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Friday, July 29, 2016

प्यार का करेंट-- कहानी


"अरे तुम यहाँ बैठे हो रग्घू, बिरजू काका के यहाँ शादी है औरतुम्हारे बिना कैसे निपटेगा सब| जल्दी से आ जाना, हम लोग तो जा रहे हैं", कहते हुएसभी लड़के निकल गए| रग्घू ने एक बार उनकी ओर देखा और सर हिला दियाजैसे वह पीछे पीछे आ जाएगा, हक़ीक़त मे तो उसे नहीं ही जाना था|
गांव का ये पोखरा रग्घू को अब वैसा नहीं लग रहा थाजैसे कभी लगता था. वैसे कुछ ज्यादा नहीं बदला था लेकिन अब जैसे पानी मेंकरेंट ही नहीं रह गया हो| कुछ ख़यालों मे डूबे वह किनारे बैठ पानी में देखे जा रहा था. लेकिन आज वो अक्स नहींदिख रहा था जो कभी इसी पानी में दिखता था| यही पोखरा था जहाँ वो गर्मी भर खूब डुबकी लगाता था औरइसी में पहली बार किसी चेहरे को देखकर उसे करेंट लगा था उसको| उस दिन के पहले तक तो उसने कभी सोचा भी नहीं था कि कभी उसे भी इस हालात से गुजरना पड़ेगा, लेकिन वक़्त पर किसका बस रहा है. अब तो कई महीना बीत गया उस बात को, लेकिन जबभी मन उदास होता है, चला आता है इसी पोखरा के किनारे,कुछ देर बैठने और किसी का अक्स देखने.  
गाँव में जाड़े में चाहे पोखर के पास जाने का मन न करे लेकिन गर्मियों के आते ही दिन में कम से कम एक बार तो उसे पोखरे में डुबकी लगाना ही था. कभी खुद नहाने के लिए तो कभी गाय या भैंस को नहलाने के लिए. उस समय भी गर्मियों का दिन था और शादी बियाह का सीजन चल रहा था| एक दिन वोपोखरा में कूदा और स्वभावानुसार पानी में मस्ती करने लगा| अचानक दूसरे किनारे सेकिसी के हंसने की आवाज़ आयी तो उसका ध्यान चला गया. उस आवाज़ में कुछ तो था कि वोपानी में खड़ा रह गया और एकटक देखने लगा| चेहरा अनजान था, अपने गांव या अगल बगल केगांव का भी नहीं लगता था| दरअसल सारे गांव वह घूमता रहता था और मजाल कि कोई भी चेहरा नपहचानता हो| बस एक ही बात थी,कभी किसी चेहरे को उसने किसी और नजरिए से देखा ही नहीं था. और कभी किसी चेहरे को देखकर करंट भी नहीं लगा था उसको इसीलिए सबसे उतने ही मजे में बात कर लेता था| अगल बगल के गाँव की कई लड़कियों को वह समझा चुका था कि उसको उनमें दिलचस्पी नहीं है इसलिए कुछ ऐसा वैसा नहीं सोचें, लेकिन आज तो कुछ अलग ही हो गया. कुछ देर बाद वह चेहरा पोखरे से निकलकर चला गया और रग्घू कुछ सोचते हुए घर वापस आ गया
अगले कुछ घंटे उसके बेचैनी में गुजरे, वह चाह कर भी उस चेहरे को भूल नहीं पा रहा था. अब कैसे पता लगाए उसके बारे में, किसी से सीधे पूछ भी नहीं सकता था. अब एक ही रास्ता उसे नजर आ रहा था, छोटकी से पूछने का. लेकिन छोटकी भी कम बदमास नहीं थी, इतनी आसानी से कहाँ बताने वाली थी. और जब बात इस तरह की हो तो और भी मुश्किल था. और वह भी तो उसे बहुत तंग करता रहता था, जब मन होता उसकी चोंटी खींच देता और भाग जाता. फिर वापस आने पर माँ की डांट पड़ती लेकिन उसके ऊपर कोई असर नहीं पड़ता था. वैसे वह छोटकी को चाहता भी बहुत था लेकिन ऊपर से जताता नहीं था. लेकिन जब कोई और रास्ता नहीं दिखा तो उसको छोटकी के पास ही जाना पड़ा.
“कैसी है छोटकी, आज खेलने नहीं गयी बाहर”, उसने मुसकुराते हुए पूछा.
“जा रही हूँ थोड़ी देर में, लेकिन तुम आज यह कैसे पूछ रहे हो. हमेशा तो खेलने के लिए डांटते ही रहते हो”, छोटकी को थोड़ा आश्चर्य तो हुआ लेकिन उसका ध्यान अपनी सहेलियों के आने की तरफ लगा था.
“अरे मैं तो ऐसे ही डांट देता हूँ, खेलना तो बहुत जरूरी है. अच्छा यह बता, कोई नया आया है क्या गाँव में?
छोटकी ने उसे अचरज से देखा और सोचने लगी, गाँव मेन सबकी खबर रखने वाला भाई आज उससे पूछ रहा है. “ऐसा कौन आ गया गाँव में जिसे तू नहीं जानता भाई?
रग्घू सीधे सीधे पुछने में हिचक रहा था, आखिर आज तक उसने कभी किसी लड़की के बारे में बात भी तो नहीं की थी छोटकी के साथ. उसने बात को टालने के लिहाज से कहा “अरे आज पोखरे में कोई नया चेहरा दिखा था, मुझे लगा कि तू जानती होगी उसको”.
छोटकी फिर चौंकी, यह किसकी बात कर रहा है भाई. उसने अब थोड़ी गंभीरता से पूछा “अरे किसकी बात कर रहा है, कौन दिखा था आज, साफ साफ बता ना”.
“अरे आज एक लड़की दिखी थी पोखरे में, शायद किसी और गाँव की होगी. मैंने तो बस ऐसे ही पूछ लिया तुझसे, जाने दे”, रग्घू ने बात बदली. वैसे अभी भी अंदर से वह यही चाह रहा था कि छोटकी फिर से पूछे.
“अच्छा तो बात किसी लड़की की है, तभी तो मैं सोचूँ कि भाई आज इतना मेहरबान क्यूँ है मुझपर”, छोटकी ने उसको छेड़ना चाहा लेकिन रग्घू के गंभीर चेहरे को देखकर वह संभल गयी.
“इस समय तो समभू महतो के यहाँ शादी है, शायद उन्हीं के घर आई होगी वह लड़की, मैं पता लगाती हूँ भाई”, छोटकी जैसे एकदम से बड़की हो गयी. लड़कियाँ शायद ऐसी ही होती हैं, एकदम से समझदार और बड़ी बन जाती हैं अपने लोगों के लिए.
रग्घू ने मुस्कुराकर छोटकी की तरफ देखा और प्यार से उसके सर पर हाथ फेरकर निकाल गया. और शाम तक उसे पता चल गया था कि वो लड़की शम्भू महतो के यहाँ ही आयी थी| शम्भू के घर उसके बिटिया की शादी थी और उसके रिश्तेदारी से ये लड़की आयी थी| जबरग्घू को छोटकी ने उसका नाम "प्यारी" बताया तो उसको सच में उस चेहरे से प्यार सा हो गया| वैसे भी अपने गांवमें कोई शादी हो और रग्घू उसमें पूरी तरह से शामिल न हो, ऐसा कभी नहीं हुआ था| लेकिन इस शादी में तो अब कुछ और बात भी थी और रग्घू दिन रात भूल कर इसमें लग गया| घर परभी लोग थोड़ा टोकते, लेकिन उसके व्यवहार को जानते हुए ज्यादा कुछ नहीं कहते थे| बस छोटकी को असली वजह मालूम थी लेकिन उसने इस बात को सिर्फ अपने तक ही रखा था. बीच बीच में अकेले होने पर वह रग्घू को छेड़ती लेकिन अंदर ही अंदर उसे भी प्यारी अब बहुत प्यारी लाग्ने लगी थी. वह तो प्यारी से बातचीत करती ही थी, शायद उससे रग्घू के लिए बात भी करती लेकिन रग्घू ने ही उसको मना किया था. और उधर रग्घू को तो बस काम करते करते किसी तरह प्यारी की बस झलक दिख जाए तो उसकी हिम्मत दो गुना बढ़जाती थी|
शादी के तमाम कामों के बीच एक दिन उसका आमना सामना हो ही गया प्यारी से तो जीवन में पहली बार उसको लगा कि जबानकैसे लड़खड़ाती है| कुछ पूछा था प्यारी ने और वो हड़बड़ा गया, और जब तक वह सम्भले, वोहँसते हुए चली गयी| अब तो उसकी बेचैनी और भी बढ़ गयी थी और शायद प्यारी को भी कुछ कुछआभास हो गया था| रग्घू के बारे में शम्भू महतो के घर सब जानते थे और सभी उसकी खूब तारीफ करते तो वह भी प्यारी को अच्छा लाग्ने लगा. फिर उसने भी रग्घू को देखकर मुस्कुराना शुरू कर दिया और रग्घू तोजैसे हवा में उड़ने लगा
कभी कभी की बात चीत और मुस्कुराहटें जैसे उसके जीने का आधार बन गयीथीं| छोटकी भी जब मौका मिलता, प्यारी से रग्घू के बारे पूछ लेती. धीरे धीरे समय उड़ता रहा और ऐसे में कब शादी का दिन आ गया और फिर उसके बाद वो दिन भी, जब प्यारी को वापसजाना था, रग्घू को एहसास ही नहीं हुआ.
इधर रोज रात में रग्घू सोचता था कि कल प्यारी से बात करेगा और अपने दिल की बात बताएगा| लेकिन समय कुछ ऐसा रहा कि न तो उसे कभी मौका मिला और एकाध बार जब मौका मिला भी तो उसकी हिम्मत जवाब दे गयी. फिर आखिर में जबउसे पता चला कि प्यारी कल चली जाएगी तो वह पूरी रात सो नहीं पाया| बस एक हीख्याल उसके जेहन में आता कि कल के बाद कैसे कटेंगे उसके दिन| कुछ कह भी नहीं पाया था वो प्यारीसे, ये अलग बात थी कि उसे लगता था कि जो वो सोचता है प्यारी के बारे में, प्यारी भी वही सोचती होगी| अगले दिन सारी हिम्मत जुटाकर वह शम्भू महतो के घर गया और मौका देख करउसने प्यारी से अपने दिल की बात कह दी|
प्यारी ने एक बार चौंक कर उसकी ओर देखा औरधीरे से बोली "ये सब बात अगर मेरे घरवालों को पता चल गयी तो मेरी तो शामत आ जाएगी,और पूरे इलाके में मेरी बदनामी अलग होगी| मुझे भी तुम अच्छे लगते हो लेकिन हमारातुम्हारा साथ बस यहीं तक था| किस्मत में हुआ तो फिर मिलेंगे, लेकिन भगवान के लिएकभी भी किसी से इन बातों का जिक्र मत करना"| और फिर प्यारी रग्घूको अकेला छोड़ कर अपने गाँव चली गयी
रग्घू ने उसके बाद बहुत सोचा कि क्या करे, दिल में तो बस प्यारी काही ख्याल आता था| छोटकी भी उसके दुख में उदास रहती लेकिन रग्घू के मना करने के चलते वह कभी यह बात किसी से कह नहीं पायी. जबभी भाई के साथ अकेले होती, उससे पुछती कि वह कहे तो माँ बाबूजी से बात करे, लेकिन रग्घू मना कर देता. उसके व्यवहार में भी अब बहुत परिवर्तन आ गया था, कहाँ मस्तमौला जवान जिसेपूरे गाँव की चिंता रहती थी और घर में जिसके पांव ही नहीं टिकते थे और कहाँ अब खोयाखोया सा रहने वाला रग्घू जो अक्सर घर में ही पड़ा रहता था| जब मन ज्यादा उदास होता तो पोखरे पर चलाजाता और प्यारी का अक्स उसमें ढूंढता| अक्सर सोचता कि प्यारी के घर वालों सेकौन बात करेगा, माँ या छोटकी तो कर नहीं सकती और बाबूजी के बारे मेन सोचना ही संभव नहीं था उसके लिए. अपने बाबूजी के क्रोधी और हठी स्वभाव से वो भलीभातीं परिचितथा
माँ को भी अब कुछ कुछ आभाष होने लगा था और वह अक्सर रग्घू से उसके उदासी की वजह पूछने लगी. आखिरकार एक दिन उसने माँ से बात की और अपने मन की बात कह डाली| माँ उसकी तरफदेखती रह गयी कि ये क्या कह रहा है रग्घू और फिर उसने पूछा "तुमको पता है न कि अपनेऔर महतो के जात में फ़र्क़ हैऔर वह निचली जात के हैं| और तुम ये भी जानते हो कि तुम्हारे बाबूजी का स्वभावकैसा है, वो कभी भी इसके लिए तैयार नहीं होंगे| उनसे ये सब बात कहने की हिम्मत तोमुझमे भी नहीं है"
"जानते तो सब हैं अम्मा, लेकिन क्या करें,कोई जानबूझ के तो नहींकिया प्रेम उससे, अब तुम्ही बताओ क्या करें", कह कर रग्घू माँ के गोद में सर रख करलेट गया| माँ बहुत देर तक उसका सर सहलाती रही और उसको समझाती रहीछोटकी भी कमरे मे आ गयी थी, वह भी भाई का हाथ पकड़कर बहुत देर तक बैठी रही. किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि बाबूजी से यह बात कहे.
कुछ दिन और गुजरे,रग्घू सोचता रहा, उधर प्यारी भी तैयार नहीं है और इधर बाबूजी से कहना संभव नहीं है| भारी मन से आखिरकार रग्घू ने फैसला कर ही लिया, प्यारी को भुला तो नहीं पाएगा लेकिन उससे शादी का ख्याल भी अब दिल में नहीं आने देगा. और आगे से गाँव में किसी के भी घर शादी में नहीं जायेगा| हाँ, जब भी मन उदास होगा तो उसीपोखरे पर जाकर बैठ जायेगाऔर उसके पानी में प्यारी के अक्स को देखने की कोशिश करेगा|

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