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Friday, March 11, 2016

बिरादरी का समाजशास्त्र--

" केतना बार कहा है कि ओकरे साथ मत उलझा करो, लेकिन हमरा बात कब्भों सुनाता है का तुमको", हर्दी बांधते हुए बड़बड़ा रही थी सुरजी| बहुत सूज गया था रग्घू का देंह, और कहीं कहीं से खून भी निकल आया था|
" जा के थाने रपट लिखा दो ओकरे खिलाफ, एकदम जनावर के तरह मारा है तुमको", देंह पोंछते हुए फिर बोली सुरजी|
" ठीक कहत हो भौजाई, हम भी साथ चलब रपट लिखावे| अइसने लोगन क बिरोध जरुरी हौ, नाहीं त आगे और मुश्किल झेले के पड़ी", मिसिर जी बोले, जो तब तक रग्घू के दरवाजे पहुँच गए थे|
" पाँय लागूं मिसिर जी, अब आप ही ले जाओ इनको थाने रपट लिखाने", सुरजी ने टुटही कुर्सी खीँच दी आगे|
" अबहीं बइठब नाहीं, लेकिन काल जरूर साथे चलब", मिसिर जी ने एक बार फिर रग्घू की तरफ देखा और चल दिए|
" तुम्हरा दिमाग त नाहीं फिर गया है, लगी मिसिर जी की हाँ में हाँ मिलाने| अरे उ का आपन बिरादर हैं", रग्घू कराहते हुए खड़ा हो गया|
" अच्छा, ई लोग आपन हैं जो इस तरह पीटत हैं तुमको| और मिसिर जी पराये हैं जो तुम्हरे साथ हैं और तैयार हैं थाने जाये के लिए", सुरजी को कुछ समझ नहीं आ रहा था| उसको तो बुरी तरह पिटा हुआ रग्घू नज़र आ रहा था जिसको देख कर ही उसके दिल में दर्द हो रहा था और पीटने वालों के लिए नफरत हो रही थी|
" अरे सुरजी, कब समझेगी ई सब, चाहे जो हो, आपन बिरादरी वाला आपन ही होत है| अपने हाड़े गाढ़े में यही लोग काम आवत हैं और मिसिर जी के यहाँ आपन बिटिया क बियाह थोड़े न कर सकत हैं हम लोग", रग्घू दर्द को भींचते हुए समझा रहा था सुरजी को|
सुरजी के लिए इस समाजशास्त्र को समझना आसान नहीं था| उसने धीरे से रग्घू को खटिया पर लिटाया और फिर से हर्दी लगाने लगी, उसके दिमाग में मिसिर जी और अपनी बिरादरी का समीकरण उलझ गया था|
 

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