बस खचाखच भरी हुई थी | शर्माजी किसी तरह अंदर घुसे और खड़े हो गए | अचानक बगल वाली सीट पर निगाह गयी और देखा की सीट पर दो दुबले पतले लोग बैठे हुए हैं | एक उम्मीद बनी कि शायद जगह मिल जाये और बड़े ही दीन हीन लहजे में पूछा कि मैं भी बैठ जाऊँ क्या ? खैर बैठे हुए लोगों को तरस आ गया और उन्होंने थोड़ा सरक कर जगह दे दी | शर्माजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि एक दूसरे का ख्याल तो रखना ही चाहिए और और धन्यवाद देते हुए बैठ गए |
अगले स्टॉप पर उनमे से एक आदमी उतर गया और अब शर्माजी को पूरी जगह मिल चुकी थी | थोड़ी देर बाद ही एक आदमी की आवाज उनके कान में आई कि थोड़ा सरक जाते तो मैं भी बैठ जाता | इतना सुनते ही झल्लाते हुआ बोले कि दिखाई नहीं देता , दो ही लोगों की सीट है फिर कैसे बिठा लें आपको , और इयरफोन से गाना सुनने में तल्लीन हो गए |
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