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Tuesday, February 16, 2016

अपने अपने सपने--

बनारसी गईया चरा के लौटे और उनको चरनी पर बाँध के पीठ सीधा करने के लिए झोलंगी खटिया पर लेट गए. उस क्षेत्र में जैसे बाकी गाओं थे, वैसे ही उनका गाँव था. अब गाँव का नाम भले ही "सिकंदरपुर" था लेकिंन इतिहास के सिकंदर और पोरस से इसका कोई सम्बन्ध नहीं था. अब गाँव में लोगों के नाम भी तो ऐसे होते हैं जिनका वास्तविकता से दूर दूर तक कोई भी सम्बन्ध नहीं होता. मिसाल के लिए उनके सगे पट्टीदार थे "दरोगा", जिनका कद भी पांच फुट नहीं था और ऊपर से दमा के मरीज, जरा सा तेज चलें तो हांफने लगते थे. आस पास के गाँव भी कुछ ऐसे ही नाम के थे और शायद ही किसी गाँव से जुड़ी कोई कहानी हो. बहरहाल उनकी गाय बिलकुल सीधी थी और उसको चराने में कोई भी मशक्कत नहीं करनी पड़ती थी. सिवान में ले जाकर उसे छोड़ देते थे और कहीं पेड़ के निचे आराम से सुस्ताने लगते थे. कोई गाँव का आदमी उधर से निकल जाए तो फिर बतकही का दौर ऐसा चलता था कि समय का पता ही नहीं चलता था. गाँव में उनके सम्बन्ध ठीक ठाक थे और लोगों को उनकी जाती और सामर्थ्य के हिसाब से बनारसी इज्जत भी देते थे. 
मौसम का कुछ ठिकाना नहीं था, इस बार पानी महीनों से बरस नहीं रहा तो घाँस भी कम हो गयी है सिवान में, चारो ओर टहाटह गर्मी पड़ रही है. खटिया पर लेते लेते गमछी से माथे का पसीना पोंछते हुए बनारसी मेहरारू को आवाज़ दिए "अरे तनी एक लोटा पानी त पिलाओ रघुआ की महतारी, बहुत गरम है आज". फिर वह दरवाज़े पर नज़र दौड़ाये तो साइकिल नहीं दिखी, मतलब रघुआ कहीं निकला है. उनका माथा गरम हो गया, ई लड़का का पेअर तो घर में टिकता ही नहीं है, जब देखो तब हवा पर सवार रहता है.
"कहवां गायब हौ तोहार नवाब, अब ओके खेत बारी से कउनो मतलब नाहीं हौ, कम से कम गईया के ही चरा दिहल करत", पानी लेते हुए बनारसी मेहरारू से बोले. ऐसे समय अक्सर रघुआ की महतारी चुप ही रहती है, पता है कि न तो ई मानेंगे और न रघुआ.
"अरे ऊ बजारे गयल हौ, कुछ किताब ख़रीदे खातिर. अब ओकर मन पढ़ाई में लगल हौ, त पढ़ लेवे द ओकरा के", लोटा लेकर वापस जाते समय उनकी मेहरारू धीरे से बोली.
अब खुद तो पढ़े लिखे नहीं थे तो का ही कहते अपने मेहरारू से. मन एक तरफ शंकित होता तो दूसरी तरफ मान भी लेता कि रघुआ पढ़ने में मन लगाता है. उनके हिसाब से पढ़ने का मतलब था कि रघुआ किताब खोलकर बैठा रहे और कुछ बोल बोलकर पढता रहे. ख़ैर पानी पीकर थोड़ा ताज़ा हुआ मन तो बनारसी ने वहीं रखा चारा काट कर भूषा में मिलाकर नाँद में डाल दिया. फिर सब गायों को नाद पर बाँध कर झउआ उठाया और गोबर फेंकने चल दिए. गाय के चलते देसी खाद और ऊपरी का इंतज़ाम तो हो ही जा रहा है.
उधर रघुआ बगल के गाँव के सिवान में एक जगह पेड़ों की ओट में साइकिल खड़ा करके इंतज़ार कर रहा था. कॉलेज में पढ़ने के चलते उसे पता था कि आज वैलेंटाइन डे था और उसको भी कुछ देना था अपनी सरोज को. टी वी और अख़बार में एक हफ्ता पहले से ही इस नवके त्यौहार का खूब धूम धाम था और ऐसा लगता था जैसे यह त्यौहार नहीं होता तो लोग भला प्रेम कैसे करते. अब देने के लिए कुछ समझ में नहीं आया तो एक नए डिज़ाइन का अँगूठी खरीद लिया था उसने. अंगूठी सोने की तो नहीं थी लेकिन किताबों के लिए मिले पैसे होम हो गए उसमे. पेड़ के नीचे खड़े खड़े वह चारो तरफ देख रहा था वो कि कोई और तो नहीं देख रहा है. भले कितना भी बहादुर बने कोई लेकिन प्रेम मोहब्बत में डर तो लगा ही रहता था लोगों का, सबसे ज्यादा अपने परिवार का ही. दूर कुछ आहट हुई और उसने पलट के देखा, सरोज दुपट्टा ओढ़े उसकी तरफ आ रही थी. रघुआ को दिल वाले दुल्हनिया का गाना याद आ गया, लगा जैसे काजोल उसकी तरफ मुस्कुराते हुए आ रही है. जैसे ही वो करीब आई, उसने मुस्कुराते हुए कहा "तुम्हारे लिए कुछ गिफ्ट लाये हैं सरोज, आज के दिन का शगुन है". फिर उसने जेब से अंगूठी निकलकर सरोज को दिया और मुस्कुरा दिया.
"अरे ई का ले आये, लगता है एक तीर से दो निशाना साध रहे हो तुम", और लजाकर अँगूठी सरोज ने अपनी उंगली में डाल लिया. रघुआ तो माने सातवें आसमान पर पहुँच गया, अब तो मामला बिलकुल सेट हो गया है, वह मन ही मन सोचने लगा.
"का सोचने लगे, बहुत सुन्दर अंगूठी है, तुम्हारी पसंद बढ़िया है", एक बार चारो तरफ नज़र दौड़ाया सरोज ने और फिर एक बार हाथ हिलाकर चल पड़ी.
"तुमको ऐसे ही थोड़े न पसंद किया हैं हम", रघु मुस्कुरा कर बोला.
सरोज आगे बढ़ी तो रघु ने धीरे से पूछा "अब कब मिलोगी सरोज".
जवाब में सरोज मुस्कुराकर चली गयी, रघु उसको दूर तक जाते देखता रहा. फिर चारो तरफ देखकर रघुआ ने साइकिल उठाया और घर चल पड़ा. शाम ढल चुकी थी, अधिकांश लोगों के घर लालटेन और कुछ घरों में बल्ब जल गए थे. गाँव में बिजली आ चुकी थी और सड़क भी ठीक ठाक बन गयी थी. 
घर पर साइकिल खड़ा करके वो दलान में घुसा और तभी बनारसी ने टोक दिया "कहाँ इतनी देर तक घूमत रहे, पढ़ाई लिखाई तो मन लगाकर कर करत हो न आजकल". रघुआ कभी भी बनारसी से खुलकर बात नहीं करता था, बस हाँ हूँ करके निकल जाता था. आदतन आज भी हूँ कहकर वो घर में घुस गया, कपड़े निकाले और मुँह हाथ धोने लगा. मतारी ने खाने का पूछा तो थोड़ी देर बाद खाऊंगा बोलकर वह अपने खटिया पर बैठ गया. 
किताब में रखी सरोज की फोटो देखकर वो उसके सपनों में खो गया था. उसकी मतारी भी चूल्हे के पास से उसे देखते हुए उसके उज्जवल भविष्य के सपने में खोई थी और दुआरे बनारसी अपने झोलंगी खटिया पर लेटे लेटे अपने खेती और गईया के सपनों में खोया था.

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