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Wednesday, July 13, 2016

याद और जंग--लघुकथा

"पापा, आप भी न, खुद जा के दिखा दीजिये माँ को, मेरे पास समय नहीं है", बेटे ने फोन रख दिया| रामनाथ जी बाहर निकले, उनके कमर का दर्द भी बढ़ गया था|
"क्या बात है रामनाथ, बहुत परेशान हो| तबियत ठीक है ना", कुर्सी पर बैठे जीतू ने उनकी ओर देखा| रोज का ही समय था और दोनों जाड़े की धूप सेंकते हुए गप्पे लड़ाते थे|
"अरे पत्नी की तबियत ठीक नहीं है और कमर का दर्द भी बढ़ गया है| बेटे के पास समय नहीं है", रामनाथ के चेहरे पर भी दर्द उभर आया|
"चलो मैं चलता हूँ, बेटा नहीं है तो क्या हम तो हैं| आखिर कब काम आएंगे पड़ोसी, मैं ऑटो बुलाता हूँ, तुम पत्नी को तैयार करो चलने के लिए"|
जीतू ऑटो लेने चला गया, रामनाथ थके क़दमों से घर के अंदर घुसे पत्नी को ले जाने| थोड़ी देर में बाहर निकले तो नज़र सामने खड़ी जंग लगी कार पर चली गयी| और याद आया वो दिन जब वो ऑफिस जाने के लिए निकलने वाले थे तभी जीतू का बेटा भागते हुए आया था| उनसे अपनी माँ को कार से जल्दी हस्पताल ले जाने के लिए प्रार्थना की थी और उन्होंने जरुरी काम का बहाना बना दिया था|
पता नहीं जीतू को ये बाद याद है या नहीं, लेकिन उनकी यादों को अभी तक जंग नहीं लगा है| ऑटो में बैठते हुए उन्होंने दो निर्णय ले लिए थे, एक तो जीतू से हाथ जोड़कर माफ़ी मांग लेंगे और दूसरे इस जंग लगी कार को कभी कबाड़ी को नहीं बेचेंगे|  

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