रो रो कर ज़रीना का बुरा हाल था, बेटी कल से वापस नहीं लौटी थी| शाम जैसे जैसे रात कि तरफ बढ़ रही थी, उसका दिल बैठा जा रहा था| रोज़ की ही तरह वो घर से कॉलेज के लिए निकली थी| घर से कॉलेज वैसे तो ज्यादा दूर नहीं था लेकिन ऑटो और बस दोनों लेना पड़ता था उसे वहां पहुँचने के लिए| उसने बेटी को गेट तक छोड़ा था और जब वो ऑटो में बैठ गयी थी तो वो वापस आ गयी थी|
तक़रीबन रोज़ाना ही अखबार में अपहरण और ह्यूमन ट्रैफिकिंग की ख़बरें छपती रहतीं थीं| पढ़ कर वो कई बार बहुत दुखी भी हो जाती थी और अक्सर उसे गुस्सा भी आ जाता था| कोसने लगती थी सबको, कानून व्यवस्था, समय, लड़कों और सबसे ज्यादा अपने आप को| वजह थी उसका लड़की की माँ होना और ऐसी लड़की का जिसका पिता नहीं है| ये इंसानी फितरत ही है जिसमें कमजोर व्यक्ति अक्सर अपने आप को सबसे पहले कारण मान लेता है किसी घटना के लिए, चाहे वो उसके लिए जिम्मेदार हो या न हो| ये स्वभावगत कमजोरी होती है, खासतौर से महिलाओं की, क्यूंकि उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं होते| और यही वजह थी कि जरीना भी अपने आप को इसका जिम्मेदार मानने लगी थी|
रात आँखों में ही बीती और हर खटके पर उसे लगता जैसे वो आ गयी हो| लेकिन सुबह की रौशनी ने जब उसके कमरे में प्रवेश किया, वो कुर्सी पर ही औंधी पड़ी हुई थी| अब तक पड़ोसियों को भी खबर हो चुकी थी और हर कोई अपने हिसाब से कयास लगा रहा था| सबकी अपनी अपनी राय और अलग अलग सलाह, लेकिन ज़रीना को कुछ समझ नहीं आ रहा था| आखिरकार लोगों के कहने पर वो पुलिस स्टेशन गयी| आज पहला अवसर था वहां जाने का और उसका अंतस बुरी तरह कांप रहा था| वैसे भी किसी भी सामान्य व्यक्ति को अगर पुलिस स्टेशन जाना पड़े तो उसकी मनोदशा दयनीय हो जाती है और यही कुछ हुआ था जरीना के साथ भी| कहने को तो पडोसी इस्माइल साथ था लेकिन जरीना से ज्यादा वो खुद घबराया हुआ था|
जैसे ही वो थाने के गेट पर पहुंची, एक बेहद अजीब निगाहों ने उसे घूरा| गेट पर खड़ा संतरी उसे देख कर ही उसकी हालत समझ गया था|
"क्या हुआ, क्यों चली आई यहाँ", उसके सवाल के लहजे और उसकी बंदूक पर उसके कसे हुए हाथ को देखकर वो थर्रा गयी|
"साहब, बेटी कल से स्कूल से वापस नहीं लौटी है", किसी तरह घबराते हुए उसने कहा|
"अपने रिश्तेदारी में पूछा सब जगह?, उसने बेहद रूखे तरीके से कहा|
"हां साहब, सब जगह फोन कर लिया है, कहीं भी नहीं है"|
"अच्छा क्या उम्र थी उसकी", अभी भी वो संतरी सवाल दागे जा रहा था| इस्माइल बिलकुल ख़ामोशी से थोड़ी दूर पर खड़ा था, उसे अब समझ में आ गया था कि सब बात उसको ही करनी है|
"साहब, २० साल की है, मुझे रिपोर्ट लिखवानी है, किससे मिलूं", बोलते हुए वो अंदर की तरफ चली|
"२० साल की है तो अपनी मर्जी से कहीं भाग गयी होगी, जाओ अंदर साहब बैठे हैं"| संतरी की आँखों और चेहरे पर अजीब सा लिजलिजापन था और अंदर जाते समय उसे उसकी निगाह अपना पीछा करती लग रही थी|
अंदर एक टेबल के सामने एक पुलिस वाला बैठा था, टोपी उसने टेबल पर ही रखी थी और उसके शर्ट के सामने के बटन खुले हुए थे| अब बार हिम्मत जवाब दे गयी जरीना की, ये आदमी उसकी मदद क्या करेगा जो खुद ही किसी मवाली जैसा लग रहा हो| उस पुलिस वाले ने आँखों से उसके सारे बदन का एक्सरे किया और बेहद भद्दे अंदाज में दाँत को एक सीक से खोदते हुए बोला "क्या हुआ , किसलिए आई यहाँ पर"|
जरीना ने फिर से वही सब दुहराया और इसने भी वही सवाल पूछा| उसकी ज्यादा दिलचस्पी जरीना को घूरने में थी और जब जरीना ने एक बार फिर हाथ जोड़ कर कहा कि उसकी रपट लिख ले तो उसने टरका दिया|
"उसकी कोई फोटो लायी है तो दे जा और उसके सब यार दोस्तों से पूछ| ऐसी उम्र में कोई प्यार वार का चक्कर ही होता है, भाग गयी होगी किसी यार के साथ| कुछ दिन देख ले, अगर नहीं लौटी तो हम लोग पता लगाएंगे", कहते हुए वो वापस अपने दाँत खोदने लगा|
जरीना ने उसे बेटी कि एक फोटो दी और एक कागज पर अपना नाम और फोन नंबर लिख कर दिया| फिर टूटे क़दमों से बाहर निकली, आज तक उसकी जो भी धारणा पुलिस के प्रति थी, आज वो और पुख्ता हो गयी थी| वही एक दीवार पर लिखा एक वाक़्य "पुलिस आपकी मित्र है" उसे अपना भद्दा मज़ाक उड़ाता लगा|
वापसी के समय इस्माइल बोल रहा था कि अपने एरिया के नेता के पास चलेंगे, वो जरूर मदद करेंगे| जरीना ने सुन के भी अनसुना कर दिया, पता नहीं कितने सवाल वहां भी पूछे जाएँ और आँखों से उसके जिस्म का एक्सरे फिर से हो| घर वापस आकर उसने एक बार फिर सब रिश्तेदारों के यहाँ फोन किया, जवाब हर जगह से नकारात्मक ही था| शाम तक वो लगभग हर परिचित और उसकी सब सहेलियों के यहाँ हो आई थी, कहीं कुछ पता नहीं चल रहा था| अब करे तो क्या करे, पति था नहीं और इकलौती लड़की गायब थी| अब तो एक ही उम्मीद लगी थी कि शायद कोई फोन आये फिरौती के लिए और वो सब कुछ बेच कर भी उसे छुड़ा ले|
तीन दिन बीत गए, फिरौती के लिए कोई फोन नहीं आया, हाँ सब रिश्तेदार और परिचित जरूर फोन करते और कहते कि कोई जरुरत हो तो बताना| सबको पता था कि अभी उसे किस चीज कि जरुरत है लेकिन उसके लिए कोई भी मदद नहीं कर पा रहा था|तीसरे दिन फिर वो पुलिस स्टेशन गयी लेकिन टका सा जवाब मिला कि कुछ पता नहीं चला है, जब पता चलेगा, खबर कर देंगे|
खाना पीना सब छूट गया था, पूरी पूरी रात जाग कर बीत रही थी उसकी| जहाँ भी उम्मीद होती, भागती चली जाती कि शायद कुछ पता चले| जब भी बाहर निकलती, लोग तो सहानुभूतिपूर्वक ही पूछते कि कुछ पता चला, लेकिन उनके लहज़े से लगता जैसे व्यंग ज्यादा कर रहे हों| और पीछे से कई बार वो सुन चुकी थी कि बेटी को ज्यादा पढ़ाने का नतीजा देख लिया, भाग गयी किसी के साथ| कुछ लोगों ने कहा कि अखबार भी देखते रहो, कभी कभी कोई खोया इसमें भी मिल जाता है| कुछ तो इतने बेरहम थे कि उन्होंने कह दिया कि कभी कभी लावारिस लाश की भी फोटो छपती है अखबार में और ये सुनकर उसका कलेजा काँप गया था| लेकिन मज़बूरी में वो अखबार भी देख लेती थी, शायद कोई खबर ही मिल जाए| इन्हीं उलझनों में उलझी हुई थी कि अचानक उसकी नजर अखबार की एक खबर पर गयी, खबर बल्लू के बारे में थी| किसी क़त्ल के केस में उसका नाम उछल रहा था अखबार में और उसे ध्यान आया कि बल्लू तो कभी उसके ही क्लास में पढ़ता था| नाम तो उसका बलबीर था लेकिन सब उसको बल्लू ही कहते थे| शुरू से ही बल्लू की संगत ख़राब थी और वो पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाया| उसके कदम जरायम की दुनिया की ओर मुड़ गए थे और आज अखबार में उसके गुंडागर्दी की ख़बर पढ़कर उसे कुछ अजीब नहीं लगा| उसने क्लास में कभी बल्लू से ज्यादा बातचीत नहीं की थी, वैसे भी वो लड़कों से खुद को दूर ही रखती थी| लेकिन बल्लू की हरकतों के चलते सब उसे जानते थे और कभी कभी बात भी करनी पड़ जाती थी| जरीना सोच में पड़ गयी, क्या वो बल्लू से मिले, शायद वो कुछ मदद कर पाये| लेकिन उसने अपने विचार को ही झटक दिया, कहीं कोई गुंडा भी किसी की मदद कर सकता है, वो तो सिर्फ लोगों को परेशान ही कर सकता है|
कुछ कहानियों में उसने पढ़ा भी था कि कुछ ऐसे बदमाश भी होते हैं जो जरूरतमंदों की मदद करते हैं| रात भर उसके दिमाग में ये सब विचार अंधड़ मचाते रहे, क्या वो बल्लू के पास जाये| किसी से पूछने की न तो इच्छा थी उसकी और उसे उम्मीद भी नहीं थी कि कोई इसमें सही राय दे पाएगा| रात बीती, सुबह होने तक उसने एक फैसला कर लिया था| पुलिस का हाल वो देख ही चुकी थी और नेताओं से कोई उम्मीद वैसे भी नहीं थी| तो अब इसे आजमाने के अलावा और कोई चारा उसे नज़र नहीं आ रहा था, चार दिन में ही रिश्तेदार और परिचित अब बहाने बनाने लगे थे| बेटी को पाने की कम होती उम्मीद ने उसे अब बल्लू के पास भी जाने के लिए मजबूर कर दिया|
ऐसे लोगों का पता लगाना पुलिस के अलावा हर किसी के लिए बहुत आसान होता है| जरीना हैरान भी थी कि कितनी आसानी से उसे बल्लू का अड्डा पता चल गया जबकि पुलिस उसे नहीं ढूँढ पा रही है| वो पता पूछते हुए उसके अड्डे पर पहुंची, अँधेरे से घर में शराब की बदबू और सिगरेट के धुंए की गंध चारो ओर फैली हुई थी| पहले तो वहां के लोगों की चुभती निगाहों ने उसे पस्त कर दिया और उसे पुलिस स्टेशन की याद आ गयी| लेकिन उस अनुभव ने उसकी मदद की और वो उन नज़रों को बर्दास्त करती बल्लू के पास पहुंची| उसने तो बल्लू को पहचान लिया, अखबार में उसकी तस्वीर देखी थी उसने, लेकिन बल्लू उसे पहचान नहीं पाया| उसकी निगाहों में उभरे प्रश्न को समझते हुए उसने पहले अपने स्कूल स्कूल की बात बताई तो वो चौंक गया| अभी भी कुछ लिहाज़ बची थी बल्लू में, वो तुरंत उसे लेकर अंदर के कमरे में गया और जब तक बल्लू कुछ पूछे, ज़रीना फूट फूट कर रो पड़ी| ऐसी स्थिति से बल्लू का पाला बहुत कम ही पड़ता था इसलिए पहले तो उसे समझ में ही नहीं आया कि वो क्या करे, फिर उसने किसी तरह ज़रीना को शांत कराया और आने का कारण पूछा| ज़रीना ने सारा किस्सा एक साँस में कह डाला और उसके सामने हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी| बल्लू के चेहरे पर कई भाव आ जा रहे थे, कुछ तंय नहीं कर पा रहा था वो| समझ में तो उसे आ गया था कि किसी गिरोह ने ही अगवा किया है जरीना की बेटी को लेकिन वो कुछ कह नहीं पा रहा था| अब तो जरीना को लगा कि शायद यहाँ भी उसका आना व्यर्थ ही हुआ, लेकिन वो बल्लू को लगातार आशा भरी निगाहों से देखे जा रही थी|
एक बार तो बल्लू की भी इच्छा हुई कि जरीना को टरका दे, लेकिन फिर जरीना के जुड़े हुए हाथों ने उसे कश्मकश में डाल दिया| आखिर वो उसके साथ पढ़ी थी और बहुत उम्मीद के साथ आई थी| फिर उसने ज़रीना के जुड़े हुए हाथों को अपने हाथों में लेकर दृढ शब्दों में कहा "जाओ जरीना, अपने घर जाओ, बस बेटी की एक फोटो देती जाओ| मैं हर तरह से कोशिश करूँगा कि किसी भी हालत में उसे तुम्हारे पास वापस ले आऊं"|
जरीना ने कृतञता से उसकी ओर देखा और फोटो के साथ नंबर उसे थमा कर बाहर निकली| घर लौटते हुए ज़रीना के क़दमों में एक दृढ़ता आ गयी थी| आज पहली बार वो सोच रही थी कि लोग जिन्हें बुरा कहते हैं क्या सचमुच वो बुरे होते हैं या उन्हें बुरा कहने वाले समाज के ये तथाकथित शरीफ और सभ्य लोग| उसके दुःख में काम आना तो दूर की बात, गलत बाते बनाना और उससे मुंह चुराने लगे थे लोग| क्या एक इंसान का फ़र्ज़ अदा करने वाला बल्लू बेहतर इंसान नहीं है, भले ही वह गुंडागर्दी करता है| अब वो कुछ और सोच नहीं पा रही थी, बस उसे तो बल्लू के रूप में एक ही आसरा दिखाई पड़ रहा था जो उसकी बेटी को ढूँढ सकता था|
जरीना के जाने के बाद बल्लू सर पकड़ कर बैठ गया, अब क्या करे| एक बार तो उसने सोचा कि एक दो दिन बाद वह फोन करके बता देगा कि उसे कोई खबर नहीं मिली| लेकिन जैसे ही उसे जरीना के जुड़े हुए हाथ और उसकी ऑंखें याद आईं, वो सोच में पड़ गया| एक तरफ तो बेमतलब का सरदर्द लग रहा था, दूसरी तरफ उसे किसी की आस दिख रही थी| कहीं न कहीं उसके मन में भी ये बात तो थी ही कि वो भी कुछ अच्छा करे, आखिर दिल से तो वो एक इंसान ही था जिसमे कुछ अच्छी चीजें भी थीं| उसने फोटो और कागज़ उठाकर अलमारी में रख दिया और कुर्सी पर पसर गया| अब उसका दिमाग काफी साल पहले के स्कूल के दिनों की ओर चला गया था, वो जरीना को स्कूल में याद करने की कोशिश करने लगा| बहुत धुंधला सा कुछ उसे याद आया और उसके चेहरे पर मुस्कराहट छा गयी| यही एक पल था जब उसने जरीना की बेटी का पता लगाने का निश्चय कर लिया|
उसने फोन उठाया और अपने लोगों से पता लगाना शुरू किया कि ज़रीना की बेटी को किसने उठाया होगा| रात तक उसे खबर मिल गई कि जरीना की बेटी को जिस्फरोशी के धंधे में डालने के लिए अगवा किया गया है| लेकिन जिस्मफरोशों ने उसे इस जगह से कई सौ किमी दूर पहुंचा दिया गया था| अब उसे वहां से छुड़ा कर लाना बहुत टेंढ़ी खीर थी, वहां पर किसी ऐसे को वो जानता भी नहीं था जिसे मदद के लिए कह सके| बल्लू इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि उसे एक उम्मीद दिखी| उसने फोन उठाया और इलाके के इन्स्पेक्टर को लगाया| सारी बात बताने के बाद उसने उससे मदद माँगी लेकिन इन्स्पेक्टर ये मानने को तैयार ही नहीं था कि बल्लू बिना पैसे लिए ये काम करने जा रहा है| बल्लू ने उसे समझाया कि वो वहां के पुलिस से बात करे, उन सब को उनका हिस्सा मिल जायेगा|
"ठीक है, एक पेटी मुझे चाहिए, बाक़ी वहां वाला जो मांगेगा वो देना पड़ेगा"|
"ठीक है साहब, आप बात करो, पैसा मिल जायेगा", बल्लू ने कहा तो एक बार खुद उसे अपनी बात पर भरोसा नहीं हुआ| बिना पैसे के आज तक कोई काम नहीं किया था उसने और आज सिर्फ एक साथ पढ़ने वाली लड़की के लिए इतना बड़ा काम अपने पैसे से करने जा रहा है| लेकिन कुछ तो था जरीना कि आँखों में, जिसने उसे ये सब करने पर मजबूर कर दिया था| उस इलाके के इंस्पेक्टर से बात हुई, सौदा ३ लाख में पक्का हुआ| पैसों का इंतज़ाम करके बल्लू ने इन्स्पेक्टर को भिजवाए और अब बेसब्री से जरीना के बेटी की रिहाई के बारे में सोचने लगा|
जरीना हर समय फोन को देखती, उसे भी जैसे पूरा भरोसा था कि बल्लू जरूर उसकी बेटी को छुड़ा लगा| जब भी फोन बजता, वो भाग कर उठाती लेकिन फोन बल्लू के अलावा किसी और का ही होता| एक दिन बीत गया था और उसे अफ़सोस हो रहा था कि उसने क्यों नहीं बल्लू का नंबर लिया| अगले दिन फिर चलूंगी बल्लू के पास और एक बार और हाथ जोडुंगी उसके, यही सब सोच रही थी वो कि बल्लू का फोन आया| उसने ज़रीना को बता दिया कि उसकी बेटी का पता चल गया है और उम्मीद है कि अगले दो दिन में वो उसे घर ले आएगा, बस वो इसका जिक्र किसी से न करे और परेशान न हो| जरीना की आँखों से गंगा जमुना बह निकली, उसका मन खुशियों से सराबोर हो गया था| वो जब तक बल्लू को धन्यवाद देने के बारे में सोचे, फोन कट गया था| उसने लपक कर बेटी का फोटो उठाया और उसे बेतहाशा चूमने लगी, उसके आंसू फोटो के साथ साथ उसके दामन को भी भिगोते रहे|
इन्स्पेक्टर ने बल्लू को फोन करके उस जगह का नाम बताया, जहाँ उसे जरीना की बेटी मिलने वाली थी| अब बल्लू को बिलकुल भी चैन नहीं था और वो अपनी जीप में कुछ साथियों के साथ निकल गया| शाम होते होते वो उस इलाके के इंस्पेक्टर के पास पहुँच गया| उसने अड्डे का पता बताया और बल्लू को बोला कि वो चुपचाप लड़की को लेकर निकल जाए और किसी को कानोकान खबर नहीं हो| बल्लू अड्डे पर पहुंचा, जरीना की बेटी बुरी हालत में थी, पिछले कुछ दिन उसने जिस हालत में बिताए थे, उसके चलते और कुछ की उम्मीद भी नहीं थी| पुलिस को देख कर जरीना की बेटी एकदम से चौंकी और उसे समझ में आ गया कि अब शायद उसकी रिहाई हो जाए|
इंस्पेक्टर ने उसकी माँ से उसकी बात करायी और बताया कि उसने बल्लू को भेजा है उसे लाने के लिए| जरीना की बेटी ने बल्लू को कस के पकड़ लिया और उसके कंधे पर सर रखकर फूट फूट कर रोने लगी| कुछ देर तक तो बल्लू को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन फिर उसकी आँखों से भी आंसू बह निकले|
"अब चिंता मत कर बेटी, मैं आ गया हूँ" बोलते हुए उसने बेटी को दिलासा दी और फिर वो इन्स्पेक्टर को धन्यवाद देकर जीप से वापस चल पड़ा| पूरे रास्ते बेटी भयभीत रही, रह रह कर वो रो पड़ती थी, बल्लू उसके पास ही बैठा था और उसे दिलासा देता रहा| शाम होते होते बल्लू बेटी को लेकर अपने शहर पहुँच गया और सीधे जरीना के घर पहुंचा| जरीना को लगातार खबर मिल रही थी उसके पहुँचने की और वो बेसब्री से दरवाज़े पर ही खड़ी थी पिछले कई घंटों से| जैसे ही जीप रुकी, बेटी उतर कर भागी जरीना की तरफ, ज़रीना ने भी बेटी को देखा और वो दोनों एक दूसरे से लिपट कर बुरी तरह रोने लगीं| बल्लू कुछ देर ऐसे ही खड़ा जरीना और उसकी बेटी को देखता रहा और फिर वो वापस अपने अड्डे पर चलने के लिए मुड़ा| जरीना ने उसकी बांह पकड़ी और फिर बेटी को लेकर तीनों घर के अंदर चले गए| सबकी आँखों के किनारे भी भीगे हुए थे, जरीना की बेटी तो उससे चिपक कर ही बैठी थी, अभी भी वो उस सदमे से उबार नहीं पायी थी| बल्लू भी माँ बेटी को देखकर मन ही मन भीग गया, शायद पिछले कई सालोँ में पहली बार उसने कोई अच्छा काम किया था जिससे उसके दिल को संतुष्टि हुई थी|
वापस आकर बल्लू सोच में डूबा हुआ था, अब इस नेक काम को करने के बाद उसे अपना काम खटकने लगा| उसे जरीना के रूप में अब एक बहन मिल गयी थी क्योंकि उसकी बेटी को उसने अपना मान लिया था| अब उसके सामने एक बेहतर जिंदगी बिताने के लिए एक मक़सद भी दिख रहा था| लेकिन जिस पेशे में वह था, उससे निकलना इतना आसान कहाँ था| न जाने कितने दुश्मन बन चुके थे और पुलिस में भी उसके नाम से एक बड़ी और बदनाम फाइल थी| इतना तो उसे पता ही था कि वह तभी तक बचा हुआ है, जब तक वो इस पेशे में है| जिस दिन उसने हथियार डाले, या तो दुश्मन और या फिर पुलिस उसका काम तमाम कर देगी| एक झटके में उसने इन सब सोचों को विराम दिया और फिर वर्तमान में आ गया| हाँ, इतना परिवर्तन जरूर हो गया था उसमे कि अब से किसी महिला या लड़की को प्रताड़ित करने वाला कोई काम नहीं करेगा|
उधर ज़रीना ने फैसला कर लिया था कि अब उसे इस घटिया समाज की कोई परवाह नहीं करनी है| उस समाज का क्या फायदा जो वक़्त आने पर पीछे हट जाए और किसी का भला न कर सके| उसने सोच लिया कि बल्लू को अपने घर में बुलाएगी और सारे रिश्तेदारों के सामने उसे अपना भाई बना लेगी| इसी बहाने उसकी बेटी को भी एक पिता जैसे शख्स का साया मिल जाएगा| उसने बल्लू को फोन लगाया, लेकिन उधर से आने वाली आवाज़ ने उसे हैरान कर दिया "ये नंबर मौजूद नहीं है"|
तक़रीबन रोज़ाना ही अखबार में अपहरण और ह्यूमन ट्रैफिकिंग की ख़बरें छपती रहतीं थीं| पढ़ कर वो कई बार बहुत दुखी भी हो जाती थी और अक्सर उसे गुस्सा भी आ जाता था| कोसने लगती थी सबको, कानून व्यवस्था, समय, लड़कों और सबसे ज्यादा अपने आप को| वजह थी उसका लड़की की माँ होना और ऐसी लड़की का जिसका पिता नहीं है| ये इंसानी फितरत ही है जिसमें कमजोर व्यक्ति अक्सर अपने आप को सबसे पहले कारण मान लेता है किसी घटना के लिए, चाहे वो उसके लिए जिम्मेदार हो या न हो| ये स्वभावगत कमजोरी होती है, खासतौर से महिलाओं की, क्यूंकि उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं होते| और यही वजह थी कि जरीना भी अपने आप को इसका जिम्मेदार मानने लगी थी|
रात आँखों में ही बीती और हर खटके पर उसे लगता जैसे वो आ गयी हो| लेकिन सुबह की रौशनी ने जब उसके कमरे में प्रवेश किया, वो कुर्सी पर ही औंधी पड़ी हुई थी| अब तक पड़ोसियों को भी खबर हो चुकी थी और हर कोई अपने हिसाब से कयास लगा रहा था| सबकी अपनी अपनी राय और अलग अलग सलाह, लेकिन ज़रीना को कुछ समझ नहीं आ रहा था| आखिरकार लोगों के कहने पर वो पुलिस स्टेशन गयी| आज पहला अवसर था वहां जाने का और उसका अंतस बुरी तरह कांप रहा था| वैसे भी किसी भी सामान्य व्यक्ति को अगर पुलिस स्टेशन जाना पड़े तो उसकी मनोदशा दयनीय हो जाती है और यही कुछ हुआ था जरीना के साथ भी| कहने को तो पडोसी इस्माइल साथ था लेकिन जरीना से ज्यादा वो खुद घबराया हुआ था|
जैसे ही वो थाने के गेट पर पहुंची, एक बेहद अजीब निगाहों ने उसे घूरा| गेट पर खड़ा संतरी उसे देख कर ही उसकी हालत समझ गया था|
"क्या हुआ, क्यों चली आई यहाँ", उसके सवाल के लहजे और उसकी बंदूक पर उसके कसे हुए हाथ को देखकर वो थर्रा गयी|
"साहब, बेटी कल से स्कूल से वापस नहीं लौटी है", किसी तरह घबराते हुए उसने कहा|
"अपने रिश्तेदारी में पूछा सब जगह?, उसने बेहद रूखे तरीके से कहा|
"हां साहब, सब जगह फोन कर लिया है, कहीं भी नहीं है"|
"अच्छा क्या उम्र थी उसकी", अभी भी वो संतरी सवाल दागे जा रहा था| इस्माइल बिलकुल ख़ामोशी से थोड़ी दूर पर खड़ा था, उसे अब समझ में आ गया था कि सब बात उसको ही करनी है|
"साहब, २० साल की है, मुझे रिपोर्ट लिखवानी है, किससे मिलूं", बोलते हुए वो अंदर की तरफ चली|
"२० साल की है तो अपनी मर्जी से कहीं भाग गयी होगी, जाओ अंदर साहब बैठे हैं"| संतरी की आँखों और चेहरे पर अजीब सा लिजलिजापन था और अंदर जाते समय उसे उसकी निगाह अपना पीछा करती लग रही थी|
अंदर एक टेबल के सामने एक पुलिस वाला बैठा था, टोपी उसने टेबल पर ही रखी थी और उसके शर्ट के सामने के बटन खुले हुए थे| अब बार हिम्मत जवाब दे गयी जरीना की, ये आदमी उसकी मदद क्या करेगा जो खुद ही किसी मवाली जैसा लग रहा हो| उस पुलिस वाले ने आँखों से उसके सारे बदन का एक्सरे किया और बेहद भद्दे अंदाज में दाँत को एक सीक से खोदते हुए बोला "क्या हुआ , किसलिए आई यहाँ पर"|
जरीना ने फिर से वही सब दुहराया और इसने भी वही सवाल पूछा| उसकी ज्यादा दिलचस्पी जरीना को घूरने में थी और जब जरीना ने एक बार फिर हाथ जोड़ कर कहा कि उसकी रपट लिख ले तो उसने टरका दिया|
"उसकी कोई फोटो लायी है तो दे जा और उसके सब यार दोस्तों से पूछ| ऐसी उम्र में कोई प्यार वार का चक्कर ही होता है, भाग गयी होगी किसी यार के साथ| कुछ दिन देख ले, अगर नहीं लौटी तो हम लोग पता लगाएंगे", कहते हुए वो वापस अपने दाँत खोदने लगा|
जरीना ने उसे बेटी कि एक फोटो दी और एक कागज पर अपना नाम और फोन नंबर लिख कर दिया| फिर टूटे क़दमों से बाहर निकली, आज तक उसकी जो भी धारणा पुलिस के प्रति थी, आज वो और पुख्ता हो गयी थी| वही एक दीवार पर लिखा एक वाक़्य "पुलिस आपकी मित्र है" उसे अपना भद्दा मज़ाक उड़ाता लगा|
वापसी के समय इस्माइल बोल रहा था कि अपने एरिया के नेता के पास चलेंगे, वो जरूर मदद करेंगे| जरीना ने सुन के भी अनसुना कर दिया, पता नहीं कितने सवाल वहां भी पूछे जाएँ और आँखों से उसके जिस्म का एक्सरे फिर से हो| घर वापस आकर उसने एक बार फिर सब रिश्तेदारों के यहाँ फोन किया, जवाब हर जगह से नकारात्मक ही था| शाम तक वो लगभग हर परिचित और उसकी सब सहेलियों के यहाँ हो आई थी, कहीं कुछ पता नहीं चल रहा था| अब करे तो क्या करे, पति था नहीं और इकलौती लड़की गायब थी| अब तो एक ही उम्मीद लगी थी कि शायद कोई फोन आये फिरौती के लिए और वो सब कुछ बेच कर भी उसे छुड़ा ले|
तीन दिन बीत गए, फिरौती के लिए कोई फोन नहीं आया, हाँ सब रिश्तेदार और परिचित जरूर फोन करते और कहते कि कोई जरुरत हो तो बताना| सबको पता था कि अभी उसे किस चीज कि जरुरत है लेकिन उसके लिए कोई भी मदद नहीं कर पा रहा था|तीसरे दिन फिर वो पुलिस स्टेशन गयी लेकिन टका सा जवाब मिला कि कुछ पता नहीं चला है, जब पता चलेगा, खबर कर देंगे|
खाना पीना सब छूट गया था, पूरी पूरी रात जाग कर बीत रही थी उसकी| जहाँ भी उम्मीद होती, भागती चली जाती कि शायद कुछ पता चले| जब भी बाहर निकलती, लोग तो सहानुभूतिपूर्वक ही पूछते कि कुछ पता चला, लेकिन उनके लहज़े से लगता जैसे व्यंग ज्यादा कर रहे हों| और पीछे से कई बार वो सुन चुकी थी कि बेटी को ज्यादा पढ़ाने का नतीजा देख लिया, भाग गयी किसी के साथ| कुछ लोगों ने कहा कि अखबार भी देखते रहो, कभी कभी कोई खोया इसमें भी मिल जाता है| कुछ तो इतने बेरहम थे कि उन्होंने कह दिया कि कभी कभी लावारिस लाश की भी फोटो छपती है अखबार में और ये सुनकर उसका कलेजा काँप गया था| लेकिन मज़बूरी में वो अखबार भी देख लेती थी, शायद कोई खबर ही मिल जाए| इन्हीं उलझनों में उलझी हुई थी कि अचानक उसकी नजर अखबार की एक खबर पर गयी, खबर बल्लू के बारे में थी| किसी क़त्ल के केस में उसका नाम उछल रहा था अखबार में और उसे ध्यान आया कि बल्लू तो कभी उसके ही क्लास में पढ़ता था| नाम तो उसका बलबीर था लेकिन सब उसको बल्लू ही कहते थे| शुरू से ही बल्लू की संगत ख़राब थी और वो पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाया| उसके कदम जरायम की दुनिया की ओर मुड़ गए थे और आज अखबार में उसके गुंडागर्दी की ख़बर पढ़कर उसे कुछ अजीब नहीं लगा| उसने क्लास में कभी बल्लू से ज्यादा बातचीत नहीं की थी, वैसे भी वो लड़कों से खुद को दूर ही रखती थी| लेकिन बल्लू की हरकतों के चलते सब उसे जानते थे और कभी कभी बात भी करनी पड़ जाती थी| जरीना सोच में पड़ गयी, क्या वो बल्लू से मिले, शायद वो कुछ मदद कर पाये| लेकिन उसने अपने विचार को ही झटक दिया, कहीं कोई गुंडा भी किसी की मदद कर सकता है, वो तो सिर्फ लोगों को परेशान ही कर सकता है|
कुछ कहानियों में उसने पढ़ा भी था कि कुछ ऐसे बदमाश भी होते हैं जो जरूरतमंदों की मदद करते हैं| रात भर उसके दिमाग में ये सब विचार अंधड़ मचाते रहे, क्या वो बल्लू के पास जाये| किसी से पूछने की न तो इच्छा थी उसकी और उसे उम्मीद भी नहीं थी कि कोई इसमें सही राय दे पाएगा| रात बीती, सुबह होने तक उसने एक फैसला कर लिया था| पुलिस का हाल वो देख ही चुकी थी और नेताओं से कोई उम्मीद वैसे भी नहीं थी| तो अब इसे आजमाने के अलावा और कोई चारा उसे नज़र नहीं आ रहा था, चार दिन में ही रिश्तेदार और परिचित अब बहाने बनाने लगे थे| बेटी को पाने की कम होती उम्मीद ने उसे अब बल्लू के पास भी जाने के लिए मजबूर कर दिया|
ऐसे लोगों का पता लगाना पुलिस के अलावा हर किसी के लिए बहुत आसान होता है| जरीना हैरान भी थी कि कितनी आसानी से उसे बल्लू का अड्डा पता चल गया जबकि पुलिस उसे नहीं ढूँढ पा रही है| वो पता पूछते हुए उसके अड्डे पर पहुंची, अँधेरे से घर में शराब की बदबू और सिगरेट के धुंए की गंध चारो ओर फैली हुई थी| पहले तो वहां के लोगों की चुभती निगाहों ने उसे पस्त कर दिया और उसे पुलिस स्टेशन की याद आ गयी| लेकिन उस अनुभव ने उसकी मदद की और वो उन नज़रों को बर्दास्त करती बल्लू के पास पहुंची| उसने तो बल्लू को पहचान लिया, अखबार में उसकी तस्वीर देखी थी उसने, लेकिन बल्लू उसे पहचान नहीं पाया| उसकी निगाहों में उभरे प्रश्न को समझते हुए उसने पहले अपने स्कूल स्कूल की बात बताई तो वो चौंक गया| अभी भी कुछ लिहाज़ बची थी बल्लू में, वो तुरंत उसे लेकर अंदर के कमरे में गया और जब तक बल्लू कुछ पूछे, ज़रीना फूट फूट कर रो पड़ी| ऐसी स्थिति से बल्लू का पाला बहुत कम ही पड़ता था इसलिए पहले तो उसे समझ में ही नहीं आया कि वो क्या करे, फिर उसने किसी तरह ज़रीना को शांत कराया और आने का कारण पूछा| ज़रीना ने सारा किस्सा एक साँस में कह डाला और उसके सामने हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी| बल्लू के चेहरे पर कई भाव आ जा रहे थे, कुछ तंय नहीं कर पा रहा था वो| समझ में तो उसे आ गया था कि किसी गिरोह ने ही अगवा किया है जरीना की बेटी को लेकिन वो कुछ कह नहीं पा रहा था| अब तो जरीना को लगा कि शायद यहाँ भी उसका आना व्यर्थ ही हुआ, लेकिन वो बल्लू को लगातार आशा भरी निगाहों से देखे जा रही थी|
एक बार तो बल्लू की भी इच्छा हुई कि जरीना को टरका दे, लेकिन फिर जरीना के जुड़े हुए हाथों ने उसे कश्मकश में डाल दिया| आखिर वो उसके साथ पढ़ी थी और बहुत उम्मीद के साथ आई थी| फिर उसने ज़रीना के जुड़े हुए हाथों को अपने हाथों में लेकर दृढ शब्दों में कहा "जाओ जरीना, अपने घर जाओ, बस बेटी की एक फोटो देती जाओ| मैं हर तरह से कोशिश करूँगा कि किसी भी हालत में उसे तुम्हारे पास वापस ले आऊं"|
जरीना ने कृतञता से उसकी ओर देखा और फोटो के साथ नंबर उसे थमा कर बाहर निकली| घर लौटते हुए ज़रीना के क़दमों में एक दृढ़ता आ गयी थी| आज पहली बार वो सोच रही थी कि लोग जिन्हें बुरा कहते हैं क्या सचमुच वो बुरे होते हैं या उन्हें बुरा कहने वाले समाज के ये तथाकथित शरीफ और सभ्य लोग| उसके दुःख में काम आना तो दूर की बात, गलत बाते बनाना और उससे मुंह चुराने लगे थे लोग| क्या एक इंसान का फ़र्ज़ अदा करने वाला बल्लू बेहतर इंसान नहीं है, भले ही वह गुंडागर्दी करता है| अब वो कुछ और सोच नहीं पा रही थी, बस उसे तो बल्लू के रूप में एक ही आसरा दिखाई पड़ रहा था जो उसकी बेटी को ढूँढ सकता था|
जरीना के जाने के बाद बल्लू सर पकड़ कर बैठ गया, अब क्या करे| एक बार तो उसने सोचा कि एक दो दिन बाद वह फोन करके बता देगा कि उसे कोई खबर नहीं मिली| लेकिन जैसे ही उसे जरीना के जुड़े हुए हाथ और उसकी ऑंखें याद आईं, वो सोच में पड़ गया| एक तरफ तो बेमतलब का सरदर्द लग रहा था, दूसरी तरफ उसे किसी की आस दिख रही थी| कहीं न कहीं उसके मन में भी ये बात तो थी ही कि वो भी कुछ अच्छा करे, आखिर दिल से तो वो एक इंसान ही था जिसमे कुछ अच्छी चीजें भी थीं| उसने फोटो और कागज़ उठाकर अलमारी में रख दिया और कुर्सी पर पसर गया| अब उसका दिमाग काफी साल पहले के स्कूल के दिनों की ओर चला गया था, वो जरीना को स्कूल में याद करने की कोशिश करने लगा| बहुत धुंधला सा कुछ उसे याद आया और उसके चेहरे पर मुस्कराहट छा गयी| यही एक पल था जब उसने जरीना की बेटी का पता लगाने का निश्चय कर लिया|
उसने फोन उठाया और अपने लोगों से पता लगाना शुरू किया कि ज़रीना की बेटी को किसने उठाया होगा| रात तक उसे खबर मिल गई कि जरीना की बेटी को जिस्फरोशी के धंधे में डालने के लिए अगवा किया गया है| लेकिन जिस्मफरोशों ने उसे इस जगह से कई सौ किमी दूर पहुंचा दिया गया था| अब उसे वहां से छुड़ा कर लाना बहुत टेंढ़ी खीर थी, वहां पर किसी ऐसे को वो जानता भी नहीं था जिसे मदद के लिए कह सके| बल्लू इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि उसे एक उम्मीद दिखी| उसने फोन उठाया और इलाके के इन्स्पेक्टर को लगाया| सारी बात बताने के बाद उसने उससे मदद माँगी लेकिन इन्स्पेक्टर ये मानने को तैयार ही नहीं था कि बल्लू बिना पैसे लिए ये काम करने जा रहा है| बल्लू ने उसे समझाया कि वो वहां के पुलिस से बात करे, उन सब को उनका हिस्सा मिल जायेगा|
"ठीक है, एक पेटी मुझे चाहिए, बाक़ी वहां वाला जो मांगेगा वो देना पड़ेगा"|
"ठीक है साहब, आप बात करो, पैसा मिल जायेगा", बल्लू ने कहा तो एक बार खुद उसे अपनी बात पर भरोसा नहीं हुआ| बिना पैसे के आज तक कोई काम नहीं किया था उसने और आज सिर्फ एक साथ पढ़ने वाली लड़की के लिए इतना बड़ा काम अपने पैसे से करने जा रहा है| लेकिन कुछ तो था जरीना कि आँखों में, जिसने उसे ये सब करने पर मजबूर कर दिया था| उस इलाके के इंस्पेक्टर से बात हुई, सौदा ३ लाख में पक्का हुआ| पैसों का इंतज़ाम करके बल्लू ने इन्स्पेक्टर को भिजवाए और अब बेसब्री से जरीना के बेटी की रिहाई के बारे में सोचने लगा|
जरीना हर समय फोन को देखती, उसे भी जैसे पूरा भरोसा था कि बल्लू जरूर उसकी बेटी को छुड़ा लगा| जब भी फोन बजता, वो भाग कर उठाती लेकिन फोन बल्लू के अलावा किसी और का ही होता| एक दिन बीत गया था और उसे अफ़सोस हो रहा था कि उसने क्यों नहीं बल्लू का नंबर लिया| अगले दिन फिर चलूंगी बल्लू के पास और एक बार और हाथ जोडुंगी उसके, यही सब सोच रही थी वो कि बल्लू का फोन आया| उसने ज़रीना को बता दिया कि उसकी बेटी का पता चल गया है और उम्मीद है कि अगले दो दिन में वो उसे घर ले आएगा, बस वो इसका जिक्र किसी से न करे और परेशान न हो| जरीना की आँखों से गंगा जमुना बह निकली, उसका मन खुशियों से सराबोर हो गया था| वो जब तक बल्लू को धन्यवाद देने के बारे में सोचे, फोन कट गया था| उसने लपक कर बेटी का फोटो उठाया और उसे बेतहाशा चूमने लगी, उसके आंसू फोटो के साथ साथ उसके दामन को भी भिगोते रहे|
इन्स्पेक्टर ने बल्लू को फोन करके उस जगह का नाम बताया, जहाँ उसे जरीना की बेटी मिलने वाली थी| अब बल्लू को बिलकुल भी चैन नहीं था और वो अपनी जीप में कुछ साथियों के साथ निकल गया| शाम होते होते वो उस इलाके के इंस्पेक्टर के पास पहुँच गया| उसने अड्डे का पता बताया और बल्लू को बोला कि वो चुपचाप लड़की को लेकर निकल जाए और किसी को कानोकान खबर नहीं हो| बल्लू अड्डे पर पहुंचा, जरीना की बेटी बुरी हालत में थी, पिछले कुछ दिन उसने जिस हालत में बिताए थे, उसके चलते और कुछ की उम्मीद भी नहीं थी| पुलिस को देख कर जरीना की बेटी एकदम से चौंकी और उसे समझ में आ गया कि अब शायद उसकी रिहाई हो जाए|
इंस्पेक्टर ने उसकी माँ से उसकी बात करायी और बताया कि उसने बल्लू को भेजा है उसे लाने के लिए| जरीना की बेटी ने बल्लू को कस के पकड़ लिया और उसके कंधे पर सर रखकर फूट फूट कर रोने लगी| कुछ देर तक तो बल्लू को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन फिर उसकी आँखों से भी आंसू बह निकले|
"अब चिंता मत कर बेटी, मैं आ गया हूँ" बोलते हुए उसने बेटी को दिलासा दी और फिर वो इन्स्पेक्टर को धन्यवाद देकर जीप से वापस चल पड़ा| पूरे रास्ते बेटी भयभीत रही, रह रह कर वो रो पड़ती थी, बल्लू उसके पास ही बैठा था और उसे दिलासा देता रहा| शाम होते होते बल्लू बेटी को लेकर अपने शहर पहुँच गया और सीधे जरीना के घर पहुंचा| जरीना को लगातार खबर मिल रही थी उसके पहुँचने की और वो बेसब्री से दरवाज़े पर ही खड़ी थी पिछले कई घंटों से| जैसे ही जीप रुकी, बेटी उतर कर भागी जरीना की तरफ, ज़रीना ने भी बेटी को देखा और वो दोनों एक दूसरे से लिपट कर बुरी तरह रोने लगीं| बल्लू कुछ देर ऐसे ही खड़ा जरीना और उसकी बेटी को देखता रहा और फिर वो वापस अपने अड्डे पर चलने के लिए मुड़ा| जरीना ने उसकी बांह पकड़ी और फिर बेटी को लेकर तीनों घर के अंदर चले गए| सबकी आँखों के किनारे भी भीगे हुए थे, जरीना की बेटी तो उससे चिपक कर ही बैठी थी, अभी भी वो उस सदमे से उबार नहीं पायी थी| बल्लू भी माँ बेटी को देखकर मन ही मन भीग गया, शायद पिछले कई सालोँ में पहली बार उसने कोई अच्छा काम किया था जिससे उसके दिल को संतुष्टि हुई थी|
वापस आकर बल्लू सोच में डूबा हुआ था, अब इस नेक काम को करने के बाद उसे अपना काम खटकने लगा| उसे जरीना के रूप में अब एक बहन मिल गयी थी क्योंकि उसकी बेटी को उसने अपना मान लिया था| अब उसके सामने एक बेहतर जिंदगी बिताने के लिए एक मक़सद भी दिख रहा था| लेकिन जिस पेशे में वह था, उससे निकलना इतना आसान कहाँ था| न जाने कितने दुश्मन बन चुके थे और पुलिस में भी उसके नाम से एक बड़ी और बदनाम फाइल थी| इतना तो उसे पता ही था कि वह तभी तक बचा हुआ है, जब तक वो इस पेशे में है| जिस दिन उसने हथियार डाले, या तो दुश्मन और या फिर पुलिस उसका काम तमाम कर देगी| एक झटके में उसने इन सब सोचों को विराम दिया और फिर वर्तमान में आ गया| हाँ, इतना परिवर्तन जरूर हो गया था उसमे कि अब से किसी महिला या लड़की को प्रताड़ित करने वाला कोई काम नहीं करेगा|
उधर ज़रीना ने फैसला कर लिया था कि अब उसे इस घटिया समाज की कोई परवाह नहीं करनी है| उस समाज का क्या फायदा जो वक़्त आने पर पीछे हट जाए और किसी का भला न कर सके| उसने सोच लिया कि बल्लू को अपने घर में बुलाएगी और सारे रिश्तेदारों के सामने उसे अपना भाई बना लेगी| इसी बहाने उसकी बेटी को भी एक पिता जैसे शख्स का साया मिल जाएगा| उसने बल्लू को फोन लगाया, लेकिन उधर से आने वाली आवाज़ ने उसे हैरान कर दिया "ये नंबर मौजूद नहीं है"|
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