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Friday, July 29, 2016

सुर्ख़ लाल रंग- कहानी

जल्दी-जल्दी हाथ चला रहे थे रज्जब अंसारी, समय कम था और काम बहुत ज़रूरी। आज किसी भी हालत में वह उसको पूरा कर लेना चाहते थे, रात भी काफ़ी हो चली थी और करघे के खट-खट से पूरा घर गूँज रहा था। इस इलाक़े में चाहे जिसके भी घर में शादी हो, लोग हमेशा उनके यहाँ ही आते थे। उसके पीछे वजह भी बहुत ख़ास थी, कई पीढ़ियों से हर जाति और धर्म के लोगों के यहाँ शादी में दुल्हन को पहनाये जानी वाली साड़ी पूरे इलाक़े में उन्हीं के यहाँ बुनी जाती थी। और इस बार तो और भी ख़ास मौक़ा था, अगले हफ़्ते तो उनके जिगरी दोस्त लक्ष्मण की बिटिया की शादी थी, जिसे उन्होंने अपनी बिटिया से कम कभी भी नहीं माना था। वैसे भी गाँव में बिटिया चाहे जिसके घर की हो, वह सबकी बिटिया समझी जाती थी। और इस चीज़ को रज्जब शायद सबसे ज़्यादा शिद्दत से महसूस करते थे।
साड़ी बुनते हुए सोच में डूब गए रज्जब, कभी कितना ख़ुशहाल हुआ करता था उनका गाँव। न तो लोग बहुत ज़्यादा अमीर थे और न ही लोगों के पास बहुत ज़्यादा खेत बारी थी, लेकिन लोग संतुष्ट थे। गाँव में अधिकांश घर हिंदुओं के थे और बीच में तीन चार घर उनके भी थे। आपसी मोहब्बत इतनी थी कि अगर दीवाली में उनके घर दीप जलते थे, तो ईद में बाक़ी लोग भी आते थे सिवई खाने। उन लोगों के पास खेतीबाड़ी तो नहीं थी, लेकिन ये करघा का काम बख़ूबी करते थे वे लोग। दिन में तो करघे चलते ही थे, शादियों के मौसम में तो सारी रात करघों की खट पट की आवाज़ पूरे गाँव में गूँजती रहती थी। अगल-बगल के गाँव ही नहीं, दूर-दूर तक उनकी बनाई साड़ी मशहूर थी और आसपास के गाँवों में तो ये अनकहा नियम था कि दुल्हन की साड़ी तो रज्जब के हाथ की ही बनी होगी। एक और चीज़ थी जो पीढ़ियों से चलती आई थी और रज्जब भी उसका पूरा ख़याल रखते थे। दुल्हन की उस साड़ी की क़ीमत भी वे नहीं बताते थे, सामने वाला जो भी ख़ुशी-ख़ुशी दे दे, रज्जब उसे आँख मूँद कर कुबूल कर लेते थे। कभी पैसे तो कभी अनाज, जो भी मिल जाए, कभी न नहीं किया। अब उनको तो कोई दिक़्क़त नहीं थी इससे लेकिन बड़े होते लड़कों ने एकाध बार टोका कि कम-से-कम लागत तो बता दिया कीजिए लोगों को, लेकिन वे उनको चुप करा देते थे।
"अरे बिटिया के ब्याह में भी कहीं सौदा किया जाता है, ये तो बड़े शबाब का काम है। उपरवाले ने ये मौक़ा कुछ सोचकर ही दिया है मुझे, और तुम लोग कहते हो कि क़ीमत लूँ इसकी", बड़े फ़क़्र से रज्जब उनको समझाते। फिर तो लड़कों ने भी उनसे ये कहना बंद कर दिया, बस कभी ख़ुद नहीं लगते थे ऐसे मौक़ों पर।
उनका अपना गाँव तो उनका परिवार ही था, हर कोई उनसे अपना सुख दुख साझा करता था। अक्सर शाम को किसी के घर बैठ जाते और फिर भोजन वहीं कर लेते। घर पर भी लोग उनकी आदत जानते थे और अगर देर होने लगती तो खाने पर उनका इंतज़ार नहीं किया जाता। उनको अच्छी तरह से याद था कि जब एक बार रात में अचानक बेग़म की तबीयत बहुत ख़राब हो गई थी तो इसी लक्ष्मण के परिवार ने उनको हस्पताल पहुँचाया था और दो-तीन बोतल ख़ून भी उनके घरवालों ने ही दिया था। अब न सिर्फ़ गाँव घर का रिश्ता था बल्कि ख़ून का भी रिश्ता बन गया था। उनको यह भी बख़ूबी मालूम है कि लक्ष्मण ही नहीं बल्कि रमेश सुरेश या दुक्खू के घरवाले भी यही करते और अपना ख़ून देने में ज़रा भी आनाकानी नहीं करते। और ऐसा मौक़ा अगर उनको भी मिलता तो शायद वह इससे भी ज़्यादा करते।
उनको तो कभी फ़र्क़ ही महसूस नहीं हुआ था, लेकिन जबसे नई पीढ़ी शहर की तरफ़ चल दी थी, कुछ बदलाव महसूस होने लगा था। कभी अगर वे अचानक घर पहुँच जाते तो बच्चे बात करते-करते एकदम से चुप हो जाते। उनको अजीब तो लगता, लेकिन फिर ये सोचकर कि ये नए ज़माने के बच्चे हैं उनसे लिहाज़ करते होंगे, उनको कभी टोका नहीं। यही वाक़या कभी-कभी गाँव में भी होता जब वे अचानक किसी के दरवाज़े पर पहुँचते तो एकदम से लोग चुप हो जाते। अब उनके दिमाग़ में तो कुछ था नहीं इसलिए उन्होंने कभी इसका कुछ ग़लत अर्थ नहीं लगाया।
"तुम लोग कभी-कभी मुझसे भी बात कर लिया करो, ऐसा क्या है कि मुझे देखते ही ख़ामोश हो जाते हो। थोड़ा-बहुत जमाने के बारे में तो मैं भी जानता हूँ, हाँ अगर मुझे बताने वाली बात नहीं हो तो अलग चीज़ है", कभी-कभी रज्जब उनसे पूछ लेते। लेकिन बच्चे या तो ख़ामोश रह जाते या कहते कि कोई ख़ास बात नहीं है, बस यूँ ही बतकही चल रही है।
बहरहाल रज्जब बदस्तूर अपने ढर्रे पर चलते रहे। उन्होंने लोगों के यहाँ अपना आना-जाना बंद नहीं किया, उसी तरह हर घर में जाते और लोगों से दिल खोलकर मिलते। एक दिन जब लक्ष्मण ने उनको बताया कि उसकी बेटी की शादी तंय हो गई है तो उनको लगा जैसे उनकी अपनी बच्ची की ही शादी होने जा रही हो। गाँव में सबसे ज़्यादा लगाव उनका लक्ष्मण से ही था और उसकी बेटी तो उनके गोद में भी खेली थी।
लक्ष्मण कुछ कहे उससे पहले ही उन्होंने पूरे अधिकार से कहा "बिटिया की शादी में साड़ी तो मैं ही बनाऊँगा और वो मेरी तरफ़ से उसके शादी में नेग होगा"। लक्ष्मण ने भी कुछ नहीं कहा, उनको मालूम था कि रज्जब जब सबके लिए करते हैं तो उनसे तो एक अलग ही रिश्ता है। बहुत ख़ुश थे रज्जब घर आते समय, ऐसा लगता था कि कब घर पहुँचे और तुरंत साड़ी बनाने में लग जाएँ। इस बार तो जान लगा देंगे, आख़िर ये तो उनके घर की ही बात थी, एक तरह से उनकी बिटिया की ही शादी हो रही थी। घर आते ही उन्होंने सबको बता दिया कि लक्ष्मण की बिटिया की शादी तंय हो गई है। उन्होंने यह भी ऐलान कर दिया कि अब कुछ दिन वे बहुत व्यस्त रहेंगे और ऐसी साड़ी बनाएँगे जिसे पूरा इलाक़ा देखता रह जाएगा। उस शाम उन्होंने पूरी तैयारी की और उन्हीं ख़यालों में डूबे हुए नींद की आग़ोश में समा गए।
इसी बीच शहर में दंगे भड़क उठे थे और उसकी ख़बर यहाँ भी पहुँच गई थी। एक डरावना माहौल गाँव में भी दिखने लगा था, जिसे बाक़ी लोग तो देख रहे थे लेकिन रज्जब को नहीं दिख रहा था। एक शाम को घर पर सभी एक साथ बैठे थे और काफ़ी धीमी आवाज़ में इसी बात की चर्चा चल रही थी। लेकिन जैसे ही रज्जब घर में घुसे, आज चर्चा बंद नहीं हुई और बच्चों ने उनको समझाना शुरू कर दिया।
"शहर में फ़साद चल रहा है और उसकी आँच यहाँ भी महसूस हो रही है अब्बू। अब जल्द-से-जल्द इस गाँव को छोड़कर उस गाँव चले जाते हैं जहाँ सारे अपने लोग बसे हुए हैं", बच्चों ने एक स्वर में कहा तो उनकी अम्मी ने भी अपना सर हिला दिया।
"दिमाग़ तो नहीं ख़राब हो गया है तुम लोगों का, ये गाँव अपना है और लोग भी अपने। इसी गाँव की मिट्टी में हम पैदा हुए हैं और यहीं रहेंगे, क्यों छोड़कर जाएँगे इसको। तुम लोग कुछ ज़्यादा ही सोचने लगते हो, यह छोटे मोटे झगड़े तो चलते ही रहते हैं, पिछले साल भी तो एक बार ऐसा हुआ था, क्या दिक़्क़त आई। तुम लोगों को दिखता होगा, मुझे तो कोई फ़र्क़ नज़र नहीं आता", एकदम से भड़क गए रज्जब।
"आपको तो कभी भी नहीं दिखेगा, लेकिन हमें तो पता है कि शहर में क्या हो रहा है। कई गाँवों में लोग अपना घर बार बेचकर सुरक्षित जगह जाने लगे हैं। आख़िर ये लोग भी कितने दिन शांत बैठेंगे, और अगर एक बार उन्होंने कुछ ग़लत सोच लिया तो फिर कौन बचाएगा हमें", बच्चों ने उनको समझाना चाहा।
"देखो, मैं तो इसी मिट्टी की पैदाइश हूँ और मैं इसी मिट्टी में दफ़न होऊँगा, मुझे कहीं जाने कि ज़रूरत नहीं है। हाँ, अगर तुम लोग ऐसा सोचते हो तो जा सकते हो मुझे छोड़कर", रज्जब ने कहा और फिर ग़ुस्से में बाहर दालान में निकल गए।
अगले कुछ दिन वे पूरी तरह साड़ी में ही उलझे रहे, अलबत्ता बच्चे और बेग़म उनको बीच-बीच में समझाने की कोशिश करते रहे। उनका गाँव में आना-जाना उसी तरह बरक़रार रहा और लगभग हर रोज़ लक्ष्मण के घर जाकर शादी की तैयारियों के बारे में पूछते रहे। लक्ष्मण भी थोड़ा चिंतित था कि अगर दंगे ख़त्म नहीं हुए तो शायद शादी की तारीख़ भी बदलनी पड़ेगी।
बच्चों और पड़ोसियों के बहुत समझाने पर भी उन्होंने गाँव छोड़ने की बात मानने से स्पष्ट मना कर दिया। लेकिन उन्होंने बच्चों से यह भी साफ़ कह दिया कि अपनी माँ को भी साथ लेकर जाओ, उसका ख़याल मैं अकेले नहीं रख पाऊँगा। दरअसल उनको पूरा भरोसा था कि कुछ ही दिनों में ये सब लौट आएँगे और फिर सब ठीक हो जाएगा।
एक बार उन्होंने लक्ष्मण से भी ये बात कही तो वे भी सोच में पड़ गया। महसूस तो उसे भी होने लगा था, जिस तरह से गाँव के नौजवान आजकल यही सब चर्चा करते रहते थे। लेकिन उन्होंने रज्जब को ढाढस बँधाया कि यहाँ पर कुछ नहीं होगा।
"अरे कुछ भी हो जाए, हम लोग तो एक ही रहेंगे रज्जब। ये सब वक़्ती तौर की बातें हैं, लोग उन्माद में आकर ऐसा सोच और कर रहे हैं। पानी में कितना भी लाठी मारो, पानी अलग थोड़े न होता है, सब ठीक हो जाएगा"।
रज्जब ने उनकी बात से पूरा अख़्तियार रखा और अपने यहीं रहने के फ़ैसले पर क़ायम रहने पर काफ़ी ख़ुश थे। उन्होंने लक्ष्मण को बता दिया कि अगले दो-तीन दिन में बिटिया की साड़ी तैयार हो जाएगी और इसके अलावा भी उनके लायक़ और कुछ हो तो उन्हें बता दें। लक्ष्मण ने सर हिला दिया और रज्जब का हाथ अपने हाथ में लेकर दबा दिया गोया बता रहे हों कि तुम्हारे साथ होने से मुझे कोई दिक़्क़त नहीं आने वाली है।
घर और पड़ोस के सारे लोगों ने जाने की तैयारी कर ली और एक बार फिर सबने उनको समझाने की कोशिश की। उन्होंने उसी दृढ़ता से मना कर दिया और अपने काम में लग गए। शाम को जैसे ही सबने गाँव छोड़ा, रज्जब का दिल ही जैसे बैठ गया। कहीं-न-कहीं उनको अभी भी लगता था कि बच्चे उनको छोड़कर नहीं जाएँगे। लेकिन सूना घर और खाली आस पड़ोस जैसे उनको काटने को दौड़ रहा था। इस मायूसी से बचने के लिए उन्होंने अपने आपको काम में पूरी तरह डुबा लिया और साड़ी को पूरा करने में लग गए। कई घंटों बाद उन्होंने सर उठाया, रात काफ़ी हो गई थी और साड़ी भी लगभग तैयार हो गई थी। जब भी वे साड़ी की तरफ़ देखते, उनको उसमें लक्ष्मण की बेटी का चेहरा दिखाई पड़ता। सालों से उनकी दिली तमन्ना थी कि एक बार वे ऐसी चटक लाल रंग की साड़ी बनाएँ, जिसमें दुल्हन का चेहरा एकदम खिल उठे। साड़ी को एक बार फिर उठाकर उन्होंने देखा, रंग तो लाल ही था लेकिन वैसा नहीं जैसा वे चाहते थे, कुछ कमी लग रही थी। थोड़ी देर सोचने के बाद उनको साड़ी को एक बार और रंगने का ख़याल आया। इसी सोच में उनको प्यास महसूस हुई और वह एक लोटा पानी लेकर पीने लगे।
थकान काफ़ी हो गई थी और नींद भी आँखों में घर कर रही थी लेकिन आज वे साड़ी को ख़त्म करके ही उठना चाह रहे थे। उन्होंने अँगड़ाई ली और एक बार फिर बैठ गए करघे पर। थोड़ी देर में ही उसकी खट-खट की आवाज़ उस सन्नाटे में गूँजने लगी। इसी बीच कब पीछे से कोई आया, उनको पता ही नहीं चला। अचानक पीछे से लाठी का एक भरपूर वार उनके सर पर पड़ा, खटाक की आवाज़ आई और करघा चलने का खट-खट बंद हो गया। उनका शरीर करघे के पास गिर पड़ा, उससे बहने वाले लहू से साड़ी का रंग सुर्ख़ लाल हो रहा था, वही सुर्ख़ लाल जिसे वे लक्ष्मण की बेटी को पहने देखना चाहते थे।

4 comments:

  1. आपकी ये कहानी पहले भी पढ़ी है. ये बहुत दुखी कर देती है. असहिष्णुता जाने कब कम होगी . दशकों हूँ गए इसे भुगतते हुए. लेकिन अब भी कोई न ओई कारण लोगों को मिल ही जाता है. आपने बहुत अच्छे से लिखा है. पढ़ा कर दिल भरी हो जाता है. यही इस कहानी की सफलता है.

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया

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    2. बहुत खूब ..., बेहद उम्दा कहानी . लघु कथा के रूप में तो शानदार थी ही .., पूरी कहानी पढ़ कर और भी असरदार लगी . शुक्रिया इस ब्लॉग तक पहुंचाने के लिए .

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    3. बहुत बहुत शुक्रिया

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