीवन , हमरे घर से कुछ कबाड़ी लाये थे का ? चच्चा के सवाल पर सजीवन ने सर उठाया और थोड़ा सोच कर हाँ में सर हिला दिया |
" कहाँ रक्खे हो उसको , एक ठो बहुत जरुरी सर्टिफिकेट था उसमें | जरा खोज देते तो बहुत मेहरबानी होती ", चच्चा गिड़गिड़ाने लगे |
" देखो चच्चा , इहाँ जो कुछ आता है उ सब कहीं भी फेंका जाता है और फिर ट्रक में लाद कर बाहर भेज दिया जाता है | अब कहाँ ढूँढ पाएंगे उसको , वैसे था क्या उसमें चच्चा ?
चच्चा बिना जवाब दिए वापस चल दिए | कैसे बताते कि बाकी लोगों की तरह उनके मन में भी उस सर्टिफिकेट को वापस करके मशहूर होने की चाहत हिलोरें मार रही थी जो कभी उनको कविता पाठ के लिए मिला था |