Translate

Friday, April 29, 2016

विरोध--

"जरा बढ़िया वाला आम देना, उस दिन वाले अच्छे नहीं थे ", बोलते हुए उसकी निगाह उस बूढ़े दुकानदार पर टिक गयी| दरअसल वो ऐसे ही बोल गया, पिछली बार वाले आम भी बढ़िया ही थे|
" बाबूजी, एकदम बढ़िया हैं ये, आपको शिकायत का मौका नहीं दूंगा ", हँसते हुए उसने अपनी तरफ से एकदम बढ़िया वाले आम निकाले और तौलने लगा| वो भी जेब से पैसे निकाल रहा था कि अचानक उस आवाज़ से चौंक गया|
" ओ बुढ़ऊ, कितनी बार बोला है कि यहाँ ठेला मत लगाया करो, लेकिन तुम मानते ही नहीं हो| लगता है तुम्हारा कुछ करना पड़ेगा", हवलदार ने एक डंडा उसके ठेले पर मारा और एक सेब उठाकर खाने लगा|
"साहब, यहीं पर तो हमेशा से लगाता हूँ ठेला, आप काहें खफा होते हैं", और धीरे से वो अपने गल्ले से कुछ नोट निकालने लगा|
कई बार देखा था उसने हवलदार को दुकानों से पैसा वसूलते लेकिन कभी वो कुछ बोल नहीं पाया था| लेकिन आज पता नहीं क्यों उसे खटक गया और वो बोल पड़ा "क्या गलत कर दिया है इसने हवलदारजी, सब तो यहीं लगाते हैं ठेला"| बोलने के बाद खुद उसे अपनी आवाज़ से हैरानी हो रही थी कि ये कैसे कह दिया उसने|
"ज्यादा नेतागिरी मत झाड़ो, वर्ना दिमाग ठिकाने लगा दूँगा", हवलदार ने कड़कते हुए उससे कहा और बूढ़े की तरफ रुपया लेने के लिए हाथ बढ़ाया|
"दादा, पैसे मत देना इसको, इसी से इनकी हिम्मत बढ़ती है", और वो हवलदार के सामने खड़ा हो गया|
हवलदार ने गुस्से में उसका कालर पकड़ लिया और एक थप्पड़ उसको लगाने जा रहा था तब तक लोगों की भीड़ इकठ्ठा होने लगी| उसने अपना कालर उससे छुड़ाया, बूढ़े को पैसे देकर फल लिया और चलने लगा| पीछे से हवलदार और भीड़ की मिली जुली आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन उसे आज अपने तमाशबीन नहीं होने पर अंदर से काफी संतुष्टि थी| 

Thursday, April 28, 2016

अपराधबोध--

कितनी ही बार वो अपने हाथ धोता लेकिन उसे लगता जैसे लहू अभी भी उसकी हथेलियों में चिपका हुआ है| कैसे भुलाए वो उस मनहूस रात को, पर गलती तो उसकी भी नहीं थी| रात के अँधेरे में उसे पता ही नहीं चला कि सामने वाला कौन है| उसने कई बार चेतावनी दी, लेकिन जब कोई जवाब नहीं आया और वो साया भागता रहा तो उसे गोली चलानी पड़ी|
पूरा शहर जल रहा था और लगता था जैसे लोगों की समझ भी उसी आग में जल गयी हो| हर घंटे पता चलता कि इस इलाके में आगजनी हुई, वहां गोली चली और उस कोने में कुछ लोग मार डाले गए| लगातार चौथा दिन था जब वो जग रहा था, नींद और थकान से बदन टूट रहा था लेकिन न तो उसे इज़ाज़त थी और न ही मौका था कि कुछ घंटे सो पाये| रात के लगभग ९ बजे थे जब उसे दूर एक साया भागता हुआ नज़र आया| अँधेरा बहुत था और उसने कई बार आवाज़ लगायी कि रुक जाओ लेकिन वो साया नहीं रुका|
उसने अपनी स्टेनगन उठाई और दौड़ पड़ा उसके पीछे| ऐसा लग रहा था जैसे वो साया बहुत छोटा हो, फिर नींद के असर के चलते उसे ठीक से समझ नहीं आया| शायद वो अपने को बचाने के लिए झुक कर भाग रहा हो, बस यही समझ में आया था उसके और फिर उसने एक बार और चेतावनी दी उसको रुकने के लिए|
उसी समय बगल की गली में एक विस्फोट हुआ और उसकी निगाह एक बार उस गली की तरफ चली गयी| हल्का सा भय भी लगा उसे कि कहीं कोई उसकी तरफ न गोली चला दे और फिर उसने उसी भय में सामने भागते साये को देखा और गोली चला दी| एक हलकी सी चीख की आवाज़ सुनाई दी उसे और वो साया ढेर हो गया| सावधानी से कदम बढ़ाते हुए वो उसकी तरफ बढ़ा और नज़दीक पहुँच कर जब उसने गौर से देखा तो उसकी ऑंखें फटी की फटी रह गयी| उसके सामने एक १०-१२ साल का लड़का लुढ़का पड़ा था जिसके हाथ में एक ब्रेड का पैकेट था| उसने उसे उठाया और उस लड़के के सर से बहता लहू उसके हाथ से होते हुए उसके शरीर पर टपकने लगा| उसने लड़के के बेजान जिस्म को उठाकर बगल के फुटपाथ पर डाल दिया और थके क़दमों से वापस चल दिया|
उस रात के बाद कई बार उसने अपनी स्टेनगन को अपने सर पर रख कर गोली चलानी चाही लेकिन हर बार अपने बच्चों के चेहरे सामने आ जाते| उसके हाथों किसी और बच्चे का खून हो गया था, ये ख्याल उसे हर रात बेचैन करता और फिर उसे लगता जैसे उसके हाथ उस बच्चे के खून से सने हुए हैं|  

Monday, April 25, 2016

एहसास--

बैठे बैठे उसकी आँख लग गयी, रात काफी हो चुकी थी| अब तो ये रोज की ही बात हो गयी थी उसके लिए, अक्सर देर रात गए ही आता था रग्घू| अचानक दरवाजा पीटने की आवाज़ आई तो उसकी आँख खुली| हड़बड़ाकर उसने दरवाज़ा खोला और रग्घू के साथ शराब का भभका भी अंदर आ गया|
" इतना देर लगाती है दरवाज़ा खोलने में, कोई काम तो है नहीं बस सोती रहती है तू ", कहते हुए रग्घू ने उसकी तरफ जलती आँखों से देखा और बिस्तर पर बैठ गया| उसने दौड़ कर एक ग्लास पानी उठाया और रग्घू के सामने खड़ी हो गयी|
" खाना ला, यहाँ क्यों खड़ी है", एक बार फिर गुर्राया रग्घू|
वो भाग कर रसोई में गयी और खाना निकालने लगी| खाना लेकर लौटी तो रग्घू कपडे निकाल कर बैठ गया था| उसने बिस्तर पर ही एक कपडा बिछाया और खाने की थाली रख दी| रग्घू ने खाना शुरू किया और थोड़ी ही देर में उसके मुंह से गालिओं की बौछार शुरू हो गयी| और फिर थाली धड़ाम से जमीन पर गिरी और उसने सुबकना शुरू कर दिया|
थाली की आवाज़ से उसकी दूधमुँही बच्ची जग गयी और रोने लगी| उसने जल्दी से थाली उठाकर रसोई में रखी और बच्ची को उठाकर गोद में बिठा लिया| रग्घू बिस्तर पर सो चुका था और वो बच्ची को चुप कराने में लगी थी| उसका मन बुरी तरह दुखी था, अपनी जिंदगी से उसे विरक्ति सी हो गयी थी| रोज रोज की गाली गलौज और कभी कभी होने वाली मारपीट ने उसे अंदर तक तोड़ दिया था|
बच्ची अभी भी चुप नहीं हो रही थी तो उसने उसे स्तनपान कराना शुरू कर दिया| धीरे धीरे बच्ची चुप हो गयी, उसने एक बार उसकी तरफ देखा| दूध पीते हुए उसके चेहरे पर झलकती संतुष्टि ने जैसे उसके तमाम दुखों को बिलकुल क्षीण कर दिया| कुछ ही देर में बच्ची सो गयी थी और वो भी उसकी बगल में लेटी हुई अब उसके लिए जीने को सोच रही थी|

Monday, April 18, 2016

मानसिकता--

" तुम बहुत गहरे रंग की लिपिस्टिक मत लगाया करो ", थोड़े उखड़े स्वर में उसने कहा|
" अरे, तुम्हीं तो कहते थे कि ये मुझ पर बहुत फबता है ", थोड़े आश्चर्य से वो बोली|
" हाँ, कहा तो था, लेकिन आज भी तो मैं ही कह रहा हूँ ", उसके लहजे में थोड़ा रोष था|
" ठीक है, तुम कहते हो तो नहीं लगाऊँगी| लेकिन अचानक ये कैसे लगा तुमको कि ये मुझे नहीं लगाना चाहिए ", उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था|
उसे भी समझ में नहीं आ रहा था कि वो कैसे समझाए| कुछ ज्यादा ही सुंदर लगती थी वो और लोगों की निगाहें जिस तरह से उसे भेदती थीं, वो बर्दास्त नहीं कर पाता था|
" मैं एक पार्टी में जा रहा हूँ, रात देर से लौटूंगा| तुम खाना खा लेना ", बोलता हुआ वो कपडे पहनने चल दिया|
" सुनो, तुम आज ये क्रीम कलर वाला सूट ही पहनना, कसम से बेहद जँचते हो उसमे ", कहते हुए उसने सूट निकाल कर रख दिया| सूट पहनते हुए उसे अपना कद थोड़ा छोटा लगने लगा|

Monday, April 11, 2016

जिसकी लाठी उसका जोर--

ऑफिस से निकलते समय एक बार फिर रत्ना का फोन आ गया " सब्जी जरूर ले आईयेगा, कम से कम आलू और प्याज़ तो जरूर ही| कुछ भी नहीं है घर में, तीन दिन से कह रही हूँ "| आज सब्जी लेकर ही घर जाना है, उसने भी सोच लिया था| नीचे पार्किंग से कार निकाली और चल पड़ा घर के रास्ते पर| हमेशा की तरह ही भीड़ सड़क पर नज़र आ रही थी, कभी कभी उसे लगता कि लोग अगर सड़क पर नहीं निकलते तो घर में रहने की जगह ही कम पड़ जाती| इन्हीं ख्यालों में खोये हुए वीरेश भीड़ में सबसे बचते, बचाते धीरे धीरे कार चलाते हुए जा रहा था|
दूर से ही सब्जी मंडी दिख गयी, ऐसा लगता था कि मंडी में तो साइकिल भी नहीं जा पायेगी, उसकी कार कैसे जाएगी उस रास्ते से| जब भी वो इस मंडी में आता, हर बार उसे ऐसा ही लगता, लेकिन किसी तरह वो कोई जगह ढूँढ कर कार खड़ा करता और सब्जी लेकर निकल जाता| शायद इसी भीड़ की वजह से वो यहाँ आने से कतराता भी था और जब तक बिलकुल ही जरुरी न हो, यहाँ आना नहीं चाहता था| कई बार तो रत्ना ही रिक्शा से चली जाती थी और उसे राहत मिल जाती, लेकिन आज तो आना ही पड़ गया| जैसे जैसे मंडी नज़दीक आ रही थी, उसकी घबराहट बढ़ती जा रही थी| खैर किसी तरह मंडी के अंदर घुस तो गया कार से, लेकिन कहीं भी गाडी खड़ी करने की जगह नहीं दिख रही थी| एक नज़र उसने अपने हमेशा की दुकान पर डाली लेकिन आज उसके सामने तो क्या, कहीं आस पास भी कोई जगह नज़र नहीं आ रही थी| मायूसी में धीरे धीरे कार आगे बढ़ाते हुए वो मंडी के लगभग बाहर आ गया तभी उसे पार्किंग की जगह दिखाई दी|
कार पार्क करते समय उसने अपने दाहिनी तरफ देखा, एक बुजुर्ग व्यक्ति एक ठेले पर आलू, प्याज़ और कुछ सब्ज़ियां भी रखे हुए था| एक बार तो उसने सोचा कि अपनी पुरानी दूकान पर जाए, लेकिन फिर दूरी और भीड़ दोनों को देखते हुए उसने विचार त्याग दिया| चलो आज इसी के यहाँ से ले लेते हैं, सोचते हुए वह दुकान पर जा खड़े हुआ| आदत के अनुसार अपने आप उसके मुँह से निकल गया "आलू कैसे दिए दादा "|
बुजुर्ग ने सर उठाया, सामने एक बढ़िया कपडे पहने व्यक्ति को देखकर एक बार तो हड़बड़ा गया, शायद आदत नहीं थी ऐसे लोगों को दुकान पर देखने की|
" १२ रुपये किलो दिए हैं, आपको ११ लगा देंगे साहब ", कहते हुए उसने अपना गमछा उठाया और सामने की सब्जियों को झाड़ने लगा|
" ठीक है, ५ किलो दे दो, और २ किलो प्याज, दो किलो बैगन और एक लौकी भी दे दो ", बोलकर वो फोन पर बात करने लगा|
बुजुर्ग ने अपना टूटा तराजू उठाया और उसपर एक एक आलू रखने लगा| फोन करते हुए उसकी निगाह बुजुर्ग पर पड़ी और वो ध्यान से देखने लगा| जिस तरीके से वो बुजुर्ग सब्जीवाला एक एक आलू देख भाल के तौल रहा था, उसे अपने पिछले सब्जी वाले की याद आ गयी| एक बार कोई ग्राहक सब्जी अपने हाथ से उठा कर रख रहा था तो वो बिगड़ गया|
" अरे, सोना खरीद रहे हो क्या, सब्जी ही तो है, इतना छाँट रहे हो इसको "|
इधर वो इन्हीं ख्यालों में डूबा हुआ था और उधर बुजुर्ग ने आलू तौला और फिर ऊपर से कुछ और आलू डाल दिए थैले में| फिर चुन चुन कर प्याज, बैगन और लौकी भी तौला और ऊपर से एकाध अलग से डाल दिया उसने| सब थैले रख कर थोड़ी धनिया, मिर्ची डाली उसने और पूछा " कुछ और दूँ साहब "|
" बस हो गया, रहने दो अब ", और उसने जेब से रुपये निकाले और सब्जीवाले की तरफ बढ़ा दिया| बुजुर्ग सब्जीवाला हिसाब जोड़ने में लग गया और जब तक वो जोड़ पाता, उसने थैला उठाया और कार में रखने लगा|
फिर सब्जीवाले का ध्यान गया और वो दौड़ कर आया " अरे साहब आपने क्यों उठाया, मैं खुद उठाकर रख देता इसको ", उसके चेहरे से परेशानी झलक रही थी|
" कोई बात नहीं दादा, ठीक है| पैसे पूरे हैं ना या और दूँ "|
" ये ले लीजिए, इतने बचते हैं ", कहते हुए बुजुर्ग ने कुछ पैसे उसको पकड़ाए| वो पैसे उसे बुजुर्ग को वापस देना ठीक नहीं लगा, कहीं दया न समझ ले वो, इसलिए पैसे जेब में डाले और कार में बैठ कर घर निकल गया|
घर पहुँच कर उसने अपना बैग और थैला उठाया और रत्ना को थैला पकड़ाते हुए बोला " आज एक बूढ़े सब्जीवाले से सब्जी ली मैंने, बहुत भला आदमी था "|
रत्ना ने एक बार उसका चेहरा देखा और फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए बोली " गनीमत है सब्जी ले तो आये| अब देखती हूँ कि क्या कूड़ा करकट उठा लाये हो, आपको तो कोई भी बेवकूफ बना सकता है "|
उसने भी अपना बैग रख और मुस्कुराते हुए कपड़े बदलने चला गया| कपड़े बदल कर और हाथ मुँह धो कर जब वो वापस लौटा तो देखा रत्ना आश्चर्य से सब्जी को देख रही थी|
"आज तो आपने सचमुच कमाल कर दिया, बहुत अच्छी सब्जी लाये हैं| लगता है कोई आपके ही तरह का था जो इतना बढ़िया सब्जी दे दिया उसने ", रत्ना से तारीफ सुन कर अच्छा लग रहा था उसे, मानो उसे समझदारी का सर्टिफिकेट मिल गया हो| अक्सर बात इसके उलट ही होती थी, उसने तसल्ली से टी वी चालू किया और समाचार देखने लगा|
उधर वो बुजुर्ग सब्जी वाला भी जब घर पहुंचा तो बहुत प्रसन्न था| घर में घुसते ही बूढी ने उसका प्रसन्न चेहरा देखा तो पूछ बैठी " क्या बात है, आज तो बहुत खुश दिखाई दे रहे हो| लगता है सारी सब्जियाँ बिक गईं"|
बूढ़े ने भी मुस्कुराते हुए कहा " अरे आज तो एक बहुत बड़ा आदमी सब्जी लेने आ गया और उसने बहुत सी सब्जी खरीद ली| मुझे तो लगा कि पैसे देने में किच किच करेगा, लेकिन उसने तो बिना मोल भाव किये पैसे दे दिए और बहुत खुश होकर गया"|
बूढी ने भी एक गहरी सांस ली और बोली "काश रोज रोज ऐसे ग्राहक आते तो अपनी दाल रोटी की चिंता नहीं रहती "| बूढ़ा तब तक हाथ मुंह आ गया था और खटिया पर बैठ गया|
वीरेश ने खाना खाते समय रत्ना को बुलाया और कहने लगा " मुझे लगता है कि हमें अब सब्जी उसी बूढ़े के ठेले से लेना चाहिए| सब्जियाँ भी अच्छी थीं और दाम भी ठीक| साथ ही साथ उस बूढ़े की भी मदद हो जाएगी| कल तुमको भी मैं दिखा देता हूँ ताकि तुम भी जब जाओ, वहीँ से सब्जी लो"|
"बात तो आप बिलकुल ठीक कह रहे हो, हर्ज़ ही क्या है इसमें| अपने साथ साथ उसका भी भला हो जाए तो बुराई क्या है ", रत्ना की निगाहों में उसके लिए आज कुछ अलग सम्मान नजर आया|
अब तो ये उनका नियम बन गया, हर दूसरे दिन उस बुजुर्ग के ठेले से सब्जी लेना| वो भी इन दोनों को पहचान गया था और बहुत प्यार से सभी सब्जियाँ तौलता, फिर उन्हें ठीक से पोछ कर देता| अब धीरे धीरे मोहल्ले के हर घर की औरतों को ये बात पता चल गयी और सारी औरतें सब्जी अब उसी बूढ़े की दुकान से लेने लगीं| अब बूढी भी आकर दुकान पर बैठने लगी, आखिर वो बूढ़ा अकेले कैसे इतने ग्राहकों को सम्भाल पाता| अब तो दोनों बुजुर्गों की दुनिया गुलज़ार हो चली थी, शाम देर तक दुकान पर बैठना, फिर घर आकर खा पीकर सो जाना| सुबह जल्दी उठकर बूढ़ा मंडी चला जाता था और ताज़ी सब्जियाँ ले आता था| फिर दोपहर में खाना खाने के बाद दोनों जाकर अपने ठेले पर दुकान सजा लेते थे|
इधर मुख्य मंडी में सब्जी की दुकान वालों को भी एहसास होने लगा था कि उनके ग्राहक कुछ कम होने लगे हैं| उनके रोज के ग्राहक जब हफ़्तों नहीं दिखे तो उनकी चिंता स्वाभाविक थी| फिर उनको समझ में आ गया कि लोग अब उस बूढ़े के ठेले से सब्जियाँ लेने लगे हैं| पहले तो उन्होंने भी अपने ग्राहकों को थोड़ा प्यार से बोलना शुरू किया, और थोड़ी ज्यादा सब्जी भी देने लगे| ये अलग बात थी कि अभी भी वो पुरे वज़न कि सब्जियाँ नहीं देते थे| फिर उन्होंने लोगों से कहना भी शुरू कर दिया कि आप लोग भी लोगों को समझाइये कि हमारे पास ज्यादा तरह की सब्जियाँ हैं और दाम भी ठीक है| उनके इस बदले व्यवहार से कुछ तो फ़र्क़ पड़ा लेकिन अभी भी अधिकांश मोहल्ले की औरतें उसी बूढ़े के ठेले से सब्जियाँ लेती थीं|
एक रात दुकान बंद करने के बाद एक बड़े सब्जी वाले ने अपने बगल की दुकान वाले से कहा " अरे भाई कुछ करना पड़ेगा नहीं तो ये बूढ़ा तो हमारा धंधा मंदा करवाकर ही दम लगा"|
"अपना धंधा तो पहले से ही कुछ कम था और आजकल तो और ही मंदा है, तुम तो फिर भी ठीक हो भाई", बगल वाले ने आह भरते हुए कहा|
"वो तो ठीक है लेकिन कुछ तो सोचो, ऐसे तो अपनी कमाई घटती ही जायेगी", सोचते हुए वो बोला|
"अब कर भी क्या सकते हैं, वो तो अपनी जगह पर ही दुकान लगा रहा है| उसको रोकेंगे भी तो कैसे"|
"एक विचार है मेरे दिमाग में, कुछ खर्च लगेगा लेकिन काम हो जाएगा", पहला वाला थोड़ा कुटिलता से मुस्कुराते हुए बोला| फिर सभी करीब आये और उस विचार को सुनकर सबने हामी भर दी|
"लेकिन ये काम तुम्ही को करना होगा, पैसे हम सब दे देंगे ", सबने उसकी जिम्मेदारी बड़े दुकान वाले को सौंप दी|
अगले दिन थाने में बैठकर उसने सारी बातें तंय कीं और वापस आ गया| दोपहर बाद जैसे ही बूढ़ा ठेला लेकर मंडी के बाहर अपनी जगह पर पहुँचा, दूर खड़ी पुलिस की जीप उसके पास पहुंची|
"किसकी परमिशन से लगा रख है ये ठेला यहाँ पर", हवलदार ने अपना डंडा उसकी ओर करते हुए पूछा|
" साहब, रोज यहीं पर लगाता हूँ ठेला| आप चाहे तो पूछ सकते हैं बगल की दुकान से ", बूढ़ा घबड़ा गया और एकदम से लड़खड़ा गया| बूढी ने उसे सम्भाला और हाथ जोड़कर हवलदार के आगे खड़ी हो गयी|
"अबे, मैं लोगों से पूछूंगा कि ये जगह किसकी है| एक तो जबरदस्ती गलत जगह पर ठेला लगाते हो और दूसरे जबान भी लड़ाते हो| वो तो तुम्हारी उम्र का लिहाज़ करके छोड़ रहा हूँ, नहीं तो दो डंडे मारकर अंदर कर देता| जल्दी से हटाओ ये ठेला यहाँ से और आज के बाद अगर दुबारा दिखाई दिए तो अंदर कर दूंगा", हवलदार ने एक डंडा उसके ठेले पर मारा और खड़ा हो गया|
बूढ़े ने एक बार चारो तरफ देखा, किसी को भी अपने साथ नहीं देखकर उसने अपनी गीली आँखों को पोंछा और बूढी के साथ ठेला लेकर वापस चल दिया| बूढी पलट पलट कर अपनी ठेले वाली जगह को देखती जा रही थी जहाँ एक अंडे वाला अपना ठेला लगा रहा था| दोनों थके क़दमों से अपने झोपडी की ओर जा रहे थे, हवलदार ने अंडे वाले से कुछ उबले अंडे और रुपये लिए और आकर जीप में बैठ गया| जीप धुआं उड़ाती मंडी से बाहर चली गयी, बड़ी सब्जी की दुकान वालों ने एक दूसरे को देखकर ठहाका लगाया और मंडी वापस यथावत चलने लगी| 

सद्गति--

अचानक उसने गाड़ी रुकवा दी और उतर गया| सड़क के किनारे खड़ा वो एकटक उस बुजुर्ग को देख रहा था और मंजुल उसे|
" इनको पहचानते हो मंजुल ", उसने भारी आवाज़ में पूछा|
दिमाग पर बहुत जोर डालने के बाद भी मंजुल को कुछ याद नहीं आया और उसने अनभिञता में सर हिला दिया| साथ ही साथ उसे आश्चर्य भी हो रहा था की वो इतने साल विदेश में रहकर भी इस भिखारीनुमा व्यक्ति को किस तरह पहचान रहा है|
" शायद इसी वजह से खेल में इस देश की दुर्दशा हो रही है, ये कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि हॉकी के विश्व प्रसिद्द खिलाड़ी हैं जिन्होंने ओलम्पिक में भी इस देश का प्रतिनिधित्व किया था| कैसे कोई देश अपने राष्ट्रीय खेल में गौरव लाने वाले किसी खिलाड़ी को इस हाल में छोड़ सकता है "?
मंजुल एक गहरी सोच और शर्म में डूब गया, कहीं न कहीं वो भी जिम्मेदार था इस हालत का, और उधर वो उन बुजुर्ग के पास बैठकर उनसे बात कर रहा था| फिर मंजुल भी उन दोनों की तरफ बढ़ा और उन्होंने बुजुर्ग को अपनी गाड़ी में बिठाया और शहर में स्थित ओल्ड ऐज होम की तरफ चल पड़े|

Friday, April 8, 2016

अपनी अपनी सोच--

" कितने के दिए आलू ", सुनते ही रघू ने सर उठाया| सामने शाम के धुंधलके में एक सूट पहने व्यक्ति को देखकर वो थोड़ा सिटपिटा गया| ऐसा ग्राहक, सामने की चमकती दुकानों को छोड़कर, उसकी दुकान पर कैसे आ गया|
" १२ रु किलो दिए हैं साहब, आप को ११ में दे देंगे ", बगल में रखे अपने गमछे से उसने आलू की धूल झाडी और टूटे पलड़े वाला तराजू उठाया|
" ५ किलो आलू दे दो और बैगन भी २ किलो तौल देना ", कहते हुए वो फोन पर बात करते हुए उसे देख रहा था| आज सामने की पटरी पर पार्किंग संभव नहीं थी तो वो अपनी कार यहीं पार्क करके आ गया|
रघू ने बहुत सम्भाल कर आलू तौले और फिर उसमे ऊपर से कुछ आलू और डाल दिए| फिर उसने बैगन को भी गमछे से पोंछा और उसको भी तौलने के बाद एक और बैगन डाल दिया| सारा सामान तौलने के बाद उसने नज़र सामने की और कुछ बोलता उसके पहले ही ग्राहक ने १०० का नोट उसकी ओर बढ़ा दिया|
रग्घू अपने जोड़ घटाव में लगा हुआ था और कुछ समय बाद जब उसने जोड़ लिया कि कितने पैसे लौटाने हैं तो अपने कुर्ते की जेब से पैसे निकालकर देने के लिए आगे बढ़ाया|
" अरे पैसे कहाँ बचते हैं अब, मैं तो सोच रहा था कि कम तो नहीं होंगे", कहते हुए उसने बैग उठाया|
" मैं रख देता हूँ गाड़ी में बैग ", बोलकर रघू उठा और बैग कार में डाल दिया| जैसे ही वो कार में बैठा, रघू ने हाथ जोड़ दिए और वो मुस्कुराते हुए निकल गया| इधर रघू सोच रहा था कि कितना भला ग्राहक था जो बिना झंझट के पैसे दे कर चला गया और उधर वो सोच रहा था कि आजतक उसने इस दुकान से सब्जी क्यों नहीं ली जहाँ न सिर्फ उसे सब्जीवाले ने उसे कुछ ज्यादा ही अच्छी सब्जी दी बल्कि जो इज़्ज़त दी वो उसे पुराने सब्जीवाले दुकानों से आज तक नहीं मिली थी| 

Tuesday, April 5, 2016

अंतिम इच्छा--

" दिमाग ख़राब हो गया था इनका, अरे कैसे दे दें दान! बस यही बच गया था कि अब समाज भी थू थू करे हम पर", बड़ा बेटा बड़बड़ाते हुए घूम रहा था| वो एक कोने में बैठी हुई थी, खामोश, एकटक पति के पार्थिव शरीर को निहारते हुए| बाहर मेडिकल कॉलेज की गाड़ी खड़ी थी और वो लोग पेशोपेश में थे|
पिछले कई महीनों से तबियत ख़राब चल रही थी उनकी और किसी तरह वो उनको सरकारी हस्पताल ले जाती थी| फायदा तो कुछ नहीं होता था, हाँ तसल्ली जरूर मिल जाती थी और कुछ देर बाहर निकलने से थोड़ी ताज़गी भी मिल जाती थी| घर में तो कोने का कमरा, जिसमे धूप और हवा भी कायदे से नहीं आती थी, ही उन दोनों का ठिकाना था| खाने के समय कर्कस आवाज़ में उनको पुकारा जाता तो खाने की इच्छा भी लगभग ख़त्म हो जाती थी|
छोटे ने भी बड़े की हाँ में हाँ मिलायी और अंतिम संस्कार की तैयारी करने लगा| वहां मौजूद लोग भी बेटों के साथ थे और किसी ने भी उससे या मेडिकल कॉलेज के लोगों से पूछना उचित नहीं समझा| आस पड़ोस की महिलाएं भी अब शव को स्नान करवाकर अंतिम संस्कार की तैयारी में लग गयीं| पंडितजी ने सामान की लिस्ट पकड़ाई और अपनी तैयारी में लग गए|
इतने में वो खड़ी हुई और कांपते स्वर में बोली " अगर इनकी इच्छा अपना शरीर दान करने की थी तो इसमें तुम लोगों को क्या दिक्कत है| समाज की परवाह तो खूब की है तुम लोगों ने और आगे भी करोगे ही| मैंने भी इनके साथ अपना शरीर दान कर दिया था और हो सके तो मेरे जाने के बाद भी तुम लोग यही करना", और वो बाहर खड़े मेडिकल कॉलेज के लोगों को बुलाने निकल गयी|  

Sunday, April 3, 2016

सन्नाटा--

आहिस्ता आहिस्ता चलते हुए दशरथ खेत के किनारे पहुँच गए, चारो तरफ एक सन्नाटा सा पसरा हुआ था| गेहूँ की कटाई हो चुकी थी और अब कुछ दिनों की मोहलत थी सबके पास| लेकिन उन्हें तो ये सन्नाटा जैसे अपना हिस्सा लगता था, जीवन ही जैसे एक शून्य हो गया था|
कभी उनका घर हमेशा भरा रहता था, जाड़े में तो ठीक रहता था जब ठण्ड के चलते सब रजाईयों में घुस के सो जाते थे| लेकिन गर्मियों में दिक्कत होती थी, न तो इतनी खटिया थी और न ही इतनी जगह दरवाजे पर| तब छत ही ठिकाना होता था सोने के लिए, रात होते ही सब छत पर चद्दर बिछा कर सोने चले जाते थे|
फिर समय के साथ विकास हुआ, बच्चे बड़े शहरों में रोजी रोटी के लिए निकल गए| साल में एक बार सब इकठ्ठा होते और फिर कुछ दिन वही पुराने दिन सब मिलकर जीते थे| दशरथ भी सबको अपनी क्षमतानुसार गेहूँ, चावल दे देते थे और अपने पिता होने का फ़र्ज़ निभा देते| धीरे धीरे आना कम होने लगा बच्चों का, क्यूंकि उनके बच्चे अब बड़े हो रहे थे और उनकी अपनी अलग प्राथमिकताएँ होने लगीं थीं| फोन लग गया था घर पर तो सबसे गाहे बगाहे बात भी हो जाती थी| लेकिन जब बच्चों ने जिद की कि वो भी मोबाइल रखें तो उनको अच्छा नहीं लगा| बहुत दिनों तक तो उन्होंने नहीं लिया लेकिन जब बार बार कहा जाने लगा तो हार कर उन्होंने भी एक मोबाइल फोन ले लिया|
अब तो बात करने के लिए तरसने लगे थे वो, बस सुबह गुड मॉर्निंग का तो शाम को गुड नाईट का मैसेज आ जाता मोबाइल पर| जब कभी कॉल करते तो अक्सर उधर से व्यस्त टोन ही सुनाई देता| बच्चों की व्यस्तता के आदी होने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था उनके पास|
एक नज़र उन्होंने खेत में डाली, दूर दूर तक सब कुछ खाली ही दिख रहा था| फिर उनकी नज़र थोड़ी दूर पड़े एक गेहूँ की बाली पर पड़ी जो उस खेत के सन्नाटे को जैसे चीरने की कोशिश कर रहा था| न जाने क्यों, उनको वो बाली अपने चेहरे की तरह लगने लगी, उन्होंने उसे उठाया और लेकर वापस घर की तरफ चल दिए| 

Friday, April 1, 2016

खोने का दर्द--

एक बुजुर्ग को हाथ देते देखकर वो रुक गया| बाइक को खड़ा करके सवालिया नज़रों से उनको देखते हुए वो कुछ पूछने ही वाला था कि बुजुर्ग ने उससे पूछा " बेटे, कहाँ जा रहे हो, लगता है कोई इंतज़ार कर रहा है तुम्हारा "|
उसके चेहरे पर झल्लाहट का भाव आया और एक बार उसने सोचा कि एक भद्दी सी गाली दे उनको, लेकिन अपने गुस्से को जज़्ब करते हुए वो बोल " आपको कहीं जाना है, लिफ्ट चाहिए, रोक क्यूँ लिया मुझे "!
" नहीं कहीं जाना नहीं है, लेकिन तुम इस तरह बाइक क्यूँ चला रहे हो ", बुजुर्ग ने बहुत शांत स्वर में कहा|
" अरे चाचा, क्यूँ खाली पीली दिमाग का दही कर रहे हो| तुमको क्या दिक्कत है मेरे बाइक चलाने से, अपने काम से काम रखा करो ", भुनभुनाते हुए वह बाइक स्टार्ट करने चला|
अचानक बुजुर्ग ने बाइक के हैंडल में टंगे हेलमेट को पकड़ा और उसे उतार कर उसकी तरफ बढ़ाया| उसका हाथ एक्सेलरेटर पर रुक सा गया|
" मेरा बेटा भी शायद तुम्हारी तरह ही जल्दी में था और हेलमेट पहनना भूल गया था| अब तुमको भी तुम्हारे माँ बाप सिर्फ तस्वीरों में नहीं देखें इसलिए इसे पहन के चलाया करो ", बोलते हुए बुजुर्ग आगे बढ़ गए और एक और बाइक सवार को हाथ देने लगे| उसने हेलमेट सर पर लगाया और बुजुर्ग को सलाम करता हुआ आगे बढ़ गया| 

वापसी--

और आज वापस हिन्दुस्तान की फ्लाइट पकड़ने के लिए वो चल पड़ा। पिछली बार शायद ६ साल पहले गया था और एक अप्रवासी की तरह समय बिताकर वापस आ गया था। एक हफ़्ते था वो अपने घर लेकिन उस एक हफ्ते में भी उसने माँ बाप के पास बैठने का समय नहीं निकाला था। एक डर था उसके अन्दर कि पता नहीं क्या मांग लें उससे।
एक दशक पहले उसकी कम्पनी ने भेज था उसे सात समन्दर पार इस देश में। उसके अपने सपनों की जैसे मंजिल मिल गयी थी और उसके माँ बाप को भी एक गर्व की अनुभूति हुई थी। शुरुवात में तो वह लगातार फोन करता, पैसे भेजता और अपनी तरफ से उनका पूरा ख्याल रखने की कोशिश करता। फिर कुछ सालों का कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने के पहले ही उसने अपनी कम्पनी से इस्तीफा देकर एक स्थानीय कम्पनी में ज्वाइन कर लिया। वहीँ उसकी मुलाक़ात हुई सबरीना से और धीरे धीरे ये मुलाक़ात प्यार में बदल गयी। माँ पिता लगातार शादी के लिए दबाव बना रहे थे और बहुत से रिश्ते भी देख रखे थे उन्होंने, लेकिन अपनी स्थिति को देखते हुए उसने सबरीना से शादी कर ली। अब उसे इस देश में स्थायी रूप से रहने का आधार मिल गया था और उसने फोन पर माँ पिता को सूचना देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी।
अगले कुछ सालों में दोनों के बीच का फ़र्क़ उभरने लगा, सबरीना का खुलापन अब उसे नागवार गुजरने लगा। फिर वो दिन भी आ गया जब सबरीना ने उसे बता दिया कि अब उसके घर में, जो उसके ही पैसों से ख़रीदा हुआ था, में उसके लिए कोई जगह नहीं है। अगले दिन सबरीना का मित्र घर में रहने आ गया और उसे अपना बैग लेकर घर छोड़ना पड़ा।
चलते समय भी उसे उम्मीद थी कि शायद सबरीना उसे रोक ले लेकिन उसकी उम्मीद धुंध में तब्दील हो गयी। अब उसे अपने देश और अपने माँ पिता की पुकार सुनाई दे रही थी।

किसी और देश में--

" पापा, मैंने आखिरी क़िस्त भी जमा कर दी है| आप अगले हफ्ते बैंक जाकर घर के कागजात ले लेना, मैंने आपको कर्ज मुक्त कर दिया", बेहद खुश था महेश फोन पर| पांच साल पहले का दृश्य उनकी आँख के सामने घूम गया जब वो बैंक में बैठे कागजों पर दस्तखत कर रहे थे और महेश चिंतित निगाहों से उन्हें देख रहा था| लगभग एक महीने की भागदौड़ के बाद उसको बैंक ने विदेश में एम बी ए करने के लिए ये शिक्षा ऋण स्वीकृत किया था| ऋण की रकम बहुत ज्यादा थी और उनको घर गिरवी रखना पड़ा था|
दो साल की पढ़ाई के दौरान उनका बार बार आग्रह रहता कि पढ़ाई के बाद नौकरी अपने देश में ही करना| लेकिन पढ़ाई पूरी करते करते महेश शायद समझ गया था कि अगर यहाँ नौकरी नहीं की तो पैसे चुकाना बहुत आसान नहीं होगा|
" जब तक कर्ज चुकता नहीं हो जाता, तभी तक यहाँ रहूँगा ", महेश ने उनको समझाया था और वहीँ नौकरी कर ली|
" तो अब वापस आ जाओ, अपने देश में ही कोई अच्छी सी नौकरी ढूँढ लो| ये तुम्हारी माँ की इच्छा है, बाकी जैसी तुम्हारी मर्जी", उनका स्वर थोड़ा उदास था|
" अभी तो यहीं काम करूँगा, कुछ सालों बाद देखा जायेगा| मैं तो आता ही रहूँगा और बीच बीच में आप लोग भी यहाँ हो लीजिएगा ", कहकर महेश ने फोन काट दिया|
उन्होंने एक नज़र बिस्तर पर लेटी पत्नी की सवालिया निगाह पर डाली और इतना ही कह पाये " महेश ने किसी और देश में रहने का फैसला कर लिया है, और उसने हमें और खुद को ऋण मुक्त कर दिया है "|