Translate

Saturday, April 19, 2014

विरोधाभास

आज का पेपर कैसा हुआ यार , श्याम ने पूछा तो मैंने कहा 'कल तो बहुत डर लग रहा था लेकिन बढ़िया हुआ , अब अगले पेपर की तैय्यारी करनी है "| 
शाम को टहलने निकले तो सबने कहा कि चलो मंदिर हो लेते हैं | लेकिन मैंने मना कर दिया कि मैं मंदिर नहीं जाउंगा , मैं इन सब बातों में यकीं नहीं करता |
लेकिन अगले दिन एग्जाम के लिए जाते समय कल वाली टीशर्ट ही पहन ली | न जाने क्यूँ पर कही न कही ये लग रहा था कि कल वाली टीशर्ट तो लकी थी , वर्ना पहले दिन तो शर्ट पहनी थी और उस दिन पेपर बहुत ख़राब हुआ था |

गाड़ी

अरे ओ साहबजादे , जरा देख के चलाया करो गाड़ी | सारा कपड़ा ख़राब कर दिया | कार पे क्या बैठ गए , पता नहीं क्या समझ लेते हैं अपने आप को |
कपड़ों पे पड़े छीटों को देख देख के मूड ख़राब हो गया उसका | आज बहुत दिन बाद वो पैदल मार्केट निकला था | घर आने पर श्रीमतीजी ने जब पूछा तो सारी भड़ास निकाल दी ये कहते हुए कि लोगों को तो सलीका ही नहीं रह गया गाड़ी चलाने का |
लेकिन अगले दिन ऑफिस में पहुँच कर अपने सहकर्मियों को हँसते हुए बता रहे थे कि आज तो मजा आ गया रास्ते में , एक गड्ढे में गाड़ी का पहिया चला गया और जो छीटें पड़ी लोगों के ऊपर कि होली की याद आ गयी |

लेखक

यार , लोग तो कुछ भी लिख देते हैं और चाहते हैं कि उसे छाप भी दिया जाये | पता नहीं कहाँ कहाँ से लेखक पैदा हो जाते हैं , बड़बड़ाते हुए संपादक महोदय ने उस कहानी को डस्टबिन के सुपुर्द किया और गहरी सांस ली |
किसी का फोन तो नहीं आया था , या कोई नयी कहानी वगैरह तो नहीं आई थी छपने के लिए , थोड़ी देर बाद इंटरकॉम पर अपने सहयोगी से पूछा | 
हाँ सर , एक कहानी तो आई थी , और शिक्षा मंत्री के पी.ए. का फोन भी आया था कि उसे छापना है , लेखक मंत्रीजी का रिश्तेदार है | आप के टेबल पे रख दी थी , मिली क्या , सहयोगी ने बताया | 
हाँ , बहुत बढ़िया है , तुरंत छाप दो इसे , कहते हुए डस्टबिन से बाहर निकाल कर ठीक किया और सहयोगी को देते हुए बोले कि उनको फोन करके विज्ञापन की याद जरूर दिला देना |

"कहानी का विकास"

"कहानी का विकास" 
मैं बड़ी थी तो मुझे लगता था कि मुझमे बहुत ताकत है | मेरा असीम विस्तार , मुझमे समाये हुए तमाम एहसास , मेरे फैले हुए पर , शाखाएं , टहनियां आदि मुझे सम्बल देती थीं | लेकिन समय के साथ मुझे लगने लगा कि शायद ये मेरा विस्तार ही मेरे लिए रूकावट बन रहा है , शायद बहुत विस्तार होने पर तेज हवाएँ मुझे झकझोड़ने लगी हैं | मुझे लगने लगा कि समय के साथ जैसे डायनासोर विलुप्त हो गए , वैसे ही मैं भी कही अदृश्य न हो जाऊँ , इसलिए मुझे नए रूप में जन्म लेना पड़ा | अब मुझमे वो विस्तार तो नहीं है लेकिन शायद ज्यादा पैनापन आ गया है | शायद अपने अल्प रूप में मैं ज्यादा ग्राह्य हो गयीं हूँ .....

फर्क

बस खचाखच भरी हुई थी | शर्माजी किसी तरह अंदर घुसे और खड़े हो गए | अचानक बगल वाली सीट पर निगाह गयी और देखा की सीट पर दो दुबले पतले लोग बैठे हुए हैं | एक उम्मीद बनी कि शायद जगह मिल जाये और बड़े ही दीन हीन लहजे में पूछा कि मैं भी बैठ जाऊँ क्या ? खैर बैठे हुए लोगों को तरस आ गया और उन्होंने थोड़ा सरक कर जगह दे दी | शर्माजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि एक दूसरे का ख्याल तो रखना ही चाहिए और और धन्यवाद देते हुए बैठ गए |
अगले स्टॉप पर उनमे से एक आदमी उतर गया और अब शर्माजी को पूरी जगह मिल चुकी थी | थोड़ी देर बाद ही एक आदमी की आवाज उनके कान में आई कि थोड़ा सरक जाते तो मैं भी बैठ जाता | इतना सुनते ही झल्लाते हुआ बोले कि दिखाई नहीं देता , दो ही लोगों की सीट है फिर कैसे बिठा लें आपको , और इयरफोन से गाना सुनने में तल्लीन हो गए |

सरोकार

सामाजिक सरोकार तो अब बचे ही नहीं , बस खुदगर्जी ही है आजकल | मन बड़ा खट्टा हो गया मेरा , भार्गवजी बता रहे थे तो मैंने पूछ लिया कि क्या हो गया | बड़े दुखी मन से बोले , आपको शायद पता नहीं , मेरे पड़ोस में एक नए दम्पति आये हैं रहने के लिए | मैंने सोचा कि चलो उनसे परिचय भी कर लें और पूछ भी लें अगर किसी चीज कि जरुरत हो तो | लेकिन क्या बताएं साहब , उन लोगों ने तो बात करना ही मुनासिब नहीं समझा , दरवाजे से ही नो थैंक्स कह कर टरका दिया |
क्या कीजियेगा भार्गव साहब , आजकल लोग नहीं चाहते कि दूसरे उनके मामलों में दखल दें | अब सारे आप की तरह सामाजिक तो नहीं होते न | भार्गव साहब भुनभुनाते हुए जा रहे थे और मैं सोच रहा था कि आज की पीढ़ी में क्या सचमुच सामाजिक सरोकार नहीं बचे हैं |

अन्धविश्वास

मैं जा रहा हूँ , अजय के घर होते हुए जाऊंगा परीक्षा देने | ये कहते हुए मैंने अपना बैग उठाया और घर के बाहर निकल पड़ा | भैया ने भी हाथ हिलाकर विदा किया और शायद मन ही मन मेरे परीक्षा के अच्छे होने की कामना की | मैं पैदल चलते हुए अजय के घर पहुंचा | अजय भी तैयार था चलने के लिए और जैसे ही मैंने आवाज दी , वो घर से निकलने लगा | तभी उसकी माँ ने आवाज लगायी , अरे बेटा रुको , जरा ये दही गुड़ तो खा लो , फिर जाना परीक्षा देने , और फिर उसे एक कटोरी में दही गुड़ दिया खाने के लिए |
अजय मेरा बहुत अच्छा दोस्त था , हम दोनों रोज स्कूल साथ जाते थे और साथ ही वापस आते थे | लेकिन हम दोनों में एक बड़ा अंतर था , उसका मन पढ़ने में बिलकुल नहीं लगता था और किसी तरह वो पास हो जाता था | लेकिन हर बार परीक्षा के समय उसकी माँ उसे दही गुड़ जरूर खिलाती थीं | वो उनके मन का विश्वास , या यूँ कहें कि अन्धविश्वास था कि दही गुड़ खाने से बेटे की परीक्षा अच्छी होगी |