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Monday, March 21, 2016

गुलाल के रंग--

इस बार फिर होली उसी तारीख़ को पड़ रही थी जिस तारीख़ से उसकी माँ की सबसे दुःखद याद जुड़ी हुई थी| इसी तारीख़ को उसके पिता होली खेलने के लिए निकले थे और नशे की हालत में उनकी गाड़ी दुर्घटना की शिकार हो गयी थी| इस बात को १० साल बीत गए थे लेकिन माँ आज भी उस दर्द को भुला नहीं पायी थी| हाँ ये अलग बात थी कि वो खुद इस चीज को भूल चुका था|
पिछले कही महीनों से वो सोच रहा था कि माँ को वर्तिका के बारे में बताये, लेकिन कोई न कोई वज़ह ऐसी आ जा रही थी कि वो बता नहीं पा रहा था| इस होली पर उसने सोच लिया था कि वो वर्तिका को लेकर घर जायेगा और माँ को एक सुखद सरप्राईज़ देगा| उसने फोन करके माँ को बता दिया था कि वो होली की पहली वाली रात को घर आएगा|
आज होली के दिन सुबह जब वो दोनों उठे तो उन्हें माँ का कल रात के भावहीन व्यवहार पर बहुत आश्चर्य हो रहा था| कहाँ उसने सोचा था की माँ बहुत खुश होगी, शायद थोड़ा डांटेगी भी कि उसने क्यों छुपाया, लेकिन वो दोनों माँ से माफ़ी माँग लेंगे| लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और वो परेशान ही था कि उसे आज की तारीख़ याद आ गयी| उसने वर्तिका को सब बात बताई और दोनों माँ से माफ़ी मांगने के लिए उसके कमरे की तरफ चले|
माँ भी कल रात से परेशान थी, आखिर इस तारीख़ में उसके बच्चों का क्या कसूर है| वो इसी उधेड़बुन में थी कि उसे सामने से बच्चे आते दिखाई दिए| उसने कुछ सोचा और कोने में रखे गुलाल को बेटे और वर्तिका के ऊपर डाल दिया| गुलाल के रंग बच्चों के तन के साथ साथ माँ के मन के अँधेरे कोने को भी रंग से भरने लगे|

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