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Saturday, April 19, 2014

"कहानी का विकास"

"कहानी का विकास" 
मैं बड़ी थी तो मुझे लगता था कि मुझमे बहुत ताकत है | मेरा असीम विस्तार , मुझमे समाये हुए तमाम एहसास , मेरे फैले हुए पर , शाखाएं , टहनियां आदि मुझे सम्बल देती थीं | लेकिन समय के साथ मुझे लगने लगा कि शायद ये मेरा विस्तार ही मेरे लिए रूकावट बन रहा है , शायद बहुत विस्तार होने पर तेज हवाएँ मुझे झकझोड़ने लगी हैं | मुझे लगने लगा कि समय के साथ जैसे डायनासोर विलुप्त हो गए , वैसे ही मैं भी कही अदृश्य न हो जाऊँ , इसलिए मुझे नए रूप में जन्म लेना पड़ा | अब मुझमे वो विस्तार तो नहीं है लेकिन शायद ज्यादा पैनापन आ गया है | शायद अपने अल्प रूप में मैं ज्यादा ग्राह्य हो गयीं हूँ .....

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