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Friday, April 1, 2016

किसी और देश में--

" पापा, मैंने आखिरी क़िस्त भी जमा कर दी है| आप अगले हफ्ते बैंक जाकर घर के कागजात ले लेना, मैंने आपको कर्ज मुक्त कर दिया", बेहद खुश था महेश फोन पर| पांच साल पहले का दृश्य उनकी आँख के सामने घूम गया जब वो बैंक में बैठे कागजों पर दस्तखत कर रहे थे और महेश चिंतित निगाहों से उन्हें देख रहा था| लगभग एक महीने की भागदौड़ के बाद उसको बैंक ने विदेश में एम बी ए करने के लिए ये शिक्षा ऋण स्वीकृत किया था| ऋण की रकम बहुत ज्यादा थी और उनको घर गिरवी रखना पड़ा था|
दो साल की पढ़ाई के दौरान उनका बार बार आग्रह रहता कि पढ़ाई के बाद नौकरी अपने देश में ही करना| लेकिन पढ़ाई पूरी करते करते महेश शायद समझ गया था कि अगर यहाँ नौकरी नहीं की तो पैसे चुकाना बहुत आसान नहीं होगा|
" जब तक कर्ज चुकता नहीं हो जाता, तभी तक यहाँ रहूँगा ", महेश ने उनको समझाया था और वहीँ नौकरी कर ली|
" तो अब वापस आ जाओ, अपने देश में ही कोई अच्छी सी नौकरी ढूँढ लो| ये तुम्हारी माँ की इच्छा है, बाकी जैसी तुम्हारी मर्जी", उनका स्वर थोड़ा उदास था|
" अभी तो यहीं काम करूँगा, कुछ सालों बाद देखा जायेगा| मैं तो आता ही रहूँगा और बीच बीच में आप लोग भी यहाँ हो लीजिएगा ", कहकर महेश ने फोन काट दिया|
उन्होंने एक नज़र बिस्तर पर लेटी पत्नी की सवालिया निगाह पर डाली और इतना ही कह पाये " महेश ने किसी और देश में रहने का फैसला कर लिया है, और उसने हमें और खुद को ऋण मुक्त कर दिया है "|


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