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Friday, November 6, 2015

समझ--

सुबह अखबार पढ़कर उसका खून खौल उठा | ये विधर्मी हमारे धर्म का सत्यनाश करने पर तुले हुए हैं , इनको सबक सिखाना जरुरी है | जिसे हम लोग माँ समान मानते हैं उसी की हत्या करना , अब बर्दाश्त नहीं किया जा सकता | लगातार इन्ही विचारों का मंथन चल रहा था उसके दिमाग में | 
" बेटा, मेरी आँख से बहुत कम दिखने लगा है आजकल , किसी डॉक्टर को दिखा लेते ", माँ की आवाज़ ने उसको जैसे ज़मीन पर ला पटका | पिछले कई हफ्ते से वो अपनी आँख के लिए कह रही थी और वो टालता जा रहा था | अचानक उसे अपने ऊपर शर्मिंदगी महसूस होने लगी कि ये क्या सोचने लगा है वो | 
" माँ , चलो तुमको आँख के डॉक्टर को दिखा देता हूँ | और आते समय एक बढ़िया सी साड़ी भी खरीद लेना अपने लिए ", कहते हुए वो उठ खड़ा हुआ | माँ ने उसकी ऑंखें खोल दी थीं , उसे इंसान और जानवर में फ़र्क़ समझ आ गया |

गौ सेवक--

बहुत मनोरम था सब कुछ उस गौशाले में । एक से बढ़कर एक नस्ल की गायें थीं वहाँ पर और उनके रहने और खाने का सुन्दर स्थल । पुरे जिले में कोई ऐसी गौशाला नहीं थी और उसके मालिक की बहुत प्रतिष्ठा थी । जिसे देखो वही उनके धर्मपरायणता के गुणगान करता रहता था । 
आज वो भी देखने चला आया था इसे । उसे भी विश्वास होने लगा था लोगों की बातों पर कि इसके मालिक जैसा गौसेवक और धर्मात्मा शायद ही कोई और होगा इस जिले में । जगह जगह हरा चारा रखा हुआ था , बहुत से लोग उसे काटने में व्यस्त थे | गायों के रहने के स्थान से थोड़ी दूरी पर खेत भी थे जहाँ पर फसलें लहलहा रही थीं | पूछने पर पता चला कि ये ऑर्गनिक फसल है जिसे गाय के गोबर और उनके मूत्र के इस्तेमाल से उगाया जाता है और इनकी बहुत माँग है आजकल | पूरे गौशाले का चक्कर लगाने में उसे काफी समय लग गया और फिर वो उनके कमरे में पहुंचा । लेकिन पूरा गौशाला देखने के बाद उसके दिमाग में एक बात खटक रही थी , उसे बड़ी मुश्किल से एकाध ही , मरियल सा बछवा दिखा और बूढ़ी गायें तो बिलकुल नहीं थीं । अधिकांश बछिया ही थीं वहां पर और वो सोच में पड़ गया था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि यहाँ की गायें सिर्फ बछिया ही जनती हों और गायें बूढ़ी होने के बाद कहाँ चली जाती हैं ।
" नमस्कार , आप बहुत ही बड़े पुण्यात्मा हैं , गऊ माता की सेवा में तन मन धन से समर्पित हैं आप । आप जैसे लोगों से ही तो अपना धर्म सुरक्षित है वर्ना तो आजकल तो लोग सिर्फ अपना आर्थिक लाभ ही देखते हैं "।
" नमस्कार , बस आप सब लोगों का आशीर्वाद है । वैसे भी गऊ माता की सेवा में ही स्वर्ग है ", मुस्कुराते हुए उन्होंने बैठने के लिए कहा ।
" अच्छा , एक बात पूछना चाह रहा था । आपकी गौशाला में मुझे न तो बछवा नहीं दिखे , नहीं कोई बूढ़ी गाय , ऐसा कैसे संभव है "।
सवाल सुनकर तो एक बार वो चौंके , फिर उनके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कराहट फ़ैल गयी । " दरअसल आपका सोचना सही है , यहाँ सिर्फ बछिया ही नहीं पैदा होती हैं , बछवा भी पैदा होते हैं । लेकिन उनका कोई उपयोग तो है नहीं तो कौन उनको पाले और उनपर खर्च करे । बस उनको हम लोग खाना पीना नहीं देते हैं और वो कुछ ही दिन बाद काल कलवित हो जाते हैं | और बूढ़ी गायों को तो हम लोगों को दान दे देते हैं जिससे उनको भी गौ पालन का सुख मिल जाए "|
ये सब बताते हुए उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और उसे लग रहा था जैसे उसके सामने दूध का नहीं बल्कि खून का ग्लास रखा हो ।

नव जीवन--

आज इतिहास फिर अपने को दुहरा रहा था| जैसे ही बहू ने घबराते हुए बताया कि उसका बेटा नज़मा से शादी करना चाहता है, उनकी आँखों में २५ साल पहले का दृश्य घूम गया|
उस सुबह को भूलना उनके लिए आज भी संभव नहीं था जब उनका बेटा शहर से अपने साथ एक विजातीय लड़की को लेकर आया था| बहुत स्पष्ट शब्दों में उसने कहा था " बाबूजी , मुझे पता है कि ये शादी आप स्वीकार नहीं करेंगे, इसलिए हमने कोर्ट में शादी कर ली है और आपका आशीर्वाद लेने आये हैं "|
अंगारे बरसाती आँखों से उन्होंने उसकी तरफ देखा था और घर छोड़ देने का हुक्म सुना दिया था| दोनों वापस चले गए और इस सदमे से उनकी पत्नी ने बिस्तर पकड़ लिया|
कुछ ही सालों में उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे दोनों को खो दिया और फिर बहू को पोते की वज़ह से अपने गाँव ले आये| समय के साथ अपने अंदर होते बदलाव को वो महसूस तो कर रहे थे लेकिन मन खुल कर मानने को तैयार नहीं था| आज की घटना ने उन्हें एक बार फिर आत्ममंथन पर मज़बूर कर दिया था| बेटे के बाद पोते को भी खोना, आगे नहीं सोच पाये|
" बहू, शादी की तैयारी शुरू कर दो, आखिर अपने घर में बहुत सालों बाद ऐसा अवसर आ रहा है "|
बहू ने उनकी तरफ आश्चर्य से देखा, वो अपना चेहरा दूसरी तरफ कर चुके थे|

आवाजें--

" इस लड़की को आप नहीं रख सकते कॉलेज में , हमारे बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा ", अभिभावकों की भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी कॉलेज के गेट पर और आवाज़ें बढ़ने लगी थीं । पिछले महीने ही कुछ दरिंदों ने उसकी अस्मत लूट ली थी और उस समय पूरा कॉलेज प्रशासन उसको निकालने के पक्ष में था लेकिन प्रिंसिपल अडिग थे अपने फैसले पर । 
" अगर यही हादसा आपके बच्ची के साथ हुआ होता तो भी आपलोग यही कहते । इस हादसे में उसका क्या कसूर था , यही न कि वो अपनी रक्षा खुद करने में असमर्थ थी । आप लोग देखना चाहेंगे कि वो क्या कर रही है यहाँ ", कहकर वो खेल के मैदान की तरफ चल पड़े । 
मैदान का दृश्य देखकर सबकी ऑंखें फटी रह गयी । वही लड़की जो कभी खुद की रक्षा नहीं कर पायी थी , आज बाकी लड़कियों को आत्मरक्षा का पाठ पढ़ा रही थी । एक बार फिर से आवाजें शुरू हो गयी थीं , लोगों की तालियों की ।

मज़बूत रिश्ते--

" आज हमारे घर आपकी दावत है भाईजान, शाम को इन्तज़ार करूँगा आपका ", इतना कहकर उसने फोन रख दिया और पत्नी से शाम की दावत के बारे में बात करके ऑफिस जाने की तैयारी करने लगा। आज वो पत्नी की उस शंका को गलत साबित करना चाहता था कि भाईजान उसके यहाँ खाना नहीं खाएँगे। धर्म अलग है तो क्या, उसने तो कितनी ही बार खाया है उनके यहाँ।
थोड़ी देर में फोन की घण्टी बजी, उधर से भाईजान थे।
" दर असल आज आपकी भाभी ने पहले से ही कहीं का कार्यक्रम बना रखा था, इसलिए आज तो नहीं आ पाएंगे, किसी और दिन जरूर आएंगे "।
" मैंने कहा था ना कि वो नहीं आएंगे, अब तो भरोसा हो गया मेरी बात का ", पत्नी का चेहरा उसका यक़ीन पुख्ता करता लग रहा था। वो सोच में पड़ गया, अब उसका भी भरोसा डगमगाने लगा था। भारी मन से वो ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा।
एक बार फिर घण्टी बजी, इस बार भाभी थीं " हम लोग जरूर आएंगे शाम को, अभी आपके भाईजान ने मुझे बताया तो मैंने शाम का कार्यक्रम रद्द कर दिया। आप के यहाँ आने से जरुरी कोई भी कार्यक्रम नहीं है"।
उसने एक बार फिर पत्नी की तरफ़ देखा, पत्नी को रिश्तों की मज़बूती पर यक़ीन हो गया था।

जिन्दगी की शतरंज--

जिन्दगी की शतरंज--
सुबह तड़के उठकर वो घर से निकल गया , पत्नी और बच्ची सोये हुए थे। शहर में फैले तनाव की वज़ह से कल उसे कोई काम नहीं मिल पाया था और कल रात में जो बचा खुचा खाने का सामान था वो ख़त्म हो गया था। जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वो आज सबसे पहले पहुँच जाना चाहता था ताकि आज तो काम मिल जाए और रात को परिवार को खाना खिला पाये। चुनावी पोस्टरों से अटी पड़ी सड़कें और गलियाँ उन जैसों के विकास की ही बात कर रही थी।
अब उजाला फ़ैल गया था और वो मज़दूर मंडी में सबसे पहले पहुँच गया था। अब इंतज़ार था तो ठेकेदारों का जो आकर ले जाएँ काम पर। ठेकेदार तो आये लेकिन वो कर्म के नहीं, धर्म के थे और कुछ ही देर में पुलिस की गाड़ियाँ सायरन बजाते घूमने लगीं। दंगे फ़ैल गए और कर्फ्यू का आदेश जारी हो गया था। घबराहट में वो भागा और गोलियों से बचते बचाते अपने घर सामने पहुँचा।
सामने जलते हुए अपने घर को देखकर वो गश खाकर गिर पड़ा। जिन्दगी की शतरंज ने शह और मात दोनों दे दी थी।

गिरगिट--

" अरे देखो तो , वो बुढ़िया के बाल बेचने वाला गिरा पड़ा है । चलकर पूछ लेते है कि क्या हुआ है "। 
" बिना बात के पचड़े में क्यूँ फँसना , कहीं मर वर गया होगा तो मुसीबत में फँस जायेंगे ", पत्नी को झिड़कते हुए राजू ने बाइक आगे बढ़ा दी ।। 
अपने ही मोहल्ले का लड़का था वो , जब भी घर की तरफ से निकलता था , बच्चे को यूँ ही पकड़ा देता था एक पैकेट । पैसे मिले या न मिले , हँसते हुए आगे बढ़ जाता । जब भी पैसे नहीं देने होते , अपने ही घर का बना देता था उसे राजू । वो भी उसे बहुत मानती थी और कभी कभी खाने पीने को कुछ दे देती थी । आज उसको यूँ छोड़ के आगे चल देना उसे दिल में कचोट रहा था । 
अचानक राजू ने बाइक रोकी और उसकी निगाह सड़क के किनारे वाले पेड़ पर बैठे गिरगिट पर चली गयी । उसे अपने पति के पीठ का रंग भी बदलता महसूस हो रहा था ।