गुनगुनी धूप थी तो उसका मन किया कि लॉन में बैठा जाये, जाड़े की धूप तो वैसे भी प्यारी होती है| हाथ में लिया हुआ अखबार चेहरे पर डालकर वो आरामकुर्सी पर लेट गयी और कुछ सोच ही रही थी कि माली काका और एक लड़की की बात कानों में पड़ी|
" बेटा, कोशिश तो कर रहा हूँ लेकिन मुश्किल लगता है| मालकिन भी आजकल परेशान हैं, फिर भी कुछ देखता हूँ इस हफ्ते ", माली काका ने उसे समझते हुए कहा|
" ठीक है पिताजी, अगर अगले कुछ दिन में हो जाए तो एडमिशन मिल जाएगा| मैं भी समझती हूँ तुम्हारी स्थिति ", लड़की का स्वर उभरा|
उसने चेहरे से अखबार सरकाकर देखा, उन दोनों की पीठ उसकी तरफ थी इसलिए वे उसे देख नहीं पा रहे थे| उसकी निगाहों में अपना समय कौंध गया| कमोबेश यही शब्द उसने भी कहे थे और पिताजी ने भी यही उत्तर दिया था| बेटे और उसमे किसी एक को ही पढ़ा सकते थे और उसने अपने को पीछे कर लिया था|
एक बार फिर उसने देखा माली की लड़की को और उसे उसपर लाड़ आ गया| आखिर ये लड़कियाँ इतनी समझदार क्यों होती हैं कि उनसे अपने पिता के चेहरे का दर्द नहीं देखा जाता|
वो धीरे से उठी और माली काका की ओर बढ़ी| काका की बेटी ने उसको नमस्ते किया तो उसने उसका हाथ थाम लिया|
" आपने मुझसे क्यों नहीं कहा काका, आखिर इतना हक़ तो मेरा भी बनता है बिटिया पर| मेरी बेटी नहीं है तो क्या, ये तो है, मैं पढ़ाऊँगी इसे| हाँ, लेकिन मेरी एक शर्त भी है "|
दोनों उसकी तरफ देखने लगे, मन में प्रश्न उठ रहे थे कि क्या शर्त होगी!
" बस ये कि मुझे भी माँ के हिस्से का थोड़ा सा प्यार दे देना "|
काका की आँखों के कोर छलक आये और वो बिटिया का हाथ पकड़ कर घर में चल दी|
" बेटा, कोशिश तो कर रहा हूँ लेकिन मुश्किल लगता है| मालकिन भी आजकल परेशान हैं, फिर भी कुछ देखता हूँ इस हफ्ते ", माली काका ने उसे समझते हुए कहा|
" ठीक है पिताजी, अगर अगले कुछ दिन में हो जाए तो एडमिशन मिल जाएगा| मैं भी समझती हूँ तुम्हारी स्थिति ", लड़की का स्वर उभरा|
उसने चेहरे से अखबार सरकाकर देखा, उन दोनों की पीठ उसकी तरफ थी इसलिए वे उसे देख नहीं पा रहे थे| उसकी निगाहों में अपना समय कौंध गया| कमोबेश यही शब्द उसने भी कहे थे और पिताजी ने भी यही उत्तर दिया था| बेटे और उसमे किसी एक को ही पढ़ा सकते थे और उसने अपने को पीछे कर लिया था|
एक बार फिर उसने देखा माली की लड़की को और उसे उसपर लाड़ आ गया| आखिर ये लड़कियाँ इतनी समझदार क्यों होती हैं कि उनसे अपने पिता के चेहरे का दर्द नहीं देखा जाता|
वो धीरे से उठी और माली काका की ओर बढ़ी| काका की बेटी ने उसको नमस्ते किया तो उसने उसका हाथ थाम लिया|
" आपने मुझसे क्यों नहीं कहा काका, आखिर इतना हक़ तो मेरा भी बनता है बिटिया पर| मेरी बेटी नहीं है तो क्या, ये तो है, मैं पढ़ाऊँगी इसे| हाँ, लेकिन मेरी एक शर्त भी है "|
दोनों उसकी तरफ देखने लगे, मन में प्रश्न उठ रहे थे कि क्या शर्त होगी!
" बस ये कि मुझे भी माँ के हिस्से का थोड़ा सा प्यार दे देना "|
काका की आँखों के कोर छलक आये और वो बिटिया का हाथ पकड़ कर घर में चल दी|
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