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Sunday, September 21, 2014

एक अनोखी यात्रा --

२००७ में बॉम्बे पोस्टिंग हुई थी | बॉम्बे में पहुँच कर सारे लोग व्यवस्थित हों गए कुछ दिन में और जिंदगी वहां के हिसाब से ढल गयी | लगभग ६ महीने बीत गए थे और फिर बनारस जाने का कार्यक्रम बना | अकेले ही जाना था , पहली यात्रा थी बनारस की , इसलिए बहुत उत्साहित था | आने जाने का टिकट नेट से करा लिया था | आखिर जाने का दिन आ ही गया | ट्रैन थी रात के १२ बज कर १० मिनट पर , इसलिए घर से रात को १० बजे निकले और ११ बजे वी टी स्टेशन पर पहुंचे | प्लेटफार्म पर पहुँच कर इंतज़ार करना था तो सोचा की क्यों न चार्ट में अपना नाम देख लिया जाये | चार्ट को एक बार देखा , दुबारा देखा लेकिन नाम नदारद | अब चिंता होने लगी , बार बार टिकट देखा , सब ठीक था | मेरी बर्थ कन्फर्म थी लेकिन चार्ट में से नाम क्यों गायब था |खैर ट्रैन २ घंटे लेट थी तो टी टी को खोजना शुरू किया | कुछ देर बाद एक दिखा तो उससे पूछा , उसने टिकट देखा और बताया कि ये तो कल का टिकट था | दरअसल रात के १२.१० के चलते गड़बड़ हों गयी थी , अब तो पसीना छूटने लगा | उस दिन दशहरा था इसलिए भीड़ भाड़ कम थी | रात के २ बज चुके थे और ट्रैन एक घंटे में जाने वाली थी | वापस लौटने के लिए भी सोचा लेकिन वापसी की लोकल ट्रैन भी ४ बजे ही मिलती |
काफी देर मैं इसी उधेड़बुन में रहा कि बनारस जाऊँ या वापस लौटूं | फिर हिम्मत जुटा कर सोचा कि बनारस ही चलते हैं | टिकट भी नहीं था और रिजर्वेशन भी नहीं , फिर टिकट काउंटर से जाकर एक सामान्य टिकट लिया | वापस प्लेटफार्म पर आकर टी टी को पूछना शुरू किया कि किसी भी क्लास में बर्थ मिल जाये लेकिन सभी ने मना कर दिया | अब तो एक ही रास्ता था कि किसी सामान्य डिब्बे में घुसा जाये और आगे की यात्रा की जाये | एक सामान्य डिब्बे में घुसा , नीचे की बर्थ पर जगह थी | मैंने हिम्मत जुटाई और बैठ गया |
थोड़ी देर में ट्रैन चल दी और उम्मीद के विपरीत बिलकुल भी भीड़ नहीं आई डिब्बे में | काफी सामान भी था मेरे पास और पैसे भी इसलिए घबराया हुआ था | लेकिन सुबह होते होते ये आभास हों गया कि ज्यादा दिक्कत नहीं होने वाली है | धीरे धीरे डब्बा भर गया था लेकिन शायद मेरे अटैची और कपडे के चलते लोगों ने मुझे काफी जगह दे रखी थी | कोई भी नीचे जाता तो पूछ लेता कि कुछ लाना है क्या | इस तरह दिन बीत गया , फिर रात भी सोते जागते बीत गयी | अगले दिन करीब ३ घंटे देर से ट्रैन बनारस पहुंची और मैं उतर के घर पहुंचा | शरीर का तो बुरा हाल था , हड्डियां चरमरा गयीं थीं बैठे बैठे , लेकिन घर पहुँचने के उत्साह ने इन सब बातों को दरकिनार कर दिया था | मैं सचमुच सही सलामत बम्बई से बनारस सामान्य डिब्बे में सफर करके पहुँच गया | लेकिन मेरी हिम्मत नहीं पड़ी कि मैं घर पर या बॉम्बे में बताऊँ कि मैं सामान्य डिब्बे में सफर करके आया हूँ | वापस आने के महीनो बाद मैंने ये बात सबको बताई और फिर ये कसम भी खायी कि अब से रिजर्वेशन करते समय कई बार चेक करूँगा , खासकर अगर ट्रैन का समय अर्धरात्रि के आस पास हो | आज ये सोचता हूँ तो लगता है कि कैसे हिम्मत जुटा ली थी मैंने..

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