बहुत मनोरम था सब कुछ उस गौशाले में । एक से बढ़कर एक नस्ल की गायें थीं वहाँ पर और उनके रहने और खाने का सुन्दर स्थल । पुरे जिले में कोई ऐसी गौशाला नहीं थी और उसके मालिक की बहुत प्रतिष्ठा थी । जिसे देखो वही उनके धर्मपरायणता के गुणगान करता रहता था ।
आज वो भी देखने चला आया था इसे । उसे भी विश्वास होने लगा था लोगों की बातों पर कि इसके मालिक जैसा गौसेवक और धर्मात्मा शायद ही कोई और होगा इस जिले में । जगह जगह हरा चारा रखा हुआ था , बहुत से लोग उसे काटने में व्यस्त थे | गायों के रहने के स्थान से थोड़ी दूरी पर खेत भी थे जहाँ पर फसलें लहलहा रही थीं | पूछने पर पता चला कि ये ऑर्गनिक फसल है जिसे गाय के गोबर और उनके मूत्र के इस्तेमाल से उगाया जाता है और इनकी बहुत माँग है आजकल | पूरे गौशाले का चक्कर लगाने में उसे काफी समय लग गया और फिर वो उनके कमरे में पहुंचा । लेकिन पूरा गौशाला देखने के बाद उसके दिमाग में एक बात खटक रही थी , उसे बड़ी मुश्किल से एकाध ही , मरियल सा बछवा दिखा और बूढ़ी गायें तो बिलकुल नहीं थीं । अधिकांश बछिया ही थीं वहां पर और वो सोच में पड़ गया था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि यहाँ की गायें सिर्फ बछिया ही जनती हों और गायें बूढ़ी होने के बाद कहाँ चली जाती हैं ।
" नमस्कार , आप बहुत ही बड़े पुण्यात्मा हैं , गऊ माता की सेवा में तन मन धन से समर्पित हैं आप । आप जैसे लोगों से ही तो अपना धर्म सुरक्षित है वर्ना तो आजकल तो लोग सिर्फ अपना आर्थिक लाभ ही देखते हैं "।
" नमस्कार , बस आप सब लोगों का आशीर्वाद है । वैसे भी गऊ माता की सेवा में ही स्वर्ग है ", मुस्कुराते हुए उन्होंने बैठने के लिए कहा ।
" अच्छा , एक बात पूछना चाह रहा था । आपकी गौशाला में मुझे न तो बछवा नहीं दिखे , नहीं कोई बूढ़ी गाय , ऐसा कैसे संभव है "।
सवाल सुनकर तो एक बार वो चौंके , फिर उनके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कराहट फ़ैल गयी । " दरअसल आपका सोचना सही है , यहाँ सिर्फ बछिया ही नहीं पैदा होती हैं , बछवा भी पैदा होते हैं । लेकिन उनका कोई उपयोग तो है नहीं तो कौन उनको पाले और उनपर खर्च करे । बस उनको हम लोग खाना पीना नहीं देते हैं और वो कुछ ही दिन बाद काल कलवित हो जाते हैं | और बूढ़ी गायों को तो हम लोगों को दान दे देते हैं जिससे उनको भी गौ पालन का सुख मिल जाए "|
ये सब बताते हुए उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और उसे लग रहा था जैसे उसके सामने दूध का नहीं बल्कि खून का ग्लास रखा हो ।
आज वो भी देखने चला आया था इसे । उसे भी विश्वास होने लगा था लोगों की बातों पर कि इसके मालिक जैसा गौसेवक और धर्मात्मा शायद ही कोई और होगा इस जिले में । जगह जगह हरा चारा रखा हुआ था , बहुत से लोग उसे काटने में व्यस्त थे | गायों के रहने के स्थान से थोड़ी दूरी पर खेत भी थे जहाँ पर फसलें लहलहा रही थीं | पूछने पर पता चला कि ये ऑर्गनिक फसल है जिसे गाय के गोबर और उनके मूत्र के इस्तेमाल से उगाया जाता है और इनकी बहुत माँग है आजकल | पूरे गौशाले का चक्कर लगाने में उसे काफी समय लग गया और फिर वो उनके कमरे में पहुंचा । लेकिन पूरा गौशाला देखने के बाद उसके दिमाग में एक बात खटक रही थी , उसे बड़ी मुश्किल से एकाध ही , मरियल सा बछवा दिखा और बूढ़ी गायें तो बिलकुल नहीं थीं । अधिकांश बछिया ही थीं वहां पर और वो सोच में पड़ गया था कि ऐसा कैसे हो सकता है कि यहाँ की गायें सिर्फ बछिया ही जनती हों और गायें बूढ़ी होने के बाद कहाँ चली जाती हैं ।
" नमस्कार , आप बहुत ही बड़े पुण्यात्मा हैं , गऊ माता की सेवा में तन मन धन से समर्पित हैं आप । आप जैसे लोगों से ही तो अपना धर्म सुरक्षित है वर्ना तो आजकल तो लोग सिर्फ अपना आर्थिक लाभ ही देखते हैं "।
" नमस्कार , बस आप सब लोगों का आशीर्वाद है । वैसे भी गऊ माता की सेवा में ही स्वर्ग है ", मुस्कुराते हुए उन्होंने बैठने के लिए कहा ।
" अच्छा , एक बात पूछना चाह रहा था । आपकी गौशाला में मुझे न तो बछवा नहीं दिखे , नहीं कोई बूढ़ी गाय , ऐसा कैसे संभव है "।
सवाल सुनकर तो एक बार वो चौंके , फिर उनके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कराहट फ़ैल गयी । " दरअसल आपका सोचना सही है , यहाँ सिर्फ बछिया ही नहीं पैदा होती हैं , बछवा भी पैदा होते हैं । लेकिन उनका कोई उपयोग तो है नहीं तो कौन उनको पाले और उनपर खर्च करे । बस उनको हम लोग खाना पीना नहीं देते हैं और वो कुछ ही दिन बाद काल कलवित हो जाते हैं | और बूढ़ी गायों को तो हम लोगों को दान दे देते हैं जिससे उनको भी गौ पालन का सुख मिल जाए "|
ये सब बताते हुए उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी और उसे लग रहा था जैसे उसके सामने दूध का नहीं बल्कि खून का ग्लास रखा हो ।
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