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Saturday, April 19, 2014

लेखक

यार , लोग तो कुछ भी लिख देते हैं और चाहते हैं कि उसे छाप भी दिया जाये | पता नहीं कहाँ कहाँ से लेखक पैदा हो जाते हैं , बड़बड़ाते हुए संपादक महोदय ने उस कहानी को डस्टबिन के सुपुर्द किया और गहरी सांस ली |
किसी का फोन तो नहीं आया था , या कोई नयी कहानी वगैरह तो नहीं आई थी छपने के लिए , थोड़ी देर बाद इंटरकॉम पर अपने सहयोगी से पूछा | 
हाँ सर , एक कहानी तो आई थी , और शिक्षा मंत्री के पी.ए. का फोन भी आया था कि उसे छापना है , लेखक मंत्रीजी का रिश्तेदार है | आप के टेबल पे रख दी थी , मिली क्या , सहयोगी ने बताया | 
हाँ , बहुत बढ़िया है , तुरंत छाप दो इसे , कहते हुए डस्टबिन से बाहर निकाल कर ठीक किया और सहयोगी को देते हुए बोले कि उनको फोन करके विज्ञापन की याद जरूर दिला देना |

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