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Tuesday, September 30, 2014

बालों की देखभाल--

बचपन का समय बहुत प्यारा था , सबका होता है , सिर्फ उन बच्चों को छोड़कर जो दुकानो एवम अन्य जगहों पर काम करते हैं | पता नहीं क्यों , लेकिन शुरू से ही बालों में तेल लगाने की आदत पड़ गयी ( जो आज भी बदस्तूर जारी है ) | शायद पहले माँ , आजी इत्यादि रोज ही तेल चुपड़ देतीं थीं तो धीरे धीरे वो कब दिनचर्या में शामिल हो गया पता नहीं चला | शुरू में तो सिर्फ कड़ुआ तेल ( सरसों का तेल ) ही होता था लगाने के लिए लेकिन जैसे जैसे बड़े होते गए , कड़ुआ तेल पीछे छूट गया | 
फिर समय आया आमला तेल का , डाबर आमला | नहाने के बाद पहला काम होता था बालों में तेल लगाना | फिर उसके बाद किसी और चीज की जरुरत महसूस नहीं होती थी , न तो कोई क्रीम , न कुछ और | श्रृंगार के नाम पर सिर्फ और सिर्फ बालों में तेल | फिर हॉस्टल में आये , देखा की अव्वल तो कोई तेल लगाता ही नहीं और अगर लगाता है तो केओ कार्पिन | अब समाज में रहना था तो उसी हिसाब से बदलना पड़ा अपने तेल को भी | कुछ सीजन में पैराशूट नारियल तेल भी लगाते थे और बाकि समय केओ कार्पिन | फिर प्रचार देख कर महसूस हुआ कि तेल लगाने से बालों में चिपचिपाहट भी होती है तो खोज शुरू हुई ऐसे तेल की जो चिपचिपाहट रहित हो |
एक मित्र थे जो सौंदर्य प्रसाधनो के जानकार थे | उन्होंने राय दी कि आजकल तमाम लाइट तेल आ रहे हैं , उनका प्रयोग करो | खैर अब तेलों में भी लाइट तेल की खोज शुरू हुई और उसका इस्तेमाल प्रारम्भ हो गया | उसी समय उनकी सलाह पर कैंथरैडिन तेल मिला जो सचमुच बहुत लाइट था और बिलकुल पता नहीं चलता था |
कॉलेज ख़त्म हुआ और नौकरी की शुरुआत हुई | तमाम नयी चीजों , जैसे शेविंग क्रीम लगाना , डेओ लगाना और परफ्यूम इत्यादि का प्रयोग शुरू हो गया , लेकिन सर पे तेल लगाने की आदत बदस्तूर जारी रही | कहीं भी बाहर जाना होता तो मंजन ब्रश के अलावा अगर किसी और चीज की बेशाख्ता जरुरत महसूस होती तो वो बालों के तेल की ही | शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि नहाने के बाद तेल का प्रयोग नहीं किया हो बालों में |
अभी भी वो आदत बरक़रार है , बस तेल अब बदल कर आलमंड का हो गया है | लेकिन एक बात का अफ़सोस रहता है कि काश अपने सर की खेती थोड़ी कमजोर होती तो शायद धन के मामले में इतना कमजोर नहीं रहते ( सुना है , पढ़ा है और देखा भी है की पैसा उनके पास ही बहुतायत में रहता है जिनके सर पर बाल कम होते हैं ) |

Sunday, September 28, 2014

बच्चे--

" कहाँ से ले आई ये गन्दी गुड़िया ", मम्मी ने उसे बाहर फेंक दिया |
" मुझे वही चाहिए " , मुन्नी चिल्लाने लगी |
" इतने सारे सुन्दर खिलौने हैं तो तुम्हारे पास , जिद नहीं करते "|
माली की लड़की अपनी गुड़िया लेकर भाग गयी , मुन्नी रोते रोते सो गयी |
अगले दिन माली की लड़की नए खिलौने से खेल रही थी और मुन्नी पुरानी गुड़िया से |
" ये बच्चे न ", दोनों माताएं सोच रहीं थी |

ऑंखें --

पूरी रात लगा रहा वो माँ की मूर्ति को पूरा करने में | अब सिर्फ रंग भरना बाकी था | थकान हावी हो रही थी लेकिन सुबह से पहले हर हाल में इसे पूर्ण करना था |
सुबह उसकी पत्नी ने उसे झगझोर कर जगाया " ये क्या किया तुमने , ऑंखें यूँ ही छोड़ दी , क्या माँ की ऑंखें नहीं खुलेंगी " |
उसने उनींदे ही जवाब दिया " आजकल सचमुच खुलती हैं क्या माँ की ऑंखें " , और वापस सो गया |

Sunday, September 21, 2014

एक अनोखी यात्रा --

२००७ में बॉम्बे पोस्टिंग हुई थी | बॉम्बे में पहुँच कर सारे लोग व्यवस्थित हों गए कुछ दिन में और जिंदगी वहां के हिसाब से ढल गयी | लगभग ६ महीने बीत गए थे और फिर बनारस जाने का कार्यक्रम बना | अकेले ही जाना था , पहली यात्रा थी बनारस की , इसलिए बहुत उत्साहित था | आने जाने का टिकट नेट से करा लिया था | आखिर जाने का दिन आ ही गया | ट्रैन थी रात के १२ बज कर १० मिनट पर , इसलिए घर से रात को १० बजे निकले और ११ बजे वी टी स्टेशन पर पहुंचे | प्लेटफार्म पर पहुँच कर इंतज़ार करना था तो सोचा की क्यों न चार्ट में अपना नाम देख लिया जाये | चार्ट को एक बार देखा , दुबारा देखा लेकिन नाम नदारद | अब चिंता होने लगी , बार बार टिकट देखा , सब ठीक था | मेरी बर्थ कन्फर्म थी लेकिन चार्ट में से नाम क्यों गायब था |खैर ट्रैन २ घंटे लेट थी तो टी टी को खोजना शुरू किया | कुछ देर बाद एक दिखा तो उससे पूछा , उसने टिकट देखा और बताया कि ये तो कल का टिकट था | दरअसल रात के १२.१० के चलते गड़बड़ हों गयी थी , अब तो पसीना छूटने लगा | उस दिन दशहरा था इसलिए भीड़ भाड़ कम थी | रात के २ बज चुके थे और ट्रैन एक घंटे में जाने वाली थी | वापस लौटने के लिए भी सोचा लेकिन वापसी की लोकल ट्रैन भी ४ बजे ही मिलती |
काफी देर मैं इसी उधेड़बुन में रहा कि बनारस जाऊँ या वापस लौटूं | फिर हिम्मत जुटा कर सोचा कि बनारस ही चलते हैं | टिकट भी नहीं था और रिजर्वेशन भी नहीं , फिर टिकट काउंटर से जाकर एक सामान्य टिकट लिया | वापस प्लेटफार्म पर आकर टी टी को पूछना शुरू किया कि किसी भी क्लास में बर्थ मिल जाये लेकिन सभी ने मना कर दिया | अब तो एक ही रास्ता था कि किसी सामान्य डिब्बे में घुसा जाये और आगे की यात्रा की जाये | एक सामान्य डिब्बे में घुसा , नीचे की बर्थ पर जगह थी | मैंने हिम्मत जुटाई और बैठ गया |
थोड़ी देर में ट्रैन चल दी और उम्मीद के विपरीत बिलकुल भी भीड़ नहीं आई डिब्बे में | काफी सामान भी था मेरे पास और पैसे भी इसलिए घबराया हुआ था | लेकिन सुबह होते होते ये आभास हों गया कि ज्यादा दिक्कत नहीं होने वाली है | धीरे धीरे डब्बा भर गया था लेकिन शायद मेरे अटैची और कपडे के चलते लोगों ने मुझे काफी जगह दे रखी थी | कोई भी नीचे जाता तो पूछ लेता कि कुछ लाना है क्या | इस तरह दिन बीत गया , फिर रात भी सोते जागते बीत गयी | अगले दिन करीब ३ घंटे देर से ट्रैन बनारस पहुंची और मैं उतर के घर पहुंचा | शरीर का तो बुरा हाल था , हड्डियां चरमरा गयीं थीं बैठे बैठे , लेकिन घर पहुँचने के उत्साह ने इन सब बातों को दरकिनार कर दिया था | मैं सचमुच सही सलामत बम्बई से बनारस सामान्य डिब्बे में सफर करके पहुँच गया | लेकिन मेरी हिम्मत नहीं पड़ी कि मैं घर पर या बॉम्बे में बताऊँ कि मैं सामान्य डिब्बे में सफर करके आया हूँ | वापस आने के महीनो बाद मैंने ये बात सबको बताई और फिर ये कसम भी खायी कि अब से रिजर्वेशन करते समय कई बार चेक करूँगा , खासकर अगर ट्रैन का समय अर्धरात्रि के आस पास हो | आज ये सोचता हूँ तो लगता है कि कैसे हिम्मत जुटा ली थी मैंने..

संकल्प--

माली बड़े जतन से पौधों को सींच रहा था और उसके चेहरे पर एक सुकून की रेखा खिंची हुई थी | इंसान होकर पौधों से इतना लगाव , शायद पेशागत , शायद जीवन का स्पंदन महसूस करने की शक्ति या कुछ और |
छोटा भी वहीँ खेल रहा था , उसकी माँ के चेहरे पर भी वही सुकून दिख रहा था | घर की याद आ गयी , कितने महीने हो गए हैं अपने गांव गए | शायद माँ बाप ने भी ऐसे ही सींचा होगा बचपन में हमें |
अचानक माली ने एक सूखा पौधा उखाड़ा | मन में कहीं चुभा कुछ , छोटा वैसे ही खेल रहा था और उसकी माँ वैसे ही खोयी हुई थी उसमें | लेकिन अब गांव जाने का संकल्प पक्का हो गया था |

Saturday, September 20, 2014

मदद--

एक वाकया याद आता है मुग़लसराय का जो कोयले और रेलवे यार्ड के लिए मशहूर है और वहां रेल का डी आर एम ऑफिस भी है | रेलवे के बहुत सारे कर्मचारियों के वेतन का खाता हमारी शाखा में था और महीने के करीब १० दिन बहुत भीड़ भाड़ रहती थी | कभी कभी तो पूरा दिन ही सिर्फ वेतन के भुगतान में निकल जाता था लेकिन लोग संतुष्ट थे |
एक उच्चाधिकारी के पिताजी का अकस्मात् निधन हो गया था और उनको तुरंत अपने घर जाना था | वे लखनऊ में थे और उनको ट्रेन से घर जाना था लेकिन ट्रेन में कोई सीट उपलब्ध नहीं थी | रात के करीब १० बजे ये सूचना मिली की वो बनारस कार से आ रहे हैं और मुग़लसराय से उनको सुबह ८ बजे ट्रेन पकड़नी थी | इतनी रात को कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी रिजर्वेशन दिलाने की , लेकिन फिर भी एक टी सी से बात हुई सुबह सुबह और अपने उच्चाधिकारी को लेकर मैं सुबह करीब ७ बजे प्लेटफार्म पहुँच गया | वहां पर उस टी सी से मुलाक़ात हुई , उसने हमें अपने ऑफिस में बैठा दिया और बोला कि मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि एक सीट मिल जाये | कोई और रास्ता नहीं था इसलिए हम लोग बैठ गए | थोड़ी देर बाद किसी ने नमस्ते किया और पूछा कि यहाँ क्यों बैठे हैं | वो भी टी सी था , जैसे ही उसे पता चला , वो भी लग गया सीट के इंतज़ाम में | अगले आधे घंटे में करीब १० टी सी आये और कमोबेश सभी ने वही सवाल पूछा और सब सीट के लिए लग गए | पता नहीं कितने लोगों ने चाय वगैरह के लिए भी पूछा , लेकिन उस समय तो एकलौती चिंता सीट की थी |
थोड़ी देर बाद एक टी सी आया जिसे उसी ट्रेन से जाना था | उसने मुझसे पूछा कि आपको एक ही सीट चाहिए न | मैंने हाँ में उत्तर दिया तो उसने फिर कहा कि करीब दस लोग मुझसे कह चुके हैं कि हर हालत में एक सीट चाहिए तो मैंने सोचा कि देख लूँ कौन है जिसके लिए इतने लोग सिफारिश कर रहे हैं | आप इत्मीनान रखिये , आपको सीट मिल जाएगी , अब और किसी से मत कहियेगा | मैंने झेंपते हुए कहा कि लोग मुझसे पूछ रहे हैं इसलिए बताना पड़ रहा है |
ट्रैन आई और सारे टी सी आ गए लिवाने | उनको सीट पे बैठाकर जब मैं वापस आ रहा था तो उन्होंने पूछा " तुम इनके लिए क्या करते हो जो आज सारे मदद के लिए खड़े थे | मैंने कहा कि बस इतनी कोशिश करता हूँ कि जो भी हमारी शाखा में आये वो संतुष्ट होकर लौटे " |
उस दिन मुझे विश्वास हो गया कि दूसरों के लिए की गयी मदद हमारे पास किसी न किसी रूप में वापस आ ही जाती है |

Sunday, September 14, 2014

नींद--

एक और वाकया याद आता है बी एच यू का | दरअसल नींद की शुरू से ही बीमारी रही है मुझे | बहुत धनी था मैं इसमें और शायद पढ़ाई के दिनों में तो कुछ ज्यादा ही प्यारी हो जाती थी ये | ग्रेजुएशन में सेमेस्टर में दो परीक्षाएं होती थीं और और अधिकांशतयाः पढ़ाई परीक्षा की रात में ही होती थी | मैं पूरी रात जग के पढ़ता था और दिन में सो लेता था , क्योंकि कोई और विकल्प नहीं था | तमाम लड़के इस बात को जानते थे और मेरे कमरे में लगभग रोज़ १५ से २० लोग अपना जगाने का समय लिखा जाते थे | मैं , जैसे जैसे समय मिलता , लोगों को जगा देता था | कुछ लड़के तो यहाँ तक कहते कि जब तक मैं उठ के बाहर निकल कर मुंह धो के न आ जाऊँ , तब तक मत जाना | एक बार एक हादसा हो गया था , मैंने एक लड़के को जगाया , वो उठा और बोला ठीक है जाओ और मैं चला आया | सुबह सुबह वो मुझे गलियां देने लगा कि तुमने मुझे जगाया नहीं | मैंने सफाई दी कि तुम्हे जगाया तो था और तुम बोले कि ठीक है अब जाओ , तो वो अपना सर धुनने लगा कि मैं तो वापस सो गया था |
खैर , मेरा रूम पार्टनर मेरे रात भर जागने से परेशान रहता था , लेकिन क्या करे | लेकिन उसे कही न कहीं ये भरोसा भी होने लगा था कि मैं बहुत कम सोता हूँ | ऐसे ही एक दिन बातों बातों में उसने मुझसे शर्त लगायी कि देखतें हैं कौन ज्यादा सोता है | मैंने उसे कहा भी कि तुम मेरा मुक़ाबला नहीं कर पाओगे लेकिन वो निश्चिंत था कि वो ही जीतेगा | खैर , शनिवार को परीक्षा ख़त्म हो रही थी और उसी रात को हमारा मुक़ाबला होना था | अपनी आदतानुसार मैं शुक्रवार रात भर जगा रहा , सुबह परीक्षा दी और दिन में सोने का कार्यक्रम मुल्तवी कर दिया | उधर मेरा प्रतिद्वंदी रात में फिल्म देखने चला गया और मैं १० बजे खाना खा के सो गया | जाड़े का समय था और मेरी आदत थी रज़ाई से मुंह ढँक कर सोने की | करीब रात के साढ़े बारह बजे वो वापस आया और दरवाजा खटखटाने लगा | करीब १० मिनट बाद भी जब कोई आहट नहीं हुई तो वो मेरा नाम लेके जोर जोर से चिल्लाने लगा और दरवाजा पीटने लगा | धीरे धीरे उस तल के बहुत सारे लड़के जग गए और अपने कमरों से निकल कर मेरे कमरे के सामने आ गए | जब लोगों ने पीटने और चिल्लाने में अपनी सारी ताक़त लगा ली तो उनके सामने एक ही विकल्प बचा था कि दरवाज़ा तोड़ दिया जाए | तभी एक लड़के ने कहा कि ऊपर का रोशनदान खुला है , उससे पानी गिराते हैं और फिर लोगों ने मेज लगाकर रोशनदान से पानी गिराना शुरू किया | पानी जब रज़ाई से छनकर मुंह पर आया तो ठण्ड से आँख खुल गयी | मैंने जैसे ही रज़ाई हटाई , वैसे ही दरवाजे पर ज़ोर से दस्तक हुई और लोगों कि चिल्लाने की आवाज़ भी आई | मैंने हड़बड़ाकर दरवाजा खोला और दरवाज़ा खुलते ही एक साथ कई लड़के अंदर आ गए | गालियों की बौछार शुरू थी और मैं हक्का बक्का देख रहा था | कुछ देर में सब चले गए और मेरे पार्टनर ने मुझसे पूछा " तुम सच में सोये थे , हम तो डर गए थे कि कहीं कुछ और तो नहीं हो गया था " | उसके बाद उसने कहा कि प्रभु , अपने चरण दिखाओ , तुमसे सोने में जीतना तो दूर , प्रतिस्पर्धा भी नहीं कर सकता मैं | अगले दिन सुबह मेस में नाश्ते के समय तमाम उंगलियां मेरी तरफ दिखाई जा रहीं थी कि वही लड़का है जो कल सो गया था |
लेकिन हक़ीक़त यही थी कि मैं सचमुच सो गया था |