" आज हमारे घर आपकी दावत है भाईजान, शाम को इन्तज़ार करूँगा आपका ", इतना कहकर उसने फोन रख दिया और पत्नी से शाम की दावत के बारे में बात करके ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा। आज वो पत्नी की उस शंका को गलत साबित करना चाहता था कि भाईजान उसके यहाँ खाना नहीं खाएँगे। धर्म अलग है तो क्या, उसने तो कितनी ही बार खाया है उनके यहाँ।
थोड़ी देर में फोन की घण्टी बजी, उधर से भाईजान थे।
" दर असल आज आपकी भाभी ने पहले से ही कहीं का कार्यक्रम बना रखा था, इसलिए आज तो नहीं आ पाएंगे, किसी और दिन जरूर आएंगे "।
" मैंने कहा था ना कि वो नहीं आएंगे, अब तो भरोसा हो गया मेरी बात का ", पत्नी का चेहरा उसका यक़ीन पुख्ता करता लग रहा था। वो सोच में पड़ गया, अब उसका भी भरोसा डगमगाने लगा था। भारी मन से वो ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा।
एक बार फिर घण्टी बजी, इस बार भाभी थीं " हम लोग जरूर आएंगे शाम को, अभी आपके भाईजान ने मुझे बताया तो मैंने शाम का कार्यक्रम रद्द कर दिया। आप के यहाँ आने से जरुरी कोई भी कार्यक्रम नहीं है"।
उसने एक बार फिर पत्नी की तरफ़ देखा, पत्नी को रिश्तों की मज़बूती पर यक़ीन हो गया था।
थोड़ी देर में फोन की घण्टी बजी, उधर से भाईजान थे।
" दर असल आज आपकी भाभी ने पहले से ही कहीं का कार्यक्रम बना रखा था, इसलिए आज तो नहीं आ पाएंगे, किसी और दिन जरूर आएंगे "।
" मैंने कहा था ना कि वो नहीं आएंगे, अब तो भरोसा हो गया मेरी बात का ", पत्नी का चेहरा उसका यक़ीन पुख्ता करता लग रहा था। वो सोच में पड़ गया, अब उसका भी भरोसा डगमगाने लगा था। भारी मन से वो ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा।
एक बार फिर घण्टी बजी, इस बार भाभी थीं " हम लोग जरूर आएंगे शाम को, अभी आपके भाईजान ने मुझे बताया तो मैंने शाम का कार्यक्रम रद्द कर दिया। आप के यहाँ आने से जरुरी कोई भी कार्यक्रम नहीं है"।
उसने एक बार फिर पत्नी की तरफ़ देखा, पत्नी को रिश्तों की मज़बूती पर यक़ीन हो गया था।
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