आज फिर शनिवार था और वो फिर अपने मिशन पर निकल गया। कहने को तो हफ्ते में दो दिन वीकेंड की वज़ह से छुट्टी होती थी जिसमें उसके अधिकतर साथी या तो घूमने निकल जाते थे या पूरी तरह आराम करते थे। लेकिन इन दो दिनों में वो समय के एक एक घंटे का पूरा सदुपयोग करता था आश्रम में। नाम का ही आश्रम था वो लेकिन शायद ही कोई सामान्य इन्सान वहाँ जाना पसंद करता था।
बचपन में वो घर पर सिर्फ माँ को ही देखता था, पिता को कभी नहीं देखा था उसने। जब भी वो पूछता, उदास माँ बताती कि पिता कहीं और रहते हैं जहाँ जाने की इज़ाज़त उसे नहीं थी। थोड़ा और बड़ा हुआ और जब उसकी जिद्द बहुत बढ़ गयी तो माँ ने एक शर्त पर उसे पिता के पास ले चलने की अनुमति दी कि वो उनके पास नहीं जाएगा। पहली बार जब वो आश्रम गया तो उसे बहुत अजीब लगा, वहाँ मौजूद अधिकतर लोगों के हाथ या पैर पर कपड़ा बंधा हुआ था और कुछ लोगों के हाथ और पैर अजीब से छोटे से थे। अगले कुछ महीनों में उसे अपने स्कूल में बच्चों ने बता दिया कि वो एक कुष्ठरोगी का लड़का है और उसे सबके साथ मिलजुल कर रहने या खेलने का अधिकार नहीं है।
वो बड़ा होता गया और उसका दिल समाज़ के व्यंग्योक्तियों से पिता के अंगों की तरह गलता रहा। पिता चल बसे, माँ भी पीछे पीछे चली गयी और वो रह गया अपने जिंदगी के अंधेरों में। और उसी समय ये राह दिखाई पड़ी जो उसे उन उजालों की ओर ले जाती थी जिससे उसके दिल को सुकून मिलता था। इस आश्रम में आकर लोगों की सेवा करने में उसे लगता जैसे वो अपने पिता की ही सेवा कर रहा है।
उसने अपना तीर्थ स्थल ढूँढ लिया था जहाँ वो हर हफ्ते जाकर न सिर्फ अपने हिस्से का पुण्य कमाता था बल्कि अपने पिता के दर्द को भी महसूस करता था।
बचपन में वो घर पर सिर्फ माँ को ही देखता था, पिता को कभी नहीं देखा था उसने। जब भी वो पूछता, उदास माँ बताती कि पिता कहीं और रहते हैं जहाँ जाने की इज़ाज़त उसे नहीं थी। थोड़ा और बड़ा हुआ और जब उसकी जिद्द बहुत बढ़ गयी तो माँ ने एक शर्त पर उसे पिता के पास ले चलने की अनुमति दी कि वो उनके पास नहीं जाएगा। पहली बार जब वो आश्रम गया तो उसे बहुत अजीब लगा, वहाँ मौजूद अधिकतर लोगों के हाथ या पैर पर कपड़ा बंधा हुआ था और कुछ लोगों के हाथ और पैर अजीब से छोटे से थे। अगले कुछ महीनों में उसे अपने स्कूल में बच्चों ने बता दिया कि वो एक कुष्ठरोगी का लड़का है और उसे सबके साथ मिलजुल कर रहने या खेलने का अधिकार नहीं है।
वो बड़ा होता गया और उसका दिल समाज़ के व्यंग्योक्तियों से पिता के अंगों की तरह गलता रहा। पिता चल बसे, माँ भी पीछे पीछे चली गयी और वो रह गया अपने जिंदगी के अंधेरों में। और उसी समय ये राह दिखाई पड़ी जो उसे उन उजालों की ओर ले जाती थी जिससे उसके दिल को सुकून मिलता था। इस आश्रम में आकर लोगों की सेवा करने में उसे लगता जैसे वो अपने पिता की ही सेवा कर रहा है।
उसने अपना तीर्थ स्थल ढूँढ लिया था जहाँ वो हर हफ्ते जाकर न सिर्फ अपने हिस्से का पुण्य कमाता था बल्कि अपने पिता के दर्द को भी महसूस करता था।
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