Translate

Thursday, December 27, 2018

फोन की घंटी बज रही थी, उसने उठाया तो विजय का नंबर दिखा. आज बहुत दिनों बाद उसका फोन आया, सोचते हुए उसने फोन उठाया और बात करने लगा.

दरअसल असली मसला और कुछ है-अधूरी कहानी

दरवाजे की ओट में बैठी लक्ष्मी ने देखा, बछड़ा एक बार फिर गिर गया. कुछ पल वह उठने की कोशिश करता रहा लेकिन फिर बैठ गया. दूर खूंटे पर बंधी उसकी माँ उसे देख रही थी और अपना सर हिला रही थी गोया वह उसे उठने के लिए प्रेरणा दे रही हो. पैदा तो वह तंदरुस्त ही हुआ था लेकिन उसके देखते ही देखते पिछले एक महीने में वह बेहद कमजोर हो गया था. वह उसको लगातार देखती जा रही थी, एक मन करता कि जाकर उसे खड़ा कर दे लेकिन बाहर कैसे निकले, कभी उसने दिन में दालान पार नहीं किया था. फिर मन ही मन वह उसके खड़े हो जाने की प्रार्थना करने लगी. चरनी पर बंधी दो गायें और उनकी बछिया इन सब चीजों से निर्लिप्त नाद में मुंह डाले भूषा खा रही थीं.
अक्सर लक्ष्मी की दोपहर कुछ ऐसी ही बीतती थी, घर में सासू थीं जो सो जाती थीं. पति और जेठ या तो खेत पर होते थे या गांव में कहीं बतकही में शामिल रहते. जेठानी आजकल अपने बच्चों के साथ मायके गयी थीं तो वह अकेली ही अपनी बेटियों के साथ थी. बड़ी बेटी स्कूल चली जाती और छोटी बेटी अभी जुम्मा जुम्मा एक महीने की ही हुई थी. अचानक उसके रोने की आवाज़ आयी तो वह वर्तमान में लौटी और उठकर बेटी के पास चली गयी.
बेटी को स्तनपान कराते समय उसे अपना बचपन याद आ गया. इस गांव से लगभग १५० किमी दूर उसका मायका था जहाँ वह एक किसान परिवार में ही पैदा हुई थी. तीन बहनों में वह सबसे छोटी थी और एक भाई था जो सबसे छोटा था. गनीमत थी कि चौथे नंबर पर भाई पैदा हो गया वर्ना एकाध और बहनें और पैदा हो जातीं. और भाई के पैदा होने के बाद कम से कम तीनों बहनों को कोसने का काम कम हो गया, वर्ना उसकी माँ और उन तीनों को दादी हमेशा खाने वाली नज़रों से ही देखती थीं. पिताजी थोड़े संयत व्यक्ति थे लेकिन दादी के भड़काने पर वह भी माँ को बुरा भला बोल देते, कभी कभी हाथ भी उठा देते. लेकिन अमूमन तीनों बहनों को वह ज्यादा कुछ नहीं कहते थे. समय बीतता गया, हर बहन की शादी उसके परिवार के लिए एक गहरा आघात लाती. जमीन तो वैसे भी बहुत नहीं थी और हर शादी में उसका एक हिस्सा निकल जाता.
तीसरी शादी उसकी थी और तब तक भाई भी इंटर कालेज में पढ़ने चला गया था. माँ उसे अचानक बहुत बूढी लगने लगी थी और पिताजी बिलकुल खामोश. बहरहाल शादी के बाद वह यहाँ आयी और फिर साल दो साल में एक बार ही मायके जाना हो पाता. अब तो भाई की भी शादी हो गयी थी और वह भी दो बच्चों का बाप बन गया. एक दो बार मायके जाने के बाद ही उसे महसूस हो गया था कि उसका आना किसी को भी बहुत अच्छा नहीं लगता था, शायद माँ को भी. 

विरासत - लघुकथा

लगभग सभी रिश्तेदार अब जा चुके थे, चौथी बाहर दालान में बैठे बैठे खलिहान की तरफ देख रहे थे. आज पिताजी को गुजरे १५ दिन बीत गए थे, तेरही ठीक तरह से निपट गयी थी, गांव घर के लोग भी भोज से संतुष्ट थे. बहनें जाते जाते उसको समझा गयी थीं कि अब तुम्हीं घर के बड़े हो और घर की सारी जिम्मेदारी अब तुम्हारी है. माँ बगल की खाट पर लेटी थी, उधर खलिहान में बंधी काली गईया नाद पर चुपचाप खड़ी थी, उसका मुंह नाद में कम ही जा रहा था.
"क्या पिताजी, आप रोज इस काली गईया को क्यों खाते समय सहलाते हैं. अरे आख़िरकार यह गाय ही है कोई आपकी बिटिया नहीं जिसे इतना लाड़ जताते हैं", वह लगभग रोज ही पिताजी को टोकता था जो इतनी उम्र होने पर भी अपनी आदत नहीं बदले थे. माँ उसे समझाती कि पिताजी की आदत है, जाने दे, तुझे क्यों दिक्कत होती है.
"मुझे तो समझ में नहीं आता इनका यह काम, मेरे बस का नहीं है यह सब", वह माँ से कहता और बाहर निकल जाता. पिताजी उम्र काफी हो जाने के चलते अब घर ही रहते थे और खेती बारी की सभी जिम्मेदारियां वह बखूबी निभा रहा था.
अचानक घुंघरू की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ, काली गईया ने पलट कर घर की तरफ देखा था. उसने बगल में बैठी माँ की तरफ देखा और उठ कर खलिहान की तरफ बढ़ गया. कुछ ही देर बाद वह काली गईया की पीठ सहला रहा था और वह मजे में नाद में मुंह डालकर खा रही थी.

कुछ अलग सी वजह- लघुकथा

आज उसके छह महीने पूरे हो रहे थे, कल से वह वापस अपनी खूबसूरत और आरामदायक दुनिया में जा सकता था. उसे याद आया, जब से सरकार ने नियम बनाया था कि हर डॉक्टर को छह महीने गांव में प्रैक्टिस करनी पड़ेगी, उसके लिए यह करना सबसे कठिन था. पिताजी की अच्छी खासी दुनिया थी उस महानगर में, बड़ी हवेली, भरा पूरा परिवार और हर तरह की सुख सुविधा. एम बी बी एस करने के बाद सबने यही कहा था कि छह महीने तो फटाफट गुजर जायेंगे और उसके बाद पिताजी महानगर में ही सब इंतज़ाम करा देंगे.
गांव में जिसके घर वह रह रहा था, उनकी उम्र काफी थी और वह काफी बीमार भी रहते थे. शुरू शुरू में अनिक्षा के बावजूद वह उनका इलाज करता, लेकिन धीरे धीरे उनको ठीक रखने में उसे अपनी पढ़ाई की सार्थकता दिखाई पड़ने लगी. उनकी पत्नी, जिसे वह दादी कहता था, के हाथ का बना खाना एक अलग ही प्रकार का स्वाद देता, जो उसे कभी भी अपने घर के खाने में नहीं मिला था. शहर में रहने के दरम्यान उसे कभी ऐसे अनुभव नहीं हुए थे जब किसी गरीब व्यक्ति से उसे लगाव महसूस हुआ हो.
कल जब उसने दादी से बताया कि उसका समय अब पूरा हो गया और वह वापस अपने शहर चला जायेगा तो दादी का चेहरा फक़्क़ पड़ गया. पिछले छह महीनों में वह उनके घर का हिस्सा बन गया था और बीच बीच में जब वह अपने घर जाता तो लौट कर आने पर उसको देखते ही दादी का चेहरा खिल जाता था. आस पास के गांव के काफी मरीज भी उसके यहाँ आते और इलाज़ कराकर जाते समय पैसे तो नहीं लेकिन ढेरों दुआएं जरूर देकर जाते थे. उसके जेहन में तमाम चेहरे घूमने लगे जो फटे पुराने कपड़े पहने, अधिकांश पैदल आते, कुछ साइकिल से भी आते. लेकिन उन चेहरों में जो भाव दिखाई देता, वह उसने पहले कभी नहीं देखा था. वह इस गांव या अगल बगल के जिस भी गांव में जाता, लोग इतनी इज़्ज़त देते कि वह अभिभूत हो जाता. वहीँ शहर में उसे घर के बाहर निकलने पर शायद ही कोई पहचानता था, इज़्ज़त देना तो बहुत दूर की बात थी.
"आओ बचवा, खाना खा लो, तुम्हारे पसंद की दाल बनाई है और साथ में सरसो का साग भी, कल तो तुम चले ही जाओगे", दादी की आवाज़ ने उसे वर्तमान में ला पटका. वह भरे मन से खाना खाने उठा और खाने के दौरान उसका ध्यान खाने पर कम, विचारों में ज्यादा लगा था.
खाना खाने के बाद वह बाहर अपने कमरे में आया, खिड़की से उसे बच्चे धूल मिटटी में खेलते दिखे. उसकी भी इच्छा हुई कि वह जाकर बाहर बच्चों के साथ उसी धूल मिटटी में खेले जिसके लिए वह बचपन में तरसता था. कुछ देर यूँ ही देखते रहने के बाद उसने फोन उठाया और पापा को मेसेज किया "अभी कुछ महीने और मैं यहाँ बिताऊंगा, फिर शहर का सोचूंगा. एक बार आपलोग भी यहाँ आईये, शायद मेरे फैसले की वजह समझ में आ जाएगी". और कुछ ही देर बाद वह बच्चों के साथ खेल रहा था.

Friday, November 30, 2018

2 -3 दिसंबर 1984 - एक दर्द जिसकी दवा आजतक नहीं मिल पायी है

दिसंबर के पहले हफ्ते की शाम और रात भोपाल में अमूमन बहुत ठंडी नहीं होती, बस ऐसी होती है कि आप न तो रज़ाई ओढ़ सकते हैं और न ही चद्दर से काम चला सकते हैं. उस साल भी रात कुछ ऐसी ही थी लेकिन ठण्ड सामान्य से थोड़ा ज्यादा थी. जे पी नगर और आस पास के निवासियों के लिए भी वह एक जाड़े की सामान्य सी रात ही थी. लेकिन वहां और भोपाल के निवासियों को सपने में भी अंदेशा नहीं था कि आज के बाद यह रात इतिहास में एक ऐसी काली रात के रूप में दर्ज हो जाएगी जिसे आने वाली पीढ़ियां भी भूल नहीं पाएंगी.
3 दिसंबर 1984 की सुबह अपने साथ एक ऐसी भयावह परिस्थिति लाएगी, अगर इसका अंदेशा भोपाल के लोगों को होता तो शायद वह अपने कलेण्डर से इस तारीख को पहले ही मिटा चुके होते. लेकिन समय पर किसका वश चलता है, 2 दिसंबर को क़ाज़ी कैम्प और जे पी नगर (आज का आरिफ नगर) और उसके आसपास के इलाके के लोग रात का भोजन करके सो गए. घरों में सोये पुरुषों और महिलाओं ने अगली सुबह के बारे में कुछ योजनाएं बनायीं होंगी और पता नहीं कितने युवक और युवतियों ने अपने प्रेम की कुछ बातों के लिए अगले दिन को चुना होगा. बच्चे रविवार होने की वजह से रोज से कुछ ज्यादा ही खेलकूद कर थके होंगे और उनकी माओं ने उनको किसी तरह खिला पिला कर सुलाया होगा कि कल फिर खेल लेना. कुछ युवाओं और युवतियों के लिए आने वाला सोमवार (3 दिसंबर) रोजगार के कुछ अवसर प्रदान करने वाला रहा होगा. और कुछ को उस दिन साक्षात्कार देना रहा होगा जिससे कि वह अपने बुजुर्ग माता पिता और परिवार के लिए सहारा बन सकें. कुछ घरों में मेहमान भी उसी रात आये थे और उन घरवालों को भी यह भान नहीं रहा होगा कि यह मेहमान अब वापस नहीं जा पायेगा. उस इलाके में कुछ शादियां भी उस दरम्यानी रात को हो रही थीं और कुछ दूल्हा दुल्हन भी प्रथम मिलन की आस लिए ही दुनिया से कूच कर गए.     
आधी रात के बाद जब पुराना भोपाल, चंद पुलिसवालों, चौकीदारों और बीमारी से खांसते खंखारते बुजुर्गों को छोड़कर गहरी मीठी नींद में सोया हुआ था तो किसी को खबर भी नहीं थी कि आरिफ नगर की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री उनके लिए जीने का नहीं बल्कि मरने का सबब बन जायेगी. उस फैक्ट्री में मौजूद तमाम गैस के टैंकों के नंबर भले ही उस समय के कुछ कर्मचारियों और कंपनी के अधिकारियों को याद रहे हों लेकिन आगे चलकर टैंक नंबर इ-610  इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया और भोपाल के लोग चाहकर भी इस नंबर को भूल नहीं पाएंगे. यह वही दुर्भाग्यशाली टैंक था जिससे गैस लीक हुई थी. 
चाहे दुनिया की कोई भी कंपनी हो और वह लोगों के भलाई की कितनी ही बात करे, उसके लिए कहीं भी अपनी फैक्ट्री लगाने के पीछे सबसे अहम कारण वहां से मिलने वाला मुनाफा ही होता है. यह बात हर देश में भी लागू होती है, चाहे वह विकसित हो या विकासशील हो. बस विकसित देशों में इंसान की जिंदगी को तवज्जो दी जाती है और ऐसे कारखाने जो इंसानों या समाज के लिए खतरनाक होते हैं, उनको आबादी से दूर बनाया जाता है. भोपाल में भी यूनियन कार्बाइड ने जब अपनी फैक्ट्री क़ाज़ी कैम्प के पास 1969 में शुरू की थी, तब यह जगह भी आबादी के बीच में ही थी, फर्क़ बस इतना था कि हिन्दुस्तान विकासशील देश था और यहाँ पर इंसानों की जिंदगी की कीमत कुछ खास नहीं थी. वैसे भी यूनियन कार्बाइड वहां पर कीटनाशक दवाएं बना रही थी, बस गलती से इंसान भी कीट फतिंगों की मानिंद उस हादसे में मारे गए. इस देश में पैसे के बल पर कहीं भी कुछ भी किया जा सकता है और प्रशासन ऐसे उद्योगपतियों के क़दमों में अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर था, बशर्ते उनको मुंहमांगी कीमत मिल जाए.
ऐसा नहीं है कि किसी को इसका अंदेशा नहीं था, उस दुर्भाग्यपूर्ण रात के पहले भी कई बार छोटे मोटे हादसे उस कारखाने में हो चुके थे. गैस लीक की छोटी मोटी घटनाएं हुई थीं, एकाध मजदूर उसमें मारे भी गए थे. अख़बारों में यूनियन कार्बाइड कारखाने की जगह पर कई बार सवाल खड़े किये जा चुके थे लेकिन न तो किसी को फर्क़ पड़ना था और न पड़ा. कारखाना अपनी गति से चलता रहा और शायद अगले कई सालों तक ऐसे ही चलता रहता, अगर उस रात वह हादसा नहीं हुआ होता. सुरक्षा के मानकों को दरकिनार करके मुनाफा बढ़ाने की प्रवृत्ति के चलते कारखाने में कभी भी कोई दुर्घटना घट सकती थी लेकिन किसी का भी ध्यान उसकी तरफ नहीं था. सन 1979 में मिथाइल आइसोसाइनाइट के उत्पादन के लिये नया कारखाना खोला गया और पांच साल बाद ही वह एक ऐसा भयावह त्रासदी भोपाल के लोगों को देकर गया जिसे इतिहास में सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी माना जाता है.
आज सन 2018 में, त्रासदी के 34 साल बाद भी जे पी नगर, आरिफ नगर और आस पास के मोहल्लों में लोग उस दिन को याद करके सिहर जाते हैं. उस त्रासदी से बच निकले कुछ लोगों से बातचीत हुई और उन्होंने जो विवरण दिया, उसे सुनकर दिल दहल जाता है. श्री संजय मिश्रा जो आज एक सफल व्यवसायी हैं, उस समय लगभग 16 साल के युवा थे और उस दरम्यानी रात को घोड़ा नक्कास के अपने घर में परिवार के साथ सोये हुए थे. रात में गैस ने जैसे जैसे अपना असर बहती हवा के साथ फैलाना शुरू किया, उनके इलाके में भी शोर मचने लगा. जो लोग खुले में थे या बाहर सो रहे थे, उनको घबराहट, बेचैनी और सांस में रुकावट महसूस हो रही थी. किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि यह किस वजह से हो रहा है और हर व्यक्ति परेशान हाल में दूसरों से कारण जानने की कोशिश कर रहा था. तभी कहीं से खबर आयी कि कार्बाइड कारखाने से जहरीली गैस लीक हो गयी है और यहाँ से भागने में ही भलाई है. उनके परिवार के सब लोग उठे, सबने जो कपड़ा मिला उसे अपने नाक और मुंह पर बाँधा और फिर वहां से लाल परेड मैदान की तरफ दौड़ लगायी. उनको याद भी नहीं है कि उन्होंने अपने घर में ताला बंद किया था या नहीं, बस जान बचाने के लिए पूरा परिवार भाग रहा था. रास्ते में उनको जगह जगह सड़क पर, गलियों में गिरे लोग और जानवर दिखाई पड़ रहे थे जो सांस लेने के लिए छटपटा रहे थे. भागते भागते उनका पूरा परिवार लाल परेड मैदान पहुंचा और उससे आगे जाने की उन लोगों में छमता नहीं बची थी. धीरे धीरे उनको महसूस हुआ कि वहां सांस लेने में ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी और आँखों में जलन भी कम थी तो सारा परिवार वहीँ पूरी रात पड़ा रहा. कुछ ही देर में पूरा लाल परेड मैदान लोगों से भर गया, हर तरफ लोग कराह रहे थे, कुछ जिनका परिवार बिछड़ गया था, वह उनको याद करके रो पीट रहे थे. उन बिछड़े लोगों को यह एहसास हो गया था कि जो भी पीछे रह गया, वह शायद ही अब उनसे दुबारा मिल पायेगा. और उनकी आशंका निर्मूल नहीं थी, भले सरकारी आंकड़ों में 4000 से भी कम लोग मरे दिखाए गए हों, 50000 से ज्यादा लोग उस हादसे में अगले कुछ दिनों में काल कलवित हो गए थे. विजय मिश्रा ने एक बात और बताई, उस रात ठण्ड और दिनों की अपेक्षा ज्यादा थी और इसी वजह से गैस ऊपर आसमान में नहीं जा पा रही थी. हलके पीले रंग की गैस की परत चारो तरफ फैली हुई थी और इस वजह से भी बहुत ज्यादा लोग प्रभावित हुए और मौत के घाट उतर गए.
एक और प्रत्यक्षदर्शी की जुबानी उस रात का खौफनाक मंजर कुछ ऐसा था. श्री अमन शर्मा उस समय लगभग 24 वर्ष के युवक थे और अपने परिवार के साथ रेलवे कॉलोनी में रहते थे. उस रात किसी परिचित की शादी थी तो बारात से खा पीकर आने में रात के बारह बज गए और उसके बाद वह भी परिवार के साथ सो गए. पिताजी रेलवे में थे और उनकी रात की पाली नहीं थी, इसलिए वह भी घर पर ही थे. रात जब शोर मचना शुरू हुआ तो सब लोग जागकर बाहर आये. बाहर यूनियन कार्बाइड कारखाने से जहरीली गैस लीक होने की खबर मिली तो पूरा परिवार घर के दो स्कूटर से वहां से भागा. एक स्कूटर पर अमन अपने पिता और एक और सदस्य को लेकर मंडीदीप की तरफ भागे तो दूसरे स्कूटर पर उनके बड़े भाई अपनी माँ, बहन और अन्य सदस्यों को लेकर टी टी नगर की तरफ भागे. अमन बताते हैं कि मंडीद्वीप पहुँचते पहुँचते उनकी हालत स्कूटर चलाने जैसी नहीं रह गयी और वह एक दूकान के सामने स्कूटर लेकर लुढ़क गए. गैस लीक होने की खबर वहां भी पहुँच चुकी थी लेकिन वहां उसका असर बहुत कम था. वह आज भी वहां के दुकानदारों और मौजूद लोगों का आभार करना नहीं भूलते जिन्होंने उनको और इनके परिवार को झटपट घर के अंदर खींच लिया और पानी के साथ साथ बेनाड्रिल सिरप पिलाने लगे. कुछ देर में उन लोगों को राहत मिली और उनको लग गया कि फिलहाल मौत का साया उनके सर से हट गया है. बस एक अफ़सोस उनको आज भी है कि भागने के दरम्यान जब वह स्कूटर से पुल पार कर रहे थे तो कुछ लोगों के हाथ या पैर के ऊपर से उनका स्कूटर गुजर गया था.
अमन के बड़े भाई टी टी नगर पहुँचते पहुँचते बेदम होने लगे और वह भी सड़क के किनारे फुटपाथ पर गिर पड़े. इस तरफ भी गैस का असर कम था और वहां मौजूद लोगों ने उन लोगों को अपने घर में पनाह दे दी. और इस तरह उनका पूरा परिवार इस हादसे से बाल बाल बच गया, ये दीगर बात है कि उनकी माँ को सांस लेने में तकलीफ उसके बाद आजीवन रही. एक और बात उन्होंने बताया कि इस हादसे के बाद रेलवे स्टेशन या आस पास भिखारी अगले कुछ महीनों तक दिखाई नहीं दिए, जितने थे वह सब इस गैस काण्ड के चपेट में आकर मौत के घाट उतर गए थे.
वैसे तो कोई भी दुर्घटना अपने पीछे बहुत सारा दर्द और तकलीफ छोड़ जाती है और भोपाल गैस त्रासदी तो इतिहास की सबसे भीषण त्रासदियों में से एक थी. अधिकांश लोगों को इसके चलते बहुत आर्थिक छति उठानी पड़ी तो कुछ लोगों को इससे अपना जाती फायदा भी हुआ था. गैस काण्ड के अगले दिन एक स्थानीय नेता लोगों का हुजूम लेकर यूनियन कार्बाइड की तरफ बढे, उन्होंने लोगों को उनका हक़ दिलाने की भी बात की. लेकिन उसी दरम्यान एक अफवाह बहुत तेजी से फ़ैल गयी कि यूनियन कार्बाइड कारखाने में आग लगा दी गयी है और अब जहरीली गैस का बहुत ज्यादा असर फैलने वाला है. इससे उस पूरे इलाके में भगदड़ मच गयी और इसके बाद खूब जमकर घरों और दुकानों को उपद्रवियों द्वारा लूटा गया. उस राजनेता को राजनीति की दुकान इसके बाद चल निकली.
रेलवे के दो अधिकारियों का भी किस्सा भी लोगों ने बताया. एक अधिकारी जो शराब पीने के लिए बहुत बदनाम थे, वह घर पर शराब पीकर सो रहे थे. जब चारो तरफ हल्ला मचा तो वह भी घर से बाहर निकले और चारो तरफ घूम घूम कर लोगों से पूछने लगे. इसी दरम्यान शायद गैस की वजह से या किसी और वजह से वह गिर पड़े और जब तक उनको घर ले जाया जाता, उनकी मौत हो गयी. लेकिन घरवालों ने उनको लेजाकर उनके ऑफिस में बैठा दिया और बाद में उनकी मौत को ड्यूटी पर हुई मौत बताया गया. लड़के को भी नौकरी मिल गयी और मौत का मुआवजा अलग से मिला. दूसरे अधिकारी उस समय ड्यूटी पर ही थे और उनको भी खबर लग गयी थी कि गैस त्रासदी हो गई है. लेकिन उन्होंने अपनी ड्यूटी नहीं छोड़ी और स्टेशन पर मौजूद लोगों के सलामती के लिए लगे रहे. उसका नतीजा उनको आगे भुगतना पड़ा, उनकी पत्नी और बेटी दोनों गैस के चलते अगले दो दिनों में दुनिया में नहीं रहे. बेटा बाहर था तो वह बच गया लेकिन कुछ सालों बाद वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठे. आज भी वह भोपाल रेलवे स्टेशन पर पागलपन की अवस्था में घूमते हुए दिखाई पड़ते हैं. मेरी भी मुलाकात उनसे एक बार स्टेशन पर ही हुई थी और उनसे जुड़े किस्से के बारे में मुझे बाद में पता चला.
तमाम अखबार, पत्रिकाएं और सरकारी अमला इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि उस कांड का असर आज भी मौजूद है. बहुत से बच्चे आज भी अपंग या मानसिक रूप से कमजोर पैदा हो रहे हैं और पिछले 34 वर्षों में कितने ही लोगों ने धीरे धीरे कैंसर और अस्थमा जैसे स्वांश रोगों से अपनी जान गँवा दी है. लोगों को मुआवजा तो मिला है लेकिन उतना नहीं जितना मिलना चाहिए था. और जिन लोगों को इस हादसे में उनसे छीन लिया है, उनका दर्द तो कभी भर ही नहीं सकता. आज यूनियन कार्बाइड का कारखाना उजाड़ पड़ा है लेकिन जहरीले पदार्थों का अवशेस अब भी वहीँ मौजूद है. जरुरत है इस हादसे से सबक लेने की जिससे भविष्य में कोई और गैस काण्ड व ऐसा ही कोई अन्य त्रासदी न हो. 

Thursday, November 29, 2018

कैसी माफ़ी-लघुकथा

पूरे घर में तनाव का माहौल था, पिछले दस दिन से घर का कोई भी व्यक्ति अपने आप को उस घटना से उबार नहीं पाया था. ड्राइंग रूम में रौशनी के माता पिता और एक पुलिस अफसर गंभीरता से बैठे हुए सोच विचार कर रहे थे. घर के अंदर रौशनी एक कमरे में बदहवास हालत में पड़ी हुई थी और उसका भाई जिसे अंदर ही रहने की ताकीद की गयी थी, वह भी दूसरे कमरे में उदास बैठा था.
कुछ ही देर में वह लड़का ड्राइंग रूम में आया जिसका इंतज़ार सभी लोग कर रहे थे. उसके पीछे पीछे उसके पिता भी थे और दोनों के चेहरे उड़े हुए थे. कमरे में घुसते ही सबने उनपर निगाह डाली और दोनों पास के सोफे पर चुपचाप बैठ गए.
"तो क्या सोचा है तुम लोगों ने", पुलिस अफसर ने कड़कती आवाज़ में पूछा.
लड़के ने डरते हुए अपनी निगाह उठायी और बोला "सर मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूँ और रोशनी से शादी करने के लिए तैयार हूँ".
उसके पिता ने भी सहमति में अपना सर हिलाया. पुलिस अफसर ने रोशनी के पिता की तरफ देखा और उनको समझाने के लहजे में बोला "मुझे लगता है आपको इसकी बात मान लेनी चाहिए, आखिर आज दस दिन बाद यह वापस तो आ गया है, वर्ना इसे हम कहाँ कहाँ ढूंढते. और इसके शादी कर लेने से लड़की और आपके परिवार की प्रतिष्ठा भी बच जाएगी".
रोशनी के माता पिता को भी इससे बेहतर कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था. पिछले दस दिनों में उन लोगों ने समाज का वह रूप भी देख लिया था जिसकी वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकते थे.
'ठीक है, अगर यह अपनी गलती सुधारने के लिए तैयार है तो हमें भी कोई आपत्ति नहीं है. बस एक बार रौशनी को भी पूछ लेते हैं, फिर आगे बात करते हैं", रौशनी के पिता ने मद्धम आवाज में कहा. रौशनी की माँ अंदर जाकर रौशनी को बुला लायी और सबके सामने उससे भी पूछा गया "बेटा रौशनी, इस लड़के ने अपनी गलती मान ली है और तुम लोग एक दूसरे को पहले से जानते भी हो. अब यह शादी के लिए कह रहा है तो तुम भी हाँ कर दो, सारी चीजों पर पर्दा पड़ जाएगा और समाज में भी कोई दिक्कत नहीं होगी".
रौशनी ने अपना सर उठाया और गुस्से से कांपते हुए लड़के के मुंह पर थूक दिया. फिर चीखते हुए बोली "इस हैवान को माफ़ करके इसके साथ शादी कर लूँ, इसपर भरोसा करके ही उस पार्टी में गयी थी और इसने मेरी इज़्ज़त को तार तार करने में एक बार भी नहीं सोचा. ऐसे गलीज़ और हैवान लोगों के लिए माफ़ी जैसा शब्द होना ही नहीं चाहिए. मेरे एफ आई आर के आधार पर इसे गिरफ्तार कीजिये, इसको इसकी नीचता का परिणाम भुगतना ही होगा".
ड्राइंग रूम में मौजूद हर व्यक्ति अवाक था, रौशनी उठकर वहां से जा चुकी थी.

उम्मीद ही तो जरुरी है-- लघुकथा

"क्या बात है, बहुत खुश हो आज तो?, समीर ने उसके चेहरे को देखते हुए कहा. दरअसल ख़ुशी उसके चेहरे से छलकी जा रही थी और समीर ही क्या, कोई भी उसे पढ़ सकता था.
"अरे यार, आज मन सचमुच प्रसन्न है, आज उस पत्रिका से मेल आया कि वह मेरी रचना छाप रहे हैं", उसने हँसते हुए समीर का कन्धा दबा दिया.
"सचमुच उससे मेल आया है, इस बात पर तो पार्टी बनती है दोस्त. वैसे छपने के लिए भेजा कब था तुमने ?, समीर ने पूछ लिया.
अब उसने एक लम्बी सांस ली और बोला "सच बताऊँ तो मैं तो भूल ही गया था कि मैंने कुछ भेजा भी है. जब उनका मेल आया तो मैंने चेक किया तो देखा कि ठीक एक साल पहले मैंने भेजा था और आज स्वीकृति आयी".
समीर के चेहरे पर आश्चर्य उभर आया "एक साल बाद, बाप रे, तुमने तो उम्मीद ही छोड़ दी होगी. और उसके बाद तो फिर कभी भेजा भी नहीं होगा वहां प्रकाशन के लिए!
"उम्मीद ही तो नहीं छोड़ी थी दोस्त", उसने मुस्कुराते हुए कहा. 

Thursday, November 22, 2018

मौसम- लघुकथा

"आजा, तू भी एक सुट्टा खींच ले, क्यों वहाँ बैठे बैठे कांप रही है", कहकर बुढ़ऊ ने एक बार
कस के सांस खींची और धुंआ निकालते हुए बुढ़िया की तरफ देखने लगे.
बुढ़िया ने जैसे सुना ही नहीं, वह किनारे बैठी कुछ सोच रही थी. अचानक बुढ़ऊ के जोर जोर
से खांसने की आवाज से उसका ध्यान टूटा और वह उठी.
"कितनी बार कहा है थोड़ा धीरे से खींचा करो लेकिन सुनते ही नहीं हो", पास आकर उसने
बुढ़ऊ की पीठ सहलानी शुरू कर दी. कुछ देर मे वह संयत हुआ और चिलम बुढ़िया की तरफ
बढ़ाई.
"लाओ, मैं भी एक बार खींच ही लेती हूँ", कहकर बुढ़िया ने भी एक बार सांस खींची. धुआं
अंदर गया तो कुछ राहत महसूस हुई उसे. वह भी खटिया पर लेट गई और लेटते ही बिटिया
की सूरत उसके जेहन मे तैर गई.
"अगले महीने बिटिया आएगी, कुछ सोचा है बिदाई के बारे में", बुढ़िया ने ऊंची आवाज मे
कहा.
कुछ देर तक बुढ़ऊ की कोई आवाज नहीं आई, लगा जैसे सो गए हों. फिर उसके बुदबुदाने
की आवाज आई "बिटिया इस बार नहीं आती तो ठीक था".
बुढ़िया कुछ नहीं बोल पाई, उसके दिमाग मे अपनी आखिरी बछिया आ गई जो पिछली बार
बिक गई थी. लेकिन बात बदलने के हिसाब से बोल पड़ी "मौसम एकदम से बदल गया है,
ठीक से ओढ़कर सोना".
कोठरी मे सन्नाटा पसर गया, रात धीरे धीरे बीत रही थी.

Wednesday, November 21, 2018

अंतहीन खामोशी-लघुकथा

बैठक के कमरे में बैठकर उसने अपनी निगाह चरो तरफ दौड़ाई, हर चीज व्यवस्थित थी और यथास्थान रखी हुई थी. पानी पीने के बाद उसने बैग में से पैकेट निकाला और मेजबान को पकड़ा दिया. उम्र के लगभग सातवें दशक में पहुँच चुके मेजबान अभी भी उतने ही ज़िम्मेदारी से घर का सारा काम निबटाने का प्रयास कर रहे थे, ये बाज बात थी कि उनकी उम्र अब इसकी इजाजत नहीं दे रही थी.
अपने एक दोस्त के कहने पर उसको एक पैकेट देने इनके घर आना पड़ा. पहली मुलाक़ात थी और वह इनके बारे में कुछ भी नहीं जानता था. सामने के शोकेस में उनके परिवार का एक चित्र टंगा हुआ था जिसमें पूरा परिवार हँसता हुआ नजर आ रहा था. मेजबान, उनकी पत्नी, एक नवयुवक, एक युवती और एक बच्ची. उसने अनुमान लगाया कि वह नवयुवक उनका पुत्र होगा और युवती उनकी वधू तथा बच्ची उनकी नातिन. आजकल के बेटे बस अपने परिवार का ध्यान रखते हैं, माँ बाप के लिए उनके पास समय कहाँ होता है, उसके दिमाग में बस यही बात चल रही थी और उस पुत्र के उपर उसको बहुत क्रोध आ रहा था.
“यह मेरा पूरा परिवार था, बेटा सब कुछ संभालता था”, मेजबान की दर्द से भरी आवाज़ सुनकर वह चौंक गया. उसकी नजर मेजबान की नजर का पीछा करते एक दूसरे फोटो पर पड़ी जिसपर एक हार टंगा हुआ था. अगले कुछ मिनट तक एक खामोशी पसरी रही जिसका अंत होता उसे नजर नहीं आ रहा था.

Friday, November 16, 2018

दरअसल मसला कुछ और है- कहानी

अजीब सी कश्मकश में गुजर रहे थे हरी बाबू पिछले एक महीने से, एक तरफ उनके खुद के पुराने विचार तो दूसरी तरफ इस छोटी सी चीज पर उनकी असहमति. पहले तो वह ऐसे नहीं थे, बल्कि खुले विचार वाले और हर चीज को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने वाले व्यक्ति थे और उनके सभी दोस्त और रिश्तेदार उनकी इसी सोच के कायल थे. जितना उन्होंने अपने धर्मग्रंथों का अध्ययन किया था, उससे कहीं कम दूसरे धर्मों के बारे में नहीं पढ़ा था. और इसी वजह से उनको धर्म की नकारात्मक बातों से एक तरह से एलर्जी थी. उनके अपने अध्ययन कक्ष में रामायण, गीता के साथ साथ क़ुरआन शरीफ और बाइबिल भी रखी थी.
बच्चों को भी उन्होंने कभी भी धर्म के बारे में किसी विशेष सोच को मानने के लिए नहीं कहा, हमेशा उनको अपने विचार खुद से समझने के लिए ही प्रेरित किया. बेटी अर्पिता पिछले दो साल से नौकरी में थी और उन्होंने कह रखा था कि या तो खुद ही शादी कर लो या जहाँ मन हो बता देना, शादी कर देंगे. लेकिन अपने उदार सोच और प्रगतिशील विचारों के बावजूद एक छोटी सी बात वह चाह कर भी किसी से नहीं कह पाए थे.
उनके सभी मज़हब और जातियों के दोस्त हमेशा से थे और उन्होंने कभी उनमें फ़र्क़ भी नहीं किया. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से धर्म के आधार पर हो रहे तमाम बहसों और घटनाओं ने उनके मन के किसी कोने में एक मज़हब के खिलाफ एक चिढ़ सी भर दी थी. समय के साथ साथ यह चिढ़ कब नफरत के ज्यादा करीब हो गयी, उनको खुद इसका इल्म नहीं हुआ. लेकिन दिक्कत यह थी कि इस बात को वह न तो खुल के कह पा रहे थे और न हीं इसे जज़्ब कर पा रहे थे. बहरहाल उन्होंने एक आवरण अपने ऊपर ओढ़ रखा था जिसके अंदर जाकर ही कोई उनके अंतर्मन को समझ सकता था. हाँ उनके मन में चलते अंतर्द्वंद में कभी उनके पुराने विचारों की जीत होती तो कभी मौजूं हालातों की ताक़त उनके मन पर हावी हो जाती.
पिछले हफ्ते जब अर्पिता ने उनको कहा कि अब वह शादी के लिए सोच रही है तो उनका पहला सवाल यही था कि उसने किसे पसंद किया है. और लड़के का नाम सुनकर उनको जोर का झटका लगा और उस समय उनको कुछ प्रतिक्रिया देते नहीं बना. उस लड़के का नाम और कुछ भी रहा होता तो उनको शायद ही कोई दिक्कत हुई होती. अर्पिता भी कुछ पल उनकी तरफ देखती रही और जब उनके चेहरे पर प्रसन्नता के कोई लक्षण नहीं दिखे तो हैरान रह गयी. अब चूँकि उन्होंने कभी किसी पर अपनी यह नयी पैदा हुई सोच जाहिर नहीं होने दी थी तो अर्पिता ने भी उस लिहाज़ से नहीं सोचा और पूछ बैठी "क्या हुआ पापा, आप लगता है खुश नहीं हैं मेरी पसंद से? आप ने ही कहा था कि बताना तो मैंने बताया, लेकिन आप एक बार उससे मिल लीजिये, फिर बताईयेगा".
अर्पिता की इस बात ने उस वक़्त उनको जैसे उबार लिया और वह अपने आप को भरसक संयत करते हुए बोले "अरे तेरी पसंद मेरी पसंद है, फिर भी तू कहती है तो एक बार मिल लेता हूँ. अगले हफ्ते के बाद किसी दिन ले आना उसको", और इसके बाद उनको और कुछ पूछना याद ही नहीं रहा.
अर्पिता उस समय तो चली गयी लेकिन कहीं न कहीं उसे भी यह सब खटक रहा था. कहाँ तो उसने सोचा था कि पापा उसकी पसंद का ज़िक्र सुनते ही उससे सवालों की झड़ी लगा देंगे और कहाँ उन्होंने कुछ पूछा तक नहीं. बहुत सोचने के बाद भी उसका दिमाग मज़हब तक नहीं पहुंचा, उसे लगा कि शायद पापा ने कोई और लड़का पसंद कर रखा है. लेकिन फिर वह उलझ गयी कि अगर किसी लड़के को पापा ने पसंद भी किया होता तो कभी न कभी तो उसके बारे में मुझसे जिक्र किया होता. इतना खुलापन तो था ही उसके और पापा के दरमियान. अब वह पापा के सभी दोस्तों और परिचितों के लड़कों के बारे में सोचने लगी, जो उसके हिसाब से पापा के पसंद हो सकते थे. लेकिन फिर भी उसे कोई चीज स्पष्ट नहीं हो रही थी और पापा से सीधे पूछने का भी उसे मन नहीं हो रहा था. दरअसल कभी भी उसने इस बात पर पापा से खुद कोई बात नहीं की थी, हमेशा पापा ही उसको बोलते थे, इसलिए अचानक उसको इस मसले पर पापा से बात करना बड़ा अटपटा लग रहा था.
हरी बाबू भी उस दिन से रोज अपने आप को अपने विचारों के हिसाब से मथते. एक तरफ तो उनकी अपनी सोच और दूसरी तरफ अर्पिता की ख़ुशी. जब भी वह बेटी का चेहरा देखते, उनको लगता कि इस मासूम के फैसले से असहमत होकर अच्छा नहीं कर रहे हैं. लेकिन फिर उस मज़हब का ध्यान आते ही उनकी सोच बदल जाती. अख़बारों में छपने वाले और सोशल मीडिया पर बहुचर्चित कुछ शब्दों जैसे "लव ज़िहाद" आदि ने हालिया वर्षों में उनके मन में एक ग्रंथि सी भर दी थी. एक समय था जब किसी भी और जाति या मज़हब का दोस्त उनसे मिलने आता तो उनको कभी यह महसूस भी नहीं होता था. लेकिन अर्पिता के कहने के बाद तो जैसे उस विशेष मज़हब का कोई भी दोस्त आता तो उनको लगता जैसे वह उनके जले पर नमक ही छिड़कने आया है. उनको देखते ही उनके अंदर एक अजीब सी चिढ़ घर कर जाती. उनको लगने लगा था कि जैसे उस मज़हब के व्यक्ति ने उनकी बेटी उनसे छीनने की कोशिश करके उनकी खुशियों पर ग्रहण लगा दिया है. एकाध बार उनके दोस्तों को उनका यह बदला व्यवहार खटका भी लेकिन किसी को इसका कारण समझ में नहीं आया, आखिर उन्होंने कभी कुछ खुल कर कहा भी तो नहीं था.
एक दिन अर्पिता ने इस बात का जिक्र मम्मी से भी किया लेकिन उनको भी कुछ ठीक से समझ नहीं आ रहा था. उसके बाद उन्होंने हरी बाबू से पूछा भी कि क्या बात है, लगता है आप अर्पिता की पसंद से खुश नहीं हैं, तो उन्होंने टाल दिया. उनको भी यही लगा कि शायद बेटी की शादी को लेकर परेशान हो रहे हैं इसीलिए व्यवहार में ऐसा फ़र्क़ दिख रहा है. मम्मी ने इसके बाद अर्पिता को समझाया कि संभवतः पिता होने के नाते ही वह परेशान होंगे इसलिए एक बार मिलने के बाद सब ठीक हो जाएगा.
एकाध बार पापा से यूँ ही बात करने के बाद भी अर्पिता को जब कुछ नहीं सूझा तो उसने इस बारे में अनवर से जिक्र करना बेहतर समझा. अनवर भी बहुत कुछ सोच नहीं पाया, उसे लगा शायद एक पिता की चिंता ही इसकी वजह होगी. दरअसल अर्पिता ने उसको अपने पापा के उदार विचारों के बारे में इतना बता रखा था कि उसकी सोच में भी मज़हब का कोण नहीं आया.
"अरे पापा तेरी शादी की बात के चलते ही टेन्स हो गए हैं, कुछ दिन में सब नार्मल हो जायेगा. और उनसे मिलते ही मैं उनको अपनी तरफ से पूरी तरह से निश्चिन्त कर दूंगा, डोंट वरी".
इसके बाद लगभग दो सप्ताह बीतने को आये, हरी बाबू ने अपनी तरफ से होने वाले दामाद से मिलने की कोई इच्छा नहीं दर्शायी. अर्पिता रोज शाम को सोचकर आती कि अगर आज पापा ने बात नहीं की तो वह खुद ही बात कर लेगी, लेकिन कहीं न कहीं उसका आत्मसम्मान उसको रोक लेता. आखिर आज तक जब उसने कभी बात नहीं की तो आज कैसे करे. अनवर रोज उससे पूछता और कहता कि चलो मैं खुद ही मिल लेता हूँ, लेकिन अर्पिता उसे मना कर देती.
आखिरकार अर्पिता ने खुद ही बात करने का निश्चय कर लिया और एक रात वह भी पापा के साथ टहलने निकल गयी. वैसे तो हरी बाबू रोज रात को खाना खाकर टहलने जाते थे और शायद ही कभी अर्पिता या उसकी मम्मी उनके साथ टहलते थे. उस दिन अर्पिता को साथ आते देखकर हरी बाबू समझ गए कि आज बात करनी ही पड़ेगी और वह अपने मन में अपने विचारों को व्यवस्थित करने लगे. घर के सामने वाले पार्क में जाकर बैठना अर्पिता ने उचित समझा तो उसके पापा को भी यह ठीक लगा. दरअसल घर में यह बात करना उनको ठीक नहीं लगता था इसीलिए उन्होंने हर बार बात को टाल दिया था.
अर्पिता ने सीधे ही बात कहना ठीक समझा "आखिर बात क्या है पापा, आप बताते क्यों नहीं. इतने दिन हो गए हैं और आपने एक बार भी अनवर के बारे में मुझसे बात नहीं की और न हीं उसे कभी मिलने के लिए बुलाया. अगर आपको किसी ने उसके बारे में कुछ गलत कहा है तो भी मुझसे बताईये, मैं हर बात स्पष्ट करुँगी, लेकिन आप कुछ बोलिये तो".
हरी बाबू ने बेटी का हाथ अपने हाथ में ले लिया और उसको देखते हुए बोले "आज मैं तुमको सब बता दूंगा लेकिन तुम भी मेरी बात को समझने की कोशिश करना".
"आप बताईये न पापा, आप तो मुझे सबसे बेहतर जानते हैं", अर्पिता ने पापा का हाथ पकड़कर कहा.
"क्या तुमको अनवर से बेहतर कोई लड़का नहीं मिल सकता", हरी बाबू ने अर्पिता की तरफ सवालिया निगाहों से देखा.
"लेकिन पापा, अनवर में क्या बुराई है. मुझे अब पूरा यक़ीन है कि किसी ने आपके दिमाग में अनवर के खिलाफ कुछ भर दिया है", अर्पिता को जैसे कुछ कुछ समझ में आने लगा.
हरी बाबू थोड़ी देर तक बेटी को देखते रहे, दरअसल जब वह घर में अर्पिता और अनवर के बारे में सोचते, तब उनको बहुत दिक्कत नहीं समझ में आती थी. लेकिन जब भी एकदम अकेले होते, उनके मन में मज़हब विशेष के प्रति नई पैदा हुई चिढ़ उनको परेशान कर देती.
'देखो बेटा, मुझे अनवर के बारे में बहुत कुछ पता नहीं है और न मैंने जानने की कोशिश ही की है. लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में बेहद मुश्किल हो रही है कि मेरी बेटी की शादी किसी मुस्लिम से हो. देखो तुम मुझे गलत मत समझो लेकिन शायद किसी भी और मज़हब का लड़का होता तो मैं इसे बर्दाश्त कर लेता लेकिन इस मज़हब के लड़के को स्वीकार करने को मेरा मन तैयार नहीं होता".
इतना कह कर हरी बाबू खामोश हो गए, अर्पिता को तो जैसे करेंट लग गया, वह तो कभी भी इस पहलू के बारे में सोच भी नहीं सकती थी. उसके हाथ से पापा का हाथ छूट गया, हरी बाबू भी दूसरी तरफ देख रहे थे. शायद अपनी बेटी की नज़रों में गिरने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे.
उन्होंने ने ही फिर बात शुरू की "पिछले कई महीनों में मैंने इस मज़हब के लोगों की करतूतों का गहन अध्ययन किया है, इनका एक ही उद्देश्य है कि किसी भी तरह से दूसरे मज़हब के लोगों को अपने में शामिल करना. आज भले ही नहीं कहें लेकिन शादी के कुछ ही सालों बाद तुम्हारे ऊपर धर्मान्तरण के लिए दबाव पड़ने लगेगा और फिर तुम भी मना नहीं कर पाओगी".
अर्पिता ने एक नजर पिता की तरफ देखा और बोलना शुरू किया "पापा, आजतक तो आपने हमेशा हर धर्म को बराबर ही समझाया हम लोगों को और शायद उसी का परिणाम था कि मैंने भी कभी किसी भी व्यक्ति को उसे मज़हब से जोड़कर नहीं देखा. दूसरी बात आपने हमें यह भी कहा था कि तुम्हारी पसंद मेरी पसंद होगी. अगर आप अनवर को उसकी काबिलियत के हिसाब से परखना चाहते हैं तो मुझे ख़ुशी ही होगी क्यूंकि तब आपके मन में भी कोई शंशय नहीं रह जायेगा. लेकिन सिर्फ इस लिए कि अनवर उस मज़हब से है और आप आजकल के खबरों पर भरोषा करने लगे हैं, आपका यह व्यवहार मुझे नितांत अनुचित लग रहा है. अगर आप नहीं चाहते हैं तो मैं फिलहाल अनवर से शादी नहीं करुँगी लेकिन फिर आप भी मुझे किसी और से शादी करने के लिए मत कहियेगा".
हरी बाबू बेटी को एकटक देखे जा रहे थे इतने में उसने आगे बोलना शुरू किया "आप ने कई किस्से पढ़े होंगे जिसमें धर्म परिवर्तन की बात होगी लेकिन क्या आपने ऐसे किस्से नहीं पढ़े हैं जिसमें दोनों ने आजीवन अपना धर्म अपनाया. यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी उनकी समझ से उनका धर्म चुनने दिया. अब आप सिर्फ नकारात्मक खबरों को ही सच मानेंगे तो आपका नजरिया भी एकतरफा ही रहेगा. क्या आपको इसके अलावा भी कोई दिक्कत है इस शादी में?
हरी बाबू को भी लगा कि उन्होंने शायद जल्दबाजी में ऐसा सोच लिया, अनवर में एक मज़हब के अलावा कोई और बुराई उन्होंने कहाँ देखी है. वह पेशोपेश में पड़ गए, आखिर बेटी के ऊपर भरोसा तो करना ही चाहिए था उनको.
"ठीक है, तुम अनवर को घर लेकर आओ, मैं बात करूँगा उससे. लेकिन अभी किसी से भी उसके बारे में जिक्र मत करना", हरी बाबू ने फिलहाल हामी भर दी.
घर के रास्ते में दोनों खामोश थे, अर्पिता ने मम्मी को बता दिया कि पापा अनवर से मिलने को तैयार हो गए हैं लेकिन उसने मज़हब वाली बात जानबूझकर छुपा ली. उसने अनवर को भी फोन पर बता दिया कि पापा से जल्द ही मिलना है और बाकि बाद वह उससे मिलकर बताएगी.
अगले दिन लंच टाइम में अर्पिता जब तक अपने पसंदीदा रेस्त्रां पहुंची, अनवर पहले से ही मौजूद था. अर्पिता के चेहरे को देखकर उसे थोड़ी आशंका हुई, जिस ख़ुशी की वह उम्मीद कर रहा था, वह गायब थी.
"अब तो सब ठीक है अर्पिता, इतना टेन्स क्यों नजर आ रही हो", अनवर ने उसकी देखते हुए कहा.
अर्पिता ने धीरे से मुस्कुरा दिया और अनवर का हाथ अपने हाथ में ले लिया.
"तुम बिलकुल चिंता मत करो, मैं तुम्हारे पापा को निश्चिन्त कर दूंगा अपने भविष्य के बारे में", अनवर उसको समझा रहा था.
लेकिन अर्पिता अभी भी कुछ सोच रही थी, उसने अनवर के चेहरे को देखते हुए पूछा "अच्छा अनवर, एक बात बताओ, क्या शादी के बाद कभी मज़हब हम दोनों के बीच में आएगा".
अनवर को झटका लगा, उसने इस सवाल की उम्मीद कभी नहीं की थी. अब उसे अर्पिता के उदास चेहरे की वजह समझ में आने लगी.
"तुमने कभी इस बात को महसूस किया है आजतक, जैसे तुम्हारा धर्म, वैसे ही मेरा धर्म. लेकिन इस तरह की बात आयी कहाँ से तुम्हारे मन में?
अर्पिता इस सवाल के लिए तैयार ही थी, उसने गंभीरता से अनवर की तरफ देखते हुए कहा "दरअसल सिर्फ मैं और तुम ही नहीं हैं इस रिश्ते में, हमारा परिवार भी है. और ये सवाल तो किसी के भी तरफ से आ सकते हैं, चाहे वह तुम्हारे घरवाले हों या मेरे घरवाले. बहरहाल तुम ये समझ लो कि मेरे घर में यह सवाल उठ चुका है और मैंने अपने तरीके से उनको बता भी दिया है कि हमारे बीच में धर्म कभी नहीं आनेवाला है".
अनवर अर्पिता को एकटक देख रहा था, उसे उसकी समझदारी पर गर्व हो उठा. उसने भी इस चीज को स्पष्ट करना उचित समझा "देखो अर्पिता, हमारे बीच मज़हब कभी भी नहीं था और न आगे कभी होगा. वैसे भी न तो तुम अपना धर्म मुझसे शादी करने के बाद बदलने वाली हो और न ही हमारी अगली पीढ़ी के लिए इसकी कोई बाध्यता रहेगी. वैसे धर्म के किस पहलू पर बात उठी थी तुम्हारे घर पर, बता सकती हो?
अर्पिता थोड़ी हिचकी, क्या खुल कर बता दे पापा की बात. लेकिन अब छुपाने से भी कोई मतलब नहीं निकलता था तो उसने बता देना ही उचित समझा "देखो अनवर, पिछले कुछ सालों में जो कुछ घटा है हमारे समाज में, उसने पापा की सोच पर भी असर डाला है. मैं उनको गलत नहीं कहती, शायद एक पिता होने के नाते भी वह मेरे बारे में ज्यादा सोचते होंगे. उनकी शंका यह थी कि क्या शादी के कुछ साल बाद तुम्हारे अंदर मेरे धर्म को लेकर कुछ फ़र्क़ आएगा. आखिर तुम्हारा भी समाज है, माँ पिता हैं, वह भी सोच सकते हैं कि बहू हमारे धर्म को क्यों नहीं अख्तियार कर लेती".
अनवर ख़ामोशी से सब सुनता रहा, उसके दिमाग में भी विचारों का मंथन चल रहा था. अर्पिता ने जो भी कहा, उसमें गलत तो कुछ भी नहीं था, अधिकतर मामलों में यही तो होता है, या इसी तरह की खबरें आती हैं. उसने अर्पिता के हाथ को कस कर दबाया और मुस्कुराते हुए बोला "तुम्हारे पापा की आशंका निर्मूल नहीं है, आखिर वह भी इसी समाज में रहते हैं जहाँ ये घटनाएं घट रही हैं. लेकिन तुम मेरे बारे में जो जानती हो उसके बाद मुझे सोचने के लिए ज्यादा नहीं बचता. जहाँ तक हमारे धर्म की बात है, मैं इसको लेकर ज्यादा परेशान नहीं हूँ. और चाहो तो मैं तुम्हारे पापा से यह भी कह दूंगा कि वह चाहेंगे तो मैं अपना मज़हब भी बदल लूंगा".
अर्पिता कुछ बोलती उसके पहले ही अनवर फिर से बोला "लेकिन अगर मैंने या तुमने मज़हब बदला तो इसका मतलब हमारी शादी एक समझौता हो जाएगी. और वह हमारे जैसे स्वतंत्र सोच रखने वाले व्यक्ति के हिसाब से भी गलत होगा. और सबसे बड़ी बात, यहाँ मसला मज़हब का बिलकुल नहीं है मेरे हिसाब से, मसला सोच का है. इन सारे पहलुओं को सोचकर ही हमें कोई बात रखनी होगी, अब तुम कहो तो मैं तुम्हारे पापा से बात करूँ".
कुछ देर तक दोनों के बीच में ख़ामोशी पसरी रही, दोनों एक दूसरे को हाथों से ही आस्वस्त करते रहे. इस बीच चाय के दो कप भी खाली हो गए, नाश्ता मंगाने का किसी को ख्याल ही नहीं आया.
"सच कहा तुमने अनवर, असली मसला मज़हब का नहीं, हमारी सोच का है. और इसमें तो कहीं भी कोई शको-सुबहा नहीं है. अब तुम बेफिक्र रहो, मैं पापा को समझा दूंगी. और अगर उसके बाद भी कोई दिक्कत हुई तो तुम मेरे लिए आकाश तो बन ही जाओगे", अर्पिता के चेहरे पर बहुत देर बाद मुस्कराहट नजर आयी.
अनवर ने भी हँसते हुए जवाब दिया "आकाश ही क्यों, तुम कहोगी तो राम भी बन जाऊंगा" और सामने पड़ी चाय को उठाकर पीने लगा.
चाय पीकर दोनों अपने अपने ऑफिस निकल गए, अर्पिता अब काफी हल्का महसूस कर रही थी. कुछ देर पहले चलने वाली गर्म हवा अब उसे शीतलता प्रदान कर रही थी, मौसम काफी बेहतर हो चला था.

Thursday, November 15, 2018

कलम और कुर्सियाँ- लघुकथा

"कुछ भी लिखते हो, इतने महीने हो गए यहाँ काम करते हुए, तुमको आजतक पता नहीं चला कि कुछ क्षेत्र कलम चलाने के लिए वर्जित भी होते हैं?
उसने अपनी रिपोर्ट को डस्टबिन में जाते देखा, अंदर उठे क्रोध को किसी तरह दबाकर वह खड़ा रहा. पढ़ाई के दरम्यान कई चीजें जो उसे इस पेशे में आने के लिए प्रेरक का काम करती थीं, आज निरर्थक लग रही थी.
"अपनी कुर्सी की धौंस दिखाकर आप मुझे सच्चाई से दूर नहीं कर सकते सर", वह कहना चाहता था लेकिन चुपचाप पलटकर जाने लगा.
फिर उसे बॉस पर तरस आ गया, वह भी तो उन तमाम कुर्सियों का जिक्र नहीं कर सकता जिनकी धौंस उसे हमेशा सुननी पड़ती होगी.

Thursday, November 1, 2018

वक़्त की नब्ज़- लघुकथा

सब कुछ जैसे एक फिल्म की तरह उनके जेहन में घूम रहा था, आखिर ऐसा क्यूँ हो गया| उनकी परवरिश में तो कोई खोट नहीं थी फिर रज्जब की गिरफ़्तारी, शायद इस राह पर चलने का यही परिणाम होता हो? रशीदा तो जैसे काठ हो गयी थी, लोगों की नज़रों का सामना करने की उसकी हिम्मत नहीं बची थी|
बहुत लाड़ से पाला था उन दोनों ने रज्जब को, यहाँ तक कि यूनिवर्सिटी में भी भेजा| उसकी बातें वैसे तो बहुत अच्छी लगती थीं उनको लेकिन कभी कभी थोड़ा डर भी लगता था| खासकर जब वह अपने ही धर्म के गुरुओं की बातों की धज्जियाँ उड़ाने लगता था| कई बार उन्होंने उसे समझाया भी कि अपने विचार तो ठीक हैं लेकिन इस तरह उनको व्यक्त करना लोगों को शायद नागवार गुजरेगा|
"देखिये अब्बू, मैं उनमे से नहीं हूँ जो इनके जाहिलपन को बर्दास्त करूँ| हमें सीख देते हैं कि मजहब की तालीम लो और उसे आगे बढ़ाओ, लेकिन खुद इनके बच्चे बाहर देशों में पढ़ते हैं और इसके लिए कोई इनको नहीं पूछता"|
"ठीक है, तू मत सुन इनकी बात और जो ठीक लगता है वैसी तालीम ले| हमने तो तुम्हें कभी मना नहीं किया इसके लिए, फिर क्यूँ बेकार में इनकी नज़र में चढ़ता है", मोहसिन ने उसको समझाया|
"दरअसल ये लोग चाहते ही नहीं हैं कि अपनी कौम पढ़े लिखे, इसलिए बस मज़हब और डर की बात करते रहते हैं लोगों से| इनका एक ही जवाब है अब्बू, अपने आप को शिक्षित करना और इनके फैलाये भ्रम के जाल को तोड़ना", रज्जब अपनी दलील रखता| मोहसिन को कभी कभी थोड़ी घबराहट भी होती लेकिन फिर वह रज्जब के आत्मविश्वास से अपने आप को तसल्ली दे देते|
रज्जब फिर भी वही करता जो उन धर्म के ठेकेदारों को बुरा लगता| युनिवर्सिटी से लौटने के बाद तो जैसे वह उनके पीछे ही पड़ गया था| अपने मोहल्ले के लोगों को उसने धीरे धीरे समझाना शुरू किया और लोगों को पढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा| धीरे धीरे मोहल्ले के कुछ लोग रज्जब की बात समझने लगे और यही बात उन चंद ठेकेदारों को बर्दास्त नहीं हुई.
पिछले दो दिन से रज्जब की कोई खबर नहीं थी उनको, लेकिन आज पुलिस स्टेशन जाते समय उन्होंने सोच लिया कि अब रज्जब को अब वक़्त के साथ चलने की नसीहत देने की जरुरत नहीं रह गयी है.

Monday, October 29, 2018

बेचैनी-लघुकथा

संध्या को समझ में नहीं आ रहा था कि मनीष की बेचैनी कैसे दूर करे, दुःख तो उसे भी बहुत हुआ था जब वह हादसा हुआ था. कितने ही लोग, जिनमें बच्चे और महिलाएं भी थीं, मारे गए थे और उसका सदमा बहुत गहरा पड़ा था मनीष के ऊपर. लेकिन उसको भी पता था और मनीष को भी कि गलती मनीष की नहीं थी और वह चाह कर भी उस हादसे को टाल नहीं सकता था.
आज मनीष की छुट्टी का सातवां दिन था, हादसे के बाद ही उसे विभाग ने कुछ दिन की छुट्टी पर भेज दिया था. सबको उम्मीद थी कि कुछ दिन बाद सब कुछ यथावत हो जायेगा और मनीष वापस अपने काम में लग जायेगा. लेकिन मनीष की बेचैनी और उदासी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी और यही बात संध्या को भी बेतरह परेशान किये हुए थी.
"अब उसे भूलने की कोशिश करो नहीं तो कैसे चलेगा. तुम्हारी तो कोई गलती नहीं थी उस हादसे में, लोग ही अपनी जान को खतरे में डालते रहते हैं तो कोई क्या करे", संध्या ने मनीष को समझाने की एक और कोशिश की.
मनीष उसे सुन कर भी जैसे अनसुना कर रहा था, उसने अपना सर हिलाया और उदास स्वर में बोला "मैं कुछ नहीं कर पाया संध्या और इतने लोगों की मौत की वजह बन गया. भले मेरा विभाग मुझे इसका जिम्मेदार नहीं मानता लेकिन मैं इस आत्मग्लानि से निकल नहीं पा रहा हूँ".
संध्या ने एक गहरी सांस ली, उसके जेहन में कुछ समय पहले का एक हादसा आ गया जिसमें ड्राइवर का धर्म अलग होने के चलते उसपर एक दूसरे तरीके का आरोप लग गया था.
"वो तो अच्छा हुआ कि वो लोग भी अपने ही धर्म के थे वर्ना लोग तो इसे एक अलग ही रंग दे देते. आजकल तो बस कोई बहाना चाहिए लोगों को", संध्या ने जैसे राहत की सांस ली.
मनीष ने उसकी तरफ देखा और कुछ सोचकर बुदबुदाया "काश इसी बहाने से ही लोग मुझे कोसते, गुनाहगार ठहराते तो शायद मेरे दिल का बोझ कुछ कम होता!

Thursday, October 25, 2018

फिर भी - लघुकथा

"आज फिर नींद नहीं आ रही है आपको, भूलने की कोशिश कीजिये उसे", रश्मि ने बेचैनी से करवट बदलते हुए राजन से कहा और उठकर बैठ गयी. कुछ देर तक तो वह अँधेरे में ही राजन का सर सहलाते रही, फिर उसने कमरे की बत्ती जला दी.
"लाइट बंद कर दो रश्मि, अँधेरे में फिर भी थोड़ा ठीक लगता है. उजाला तो अब बर्दास्त नहीं होता, काश उस दिन मैं नहीं रहा होता", राजन ने रश्मि की गोद में सर छुपा लिया.
धीरे धीरे रश्मि ने अब अपने आप को संभाल लिया था लेकिन अभी भी जब वह बाहर निकलती, उसे लगता जैसे लोगों की निगाहें उससे लगातार सवाल कर रही हैं. और उसे राजन की मनःस्थिति का भी भरपूर अंदाजा था.
"मेरी कोई गलती नहीं थी रश्मि, मोड़ पर अँधेरे के चलते मुझे दिखाई नहीं पड़ा और जबतक मुझे दिखा, लोग सामने थे", राजन ने एक बार फिर वही दुहराया जो वह पिछले एक हफ्ते से कहता आ रहा था.
"किसने कहा कि तुम्हारी गलती थी, सबने तो तुम्हें बेकसूर बता दिया है. अख़बारों में भी तुम्हारे बारे में कुछ गलत नहीं छपता अब तो", रश्मि ने उसे फिर से दिलासा देने की कोशिश की.
राजन ने करवट बदली और उसने रश्मि की तरफ देखते हुए गहरी सांस ली "लेकिन अपने आप को कैसे समझाऊँ रश्मि, उसमें कुछ बच्चे भी थे हमारे बच्चों के उम्र के". 

Wednesday, October 24, 2018

धरती का बोझ-लघुकथा

शोक सभा चालू थी, हर आदमी आता और मरे हुए लोगों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी बात शुरू करता और फिर प्रशासन को कोसते हुए अपनी बात ख़त्म करता. बीच बीच में लोग उस एक व्यक्ति की भी तारीफ़ जरूर करते जिसने कई लोगों को बचाया था लेकिन अपनी जान से भी हाथ धो बैठा था.
उधर कही आसमान में रूहें एक जगह बैठी हुई जमीन पर चलने वाले इस कार्यक्रम को देख रही थीं. उनमें अधिकांश तो उस एक रूह से बहुत खुश थीं जिसने उनके कुछ अपनों को बचा दिया था लेकिन एक रूह बहुत बेचैन थी. उसे यह बात जरा भी हजम नहीं हो रही थी कि मंच पर आने वाले उसका तो जिक्र ही नहीं कर रहे हैं.
तभी श्रोताओं में से कुछ लोग बोलने लगे "खैर बहुत बुरा हुआ लेकिन कम से कम वह नेता भी इसमें मर गया, धरती का बोझ कम हो गया". 
ऊपर सभी रूहों ने उस एक रूह की तरफ देखा, अब वह सबसे नजरें चुरा रही थी. 

मिलन-लघुकथा

चारो तरफ मची भगदड़ अब धीरे धीरे कम हो चली थी, बस घायल लोगों की चीखें ही चारो तरफ गूंज रही थीं. इस भयानक हादसे में सैकड़ों लोग मरे थे और उससे ज्यादा ही घायल थे. राहत में पहुंचे लोग मृत शरीरों को एक तरफ इकट्ठा कर रहे थे और घायलों को हस्पताल भेजने की तैयारी में भी जुटे थे.
पटरी के एक तरफ पड़े एक युवा के मृत शरीर को लोगों ने उठाकर एक तरफ कर दिया. कुछ ही देर बाद कुछ और लोग एक लड़की के मृत शरीर को भी वहीँ डाल गए. कुछ घंटे बीतते बीतते तमाम लाशें एक दूसरे से गड्डमड्ड पड़ीं थीं और लड़के का हाथ लड़की के हाथ में था.
ऊपर कहीं आसमान के किसी कोने में दोनों की आत्माएं बेहद सुकून महसूस कर रही थीं. लड़के की आत्मा ने मुस्कुराते हुए लड़की की आत्मा से कहा "ऊपरवाले ने तुम्हारी बात कितनी जल्दी सुन ली, कल ही तुम कह रही थी कि समाज अगर साथ जीने नहीं देता तो कम से कम साथ साथ मरने तो देगा. और देखो आज मरने के बाद तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में है".
लड़की की आत्मा भी मुस्कुरायी और उसने लड़के की आत्मा का हाथ अपने हाथ में ले लिया. नीचे लाशों के अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं, लड़के और लड़की के घर वाले हादसे के स्थल पर एक दूसरे से अलग बैठकर उनके मौत पर विलाप कर रहे थे.

Wednesday, October 17, 2018

परछाईयों का भय - लघुकथा

पिछले कुछ घंटों से उदास दिख रहे अपने दोस्त को देखकर उससे रहा नहीं गया. "क्या हो गया राजमन, बहुत उदास लग रहे हो".
राजमन ने एक नजर उसकी तरफ डाली और सोच में पड़ गया कि तेजू को बात बताएं कि नहीं. लेकिन तेजू तो उसकी हर बात, हर राज से वाकिफ़ था इसलिए उसे बताने में कोई हर्ज भी नहीं था.
"यार, तुम तो देख ही रहे हो ये आजकल का ट्रेंड, जिसे देखो वही इस #मी टू# के बहाने लोगों के नाम उछाल रहा है. रिटायरमेंट के बाद अब कहीं कोई मेरे खिलाफ भी यह चैप्टर न खोल दे, यही सोचकर घबरा रहा हूँ".
तेजू ने गहरी सांस ली "अच्छा तो यह वजह है, वैसे तुम्हारा कोई अफेयर मुझसे तो छिपा नहीं है. लेकिन शोषण तो तुमने किया ही था कई महिलाओं का".
"अब तुम भी यही कहोगे, मैंने शोषण किया है. अरे सबके अपने अपने स्वार्थ थे और सारे समझौते उसी के लिए तो हुए थे", राजमन ने अपनी दलील दी.
तेजू के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी "अब इतना तो तुम भी जानते हो कि उस समय तुम ऐसे पद पर थे कि लोगों की मदद कर सकते थे. लेकिन क्या उस समय तुम्हारी नैतिक जिम्मेदारी कुछ नहीं थी? 

Tuesday, October 16, 2018

आत्मनिर्भरता- कहानी

उसने ग़ौर से पिताजी को देखाबहुत उदास दिख रहे थे और शायद निराश भी थे। सेवानिवृत्ति के 5 वर्ष बाद लगभग 65 साल की उम्र पार कर चुके पिताजी को उसने शायद ही कभी इस तरह से निराश देखा हो। दरअसल सेवानिवृत्ति के पहले भी कभी वह हम लोगों पर निर्भर नहीं रहे और अब पिछले कुछ सालों से हम दोनों के साथ बारी-बारी से रह रहे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी जब तक माँ थीतब तक उन्होने अपना जीवन अपने तरीक़े से ही जिया। पेंशन के पैसों को कहाँ और कैसे ख़र्च करना हैइसका निर्णय उन्होने माँ से पूछकर ही किया लेकिन माँ के नहीं रहने पर उन्होने जैसे सब कुछ छोड़ दिया। अब जिसके घर जाते हैंअपने बैंक खाते की चेकबुक उसे ही पकड़ा देते हैं और फिर जीवन को एक अलग ढर्रे पर चलने के लिए छोड़ देते हैं। शायद जीवन को अब वह एक अलग ही नज़रिए से देखने लगे थे जहाँ उनकी अपनी इच्छाएँ बहुत मायने नहीं रखती थीं।

पिछले क़रीब तीन महीने से पिताजी बड़े भाई के यहाँ रह रहे थे और उसकी भी इच्छा थी कि पिताजी से मिल लिया जाए। वह पिताजी से ज़्यादा क़रीब था लेकिन सिर्फ़ अपने घर उनको रखना भी उसके लिए संभव नहीं था। एक तो बड़े भाई ख़ुद भी कहते थे कि कुछ महीने पिताजी उनके घर रहेंगे। और दूसरे उसने जब घर में पिताजी को हमेशा अपने साथ ही रखने की बात की तो पत्नी ऊषा का रुख़ उसे बहुत सकारात्मक नहीं लगा। हालाँकि उसने खुले शब्दों में कुछ नहीं कहा लेकिन कई और तरीक़ों से उसने ज़ाहिर कर दिया कि पिताजी को हमेशा रखना मुमकिन नहीं है।

अब बड़े भैया भी तो चाहते हैं कि पिताजी उनके साथ रहें और पिताजी का भी तो मन होगा ही कि वह बड़े बेटे के घर कुछ दिन रहें। उनसे पूछने पर तो शायद खुल के नहीं बोल पाएँ लेकिन हमें तो सोचना ही चाहिएऊषा का तर्क था।

उसे भी लगा कि ठीक ही हैपिताजी का मन भी लगा रहेगा और ऊषा को भी बहुत दिक़्क़त नहीं होगी। वह भी इसी समाज का हिस्सा था और अपने कुछ दोस्तों के घर पर उनके माँ पिताजी की हालत देख चुका था।

यह भी ठीक रहेगापिताजी भी सब जगह घूम फिर लेंगें और सबका मन लगा रहेगाउसने कहा तो ऊषा ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करने में कोई कोताही नहीं की।

माँ के गुज़रने के बाद उसने शुरू में पिताजी को अपने घर ही रखा। ठीक-ठाक पेंशन मिल रही थी लेकिन पिताजी ने जैसे पैसे निकालने या ख़र्च करने से तौबा कर ली। उसने कई बार समझाया कि अपनी पासबुक और चेकबुक आप अपने पास ही रखिए लेकिन पिताजी ने उसे पकड़ा दिया।

अब मुझे क्या ज़रूरत हैहर चीज़ तो तुम ला ही देते हो। कभी ज़रूरत पड़ेगी तो तुमसे माँग लूँगाकुछ चेक मैंने साइन कर दिए हैंजब ज़रूरत हो निकाल लिया करनापिताजी ने इन सब चीज़ों से अपने आपको एकदम परे कर लिया।

उसने भी नियम बना लिया थाहफ़्ते में एक दिन पिताजी को सैलून लेजाकर उनकी हजामत बनवानापूरे महीने की दवा एक साथ शुरू में ही मँगवा लेना और दो हिंदी अख़बार उनके लिए रोज़ मँगवाना। उसे याद था कि कैसे सुबह-सुबह अख़बार पढ़ने के लिए पिताजी हाकर का इंतज़ार करते रहते थे और उसकी साइकल की आवाज़ भी वह दूर से ही पहचान जाते थे। गाहे-बगाहे उसे उलाहना भी देते रहते अरे रामचरणआजकल देर करने लगे हो आने मेंसामने शर्माजी के घर तो आधे घंटे पहले ही अख़बार आ जाता है।और रामचरण उनको अगले दिन से जल्दी आने का वादा करते हुए निकल जाता। एक-दो दिन बाद फिर वही समय हो जाता लेकिन पिताजी ने कभी भी रामचरण को अख़बार बंद करने के लिए नहीं कहा। और उनका अख़बार भी एक ही था दैनिक जागरणजो पिछले कई सालों से चला आ रहा था। शर्माजी के यहाँ हिंदुस्तान आता था और कभी-कभार वह उसे भी पढ़ लेते थे लेकिन संतुष्टि उनको सिर्फ़ दैनिक जागरण से ही होती थी। बड़े भाई को अख़बार में बहुत दिलचस्पी नहीं थी लेकिन वह भी पिताजी के ही ढर्रे पर थाअक्सर पिताजी के साथ ही बीच के पन्ने निकालकर पढ़ता रहता।

शुरू-शुरू में तो उसने हमेशा कुछ रुपये पिताजी के कुर्ते के जेब में रखा। पिताजी ने कई बार कहा भी कि क्या ज़रूरत है इसकी लेकिन उसे लगता था कि एक ऐसे व्यक्ति के पास पैसे हमेशा होने चाहिए जिसने पूरी ज़िंदगी अपने पैसों से ही जीवन काटा होकभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया हो। पिताजी भी रोज़ टहलने जाते और आते समय बच्चों के लिए चॉकलेट या मूँगफली ले आते। एकाध बार ऊषा ने उसे टोका भी कि पिताजी को मना करो लेकिन उसने ऊषा को समझा दिया पिताजी का आत्मसम्मान रखने के लिए कभी मना मत करनावैसे भी उनके पेंशन का हिस्सा ही वह ख़र्च करते हैं।

वो तो ठीक है लेकिन जब ज़रूरत नहीं हो तो पैसे क्यों ख़र्च करते हैंआख़िरकार अंत में काम तो उनके ही आने हैंऊषा ने अपना मत रखा लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया।

समय के साथ मनुष्य चीज़ों को भूलने लगता है या यूँ कहें कि मस्तिष्क को अपनी सहूलियत से भूल जाने देता है। मैं भी जैसे-जैसे अपनी जाती ज़िंदगी में व्यस्त होने लगापिताजी के प्रति थोड़ा लापरवाह होने लगा। अब मैं कभी-कभी उनके जेब में पैसे रखना भूल जातापिताजी भी अमूमन कुछ नहीं कहते। जब दो-चार दिन ऐसा हो जाता तो सीधे तो नहीं लेकिन दूसरे तरीक़े से बता देते कि उनके पास पैसे नहीं हैं आज पार्क के बाहर बहुत बढ़िया मूँगफली मिल रही थीहमने सोचा कि बच्चों के लिए ले लें लेकिन शायद दूसरा कुर्ता पहन लिया था मैंने।मुझे यह अच्छी तरह से मालूम था कि पिताजी के कमरे में उनके सुबह के टहलने के लिए एक ही कुर्ता टँगा रहता और बाक़ी कुर्ते अलमारी में रहते। और यह बात पिताजी भी जानते थे लेकिन एक हिचक सी होने लगी थी उनको पैसे के लिए कहने में। दो-चार बार जब यह घटना हुई तो मुझे अहसास हुआ कि यह ग़लत हो रहा है तो मैंने फिर से नियम से पैसे पिताजी के कुर्ते में रखना शुरू कर दिया।

मैंने यह बात बड़े भाई को भी बता दी थी और उनको ताकीद भी किया था कि वह इसका ख़याल रखें। लेकिन भैया तो शुरू से ही इन सब चीज़ों के प्रति लापरवाह थे और उन्होने कभी-कभार ही इसके लिए ध्यान दिया। आज पिताजी की उदासी को मैं तो भाँप गया लेकिन बड़े भाई ने महसूस ही नहीं किया। जब बड़े भाई ऑफ़िस निकल गए और भाभी भी घर के काम में व्यस्त हो गईं तो मैंने पिताजी से पूछा क्या बात है पिताजीतबीयत थोड़ी गड़बड़ है क्याआप उदास लग रहे हैं?

पिताजी ने मेरी तरफ़ ग़ौर से देखा और सर हिलाते हुए बोले तबीयत तो ठीक ही हैबस ऐसे ही। अब उम्र के साथ थोड़ी-बहुत दिक़्क़त तो लगी ही रहेगी।

मैं समझ गया कि पिताजी खुलकर बात नहीं करेंगे और मैं उनसे काफ़ी देर तक इधर-उधर की बात करता रहा। शाम को बड़े भाई आए तो उनसे भी इस बाबत सीधे बात करना उचित नहीं लगा। मैंने थोड़ा घुमाकर बात शुरू की पिताजी का पेंशन आपने कभी निकाला कि नहींबीच-बीच में खाता देख लिया कीजिए

बड़े भाई समझ नहीं पाए कि मैं यह क्यों पूछ रहा हूँउन्होने मेरी तरफ़ अचरज से देखा। पिछले महीने एक बार कुछ रुपये निकाले तो थेउसके बाद ज़रूरत नहीं महसूस हुई। तुम्हें पैसों की ज़रूरत है तो बोलोमैं दे देता हूँ।

मुझे लग गया कि बड़े भाई ग़लत समझ गए हैंअब मैंने उनसे खुल कर बात की दरअसल बात यह है भैया कि पिताजी के पास भी कुछ पैसे रहने चाहिए लेकिन वह कभी माँगते नहीं। इसीलिए मैं उनके जेब में हमेशा कुछ रुपये डाल देता था जिससे उनको जो भी ठीक लगेख़र्च करें। और उनके पेंशन से ही पैसे निकालता हूँ जिससे उनको यह न लगे कि वह हमारे पैसे पर आश्रित हैं। आप उनके जेब में आजकल रुपये नहीं डालते हैं और शायद उनको यही बात अंदर से साल रही है कि उनके पास बच्चों के लिए ख़र्च करने के लिए भी पैसे नहीं हैं।

बड़े भाई को जैसे झटका लगाउन्होने इस विषय में कभी ध्यान ही नहीं दिया था। मैंने उनको इशारों इशारों में यह बात पहले भी बताई थी लेकिन खुलकर नहीं कह पाया था कि कहीं उनको बुरा न लग जाए

अरे मैंने तो यह बात कभी सोची ही नहींमुझे लगा कि उनकी हर ज़रूरत का सामान तो घर में रहता ही है और बाहर का वह कुछ खाते पीते नहीं। इसलिए उनको पैसे की क्या ज़रूरत होगीबड़े भाई को अपनी भूल का अहसास हुआ और वह बाहर निकल गए। थोड़े देर में जब वह वापस लौटे तो उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव थेउन्होने पिताजी के कुर्ते में कुछ रुपये डाल दिए थे।

अगली सुबह पिताजी टहल कर लौटे तो उनके हाथ में एक दर्जन केले थे जिसे सबने बड़े मज़े में मिलकर खाया। उनके चेहरे पर उदासी अब दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही थी। बड़े भाई ने इसी बीच उनकी चेकबुक भी लाकर रख दीपिताजी बड़ी प्रसन्नता से उसमें कुछ रकम लिख रहे थे।