बचपन का समय बहुत प्यारा था , सबका होता है , सिर्फ उन बच्चों को छोड़कर जो दुकानो एवम अन्य जगहों पर काम करते हैं | पता नहीं क्यों , लेकिन शुरू से ही बालों में तेल लगाने की आदत पड़ गयी ( जो आज भी बदस्तूर जारी है ) | शायद पहले माँ , आजी इत्यादि रोज ही तेल चुपड़ देतीं थीं तो धीरे धीरे वो कब दिनचर्या में शामिल हो गया पता नहीं चला | शुरू में तो सिर्फ कड़ुआ तेल ( सरसों का तेल ) ही होता था लगाने के लिए लेकिन जैसे जैसे बड़े होते गए , कड़ुआ तेल पीछे छूट गया |
फिर समय आया आमला तेल का , डाबर आमला | नहाने के बाद पहला काम होता था बालों में तेल लगाना | फिर उसके बाद किसी और चीज की जरुरत महसूस नहीं होती थी , न तो कोई क्रीम , न कुछ और | श्रृंगार के नाम पर सिर्फ और सिर्फ बालों में तेल | फिर हॉस्टल में आये , देखा की अव्वल तो कोई तेल लगाता ही नहीं और अगर लगाता है तो केओ कार्पिन | अब समाज में रहना था तो उसी हिसाब से बदलना पड़ा अपने तेल को भी | कुछ सीजन में पैराशूट नारियल तेल भी लगाते थे और बाकि समय केओ कार्पिन | फिर प्रचार देख कर महसूस हुआ कि तेल लगाने से बालों में चिपचिपाहट भी होती है तो खोज शुरू हुई ऐसे तेल की जो चिपचिपाहट रहित हो |
एक मित्र थे जो सौंदर्य प्रसाधनो के जानकार थे | उन्होंने राय दी कि आजकल तमाम लाइट तेल आ रहे हैं , उनका प्रयोग करो | खैर अब तेलों में भी लाइट तेल की खोज शुरू हुई और उसका इस्तेमाल प्रारम्भ हो गया | उसी समय उनकी सलाह पर कैंथरैडिन तेल मिला जो सचमुच बहुत लाइट था और बिलकुल पता नहीं चलता था |
कॉलेज ख़त्म हुआ और नौकरी की शुरुआत हुई | तमाम नयी चीजों , जैसे शेविंग क्रीम लगाना , डेओ लगाना और परफ्यूम इत्यादि का प्रयोग शुरू हो गया , लेकिन सर पे तेल लगाने की आदत बदस्तूर जारी रही | कहीं भी बाहर जाना होता तो मंजन ब्रश के अलावा अगर किसी और चीज की बेशाख्ता जरुरत महसूस होती तो वो बालों के तेल की ही | शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि नहाने के बाद तेल का प्रयोग नहीं किया हो बालों में |
अभी भी वो आदत बरक़रार है , बस तेल अब बदल कर आलमंड का हो गया है | लेकिन एक बात का अफ़सोस रहता है कि काश अपने सर की खेती थोड़ी कमजोर होती तो शायद धन के मामले में इतना कमजोर नहीं रहते ( सुना है , पढ़ा है और देखा भी है की पैसा उनके पास ही बहुतायत में रहता है जिनके सर पर बाल कम होते हैं ) |
फिर समय आया आमला तेल का , डाबर आमला | नहाने के बाद पहला काम होता था बालों में तेल लगाना | फिर उसके बाद किसी और चीज की जरुरत महसूस नहीं होती थी , न तो कोई क्रीम , न कुछ और | श्रृंगार के नाम पर सिर्फ और सिर्फ बालों में तेल | फिर हॉस्टल में आये , देखा की अव्वल तो कोई तेल लगाता ही नहीं और अगर लगाता है तो केओ कार्पिन | अब समाज में रहना था तो उसी हिसाब से बदलना पड़ा अपने तेल को भी | कुछ सीजन में पैराशूट नारियल तेल भी लगाते थे और बाकि समय केओ कार्पिन | फिर प्रचार देख कर महसूस हुआ कि तेल लगाने से बालों में चिपचिपाहट भी होती है तो खोज शुरू हुई ऐसे तेल की जो चिपचिपाहट रहित हो |
एक मित्र थे जो सौंदर्य प्रसाधनो के जानकार थे | उन्होंने राय दी कि आजकल तमाम लाइट तेल आ रहे हैं , उनका प्रयोग करो | खैर अब तेलों में भी लाइट तेल की खोज शुरू हुई और उसका इस्तेमाल प्रारम्भ हो गया | उसी समय उनकी सलाह पर कैंथरैडिन तेल मिला जो सचमुच बहुत लाइट था और बिलकुल पता नहीं चलता था |
कॉलेज ख़त्म हुआ और नौकरी की शुरुआत हुई | तमाम नयी चीजों , जैसे शेविंग क्रीम लगाना , डेओ लगाना और परफ्यूम इत्यादि का प्रयोग शुरू हो गया , लेकिन सर पे तेल लगाने की आदत बदस्तूर जारी रही | कहीं भी बाहर जाना होता तो मंजन ब्रश के अलावा अगर किसी और चीज की बेशाख्ता जरुरत महसूस होती तो वो बालों के तेल की ही | शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि नहाने के बाद तेल का प्रयोग नहीं किया हो बालों में |
अभी भी वो आदत बरक़रार है , बस तेल अब बदल कर आलमंड का हो गया है | लेकिन एक बात का अफ़सोस रहता है कि काश अपने सर की खेती थोड़ी कमजोर होती तो शायद धन के मामले में इतना कमजोर नहीं रहते ( सुना है , पढ़ा है और देखा भी है की पैसा उनके पास ही बहुतायत में रहता है जिनके सर पर बाल कम होते हैं ) |
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