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Monday, April 25, 2016

एहसास--

बैठे बैठे उसकी आँख लग गयी, रात काफी हो चुकी थी| अब तो ये रोज की ही बात हो गयी थी उसके लिए, अक्सर देर रात गए ही आता था रग्घू| अचानक दरवाजा पीटने की आवाज़ आई तो उसकी आँख खुली| हड़बड़ाकर उसने दरवाज़ा खोला और रग्घू के साथ शराब का भभका भी अंदर आ गया|
" इतना देर लगाती है दरवाज़ा खोलने में, कोई काम तो है नहीं बस सोती रहती है तू ", कहते हुए रग्घू ने उसकी तरफ जलती आँखों से देखा और बिस्तर पर बैठ गया| उसने दौड़ कर एक ग्लास पानी उठाया और रग्घू के सामने खड़ी हो गयी|
" खाना ला, यहाँ क्यों खड़ी है", एक बार फिर गुर्राया रग्घू|
वो भाग कर रसोई में गयी और खाना निकालने लगी| खाना लेकर लौटी तो रग्घू कपडे निकाल कर बैठ गया था| उसने बिस्तर पर ही एक कपडा बिछाया और खाने की थाली रख दी| रग्घू ने खाना शुरू किया और थोड़ी ही देर में उसके मुंह से गालिओं की बौछार शुरू हो गयी| और फिर थाली धड़ाम से जमीन पर गिरी और उसने सुबकना शुरू कर दिया|
थाली की आवाज़ से उसकी दूधमुँही बच्ची जग गयी और रोने लगी| उसने जल्दी से थाली उठाकर रसोई में रखी और बच्ची को उठाकर गोद में बिठा लिया| रग्घू बिस्तर पर सो चुका था और वो बच्ची को चुप कराने में लगी थी| उसका मन बुरी तरह दुखी था, अपनी जिंदगी से उसे विरक्ति सी हो गयी थी| रोज रोज की गाली गलौज और कभी कभी होने वाली मारपीट ने उसे अंदर तक तोड़ दिया था|
बच्ची अभी भी चुप नहीं हो रही थी तो उसने उसे स्तनपान कराना शुरू कर दिया| धीरे धीरे बच्ची चुप हो गयी, उसने एक बार उसकी तरफ देखा| दूध पीते हुए उसके चेहरे पर झलकती संतुष्टि ने जैसे उसके तमाम दुखों को बिलकुल क्षीण कर दिया| कुछ ही देर में बच्ची सो गयी थी और वो भी उसकी बगल में लेटी हुई अब उसके लिए जीने को सोच रही थी|

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