अचानक उसकी नज़र पड़ी पिताजी पर, टिफ़िन को लेकर हाल में खड़े थे और शायद चपरासी किसुन को ढूँढ रहे थे जिसे टिफ़िन पकड़ा सकें| आज वो जल्दी निकल आया था ऑफिस, उस समय तक टिफ़िन नहीं बन पाया था| उसने मना भी किया था कि कुछ मत भेजना, मैं यहीं कुछ खा लूंगा, लेकिन माँ ने भेज ही दिया| उसने अपने काउंटर को बंद किया और पिताजी के पास पहुँच कर टिफ़िन ले लिया|
"क्या जरुरत थी आपको लाने की, मैंने कहा तो था कि यहीं कुछ खा लूंगा", उसने पिताजी से कहा|
"लेकिन तुमको क्या जरुरत थी काउंटर बंद करके यहाँ आने की, लोग इंतज़ार कर रहे हैं| मैं तो किसुन को देख रहा था, उसको देकर चला जाता", पिताजी ने लोगों की कतार को देखते हुए कहा|
"ठीक है, १० मिनट में क्या हो जायेगा पिताजी, यहाँ तो रोज ही ऐसी कतार लगी रहती है"|
"बेटा, टिकट की लाइन में खड़े रहने पर अगर काउंटर वाला बाहर निकल कर किसी से बात करने लगे तो कैसा महसूस करते हो", कहते हुए पिताजी चले गए| अब उसे कतार में खड़े हर व्यक्ति में अपना तमतमाया चेहरा नज़र आने लगा|
काउंटर पर बैठकर अब उसकी उँगलियाँ दुगुने तेजी से कार्य निपटा रही थीं|
"क्या जरुरत थी आपको लाने की, मैंने कहा तो था कि यहीं कुछ खा लूंगा", उसने पिताजी से कहा|
"लेकिन तुमको क्या जरुरत थी काउंटर बंद करके यहाँ आने की, लोग इंतज़ार कर रहे हैं| मैं तो किसुन को देख रहा था, उसको देकर चला जाता", पिताजी ने लोगों की कतार को देखते हुए कहा|
"ठीक है, १० मिनट में क्या हो जायेगा पिताजी, यहाँ तो रोज ही ऐसी कतार लगी रहती है"|
"बेटा, टिकट की लाइन में खड़े रहने पर अगर काउंटर वाला बाहर निकल कर किसी से बात करने लगे तो कैसा महसूस करते हो", कहते हुए पिताजी चले गए| अब उसे कतार में खड़े हर व्यक्ति में अपना तमतमाया चेहरा नज़र आने लगा|
काउंटर पर बैठकर अब उसकी उँगलियाँ दुगुने तेजी से कार्य निपटा रही थीं|
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