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Friday, March 18, 2016

हिम्मत--

ये तीसरा पत्र था बैंक का, आखिरी चेतावनी लिखा हुआ| साफ़ साफ़ लिखा था कि अगर अगले १५ दिन में किश्त नहीं चुकाई तो जमीन की नीलामी कर देंगे| पिछले तीन महीने से दिन रात एक किया हुआ था उसने कि इस फसल में पुराना हिसाब चुकता कर देगा| इस बार नया बीज डाला था उसने और किसी तरह कीटनाशक का भी इंतज़ाम किया था उधार पर|
बहुत बढ़िया फसल हुई थी और उसने कटवाकर खेत में बोझ बनाकर रख दिया था| अगले दिन थ्रेशर में मड़ाई करवानी थी और थ्रेशर वाले से बात पक्की हो गयी थी| रात को सोने से पहले उसे आसमान में बादल दिखे और थोड़ा भय लगा था| इस मौसम में बरसात से तो उसकी खेत में पड़ी फसल बर्बाद हो जाएगी| बादल देखते ही पत्नी ने सभी देवताओं की गुहार लगानी शुरू कर दी थी और वो भी मन ही मन उस प्रार्थना में शामिल हो गया| लेकिन बरसात शुरू हुई और धीरे धीरे उसने मूसलाधार रूप धारण कर लिया| अपने भीगने की परवाह किये बिना वो खेत की तरफ कुछ बोरियों को लेकर भागा और उससे अपनी फसल को ढंकने का प्रयास करने लगा| बारिश और तेज हवा ने सब कुछ तबाह कर दिया और जो फसल शाम तक उसे अपनी सारी समस्याओं का हल नज़र आ रही थी, वो अब एक कूड़े से ज्यादा नहीं बची थी|
अब जिन्दा रहने की भी इच्छा नहीं बची थी उसमे, कैसे चुकाएगा सबका क़र्ज़ और कहाँ से लाएगा अगली फसल के पैसे| एक नज़र उसने बाहर डाली और अपनी पक्की दीवाल को देखकर दंग रह गया| एक पौधा पता नहीं कैसे उसपर उगा हुआ था जो हर मौसम को झेलते हुए भी खड़ा था| फिर एक बार उसने पत्नी की तरफ देखा और उसे एहसास हुआ कि उसकी जिम्मेदारी सिर्फ खुद की ही नहीं है|
नहीं, उसे इतनी आसानी से हार नहीं मानना था प्रकृति के कोप से| उसने बैंक के पत्र को उठाया और बैंक की तरफ निकल गया| थोड़ी देर में ही वो बैंक मैनेजर के सामने बैठा हुआ था और उससे कुछ और महीने की मोहलत मांग रहा था|     

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