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Tuesday, February 16, 2016

अंतहीन इंतज़ार--लघुकथा

" मौसम ऐसे ही साथ देता रहे तो कार्यक्रम सकुशल निपट जायेगा", आसमान की ओर देखते हुए एक कार्यकर्ता ने कहा। आज भी मौसम बिलकुल साफ़ था, दूर दूर तक बादलों का नामोनिशान नहीं था। पिछले एक महीने से छिटपुट बारिश को छोड़कर कभी भी ठीक बारिश नहीं हुई थी। बरसात का मौसम था और पूरे प्रदेश में कहीं भी बारिश नहीं हो रही थी। गाँवों में किसान फसल की बुवाई भी नहीं कर पाये थे, सारे खेत परती पड़े हुए थे। शहरों में भी गर्मी बढ़ गयी थी लेकिन फिर भी लोग खुश थे, क्योंकि कीचड़ से बचे हुए थे।
लेकिन धीरे धीरे किसानों के धैर्य का बाँध टूटने लगा और अब उनके आत्महत्या की ख़बरें भी छन छन कर सरकारी कार्यालयों में पहुँचने लगी। जब मामला मीडिया में तूल पकड़ने लगा और विपक्ष को भी एक बड़ा मुद्दा मिल गया तो सरकार चेती। कृषि मंत्री ने अपने गुरु से सलाह मांगी जो उसे हर समस्या का हल दिया करते थे। गुरु ने उनको इन्द्र देव को प्रसन्न करने के लिए एक बड़ा यज्ञ करने की सलाह दी और फिर जोर शोर से यज्ञ की तैयारी होने लगी।
आज उसी सामूहिक यज्ञ का कार्यक्रम एक बड़े से खुले मैदान में था। किसानों के दर्द को दूर करने के कार्यक्रम में बारिश का विघ्न न पड़े, इसकी कामना अब किसान भी करने लगे थे। दरअसल वो तो अपनी जिंदगी के लिए भी चमत्कारों के भरोसे ही रहने के आदी हो चुके थे। मीडिया भी इस गुनाह में बराबर का भागीदार बन गयी थी और वो भी इसे प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। दिन बीतता गया, बारिश नहीं हुई, यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हो गया। जिन पैसों से किसानों के लिए सिचाई के साधन उपलब्ध कराये जा सकते थे वो इस यज्ञ रूपी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया और किसान एक बार फिर भगवान भरोसे अपने खेतों में बारिश की बूंदों का अंतहीन इन्तज़ार करने के लिए मज़बूर हो गया।

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