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Friday, April 8, 2016

अपनी अपनी सोच--

" कितने के दिए आलू ", सुनते ही रघू ने सर उठाया| सामने शाम के धुंधलके में एक सूट पहने व्यक्ति को देखकर वो थोड़ा सिटपिटा गया| ऐसा ग्राहक, सामने की चमकती दुकानों को छोड़कर, उसकी दुकान पर कैसे आ गया|
" १२ रु किलो दिए हैं साहब, आप को ११ में दे देंगे ", बगल में रखे अपने गमछे से उसने आलू की धूल झाडी और टूटे पलड़े वाला तराजू उठाया|
" ५ किलो आलू दे दो और बैगन भी २ किलो तौल देना ", कहते हुए वो फोन पर बात करते हुए उसे देख रहा था| आज सामने की पटरी पर पार्किंग संभव नहीं थी तो वो अपनी कार यहीं पार्क करके आ गया|
रघू ने बहुत सम्भाल कर आलू तौले और फिर उसमे ऊपर से कुछ आलू और डाल दिए| फिर उसने बैगन को भी गमछे से पोंछा और उसको भी तौलने के बाद एक और बैगन डाल दिया| सारा सामान तौलने के बाद उसने नज़र सामने की और कुछ बोलता उसके पहले ही ग्राहक ने १०० का नोट उसकी ओर बढ़ा दिया|
रग्घू अपने जोड़ घटाव में लगा हुआ था और कुछ समय बाद जब उसने जोड़ लिया कि कितने पैसे लौटाने हैं तो अपने कुर्ते की जेब से पैसे निकालकर देने के लिए आगे बढ़ाया|
" अरे पैसे कहाँ बचते हैं अब, मैं तो सोच रहा था कि कम तो नहीं होंगे", कहते हुए उसने बैग उठाया|
" मैं रख देता हूँ गाड़ी में बैग ", बोलकर रघू उठा और बैग कार में डाल दिया| जैसे ही वो कार में बैठा, रघू ने हाथ जोड़ दिए और वो मुस्कुराते हुए निकल गया| इधर रघू सोच रहा था कि कितना भला ग्राहक था जो बिना झंझट के पैसे दे कर चला गया और उधर वो सोच रहा था कि आजतक उसने इस दुकान से सब्जी क्यों नहीं ली जहाँ न सिर्फ उसे सब्जीवाले ने उसे कुछ ज्यादा ही अच्छी सब्जी दी बल्कि जो इज़्ज़त दी वो उसे पुराने सब्जीवाले दुकानों से आज तक नहीं मिली थी| 

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