आज उसे अपना सपना सच होता दिख रहा था, आखिर जिस पुरस्कार के बारे में वो हमेशा सोचा करता था, वो आज उसे मिलने वाला था। सुबह जैसे ही उसके ससुरजी ने उसे फोन करके इसकी सूचना दी, वो मारे ख़ुशी के कुछ बोल नहीं पाया। एक बार उसके मन में आया कि पत्नी को जगा कर उसे भी ये खुश खबरी दे, लेकिन फिर उसने विचार बदल दिया। क्या फ़ायदा था उसे बताने में जिसे कुछ भी समझ नहीं आता था।
आज वो जो भी था, अपने ससुर जो किसी जमाने में उसके प्रोफेसर और गाइड भी थे, की ही वज़ह से था। बेहद कमजोर आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का वह कभी सोच भी नहीं सकता था कि ऐसे प्रोफेसर न सिर्फ उसे गाइड करेंगे, बल्कि उसे उसी यूनिवर्सिटी में लेक्चरर भी बनवा देंगे। वो अक्सर उनके बुलाने पर उनके घर जाया करता था और देखता था उनकी बेटी को, जो सिर्फ देखने में बड़ी थी, मानसिक रूप से नहीं।
उसकी डिग्री मिलने के दिन उसके गाइड ने सिर्फ एक ही बात कही थी और वो उनके एहसान का बोझ किसी और तरीके से नहीं उतार सकता था।
आज वो जो भी था, अपने ससुर जो किसी जमाने में उसके प्रोफेसर और गाइड भी थे, की ही वज़ह से था। बेहद कमजोर आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का वह कभी सोच भी नहीं सकता था कि ऐसे प्रोफेसर न सिर्फ उसे गाइड करेंगे, बल्कि उसे उसी यूनिवर्सिटी में लेक्चरर भी बनवा देंगे। वो अक्सर उनके बुलाने पर उनके घर जाया करता था और देखता था उनकी बेटी को, जो सिर्फ देखने में बड़ी थी, मानसिक रूप से नहीं।
उसकी डिग्री मिलने के दिन उसके गाइड ने सिर्फ एक ही बात कही थी और वो उनके एहसान का बोझ किसी और तरीके से नहीं उतार सकता था।
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