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Sunday, April 3, 2016

सन्नाटा--

आहिस्ता आहिस्ता चलते हुए दशरथ खेत के किनारे पहुँच गए, चारो तरफ एक सन्नाटा सा पसरा हुआ था| गेहूँ की कटाई हो चुकी थी और अब कुछ दिनों की मोहलत थी सबके पास| लेकिन उन्हें तो ये सन्नाटा जैसे अपना हिस्सा लगता था, जीवन ही जैसे एक शून्य हो गया था|
कभी उनका घर हमेशा भरा रहता था, जाड़े में तो ठीक रहता था जब ठण्ड के चलते सब रजाईयों में घुस के सो जाते थे| लेकिन गर्मियों में दिक्कत होती थी, न तो इतनी खटिया थी और न ही इतनी जगह दरवाजे पर| तब छत ही ठिकाना होता था सोने के लिए, रात होते ही सब छत पर चद्दर बिछा कर सोने चले जाते थे|
फिर समय के साथ विकास हुआ, बच्चे बड़े शहरों में रोजी रोटी के लिए निकल गए| साल में एक बार सब इकठ्ठा होते और फिर कुछ दिन वही पुराने दिन सब मिलकर जीते थे| दशरथ भी सबको अपनी क्षमतानुसार गेहूँ, चावल दे देते थे और अपने पिता होने का फ़र्ज़ निभा देते| धीरे धीरे आना कम होने लगा बच्चों का, क्यूंकि उनके बच्चे अब बड़े हो रहे थे और उनकी अपनी अलग प्राथमिकताएँ होने लगीं थीं| फोन लग गया था घर पर तो सबसे गाहे बगाहे बात भी हो जाती थी| लेकिन जब बच्चों ने जिद की कि वो भी मोबाइल रखें तो उनको अच्छा नहीं लगा| बहुत दिनों तक तो उन्होंने नहीं लिया लेकिन जब बार बार कहा जाने लगा तो हार कर उन्होंने भी एक मोबाइल फोन ले लिया|
अब तो बात करने के लिए तरसने लगे थे वो, बस सुबह गुड मॉर्निंग का तो शाम को गुड नाईट का मैसेज आ जाता मोबाइल पर| जब कभी कॉल करते तो अक्सर उधर से व्यस्त टोन ही सुनाई देता| बच्चों की व्यस्तता के आदी होने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था उनके पास|
एक नज़र उन्होंने खेत में डाली, दूर दूर तक सब कुछ खाली ही दिख रहा था| फिर उनकी नज़र थोड़ी दूर पड़े एक गेहूँ की बाली पर पड़ी जो उस खेत के सन्नाटे को जैसे चीरने की कोशिश कर रहा था| न जाने क्यों, उनको वो बाली अपने चेहरे की तरह लगने लगी, उन्होंने उसे उठाया और लेकर वापस घर की तरफ चल दिए| 

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